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कविता

चोर बदन
हरिओम राजोरिया


क्या उनके बारे में आप जानते हैं
जो काम से काम रखते हैं
काम पर जाते हैं काम से
काम नहीं तो घर लौट आते हैं
घर लौटकर काम का काम करते हैं
मसलन उनके काम के कामों के
होते हैं तमाम प्रकार

आढ़ा या खड़ा वक्त नहीं होता
उनका वक्त अपना वक्त होता है
जिनसे कभी काम नही पड़ता
भला उनसे क्या वास्ता
खुदा न खास्ता कभी पड़ ही जाए काम
तो खूँटी पर टाँग देते हैं मान-सम्मान
उनके भीतर कहीं पानी से भरा डिब्बा होता है
जो गाहे बगाहे कभी थोड़ा-बहुत बजता है

जो अपने काम से ही काम रखते हैं
कैसा होता होगा उनके भीतर का संसार
मोर, हिरण, हवा, पहाड़, झरना होते होंगे उसमें
हो सकता है जब काम से ही
उन्हें जाना पड़ जाता होगा पहाड़
तब अपने भीतरी संसार में
कितनी जगह दे पाते होंगे वे पहाड़ को
काम में लगे रहना
और अपने ही काम में लगे रहना
दो अलग-अलग स्थितियाँ हैं
डर लगता है इन चोर बदन काम वालों से
जो इनसे डरते नहीं
वे उनके मित्र हो जाते हैं
फिर काम से घर लौटते वक्त
काम से होती हैं उनकी मुलाकातें

काम से काम रखने वाले
बना लेते हैं पैसे की पकड़
पैसे की पकड़ से आदमी की भी पकड़ होती है
जिस तरह गुड़ से लगती हैं मक्खियाँ
उसी तरह आदमी और मक्खी में
वे ज्यादा फर्क नहीं कर पाते
काम से काम रखने वालों के जीवन में
सामान्यतः दो ही तरह के खतरे हैं
पहला बुरा समय और दूसरा बीमारी
मौत के बाद तो आदमी ही नहीं रहता
मौत पर सोचते-सोचते
वे थककर सो जाते है


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