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जीवनी

सुब्रह्मण्यम भारती : व्यक्तित्व और कृतित्व
मंगला रामचंद्रन

अनुक्रम 16. नीलकंठ ब्रह्मचारी पीछे     आगे

उन दिनों दक्षिण भारत में पुलिस जिससे डरती थी वे व्यक्ति थे स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े हुए क्रांतिवीर नीलकंठ ब्रह्मचारी। भारती और व.उ. चिदंबरम बाल गंगाधर तिलक के अनुयायी थे और नियमबद्ध तरीके से आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे। उस समय नीलकंठ ब्रह्मचारी युवकों को इकट्ठा कर, प्रशिक्षित कर अँग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई लड़ने की प्रेरणा दे रहे थे। वे तंजापुर के एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए थे। सन 1907 में विपिन चंद्र पाल का चेन्नै में क्रोध और आवेश से भरे भाषण से प्रभावित होकर राजनीति में कूद गए। धीरे-धीरे बंगाल के क्रांतिकारियों से जुड़ते गए और स्वयं भी क्रांतिकारी बन गए।

जर्मनी के राजा केयसर ने बड़ौदा और अन्य कुछ रियासतों के अधिपतियों को अँग्रेजों के खिलाफ उकसाया। इन रियासतों के अलावा बंगाल के अरविंद घोष व अन्य क्रांतिकारियों ने मिल कर जर्मनी से अस्त्र-शस्त्र लेकर अपनी एक अलग सेना बनाई। सन 1857 के गदर की तरह एक बड़ा विद्रोह कर अँग्रेजों को मार भगाने का उद्देश्यों था। इस उद्देश्यों में दक्षिण भारत से नीलकंठ ब्रह्मचारी प्रतिनिधि के रूप में थे। इन्हीं के शिष्य के रूप में वांछीनाथन इनके दल में शामिल हुआ था। एश की हत्या के मुकदमे में नीलकंठ को राजद्रोह का आरोपी बना कर सात साल की कड़ी सजा सुनाई गई थी।

तय योजनानुसार सन 1914 में जर्मनी ने प्रथम विश्वयुद्ध की शुरुआत कर दी थी। नीलकंठ ब्रह्मचारी कैद से छुपते हुए निकल तो गए पर दुर्भाग्यवश तीसरे ही दिन फिर पकड़े गए। उनकी इस कारस्तानी के लिए सजा की अवधि छ महीने और बढ़ा दी गई। इस प्रकार आठ वर्ष जेल की कड़ी यातना भुगत कर वो छूट कर आए। गरीब और बेसहारा होकर वे भटक रहे थे। सन 1921 में पुदुचैरी में भारतीजी के घर पहुँच गए। वहाँ भरपेट खाना खाया और भारती की बेटी के दिए हुए दो आना (उस समय की मुद्रा) लेकर चले गए।

नीलकंठ जैसे देशभक्तों को देख कर भारती द्रवित हो गए और उनके कवि हृदय से विभिन्न उद्गार फूट पड़े। जिन्होंने उनके संग्रहों में भी जगह बना ली। भारतीजी के जीवन के आखिरी दिनों में जो लोग उनके पास बने हुए थे उनमें नीलकंठ भी एक थे। भारती की मृत्यु के बाद अपने एक मित्र के साथ कम्युनिस्ट पार्टी का प्रचार करते हुए पकड़े गए। फिर जेल में दस वर्ष की सजा काटी। इन दस वर्षों में जो यातना भुगती उसने उन्हें आत्ममंथन की ओर मोड़ दिया। जिससे उनके मन की उथल-पुथल, बेचैनी सब शांत हो गई। सन 1930 में वो रंगून की जेल से छूट कर बाहर आए। एक वर्ष तक तो वो पत्रिकाओं में लिखते-छपते रहे। बाद में संन्यासी होकर यायावरी हो गए।

संन्यासी बनने के बाद भी उनका संपर्क राजपरिवारों व बड़े लोगों से बना रहा। पर सबसे ऊब कर वे जगह-जगह घूमने लगे। अंत में मैसूर राज्य के कोलार जिले में पहाड़ी की तली में एक आश्रम बना कर एकांत में रहने लगे। सन 1978 में अठ्यासी (88) वर्ष की आयु में सद्गुरु ओंकार नामक क्रांतिकारी साधु के रूप में मृत्यु को प्राप्त हुए। इनकी कुछ बेहतरीन पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं।


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