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जीवनी

सुब्रह्मण्यम भारती : व्यक्तित्व और कृतित्व
मंगला रामचंद्रन

अनुक्रम 19. भारती और देश की शीर्ष हस्तियाँ पीछे     आगे

भारतीय जिस तरह गुलामी , दरिद्रता और अनके तरह की परेशानियों में जी रहे हैं , इन्हें ऊँचा उठा कर अपनी मर्जी से जीने की आजादी दिलाने आए हैं। गांधीजी अमर रहे। (गांधीजी के प्रति उद्गार)

भारती ने जब से एक बड़े और विशाल जगत में प्रवेश किया वे दुनिया भर की हलचलों और खबरों से मानसिक रूप से जुड़ गए थे। जिसके कारण अपने पत्र-पत्रिकाओं में इन हलचलों को प्रमुखता से प्रकाशित करते थे। साथ ही प्रमुख व्यक्तियों, लेखक-कवि, राजनेताओं के बारे में उनकी राय बनी हुई थी जिसे वो प्रकट भी करते थे। ऐसे कुछ प्रमुख व्यक्तियों के बारे में। महात्मा गांधी भारती प्रथम बार गांधीजी से सन 1919 में राजाजी के घर पर मिले थे। गांधीजी सन 1919 में रूलेट एक्ट का विरोध करने के लिए, बाकी नेताओं से चर्चा करने राजाजी के घर चेन्नै आए हुए थ। राजाजी (चक्रवर्ती राजगोपालाचारी) के अलावा सत्यमूर्ति, ए. रंगस्वामी अय्यंगार आदि भी थे। भारती सीधे गांधीजी की गद्दी के सामने उन्हें अभिवादन कर पास में ही बैठ गए। बाकी लोगों को उनकी ये निडरता गांधीजी का अपमान सा लगा था। भारतीजी की एक जनसभा उस दिन शाम को थी और उनका लक्ष्य था कि अगर गांधीजी उस सभा में अध्यक्षता करें तो जनता को जोश और उत्साह कई गुना बढ़ जाएगा। सो उसी झोंक में उन्होंने गांधीजी से शाम की बात कही और गांधीजी ने अपने सचिव महादेव देसाई से पूछ कर उस दिन उनका पहले से ही तय कार्यक्रम बताया। भारती फिर रुके नहीं और उनकी चर्चा और पहल को शुभकामनाएँ देते हुए लौट गए।

भारती के प्रस्थान के बाद गांधीजी ने पूछ कर जाना कि वो महाकवि भारती हैं। तब गांधीजी ने कहा, इनकी देख भाल और हिफाजत आवश्यक है। इस बात का अलग-अलग व्यक्ति अलग अर्थ निकालने लगे। उस मुलाकात के बारे में कुछ लोगों की भारती के प्रति गलत धारणा भी बनी थी कि भारती ने गांधीजी के प्रति सही तरीके से आदर नहीं दिखाया। जबकि सन 1909 में ही उन्होंने 'इंडिया' पत्रिका में गांधीजी को काँग्रेस का सभापति चुनने का विचार देकर गांधीजी पर अपनी श्रद्धा और अपना विश्वास प्रकट कर दिया था। भारती के अनुसार गांधीजी में जनता को इकट्ठा कर एक लक्ष्य की ओर ले जाने का जो दम है वो और कोई नहीं कर सकता। सरकार के विरोध में एक भीड़ को खड़ा करना वो भी सात्विक तरीके से उसके लिए गांधीजी से बढ़ कर कोई नेता नहीं है।

सन 1919 में गांधीजी से प्रत्यक्ष मिल कर भारती इतने उत्साहित हुए कि उनके दिल से दो बहुमूल्य गीतों की उत्पत्ति हुई। 'भारतमाता नवरत्न माला' और पाँच पदों की 'महात्मा गांधी पंचकम्'। महात्मा गांधी पर बने गीतों में यह सर्वश्रेष्ठ है।

भारती की मृत्यु के बाद की बात है। 1928 में उनकी गीतों को जब्त कर रोक लगाया गया। चेन्नै की अदालत में श्री सत्यमूर्ति ने पेटीशन दायर कर इसका विरोध किया। गांधीजी ने अपने 'यंग इंडिया' में इस घटना की भर्त्सना की और 'न्याय पगला गया' शीर्षक से प्रकाशित किया। इसी के साथ भारती के अठारह गीतों का राजाजी द्वारा किए गए अनुवाद व राजाजी की टिप्पणी सहित 'यंग इंडिया' के अंकों में प्रकाशित करते रहे। गांधीजी को भी इन गीतों ने प्रभावित किया और 'नवजीवन' में उन्होंने अपने विचार प्रकट किए। 'गुजरात में भारती का नाम परिचित हो गया है'। ये बहुत अर्थवान बात है।

साबरमती आश्रम के उद्योग मंदिर के मुखपत्र मधुपुड़ में श्री जगतराम दवे ने 'नेंच्चु पोरुकदिल्लै' अर्थात 'हृदय को तसल्ली नहीं होती' का गुजराती अनुवाद छापा। जिसे गांधीजी ने सराहा और उनका विचार था कि हम भारतीजी के लेखन से बहुत कुछ सीख सकते हैं। भारतीजी ने जब भगवत गीता का तमिल अनुवाद किया तब गांधीजी ने उन्हें तमिल में ही आशीर्वचन लिख कर दिए।

भारती के ऊपर कितने ही लोगों ने कितनी ही पुस्तकें लिखी। इनमें से श्रीयुत मु. श्रीनिवासन (जो कि उच्च पदों पर रहे और विश्व की कई देशों की यात्रा की, तथा कलकत्ता में 1947 से 1995 तक रहे और अभी चेन्नैवासी हैं) ने अपने बुडापेस्ट प्रवास में वहाँ के राष्ट्र कवि बेट्टाफी के बारे में जाना। उन्हें भारती की कविताओं और बेट्टाफी की रचनाओं में कई गुणों में समानता लगी। दोनों ही श्रेष्ठ रचनाएँ हैं, ऐसा उनका मानना है। इसी तरह इटली (रोम) की स्वतंत्रता के लिए प्रयासरत रहे तीन प्रमुख व्यक्तियों में माजिनी एक थे। भारती ने इनके साहस और देशभक्ति तथा राजनीति में इनके सहयोग को सराहा और उस पर भावपूर्ण, बहुत ही सुंदर गीत लिखा।

वर्तमान में हममें से अधिकांश लोग वैश्वीकरण की पहल कर रहे हैं जिसकी पहल भारतीजी ने आज से सौ से भी अधिक वर्ष पूर्व कर लिया था। अपने छोटे से गाँव से निकल कर उन्होंने जो देखा, पाया उससे वे विशालमना दृष्टिकोण और उदार हृदय के स्वामी बने।

भारती जिन नायकों से अत्यधिक प्रभावित हुए थे उनमें बाल गंगाधर तिलक व अरविंद घोष, स्वामी विवेकानंद प्रमुख थे। अरविंद घोष के साथ तो वो, आठ वर्ष पुदुचैरी में रहे। कहने को दोनों अलग-अलग मकान में रहते थे पर बिना नागा प्रतिदिन शाम को मिलते और घंटों विभिन्न तरह की चर्चा में रत रहते थे। भारतीजी की पत्नी चेल्लमाँ ने अपनी एक पुस्तक में इस बारे में इस तरह लिखा है - 'भारती प्रतिदिन बिना खाना खाए भले ही रह जाएँ पर अरविंदजी से बिना मिले नहीं रह सकते।'

अरविंद घोष बंगाल के एक प्रतिष्ठित परिवार में सन 1872 में पैदा हुए थे। उनके पिता ने उन्हें आठ वर्ष की उम्र में ही इंग्लैंड भेज दिया। वहाँ 1892 में ऑनर्स की डिग्री ली और अगले ही वर्ष आई.सी.एस. की परीक्षा भी पास की। पर घुड़सवारी में नाकाम हो जाने से उनका चयन नहीं हो पाया। इन्होंने लैटिन, ग्रीक भाषाएँ तो अच्छी से सीखी ही थी, साथ में इटालियन और जर्मन भाषा का भी काफी ज्ञान था। यूरोप की भाषाओं और आधुनिक रहन-सहन से भी भली भाँति परिचित थे। अपनी मातृभाषा बंगला का ज्ञान भी विदेश से लौट कर सन 1893 में ही प्राप्त किया। सन 1906 तक बड़ौदा महाराजा के यहाँ कार्य करते रहे। इसी समय इन्होंने मराठी और गुजराती बोलना भी सीख लिया।

अरविंद एक संपन्न घराने के पुत्र थे। जबकि भारती एक छोटे गाँव के साधारण परिवार से थे। जिन्होंने माँ को बाल्यावस्था तथा पिता को किशोरावस्था में खो दिया। सदा कष्टों और दरिद्रता में ही जीवन बिताया। भले ही दरिद्रता को एक तरह से उन्होंने ही अपनी दरियादिली से दान-पुण्य दे देकर न्यौता दिया हो। भारती को अपनी अवस्था पर हीनता बोध नहीं होता था। शायद इसीलिए वो जिसे पसंद करते थे, आदर करते थे उनसे बिना झिझक मिलते और खुल कर बात करते थे।

अरविंद घोष 1893 से लगभग आठ-नौ वर्ष तक 'इंदु प्रकाश' नामक पत्रिका में राजनीति से संबंधित पत्र लिखते रहे। 1902 में ही उन्होंने तीव्र गतिविधियों में प्रवेश किया। खास कर सन 1905 में बंग-विभाजन के बाद तो जनता में भी सरकार के प्रति विरोध की भावना जाग उठी थी। उस समय भारती और अरविंद ने अपने आपको देश पर समर्पित कर दिया।

सन 1905 में काशी में हुए काँग्रेस महाअधिवेशन से कलकत्ता लौट कर अरविंद विपिन चंद्र पाल की 'वंदे मातरम्' पत्रिका से जुड़ गए। 1906 में दादाभाई नौरोजी के नेतृत्व में कोलकाता में जुड़े काँग्रेस अधिवेशन मे देशी शिक्षा व विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार ये दो मुद्दे खास थे। 1907 में सूरत अधिवेशन में एक प्रमुख मोड़ आया। बा.गं. तिलक, लाला लाजपत राय, अरविंद घोष, विपिन चंद्र पाल आदि तीव्रवादियों (उग्रवादी) ने दल से बाहर आकर अपना अलग दल बनाया। दक्षिण भारत से भारती और व.उ. चिदंबरम आदि भी इस अधिवेशन में गए थे। लौट कर भारती ने एक पुस्तक 'एंगल काँग्रेस यात्रै' अर्थात 'हमारी काँग्रेस यात्रा' लिख कर प्रकाशित की।

जहाँ तक पता चला भारती की अरविंद से पहली भेंट सूरत में ही हुई। भारती उनसे इतने प्रभावित हुए कि 'इंडिया' के हर अंक में उनका जिक्र करते थे। भारती और अरविंद दोनों ही के लेखों से ब्रिटिश सरकार उनसे खार खाती थी। दोनों को कैद करने के बहाने ही ढूँढ़ा करती थी। चाहे फिर खुदीराम बोस और जग्गी द्वारा मजिस्ट्रेट किंग्ज फोर्ड की गाड़ी पर फेंका गया बम हो, जिसमें दो महिलाएँ मारी गईं। 'जुगांधर' नामक क्रांतिकारी दल के 26 सदस्यों के साथ अरविंद को कैद कर लिया गया। उन पर दो आरोप लगाए गए एक देशद्रोह का दूसरा किंग्ज फोर्ड की हत्या की साजिष का। उस समय अरविंद की आर्थिक हालत बहुत खराब थी। उनकी पैरवी चित्तरंजनदास नामक नामी और देशभक्त वकील ने की। लगभग 126 दिन चले इस मुकदमे में अरविंद के छोटे भाई तथा एक और को फाँसी की सजा सुनाई गई। कई अन्य को विविध सजाएँ सुनाई गई। अरविंद निर्दोष साबित हुए। इतने दिन अलीपुर जेल में रहे थे। ऐसा कहा जाता है कि जेल में रहते हुए उन्हें ईश्वर के दिव्य दर्शन हुए।

शायद इसीलिए जेल से बाहर आकर उनका व्यवहार कुछ बदला हुआ लगा। लोगों से बातें करते हुए एक क्रांतिकारी देशभक्त की तरह न लग कर एक दिव्यात्मा की तरह लगते थे। पर उनके इस बदले व्यवहार पर भी शक करने के कारण उन्हें पुदुचैरी में अज्ञातवास करना पड़ा। भारती और वो लंबे समय साथ रह पाएँ। अरविंद का आश्रम जो पांडिचेरी में अरविंदो आश्रम से प्रसिद्ध है। इस आश्रम के प्रमुख पदाधिकारी अमृता (आरावुमुद अय्यंगार) भारती को भी आदर और स्नेह करते थे। उनके अनुसार इन दो महान विभूतियों के मिलन, मित्रता और साथ रहने से साहित्य पुनः पल्लवित, पुष्पित हुआ। अरिवंदजी की शरण में जाने से पूर्व ही अमृता भारतीजी से प्रभावित हो गए थे। भारती के जीवन और कार्यशैली के कारण ही अमृता भी पुरानी परिपाटी, अंधविश्वास आदि छोड़ कर विशाल और उदार हृदय के बने। इन्होंने लिखा है भारती के जीवन को समुचित रूप से देखने बाद लगता है कि वो पैदायशी कवि थे। बाद में जब उन्हें लगा कि वे भारत माँ के पुत्र हैं तब अपने आपको उन्होंने शक्तिपुत्र के रूप में पाया।

उन्होंने नवरात्रों में देवी की शक्तिपूजा के गीत बना कर गाए। कई अवसरों पर उनकी शक्तिपूजा के उदाहरण मिलते हैं।

अरविंदजी के प्रथम शिष्य जो उनके साथ लंबे समय तक रहे नलिन कांत गुप्ता ने लिखा है - शाम को वे अपने आसन पर बैठते और हम सब उनके ईर्द-गिर्द। भारती और मैं इस कक्षा के सबसे अधिक उत्साहित 'छात्र' थे। भारतीजी ने इसके बाद जो गीत लिखे उनमें से कुछ एक तरह से अरविंद द्वारा प्रेरित थे। खास कर 'अग्नि' तथा 'वेलवी' (बलिदान)

भारती अरविंद के वेदज्ञान को सराहते थे और इसके लिए आदर भी करते थे। अरविंद के कविता संग्रह 'अहना' की समीक्षा में लिखते हैं - अरविंद का वेदों का गूढ़ चिंतन और शोधरूपी ज्ञान तो दिखता ही है, साथ ही सात्विक तरीके से वेद ऋषियों की तरह पारदर्शी ज्ञान भी दिखता है।

अरविंद के एक शिष्य कपाली शास्त्री भारती से जब पहली बार मिले तो उनका वेदज्ञान देख कर बहुत प्रभावित हुए। फिर उनको पता चला कि उन्होंने ये ज्ञान अरविंदजी से अर्जित किया।

भारती की बड़ी बेटी तंगम ने कहा था कि वो अपने लिखे नए गीतों को पहले पत्नी चेल्लमा को सुनाते तत्पश्चात अरविंद, श्रीनिवासचारी, व-वे-सू अय्यर को सुनाते थे। कई बार उन सभी की आर्थिक हालत बहुत खराब हो जाती और अगले भोजन का भी ठिकाना नहीं होता। उस समय अरविंद ने कहा है - 'काश हम लोग भी इस चिंता से मुक्त होकर भारती की तरह जीना सीख लें।' उन्हें उस समय एक जोड़ी चप्पलों की अत्यधिक आवश्यकता थी। उनकी पुरानी जोड़ी भारती पहन कर चले गए थे। ऐसी थी इन लोगों की मित्रता।

कुछ समय पुलिस अधिक परेशान करते हुए रात-बेरात तलाशी लेने आ जाती थी। तब जितनी महिलाएँ थी वो मुरूगेश पिल्लै के यहाँ और जितने पुरुष वो अरविंदजी के घर सोया करते। नए-नए नियम-कानून बनाने और लागू करने की बातें इन लोगों के कानों में पड़ती और सब चिंतित हो जाते। अरविंद के चेहरे पर भी चिंता झलकती क्योंकि ये कानून इनका मनोबल तोड़ने के लिए ही बनते थे। सबको आश्चर्य इस बात का होता था कि भारती पर इन सब बातों का कोई असर ही नहीं पड़ता। न तो उनका मनोबल टूटता ना ही उनका हास्य और देशप्रेम का जज्बा।

अरविंदजी को दक्षिण भारतीय खाना पसंद था, खास कर सांभार और दक्षिण भारतीय पापड़। इतना सब होने के बावजूद भारती का मन पुदुचैरी में नहीं लग रहा था। आर्थिक स्थिति भी इसका एक प्रमुख कारण था। जिसे भुलाने के लिए वो कभी आम के बगीचे में तो कभी समुद्र किनारे निकल जाते। अरविंदजी तो अपने आत्म साधना में लीन रहने लगे। आखिर भारती ने पुदुचैरी छोड़ने का मन बना ही लिया। तब आखिरी बार दोनों मिले तो अरविंदजी की शांत आँखों में आँसुओं का समुद्र था और भारती की वीरता से भरी आँखें भी सजल थी।

बंगाल के प्रबुद्ध लेखक-कवि एवं प्रतिष्ठित व्यक्ति जिनके लेखन और वाक्चातुर्य से भारती चमत्कृत थे उनका नाम है गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर। भारती से उम्र में 20 वर्ष बड़े तथा भारती की मृत्यु के बाद 20 वर्ष तक जीवित रहे गुरुदेव रवींद्रनाथ चेन्नै आए जरूर पर दोनों मिले नहीं। एनी बेसेंट जो भारती को अच्छे से जानती थी और उन्हें जेल से छुड़ाने में मदद भी की थी, उन्हीं के घर कवि गुरु रुके थे। भारती ने टैगोर के बारे में लगातार अपनी पत्र-पत्रिकाओं में लिखा, उनकी कई रचनाओं का अनुवाद किया और छापा। रचनाओं को सराहा और जापान में उनके भाषण पर खुशी जाहिर करते हुए कहा कि 'जो व्यक्ति मात्र स्वयं के लिए लिखता है वो बड़ी बात नहीं है। जो अपने लेखन से अपने देश के लिए सम्मान प्राप्त करता है वो अहम बात है।' उन्होंने लोक गुरु शीर्षक से इस आलेख को लिखा था, जिससे हम समझ सकते हैं कि उनके मन में टैगोर के प्रति कितना आदर-सम्मान था। वे देशवासियों से भी इसके लिए आह्वान करते हैं। संगीत प्रेमी भारती गुरुदेव के रवींद्र संगीत से भी प्रभावित थे तथा अपने आलेख गुरुदेव के कथन को उद्धृत करते हुए लिखा था - 'यूरोपीय संगीत जड़ है जबकि भारतीय संगीत सूक्ष्म है। उनका लौकिक है तो भारतीय अलौकिक, उनके संगीत में मानवी शक्ति दिखती है और हमारे संगीत में दैवीय शक्ति।'

भारती ने उनकी अनेक कहानियों व अन्य रचनाओं का अँग्रेजी से तमिल अनुवाद किया। कलकत्ता के मॉडर्न रिव्यू में प्रकाशित पाँच आलेखों को 'पंच व्यासम' शीर्षक से पुस्तकाकार में प्रकाशित किया।

उनकी अनुवादित कहानियों के संग्रह को उनकी मृत्यु के उपरांत सन 1923 में, उनको स्नेह करने वाले मित्र श्री मंडेयम श्रीनिवासचारी द्वारा प्रकाशन में आया। इसमें प्राक्कथन वरिष्ठ प्राध्यापक श्री यज्ञनारायण ने लिखा था।

भारती द्वारा टैगोर के प्रति स्नेह और आदर सम्मिलित भाव बार-बार देखे गए। आश्चर्य इस बात का है कि गुरुदेव ने क्या भारती के प्रति अपने कोई उद्गार जाहिर नहीं किए? जबकि उस समय तक भारती प्रसिद्ध कवि हो चुके थे।

सूरत में काँग्रेस अधिवेशन में भारती बाल गंगाधर तिलक से पहली बार मिले। पर उनके विचारों से बहुत पहले से परिचित थे और उन्हें अपना राजनैतिक गुरु मान चुके थे। बा.गं. तिलक सन 1856 में एक स्कूल अध्यापक के घर पैदा हुए थे। 1880 में एल.एल.बी. किया और उन्हें तुरंत सरकारी नौकरी मिल सकती थी, जैसा कि उन दिनों ये आम बात थी। पर तिलक और उनके दोस्त ने अपने छात्र-जीवन में ही सोच लिया था कि वो लोग सरकारी नौकरी नहीं करेंगे। उन्होंने मानवीय सेवा और सामाजिक कार्य करने का ठान लिया था। उस समय देश की जनता का जीवन स्तर सुधारने और उनको स्वाभिमानी और देशभक्त बनाने के लिए सबसे आवश्यक था शिक्षा का प्रसार। इसके लिए तिलक व उनके मित्र आगरकर ने प्राचार्य चिपलूनकर के साथ मिल कर न्यू इंग्लिश स्कूल प्रारंभ किया। यही बाद में डेक्कन एज्यूकेशन सोसाइटी के नाम से पुष्पित-पल्लवित हुआ। इसी के साथ 1881 में तिलक ने दो पत्रिकाएँ मराठी में 'केसरी' तथा अँग्रेजी में 'मराठा' प्रारंभ की। 'केसरी' जन साधारण में चेतना जागृत करने व अशिक्षा को दूर करने के लिए था। 'मराठा' उच्च शिक्षित और नई तथा स्वयं की सोच रखने वालों को अधिकार पूर्वक अपना विचार रखने का मंच बन गया।

तिलक ने शिवरात्रि में शिवालयों में उत्सवों तथा गणेश चतुर्थी उत्सव द्वारा जनता में आत्मविश्वास, देशभक्ति, वीरता आदि भावों का प्रचार ही किया। इसी बीच 1896 में महाराष्ट्र में अकाल पड़ा और प्लेग का धावा भी हुआ। अकाल निवारण के कार्य में लगे तिलक अपने उद्देश्यों को भी पूरा कर रहे थे। इसी बीच प्लेग की दवाई बाँटने, टीका लगाने तथा जाँच के बहाने घरों में जब-तब घुसने वाले अफसरों की क्रूरता बढ़ती जा रही थी। महिलाओं से अशालीन व्यवहार आदि से लोग बौखला गए और दो अफसरों को दामोदर चापेकर ने मार डाला। तिलक ने 'केसरी' में सरकार के व्यवहार की तीखी आलोचना की। फलस्वरूप उन पर भी राजद्रोह का मुकदमा चला कर 18 महीने की कड़ी सजा हुई। पर वे छ माह में ही छूट गए।

1904 में जब भारती अपने दड़बे से निकल कर 'स्वदेश मित्रन' के सहायक संपादक बने उन्हें देश की हलचल का पता चलने लगा। उनके देशभक्ति का जज्बा भी तभी प्रकट हुआ और तिलक के प्रति उनका आदर व अनुराग भी जागा। तिलक की तरह भारती को भी लगा कि भारतीय जनों को उनकी नींद से जगाना चाहिए। ऐसा लगता था मानों लोग गुलामी की मीठी नींद में सो रहे हों। 1905 में बंग विभाजन से ही लोगों में चेतना आई, एक तरह से नींद से उठे। हिंदू-मुस्लिम एकता का बहुत अच्छा उदाहरण इस समय दिखा। तिलक का उग्रवादी रवैया भारती के जवान, जोशीले और उत्साही तबीयत को भा गया। भारती ने उस समय काँग्रेस के उदारवादी दल के व्यवहार को हास्य रस की कविताएँ बना कर खिल्ली उड़ाई थी। तिलक की बताई राह व तरीके उन्होंने दक्षिण भारत में अपनाए। हिंदी भाषा की कक्षा दक्षिण में प्रारंभ करने वाले वे प्रथम व्यक्ति थे।

1908 में जब तिलक को 6 वर्ष की सजा हुई थी, वे जेल में लगातार लिखते रहे। 'गीता रहस्य' तथा 'कर्मयोग शास्त्र' जैसी गंभीर, बड़ी रचनाएँ भी लिखी। कानपुर में तिलक ने जाति-प्रथा के खिलाफ जोरदार भाषण दिया था। भारती ने उसके सार तत्व को उतने ही जोरदार, समर्पित भाव से पत्रिका में छापा। तिलक महाराष्ट्र के वैदिक ब्राह्मण के वंशज थे और वेदशास्त्र का उन्होंने गहन अध्ययन भी किया था। इसलिए उनका जाति-प्रथा का विरोध सही अर्थों में बहुत मायने रखता है। इस बात को भारती ने बहुत महत्व दिया और जन साधारण को समझाने की कोशिश की। तिलक के उच्च और नए विचार भारती को आकर्षित करते थे। उनके प्रति आदर की वृद्धि के साथ ही वो तिलक के बारे में तथा उनके कथन को प्रमुखता से अपनी पत्रिका में स्थान देते थे। एक तरह से तिलक को भगवान स्वरूप मानते थे। यहाँ तक कि अपनी कल्पना के घोड़े दौड़ाते हुए वे कहते हैं - 'मैंने, धर्मराज का चेहरा देखा है, उसमें तिलक के चेहरे की प्रतिछाया देखी।'

भारती के हिसाब से भारत राष्ट्र में देशभक्तों के क्रम में सबसे ऊपर के दो क्रम बाल गंगाधर तिलक तथा महात्मा गांधी ही होंगे।

तिलक के बाद जिस देशभक्त को भारती ने बहुत सराहा वे थे विपिनचंद्र पाल। विपिनचंद्र के साथ भारती के अच्छे, सतत संपर्क रहे थे। मध्यम वर्ग के, फारसी भाषा के जानकार रामचंद्र पाल ढाका के न्यायालय में पेशकार थे। सन 1858 में इनके बेटे विपिनचंद्र पाल का जन्म हुआ। अपने उम्र के 10 वें वर्ष में अँग्रेजी माध्यम के स्कूल में पढ़ रहे थे। 1874 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में बी.ए. की परीक्षा दी पर आसफल रहे। 1879 में कटक के एक स्कूल में प्रधान आचार्य के पद पर कार्य करने लगे। तभी ब्रह्म समाज में दाखिल हुए और अपने पिता से उनका संबंध टूट गया। 1881 में नित्य कल्याणी नाम की बाल-विधवा से मुंबई में विवाह किया। एक वर्ष बैंगलूर (आज का बंगलुरु) में नौकरी की फिर कोलकाता लौट आए।

विपिनचंद्र के पिताजी का स्वास्थ्य खराब हो रहा था, उन्होंने बेटे को बुलवा भेजा। इस भेंट से दस वर्ष बाद दोनों के बीच की कड़वाहट दूर हो गई। पर उसी वर्ष अर्थात 1886 में उनके पिता का देहांत हो गया। उसी साल उन्होंने काँग्रेस में प्रवेश किया। 1887 में चेन्नै में हुए काँग्रेस अधिवेशन में शामिल भी हुए और सरकार के व्यवहार को लेकर कुछ मुद्दे पर तीखी आलोचना भी की। ब्रह्म समाज के भी अग्रणी नेता बन गए थे। कुछ समय लाहौर के 'ट्रिब्यून' में संपादक रहे।

1905 में बंग विभाजन के बाद 'वंदे मातरम्' पत्रिका प्रारंभ की। बीच-बीच में इंग्लैंड, अमेरिका जैसे देशों में जाकर 'ब्रह्म समाज' का महत्व, स्वरूप आदि पर भाषण दिए। साथ ही भारत के बिगड़े राजनैतिक हालात व उनके सुधार के उपाय आदि पर भी उद्बोधन देते रहे। पूरे देश में स्वदेशी, विदेशी वस्त्र का बहिष्कार तथा देशीय शिक्षा पद्धति इन त्रिसूत्रीय योजना का प्रचार-प्रसार विपिन चंद्र ने किया।

कलकत्ता में हुए काँग्रेस अधिवेशन में भारती ने विपिन चंद्र पाल को तमिलनाडु में आने का निमंत्रण दिया जिसे उन्होंने स्वीकार किया। आंध्र प्रदेश के अनेक हिस्सों तथा कटक में उनके भाषणों के बाद, भारती उन्हें तमिलनाडु लेकर आए। अप्रैल 27, 1907 का दिन चेन्नै के लिए यादगार हो गया था। चेन्नै के तिरूवल्लीकेनी के समुद्र तट पर उनके जोश भरे, विचारोत्तेजक उद्बोधन को सुनने मानव समुद्र वहाँ जमा हुआ था। इस कार्यक्रम के सभापति थे 'स्वदेशमित्रन' के जी. सुब्रम्हणीय अय्यर। नरम दल के किसी नेता या सदस्य ने सामने आने का साहस नहीं किया। उनके भाषण के अंश भारती ने 'इंडिया' पत्रिका में दिए।

विपिन चंद्र ने कहा - 'हमारा लक्ष्य है स्वराज्य प्राप्त करना, सबके लिए रोजगार तथा स्थिर और ठोस जमीन मुहैया कराना। बिना स्वराज्य की चाह के इनसान उस खेत की तरह हैं जो बिना खाद के क्षीण होता जा रहा हो, जिसकी उर्वरा शक्ति खत्म हो रही हो। इनसान भी इसी तरह गरीबी, रोग, कमजोरी और अधर्म को प्राप्त होगा।'

अगले दिन प्रमुख समाचार पत्रों में इसी भाषण की चर्चा और प्रशंसा थी। हर जगह 'वंदे मातरम्' के नारे का बोलबाला था। आंध्र प्रदेश में तो विपिन चंद्र पाल के आगमन व भाषण ने एक नई जान फूँक दी। विश्वविद्यालय के छात्र चाँदी के लॉकेट पर 'वंदे मातरम्' लिखवा कर छाती पर लगाकर विश्वविद्यालय गए। कुछ छात्रों को विश्वविद्यालय से निकाल दिया गया, जिससे करीब 200 छात्र स्वयं ही निकल गए।

विपिन चंद्र पाल का चेन्नै आगमन व उसकी सफलता का श्रेय भारती को जाता है। उनके भाषणों को दो पुस्तकों (भाषणों का संग्रह) में प्रकाशित किया गया।

राष्ट्र के प्रति समर्पित देशभक्तों जिन्होंने भारती को प्रभावित किया उनमें सबसे वयोवृद्ध और आदरणीय नाम है दादाभाई नौरोजी का। ये सन 1825 में एक गरीब पारसी परिवार में पैदा हुए थे। इनके पिता पुरोहित थे। दादाभाई के बाल्यकाल में उनके पिता का देहांत हो गया तथा उनकी माता ने ही उनको पाला। बंबई (आज की मुंबई) के एलफिनस्टन कॉलेज में एक तेजस्वी और मेधावी छात्र थे। उनकी मेधा को देख कर बंबई न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने उन्हें इंग्लैंड जाकर आई.सी.एस. की परीक्षा के लिए आर्थिक सहायता की पेशकश की। पर स्वाभिमानी दादाभाई ने इस सहायता को नकार कर एलफिनस्टन कॉलेज में ही पढ़ाने लगे। यहीं पर बाद गणित के प्रोफेसर भी रहे। अपने 24 वें वर्ष की वय में अपने कुछ मित्रों के साथ, पुरातन पंथियों द्वारा रोक-रुकावटों का महत्व न देकर बालिकाओं के लिए चार पारसी हाईस्कूल तथा तीन हिंदू हाईस्कूल की स्थापना की। डेढ़ सौ से भी अधिक वर्ष पहले इन सब बातों के बारे में सोचना भी मुमकिन नहीं था, वही उन्होंने कर दिखाया।

पारसी समुदाय में सदियों से जमी हुई पुरानी सड़ी गली परिपाटी को बदलने और प्रगति की राह पर चलने के लिए उन्होंने सदैव प्रयत्न किया और सफल भी हुए। इसी उद्देश्यों से एक पत्रिका 'रस्त गोफ्तार' महीने में दो बार प्रकाशित करने लगे। 1855 में लंदन में 'कामा प्रबंध समिति' से जुड़ गए। 1859 में इन्होंने स्वयं ही एक कंपनी प्रारंभ की। 1866 में 'लंदन इंडियन संघ' की स्थापना की तथा 'ईस्ट इंडियन एसोसिएशन' की स्थापना में भी मदद की। अपना शेष जीवन उन्होंने देश की स्वतंत्रता के संघर्ष में लगा दिया।

सन 1872 में बड़ौदा राज्य के दीवान के रूप में समाज सुधार के कार्य किए। 1883 में बंबई नगर सभा में कार्य करते हुए जल-विनियोग के कार्य को सुधारा।

सन 1886 में कलकत्ता अधिवेशन, 1894 में लाहौर तथा 1906 में फिर कलकत्ता काँग्रेस अधिवेशन, तीनों के सभापति दादाभाई नौरोजी ही रहे। 1905 से भारती अपनी पत्रिकाओं में इनके बारे में उल्लेख करते रहे। इन्होंने देशवासियों में देश के प्रति गर्व और अभिमान का एहसास जगाया जो उस समय अत्यंत आवश्यक था। बंग-विभाजन के समय नरम दल-गरम दल जो बँटवारा हुआ था उससे नरम दल के फिरोज शाह मेहता, गोखले आदि ने गरम दल के तिलक को 1906 के काँग्रेस अधिवेशन का सभापति न बनने देने के लिए बहुत प्रयत्न किया। दादाभाई नौरोजी को सभापति बनने को राजी किया। भारती ने 'इंडिया' पत्रिका में इस घटना का हवाला देते हुए लिखा कि नरम दल को लगा कि दादाभाई उनका समर्थन करेंगे। पर वे तो तिलक से भी अधिक तीव्रवादी थे मानों उनके भी गुरु हों।

भारती के अनुसार तब तक अँग्रेजों से स्वशासन की माँग करने वालों को दादाभाई ने ही 'स्वराज्य' की धारणा दी। 'स्वराज्य' शब्द अपना, हमारा देशी लगता है। विदेशी वस्तुओं का, लोगों का तिरस्कार ही एकमात्र उपाय है और हमें स्वराज्य अवश्य मिलेगा। हम 'स्वराज्य' को भीख की तरह भी नहीं लेंगे।

दादाभाई नौरोजी के दृढ़ कथन को भारती ने कहा - 'विश्वास का दूसरा नाम दादाभाई है और विश्वास की कभी मृत्यु नहीं होती। विश्वास के साथ साधे गए कार्य अवश्य पूरे होते हैं।' देशवासियों में चेतना, शिक्षा आदि का प्रसार कर विश्वास जगाने का काम दादाभाई नौरोजी ने लगभग सत्तर (70) वर्ष किया। उनकी मृत्यु के पहले देशवासी जाग गए और देशवासियों की ताकत में वृद्धि होते हुए देख कर ही उनके प्राण निकले। जून 30, 1917 को इस समाजसेवी, विद्वान, देशभक्त ने प्राण त्यागे। पीछे रह गए देशवासियों के लिए प्रेरणा पुंज बन कर गए।

सन 1863 में पैदा हुए नरेंद्र दत्त और भारती की जीवन रेखा एक दम बराबर थी। दोनों ही अपनी उम्र के 39 वें साल में मृत्यु को प्राप्त हुए। नरेंद्र दत्त भारती के जन्म से उन्नीस (19) वर्ष पूर्व पैदा हुए थे। नरेंद्र ने विवेकानंद के रूप में संन्यासी धर्म अपनाया और जगत के मोह-माया से तटस्थ रहे। पर देश प्रेम से अपने आपको अलग नहीं किया। भारती के हिसाब से स्वामी विवेकानंद का यह उपकार देश के लिए वरदान ही सिद्ध हुआ। स्वामीजी का दृढ़ चरित्र और प्रगतिशील सोच ने एक नए भारत के निर्माण में बुनियाद या नींव का महत्वपूर्ण कार्य किया है। भारती का कहना है - 'रामकृष्ण परमहंस ने नरेंद्र को विवेकानंद बनाया और विवेकानंद ने भारत का नवनिर्माण किया।'

सन 1904 से पूर्व भारती स्वामीजी के बारे में कुछ नहीं जानते थे। स्वदेशमित्रन के सहायक संपादक बन कर, तथा उसके लिए तमिल-अँग्रेजी अनुवाद कर के वे दुनिया भर से व दुनिया की खबरों से जुड़ते जा रहे थे। भारती 1906 में कोलकाता के काँग्रेस अधिवेशन में संवाददाता के रूप में गए थे। वापसी में डमडम नामक जगह पर भगिनी निवेदिता से भेंट करने गए। (यहाँ पर लेखकों में कुछ मतभेद हैं। एक लेखक ने लिखा है कि 1905 के काशी में हुए अधिवेशन से लौटते हुए कलकत्ता के डमडम नामक स्थान पर जाकर भगिनी निवेदिता से भेंट की)। इतना निश्चित है कि उनसे भेंट हुई और स्वामी विवेकानंद के बारे में बहुत सी जानकारी प्राप्त की। स्वामीजी और उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस के बारे में भारती बहुत उच्च विचार रखते थे। स्वामी विवेकानंद के उद्गारों को उद्धृत करते हुए भारती ने लिखा है - 'अगले पचास वर्षों तक हम अपने सोते हुए ईश्वरों को भूल जाएँ। हमारे सामने, आस-पास हमारी जनता है जिसके विराट स्वरूप को देखें। इस ईश्वर को आत्मविश्वास, स्वाभिमान दिलाने का प्रयत्न करें। भूखे को भोजन, अशिक्षित को शिक्षा देने का प्रबंध करें। संक्षेप में कहें तो ईश्वर को देखना है या पाना है तो इन मानवों की सेवा करें।'

भारती भी इसी बात पर जोर देते रहे हैं। दोनों ही धनहीन और साधनहीन को ऐसी शिक्षा देने का कहते हैं जिससे उनका पेट भरे, स्वाभिमान जागे और आत्मविश्वास बढ़े।

भारत के शाश्वत वेदांत को विश्वव्यापी विस्तार देने वाले स्वामी विवेकानंद ही थे। अपने स्वार्थ को भुला कर जगत की भलाई के लिए स्वामीजी और भारती ने सेवा की जो एक मिसाल बन गई।

भारती की छोटी पुत्री शकुंतला ने अपनी पुस्तक 'एन तंदै' (मेरे पिता) में इस बात का उल्लेख किया है कि उनके घर में प्रतिवर्ष विवेकानंद जयंती मनाई जाती रही है। प्रथम वर्ष भारती ने स्वयं इसके लिण् वंदना एवं चरित्र चित्रण लिख कर दिया और बेटी से पढ़वाया था।

स्वामीजी निवेदिता द्वारा स्थापित विद्यालय में अक्सर आकर देखा करते थे। 28 जून 1902 में वो निरीक्षण करने विद्यालय आए थे और 4 जुलाई को बेलूर मठ में उनका निधन हो गया।

स्वामी विवेकानंद की शिष्या व धर्मपुत्री भगिनी निवेदिता से भारती का मिलना महत्वपूर्ण रहा। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में दो विदेशी महिलाओं की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। एक थियोसोफिकल संघ की अध्यक्ष एनी बेसेंट तथा दूसरी मारग्रेट एलिजाबेथ नोबल। यही मारग्रेट स्वामीजी की शिष्या भगिनी निवेदिता थी। सन 1884 से 1894 तक इंग्लैंड में स्कूली शिक्षिका थी। 1893 में शिकागो में हुए सर्वसमय पार्लियामेंट में भाग लेने गई थीं। 1895 में स्वामी लंदन गए तो वहाँ भी मिली। उन्होंने उनके सभी उद्बोधनों को सुना और प्रभावित हो गई। स्वामीजी ने मारग्रेट को भारत आकर स्त्रियों की दशा सुधारने के लिए कुछ कार्य करने को कहा। मारग्रेट 1898 में जहाज पर बैठ कर कलकत्ता आ गई। पहले उन्होंने माँ शारदा देवी से आशीर्वाद लिया फिर स्वामीजी से दीक्षा लेकर निवेदिता बन गई। उनका सेवा व्रत उसी दिन से प्रारंभ होकर 1911 तक जब उनकी मृत्यु हुई तब तक चला। मृत्यु के समय उनकी आयु थी मात्र 44 वर्ष।

तत्कालीन भारत में स्त्रियों की दशा सुधारने के लिए सर्वप्रथम उन्हें शिक्षित करना आवश्यक था। 1898 में भगिनी निवेदिता ने लड़कियों के लिए एक विद्यालय प्रारंभ किया। पर उसमें पहले दिन मात्र तीन लड़कियाँ भर्ती हुईं। छ महीने में आर्थिक तंगी के कारण विद्यालय बंद करना पड़ा। तत्पश्चात वो स्वामीजी के साथ यूरोपीय देशों की तथा अमेरिका की यात्रा पर गई। वहाँ अपने भाषणों, उद्बोधनों तथा अलग-अलग पत्रिकाओं में लिख कर राशि जमा की। अमेरिका व इंग्लैंड में एक निधि कोष 'दि निवेदिता गिल्ड ऑफ हेल्प' की स्थापना कर उससे भी रकम जुटा कर स्कूल चलाने में मदद ली। उस समय विद्यालय का नाम 'रामकृष्ण बालिका विद्यालय', 'विवेकानंद विद्यालय' तो कभी 'निवेदिता विद्यालय' कह कर लिया जाता। निवेदिता की मृत्यु के पश्चात उसको रामकृष्ण मिशन ने अधिगृहीत कर चलाया। 1963 में रामकृष्ण शारदा मिशन ने इस विद्यालय को चलाने का जिम्मा उठाया। विशाल बरगद की तरह वह विद्यालय अब 'रामकृष्ण शारदा मिशन भगिनी निवेदिता बालिका विद्यालय' नाम से बहुत अच्छे से चल रहा है।

स्वामीजी की मृत्यु के बाद निवेदिता ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूपों से भारत की आजादी के संग्राम में योगदान किया। विद्यालय की छात्राओं को त्याग, बलिदान, भारत के वीरों की कहानियों के साथ देशभक्ति का पाठ पढ़ाया। अँग्रेजों की दमनकारी नीतियों से बिना डरे, बिना दबे विद्यालय में 'वंदे मातरम्' का गान अनिवार्य कर दिया। स्वदेशी और देशी शिक्षा पर जोर दिया।

वनस्पतिशास्त्री जगदीश चंद्र बोस की वो मित्र तथा आलोचक-समीक्षक भी रही। उनके शोध के लिए एक अमेरिकी महिला से आर्थिक सहायता भी करवाती रही। उनकी शोध पुस्तक को विश्वव्यापी प्रशंसा और स्वीकृति मिलने पर सबसे अधिक खुशी उन्हें ही हुई। भगिनी निवेदिता अपने विदेश भ्रमण में डा. बोस व उनकी पत्नी को कई बार लेकर गई। वहाँ अन्य वैज्ञानिकों से उन्हें परिचित करवाती रहीं। निवेदिता की मृत्यु डा. जगदीश चंद्र बोस के दार्जिलिंग स्थित आवास में हुई थी।

1905 के काशी काँग्रेस अधिवेशन में गोपाल कृष्ण गोखले सभापति थे। भगिनी निवेदिता उनकी सचिव थी। उनको गोखले पर अगाध श्रद्धा थी। पर जब मतभेद के कारण काँग्रेस के दो दल बन गए तब निवेदिता को बहुत दुख हुआ। वो बाल गंगाधर तिलक के विचारों से सहमत थी। इसी वर्ष भारती भगिनी निवेदिता से कलकत्ता के डमडम में मिले थे।

इन विदुषी मनीषी से जब भारतीजी मिले तो उन्हें प्रेम और स्नेह का एक नया और विस्तृत रूप मिला जो अद्भुत था। भगिनी निवेदिता ने उन्हें कहा - 'पुत्र, सबसे पहले अपने मन से विभाजन की रेखा को मिटाओ। जात, धर्म, कुल, गोत्र का जो अंतर एक मानव और दूसरे मानव में होता है उसे भूल जाओ। यह भी एक तरह की असभ्यता है कि हम इनके द्वारा फर्क करते हैं। बस स्नेह ही एक शाश्वत सत्य है जो बिना भेदभाव के सभी को दिया जा सकता है। वही करो। भगिनी निवेदिता ने अगला ही प्रश्न पूछा - 'अविवाहित हो क्या? बस फिर एक के बाद दूसरा, तीसरा प्रश्नों की झड़ी लग गई।

भारतीजी ने प्रथम प्रश्न का उत्तर दिया - 'विवाहित हूँ और दो पुत्रियों का पिता भी हूँ।'

'फिर पत्नी को साथ क्यों नहीं लाएँ?'

'हम लोगों में पत्नी हर जगह साथ नहीं आती। वैसे भी काँग्रेस अधिवेशन में उनको साथ ले जाने का कोई अर्थ नहीं है।' - भारतीजी सादगी से बोले।

भगिनी निवेदिता रोष से भर गई - 'समाज की आधी जनसंख्या (नारी जाति) अगर दासता में जकड़ी हो तो शेष आधे (पुरुष) की स्वतंत्रता का क्या अर्थ रह जाता है?

फिर कुछ रुक कर मानों भारतीजी को दिलासा दे रही हों - 'जो हुआ, जितना हुआ उसे छोड़ो और आगे बढ़ो। भविष्य में पत्नी को अलग से मत देखो, अपना बायाँ हाथ समझो और मन और कर्म से उसका बराबरी से आदर करो।'

भारतीजी उनकी बातों से अभिभूत हो गए थे। उन्होंने वादा किया कि वो पत्नी के साथ ऐसा ही व्यवहार करेंगे।

निवेदिता देवी ने उन्हें एक पत्ता दिया जो पीपल के पत्ते की तरह दिखता था। निवेदिता देवी उस पत्ते को हिमालय से लाई थी। भारतीजी ने उस पत्ते को अपने अंतिम क्षण तक सँभाल कर रखा। कई मित्रों ने उसे ऊँची कीमत पर खरीदने की इच्छा जताई पर उन्होंने नहीं दिया। उनकी मृत्यु के पश्चात वो पत्ता न जाने कहाँ चला गया।

निवेदिता देवी से भेंट के बाद भारतीजी उनसे बहुत प्रभावित हुए। एक समाज सेवी सन्यासिनी का उनका रूप भारतीजी को इतना प्रभावशाली लगा कि उन्होंने निवेदिता देवी को अपना ज्ञान गुरु ही मान लिया।

एक बार निवेदिता देवी बहुत बीमार पड़ गई। तब भारती ने नवंबर 1906 के 'इंडिया' अंक में उनके शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की प्रार्थना करते हुए एक आलेख लिखा। भारती के जीवन को नई सोच और प्रगतिशील दिशा देने में भगिनी निवेदिता ने बहुत अहम भूमिका निभाई थी। खास कर महिलाओं के प्रति उनकी सोच में।

सन 1908 में भारती की 'स्वदेश गीतंगल' (देश या राष्ट्र के गीत) तथा 1909 में 'जन्मभूमि' (जो स्वदेशगीतंगल) का दूसरा भाग है) प्रकाशित हुई। दोनों ही पुस्तकों को उन्होंने भगिनी निवेदिता के चरणों में भक्तिभाव से समर्पित किया है।


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