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जीवनी

सुब्रह्मण्यम भारती : व्यक्तित्व और कृतित्व
मंगला रामचंद्रन

अनुक्रम 17. भारती और युवा खून पीछे     आगे

वैसे तो भारती अपनी युवावस्था में ही थे पर उनके बुद्धिचातुर्य और मेधा से उनकी ओर आकर्षित होने वाले युवाओं की संख्या कम नहीं थी। पुदुचैरी के अनेक युवा उनसे मिलने, चर्चा करने के लिए एक तरह से लालायित ही रहते थे। भारती को भी उनसे वार्तालाप करना बहुत सुहाता था।

तिरुच्चि के एक नेता रंगस्वामी अय्यंगार ने अरविंद घोष के पुदुचैरी पहुँचने की खबर पाने के लिए एक युवा रामस्वामी अय्यंगार को भेजा। रामस्वामी पुदुचैरी पहुँच कर भारती और अरविंद दोनों से बहुत प्रभावित हुआ। लोग मजाक करते थे कि रामस्वामी दोनों में से किसका भक्त है!

ऐसे अनेकों युवा समय-समय पर आते रहते, कुछ समय उन लोगों के साथ रहते और स्वतंत्रता संग्राम के कार्यों में लग जाते। इन देशभक्तों और इनके कार्यों के लिए आर्थिक संसाधन जुटाना जरा भी आसान नहीं था। इस कठिन कार्य को युवा रामस्वामी अय्यंगार संपादित करते थे। इसके लिए इन्होंने घी के व्यापार और पुस्तक विक्रेता का ढोंग किया। पुदुचैरी में एक प्रमुख व्यापारी आरूमुकम चेट्टियार के यहाँ चेन्नै से घी के टिन आया करते थे। इसी घी में रुपयों के सिक्कों को डाल कर धन को भेजा जाता था। बुक पोस्ट में पुस्तकें आती और मुखपृष्ठ को फाड़ने पर रुपयों के नोट रखे मिलते।

अमृता नाम से जाने जाते आरावूमुद अय्यंगार ऐसे युवा थे जिसने भारतीजी को अपरिमित स्नेह और आदर दिया था। ये बाद में अरविंद आश्रम में एक जिम्मेदार पद पर काम करते रहे थे।

कनक सुबरत्नम भारती से अत्यंत प्रभावित युवा थे। उन्होंने 'भारतीदासन' उपनाम से काफी लिखा। ये युवा भारती से कभी मिले नहीं थे। एक सरकारी स्कूल में शिक्षक थे। कुछ कठिनाइयों के बाद उन्होंने इंडिया की प्रतियाँ प्राप्त की, 'भारती गीतगंज' (भारती के गीत) की प्रति भी उन्हें मिली। एक विवाह समारोह में इसी पुस्तक का एक गीत, स्वतंत्रता के बारे में उन्होंने भावपूर्ण होकर गाया। भारतीदासन ने गाते-गाते ध्यान दिया कोई भी उनकी ओर देख ही नहीं रहा है। बल्कि एक ऐसे व्यक्ति को सब ध्यान से देख रहे थे जो सुंदर नाक नक्श और ओजपूर्ण चेहरे का मालिक था। जब गीत समाप्त हुआ तो वही व्यक्ति करीब आए और प्रशंसा करते हुए बोले - 'शब्दों को समझकर, दिल से बहुत अच्छा गाया।' तब जाकर भारतीदासन को पता चला कि वही व्यक्ति गीत के रचनाकार और उनके आराध्य भारतीजी हैं। उस समय वो संकोच से भर गए। बाद में भारतीजी के प्रोत्साहन से वो स्वयं लिखने लगे, तभी अपने आपको 'भारती दासन' मान लिया और इसी उपनाम से लिखने लगे। बाद में इन्होंने एक पत्रिका 'भारती कविता मंडलम्' निकाली जिसे काफी अरसे तक चलाया। इसमें मात्र कविताओं को ही स्थान मिलता था, पूरी तरह से पद्य रचनाओं की पत्रिका थी। भारती से मित्रता के बाद इन्होंने समाज सुधार की कविताएँ लिखनी शुरू की। इनके अलावा भी अनेकों युवा भारती के कविताओं, आलेखों तथा ओज भरे उद्गारों से प्रभावित होकर देश सेवा की ओर मुड़े थे।


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