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जीवनी

सुब्रह्मण्यम भारती : व्यक्तित्व और कृतित्व
मंगला रामचंद्रन

अनुक्रम 21. भारती और नारी तथा उनका दांपत्य जीवन पीछे     आगे

हम अपनी दो आँखों में से एक को नुकसान पहुँचा कर अपनी दृष्टि को क्षीण नहीं कर सकते। उसी तरह हम अपनी आधी जनसंख्या को शिक्षा से दूर रख कर उन्नति नहीं कर सकते। विश्व भी तभी बुद्धिमान होगा जब हम पुत्रियों को शिक्षित करेंगे।

भारती के जीवन में आई प्रथम चार महिलाओं में उनकी माता, विमाता और बुआ तो उम्र और रिश्ते से बड़ी और वंदनीय थी ही। पत्नी चेल्लमा ही एक मात्र उनसे उम्र और रिश्ते के मान से छोटी थी। भारती को माता का सामीप्य पाँच वर्ष की उम्र में ही खोना पड़ा। विमाता का लाड़-प्यार भी मिला। बाद में मातृ-पितृ हीन बालक की तरह बुआ का स्नेह-प्यार मिला। तीनों महिलाओं के व्यवहार से भारती के मन में नारी जाति के प्रति स्नेहिल आदर पनपा हो तो कोई आश्चर्य नहीं। उनके मन में नारी के प्रति समानधर्मी विचार अर्थात पुरुष-महिला में अंतर न करने वाली बात भगिनी निवेदिता से मिलने के बाद ही प्रभावशाली हुई। क्योंकि उनसे भेंट करने के बाद ही उन्होंने इस बात की महत्ता को समझा कि स्त्रियों को शिक्षा व अन्य क्षेत्रों में समान अवसर न दिए जाएँ तो आने वाली पीढ़ी भी मानसिक रूप से कमजोर होगी। भारती कहते थे कि स्त्रियों को ज्ञान न दिला कर तो हम अपनी ही आँखें फोड़ रहे है। उनके लिए आधुनिक नारी का अर्थ है 'गर्व से सिर उठा कर चले और निडरता से किसी का भी सामना कर सके' भारतीय नारी के इसी रूप का स्वप्न देखते थे।

पाँचाली शपथम् (खंड काव्य) में उन्होंने जिस तरह द्रौपदी की व्यथा को उकेरा है वो काव्य-साहित्य में तो मील का पत्थर है ही। पर ये भी दर्शाता है कि उनके मन में महिला के प्रति करुणा, कोमल भावनाएँ भी भरी हुई हैं। द्रौपदी में वो भारत माता की प्रतिच्छाया देखते हैं और दुशासन तथा कौरवों को अँग्रेज मानते हैं। पाँचाली शपथम् में पाँचाली या द्रौपदी के विलाप के आगे उन्होंने कविता को खींचा नहीं। एक सती स्त्री के विलाप और त्रासदी के बाद कोई कुछ भी कहे या समझाए उसका कोई अर्थ नहीं होता। इस दृष्टांत को आज की इक्कीसवीं सदी में भी लोग नहीं समझ पाएँ और एक प्रताड़ित स्त्री की समाज, कोर्ट और कई अन्य तरीकों से प्रताड़ित करने में नहीं चूकते।

शकुंतला-दुष्यंत संदर्भ में भी उन्होंने जो रचना की, उसमें 'शकुंतला के वीर पुत्र भरत' का वर्णन है जो सिंह शावकों के साथ खेलता है। दुष्यंत का कहीं नामोनिशान नहीं है। ये दृष्टांत बताते हैं कि नारी के प्रति भारतीजी में कितनी श्रद्धा थी। कवि चंद्र को पुरुष व चाँदनी को नारी मान कर रचना करते हैं। पर भारतीजी ने चंद्र में मति जोड़कर उसे स्त्री लिंग चंद्रमति बना दिया।

उनका महिला के प्रति आदर का जज्बा प्राकृतिक था, चाहे वो जरा सी बच्ची हो, प्रौढ़ा या वृद्धा। अपनी किशोरावस्था में नारी के प्रति उनका मैत्री भाव ही था। जब उनका विवाह हुआ तब वे साढ़े चौदह (14) वर्ष के थे। उन दिनों बालक-बालिकाओं के विवाह छोटी उम्र में हो जाते थे। पर पति-पत्नी बड़ों के सामने आपस में बातें नहीं करते थे। संयुक्त परिवार होने से उम्र में बड़े लोग साथ में रहते ही थे। भारती चेल्लमा को छेड़ने के लिए उस पर कविताएँ बनाते और बातें भी करते थे। यह उनका पत्नी के साथ सखा भाव था।

जब भारती की बेटियाँ बड़ी हुईं तो उन पर बहुत पाबंदियाँ नहीं लगाईं। उनका कहना था कि किसी पर भी नियंत्रण कठोर हो जाएँ तब ही वो उससे छूटने को छटपटाता है। अगर प्राकृतिक रूप में पुरुष-स्त्री समाज में बिना भेदभाव के विचरण करें तो मन में एक दूसरे के लिए गलत विचार नहीं पनपते है। भारती स्त्री-पुरुष के लिए ऐसी समाज संरचना की कल्पना करते थे। प्राचीन भारतवर्ष की विदुषी नारियाँ जिस तरह वाद-विवाद, चर्चा आदि में हिस्सा लेती थी, पुरुषों की बराबरी में अपने बुद्धि चातुर्य का प्रदर्शन करती थी, वही वो बालिका और स्त्रियों के लिए चाहते थे। भारती अपनी बड़ी बेटी तंगम को सखी की तरह मान कर बालिकाओं के आचार-विचार, व्यवहार पर कविताएँ बना कर गाते जो सभी वर्ग की बालिकाओं के लिए उपयुक्त होता। छोटी बेटी शकुंतला को बच्ची के रूप में कविताएँ बना कर गाकर सुनाते। उनका मानना था कि नारी को कठोर नियंत्रण में या दबा-दबा कर रखने से सही तरह से उनका उचित विकास संभव नहीं होता है। यह उसी तरह है जैसे दबे-कुचले बीज अंकुरित नहीं होते।

माता-पिता में माँ को वो उच्च स्थान देते थे। पिता तो मात्र आर्थिक समस्या का प्रतिपादन कर के अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेता है। बाकी समस्त जिम्मेदारी, सारे कर्म माँ ही पूरी करती है। स्त्रियों को वो अपने संदेशों में कहा करते थे कि आलसी मत बनो पर अपने सामर्थ्य से अधिक काम भी मत करो। नारी को शक्तिपुंज मान कर उन्होंने देवियों की शक्ति आराधना की है। विभिन्न देवियों पर ऐसे गीत लिखे हैं। पर इन सबके ऊपर माँ का स्थान ही मानते थे और अपनी रचना में उन्होंने इसी तथ्य को इंगित करते हुए लिखा है कि माँ से बढ़कर भी कोई देवी-देवता होता है क्या? माँ ही नहीं पत्नी के लिए भी उनकी धारणा कुछ ऐसी थी। पुरुषों से एक तरह से, आह्वान करते थे कि अपनी पत्नी को आदर दें, उन्हें भी स्वयं की तरह हाड़-मांस का मानव माने। उन्हें मात्र भोग के हेतु न रख कर अपने अन्य विचार विमर्श में भी सम्मिलित करे। शिक्षा और ज्ञानवृद्धि की उनकी चाह में अड़ंगे न लगाए।

हालाँकि अपनी युवावस्था में भारती अन्य पुरुषों की तरह अपनी पत्नी चेल्लमा के प्रति पुरुषोचित अकड़ प्रदर्शित करते थे। उन दिनों एटैयापुरम के राजा की सभा में अन्य विद्वानों के संग बहस, चर्चा आदि में रत रहते और रात को काफी विलंब से घर लौटते। भोर से कार्य में रत चेल्लमा इतनी थकी हुई रहती कि भारती की राह देखते-देखते वो थक कर नींद में चली जाती। एक बार इसी तरह की अवस्था में भारती ने जब लौट कर दरवाजा खटखटाया तो प्रतिदिन की तरह दरवाजा खुला नहीं। भारती शब्दों की बौछार के बीच में दरवाजे को इस तरह पीटने लगे कि पड़ोसी जाग गए और अपने-अपने किवाड़ खोल कर तमाशा देखने लगे। चेल्लमा की नींद बड़ी मुश्किल से खुली। चेल्लमा ने दरवाजा खोला और शर्म तथा डर से काँपने लगी। भारती ने पड़ोसियों को भी कोसा। उस समय भारती की उम्र 21-22 वर्ष की थी और चेल्लमा मात्र 14-15 वर्ष की। भले ही जवानी के जोश में, उन्हें अपना कुसमय या देर रात आना गलत नहीं लगा हो पर चेल्लमा को चाहते भी बहुत थे। उनके लिए शुचिता तथा पवित्रता के अर्थ पुरुष और स्त्री के लिए समान थे।

पुदुचैरी में म. श्रीनिवासचारी की पुत्री यदुगिरी से भारतीजी का वार्तालाप हुआ करता था। उम्र में दोनों पुत्रियों से यदुगिरी कुछ बड़ी थी। एक तरह से उनकी शिष्या और मानस पुत्री थी। किशोरियों के लिए जो भी रचना लिखते उसे पहले सुनाते थे। बाद में जब यदुगिरी कुछ बड़ी हुई तो अपनी रचनाओं के बारे में राय भी लेते थे। बाद में सुश्री यदुगिरी ने अपनी पुस्तक 'भारतीयिन निनैवूकल' अर्थात 'भारती के संस्मरण' में लिखा है - 'लगभग चालीस वर्ष पूर्व पुदुचैरी में भारतीजी की शिष्या तथा गर्वित पुत्री के रूप में रहना मेरे लिए कितना बड़ा सौभाग्य था। वो आज समझ पा रही हूँ।

यदुगिरी की यह पाँडुलिपि पंद्रह वर्षों तक प्रकाशक की तलाश में पड़ी रही। 2002 में इसके प्रकाशित होते-होते उनकी मृत्यु हो गई। प्रकाशन होने की प्रबल संभावना की तसल्ली लेकर इस जगत से विदा हो गई।

भारती महिलाओं के साथ भी उसी सहजता से व्यवहार करते जैसे पुरुषों के साथ। उनके लिए दोनों ही इनसान है, पुरुष-नारी वाला भेदभाव नहीं। नारी-पुरुष के बीच यह मैत्री भाव आज के आधुनिक युग में भी अत्यंत अल्प मात्रा में ही दिखता है। आज की शिक्षित, कामकाजी, अपनी सोच रखने वाली व सामाजिक सरोकारों से जुड़ी महिलाओं को वो देख पाते तो शायद अपनी कल्पना को साकार पाते। इतने वर्षों पूर्व नारी की इस रूप में कल्पना करना एक दूरदृष्टि, उदारमना, संवेदनशील व्यक्ति ही कर सकता है।


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