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जीवनी

सुब्रह्मण्यम भारती : व्यक्तित्व और कृतित्व
मंगला रामचंद्रन

अनुक्रम 15. युवा शक्ति को स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ना पीछे     आगे

मैंने अग्नि पक्षी के एक चूजे को देखा। उसे जतन से एक वृक्ष के कोटर में रख दिया। उससे पूरा वनप्रांत ही जल कर राख हो गया। उसी तरह हमें परिपक्व और युवा शक्ति में अंतर न कर संग्राम सें जोड़ना है।

पुदुचैरी में जब इंडिया पत्रिका जम गई थी तो भारतीजी ने एटैयापुरम में अपने एक मित्र को पत्र लिखा कि कुछ देशभक्त युवकों को पत्रिका में काम करने भेजें। इस तरह पी.पी. सुबैया, वी.हरिहर शर्मा तथा एन. नागस्वामी तीनों वहाँ पहुँचे। सुबैया अच्छे लेखक थे और इनके आलेखादि प्रकाशित होते रहते थे। जब 'इंडिया' पत्रिका 1910 में बंद हो गई तो वापिस अपने गाँव जाकर एक पाठशाला को चलाने लगे।

हरिहर शर्मा भारतीजी के दूर के रिश्तेदार थे। 'इंडिया' पत्रिका के बंद होते ही स्वतंत्रता संग्राम के काम में जुट गए। बाद में गांधीजी के साथ उनके आश्रम में रहे और हिंदी प्रचारक बने। उन्होंने 'दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा' का प्रसार किया। भारतीजी की मृत्यु के बाद 'भारती प्रकाशन' के तीन प्रकाशकों में से एक हरिहर शर्मा थे। भारतीजी की पुस्तकों का प्रकाशन और प्रसार में इनका योगदान अभूतपूर्व था। जून 1971 में चेन्नै में इनकी मृत्यु हुई।

एन नागस्वामी पुदुचैरी में ही बस गए थे। अत्यंत गरीबी में 18 मई 1971 में एक झोपड़ी में उनकी मृत्यु हुई थी। भारतीजी के बारे में लिखे उनके आलेख पुस्तकाकार में सुरक्षित है। यही नागस्वामी व.वे.सू. अय्यर के बाया हाथ थे। इन्होंने 'धर्मालयम' नामक वाचनालय तथा 'धर्मम्' नामक एक पत्रिका निकाल कर युवकों को स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ने में मदद की। शारीरिक-मानसिक विकास के साथ ही शस्त्रादि चलाने की शिक्षा, व अन्य कार्य कलापों को किस तरह पूरा करें, इन गतिविधियों में नागस्वामी के अलावा एक और प्रमुख व्यक्ति भी थे जिनका नाम था कण्णु पिल्ले। वांछीनाथन को जब एश का काम तमाम करने का बीड़ा दिया गया था तब इन्हीं दो प्रशिक्षकों ने उसके माथे पर रक्त तिलक लगा कर पिस्तौल देकर भेजा था।

भारतीजी की बड़ी बेटी तंगम का विवाह इन्हीं नागस्वामी के साथ करने की बात भी हो रही थ। नागस्वामी अरविंदजी को भी उतना ही मानते थे जितना भारती को। सन 1920 में नागस्वामी का विवाह एक क्रिश्चियन लड़की से ब्रम्ह-समाज रीति से अरविंद घोष ने करवाया।

कण्णु पिल्ले का पूरा नाम था मुत्तु कुमारस्वामी पिल्ले। इन्होंने पुदुचैरी में ही शिक्षा पूरी की और फ्रेंच सरकार के विद्यालय में तमिल के आचार्य की नौकरी की।

जवानी में कदम रखते ही स्वदेशी का जुनून सा हो गया था। भारती तथा व.वे.सू. अय्यर की संगत होने से सी.आई.डी. पुलिस इन पर भी नजर रखे हुए थी। उनके बारे में पुलिस ने गलत भ्रांति फैला कर अफवाहों को जन्म दिया था। जिस कारण कण्णु पिल्ले बहुत नाराज थे और उनको सबक सिखाना चाहते थे। सन 1914 में उन्होंने एक पुलिस वाले से उसकी डायरी छीन ली जिसमें वो क्रांतिकारियों के बारे में गतिविधियाँ नोट करता था। इसमें भारती, अरविंद घोष, व.वे.सू. अय्यर, श्री निवासचारी तथा कण्णु पिल्लै के बारे उन लोगों की क्या राय है ये पता चलता है। बाद में भारत की आजादी, फ्रेंच आधिपत्य से आजादी के लिए सदा जुटे रहे। सन 1943 में 63 वर्ष की आयु में परलोक सिधार गए।

सन 1910 में नीलकंठ ब्रह्मचारी ने तेनकाशी में एक गुप्त सभा बुलाई। इसमें स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े प्रसिद्ध व्यक्ति व.उ. चिदंबरम को अपना गुरु मानने वाले एस.एम. माडस्वामी पिल्लै इस सभा में आए। अपने खून से तिलक करवा कर नीलकंठ के संघ की शपथ ली। संघ के उपस्थित सदस्यों ने अपने-अपने बदले हुए नाम उपयोग करने का तय किया। नीलकंठ ब्रह्मचारी का नाम 'कमलनायकी' हुआ और माडस्वामी का 'राममूर्ति'।

बहुत समय पहले गरीब माडस्वामी कोर्ट के किसी केस में फँस गया था। उस केस में व.उ. चिदंबरम ने अपने पिता के खिलाफ कोर्ट में बहस करके केस जीत लिया था। तब से माडस्वामी चिदंबरम के स्वदेशी राजनीति तथा जहाज कंपनी में जी जान से कार्य करने लगे। एक बार विरोधियों ने जहाज के नीचे बम लगा दिया था। पता चलते ही माडस्वामी ने अपनी जान पर खेल कर उसे नाकाम (कमनिेम) कर दिया था। व.उ. चिदंबरम तथा शिवा को जब 'स्वराज्य दिवस' के समय गिरफ्तार किया था। विरोध में जनता के प्रदर्शन में माडस्वामी भी एक आरोपी माना गया। गिरफ्तारी से बचने के लिए वो पुदुचैरी में आरूमुखम चेट्टियार के यहाँ छुप कर रहने लगा। एक दिन फ्रेंच पुलिस उनके यहाँ दबिश देने आ गई। एक कमरे में धान के बोरों के बीच में छिप कर किसी तरह बचने में कामयाब हो गया।

एश की हत्या के बाद वांछीनाथन के घर पर जाँच पड़ताल की गई। उसमें उसके मित्रों के पत्र मिले जिससे कुछ जानकारियाँ मिली। तब पुलिस ने एक नोटिस छपवाया था कि जो व्यक्ति माडस्वामी का पता बताएगा उसे एक हजार रुपये का ईनाम मिलेगा। इसके बाद वो कोलंबो जाकर न जाने कहाँ गायब हो गया। किसी ने कहा मलाया चला गया। बाद में किसी ने उन्हें गंजे सिर वाले संन्यासी के रूप में देखा।


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