hindisamay head
डाउनलोड मुद्रण

अ+ अ-

जीवनी

सुब्रह्मण्यम भारती : व्यक्तित्व और कृतित्व
मंगला रामचंद्रन

अनुक्रम 24. निर्धनता की पराकाष्ठा में कडैयम में वास पीछे     आगे

ऋषियों द्वारा वैदिक ऋचाओं का पाठ पढ़ाकर भी क्या हम यूँ ही शोषित और पीड़ित रहेंगे ? हमारे पास स्वयं पर विजय प्राप्त करने की कला भी नहीं है क्या ?

भारती आखिर अपनी पत्नी के गाँव कडैयम पहुँच ही गए। एक ऐसा गाँव जो प्राकृतिक संपदा से जितना रईस था उतना ही प्रगति और नए विचार से गरीब। पहाड़ी श्रृंखला से घिरा हुआ, दोनों तरफ खेत व बगीचे व कल कल बहती नदियाँ, जहाँ दृष्टि जाती हरियाली नजर आती। पहाड़ी पर गणेश व मुरुगन (कार्तिकेय) के मंदिर, कुछ दूरी पर प्रसिद्ध नित्यकल्याणी देवी का मंदिर, उस गाँव की खूबसूरती में ये सब और वृद्धि कर देते थे। भारतीजी प्रकृति प्रेमी तो थे ही सो उनके लिए वातावरण एकदम मुफीद था। रामनदी (पहले इसका नाम तत्वसारा था। एक राक्षस को मार कर श्रीराम ने इस नदी में स्नान किया तब से यह नदी राम नदी कहलाने लगी) के किनारे बैठ कर देवी के भक्तिगीत, देवी के शौर्यगीत स्वतःस्फूर्त रूप से बनाते और गाते रहते। एक तरह से देवीमय या देवी के उपासक से हो गए। सारे समय प्राकृतिक वातावरण में विचरण करते हुए न उन्हें भूख-प्यास का आभास होता ना ही अन्य सांसारिक क्रियाओं का ध्यान रहता। लोग उन्हें विक्षिप्त कहने लगे।

भारतीजी की मनोदशा को बहुत कम लोगों ने समझा। हर युग में ही मेधावी, समय के आगे चलने और विचार रखने वालों को सनकी या इसके समानार्थी शब्दों से ही विभूषित किया गया है। एक तरफ तो भारतीजी के पद्यों की इतनी सराहना होती थी और यहाँ तक कहा जाता था कि उनके एक पद पर लाख लुटाया जा सकता है। पर फिर भी वो पत्नी और बच्चों को एक समृद्ध जीवन नहीं दे पाएँ। सदैव ही अगले दिन के खाने की चिंता भरा जीवन ही दे पाएँ।

कडैयम पहुँच कर दो ही दिन बाद उन्होंने 'स्वदेशमित्रन' के संपादक ए. रंगस्वामी अय्यंगार ने भारतीजी को कहा भी था कि वो जब चाहे चेन्नै आकर 'स्वदेशमित्रन' में कभी भी अपने पहले के पद पर कार्यभार ग्रहण कर सकते हैं। यहाँ रहते हुए पत्रिका में अपने गद्य और पद्य भेज कर उन्हें कुछ आमदनी हो जाती थी। पर यह बहुत अल्प ही थी। अपने साले अप्पादुरै के घर पर रह रहे थे, जहाँ पहले ही दस लोग रहते थे। बड़ी मुश्किल में दिन कट रहे थे। ये सारे हालात उनके मन को चोट पहुँचा रहे थे और वो बेबस थे और अंदर ही अंदर घुट रहे थे। पर लोगों को उनका टूटना नजर नहीं आ रहा था, उनका फक्कड़पन और दीवानापन ही दिखता था।

कडैयम में जाति प्रथा का बोलबाला था। ब्राह्मण नीची जात की परछाई से भी दूर रहते थे। पर भारतीजी जाति प्रथा के प्रबल विरोधी थे। अनेक धर्म और अनेक जात के लोगों के साथ उनका उठना-बैठना, साथ खाना-खाना आदि चलता था। छोटे से उस गाँव में भारतीजी का यह व्यवहार बहुत बड़ा गुनाह माना गया और उन्हें अपनी जाति से बाहर कर दिया गया। अपने ही घर में प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई। उनको भोजन देने पर भी रोक लगने से अनिवार्य रूप से भूखे रहना पड़ा। बच्चे या पत्नी भी चाह कर भी उनको भोजन नहीं दे सके। साले के परिवार के लिए भी भारती का खुला और जाति च्युत होने का आचरण मुसीबत पैदा कर रहा था। तीन दिन अनिवार्य रूप से भूखे रहने के बाद दयावश किसी ने कुछ खाने को दिया तो वो भी उनके हलक से नीचे नहीं उतरा।

भारतीजी के लिए एक पुराना अत्यंत मामूली सा तथा छोटा घर, जिसका किराया भी अल्प था, तय किया गया। वो उसमें रहने लगे और भोजन अप्पदुरै के घर से जाता रहा। कुछ समय बाद चेल्लमा अपनी दोनों पुत्रियों के साथ पति के साथ रहने चली गई। भारतीजी की अल्पमात्रा में होती आमदनी से घर खर्च निकालना कठिन ही नहीं असंभव था। उस पर आए दिन कविराज की कुछ ऐसे बचकानी हरकतें हो जाती कि पूरे परिवार को ही परेशानी झेलनी पड़ती। दक्षिण भारत में गधे को स्पर्श करना अशुभ माना जाता है। वैसे भी कोई उसे छूना चाहेगा भी क्यों? पर भारतीजी जैसे व्यक्ति का कोई भी अनुमान नहीं लगा सकता था कि अगले पल वे क्या कर सकते हैं। एक बार घर के सामने चर रहे गधे के शावक को देखते रहे और वो उन्हें इतना प्यारा लगा कि उसे अपने गले से लगा लिया। गाँव में उनकी ये सारी बेजा हरकतें सहन नहीं की जा सकती थीं। उनकी पत्नी और बेटियों को भी अन्य लोगों की अवहेलना का शिकार होना पड़ता था। आर्थिक संकट के साथ ही साथ समाज से बहिष्कार का संकट मिल कर कडैयम वास को जटिल बना रहे थे।

वैसे भी कडैयम पुरानी परिपाटी और लकीर के फकीर वाली सोच वाला गाँव था। नए विचार और नई सोच को तो मानों वो सोच में भी जगह नहीं देना चाहते थे। कूप-मंडूक की तरह जीवन शैली ही उन्हें रास आती थी। सौ वर्ष आगे की सोच रखने वाले भारतीजी ऐसे वातावरण में मन मसोस कर ही रह रहे थे।

सारे हालातों से ऊब चुके भारती ने मई महीने सन 1919 में एटैयापुरम के राजवंश को पत्र लिखा। राजवंश के इतिहास को 'वंशमणि दीपिका' नाम से एक पूर्व महान कवि केसरी द्वारा लिखा गया था। उस समय की प्राचीन तमिल भाषा में बाद में बहुत सुधार और नए वर्ण और अक्षर आ चुके थे। जिससे जन समुदाय भी पढ़ कर रस ले सकता था। भारती ने पत्र में इसी का हवाला देते हुए लिखा कि वे चाहें तो भारती नए सिरे से उस इतिहास की भाषा को प्रवाहमय और मनोरंजक कर देंगे। इसके लिए वो एटैयापुरम जाकर रहने को भी तैयार थे। पर राजवंश ब्रिटिश साम्राज्य के आधिपत्य में होने से भारती के मेल-मिलाप से डरते थे। भारती के विचार से सहमत होते हुए भी उन्होंने पत्र का कोई जवाब नहीं दिया। गाँव (कडैयम) के सुस्त-सोते से वातावरण में उनका दम घुटने लगा। उनकी मानसिक अवस्था पर भी इसका असर पड़ रहा था। आए दिन किसी से किसी भी बात पर बहस और वाद-विवाद करने लगते और रिश्ते बिगड़ जाते। आर्थिक कठिनाई भी यहाँ रहते हुए तो दूर हो ही नहीं सकती थी।


>>पीछे>> >>आगे>>