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कहानी

धूल
कविता


'झाड़ो-बुहारो कोने में जा सिमटेगी / फेंक दो बाहर, परवाह नहीं / पुनः पुनः आएगी / धो कर सोचोगे आँखों से निकल गई किरकिरी, पर आँखों की ललाई में वह होगी लगातार / पछवा हवा के साथ दर्द भी जागता है पुराना और धूल भी हमला बोलती है - 'धप्पा'।'

समय की आँखों में पड़ा तिनका / जो गुम हो जाता है कहीं भीतर में / कसकता है, चुभता है, गड़ता है बार-बार...। चुप्पियाँ इतनी चुप नहीं होतीं / हारता है मन हरेक चुप्पी के साथ / कसकती है भीतर कोई गाँठ / सुबकता है कोई दर्द अंतस में... दर्द का फैलाव यहीं से शुरू होता है...

हरीराम ने देखा उसके साहब के कमरे की तरफ बढ़ते पत्रकार और फोटोग्राफर अब मुँह लटकाए पार्टीवाले कमरे की तरफ लौटे आ रहे थे। उन्हें तो अच्छा मसाला हाथ लगा था पर स्मिता बिटिया की अँग्रेजीदाँ फटकार ने उनकी बोलती बंद करवा दी। उसे हैरत हुई घर-परिवार में तो उनकी चलती वाजिब ठहरी पर बाहर के हलकों में भी वही प्रभाव... वरना जानता है वह कम पढ़ा लिखा होने के बावजूद इनके शातिरपने और टुच्चेपन को... तमाम तरह के वो क्या कहते है शब्द नहीं याद आ रहा उसे पर जो टीवी पर दिखाए जाते रहते हैं... हाँ 'एस्टिंग औपरेशन' यही तो कहते हैं उसके साहब यानी शिव साहब यानी शिव बबुआ। अफसरों, नेताओं के तो पोल खोलते ही रहते हैं हमेशा, आजकल साधु संन्यासियों के भी पीछे पड़ गए हैं, अभी हाल ही में तो...

अरे शिव बबुआ के कमरे से तो अभी तक सिसकियों की आवाज आ रही है और वह है कि अपने विचार-वैतरणी में ही गोते लगाता रहा। कभी सिसकियों सी, कभी बुदबुदाहट में। कभी धीमी दम तोड़ती सी लगती हुई और कभी अपनी आवृत्ति से सारी दीवारों को भेदती हुई...। अच्छा भला खुशी का दिन था। सप्ताह हुए उसके शिव बबुआ मुख्यमंत्री चुने गए। आज इसी खुशी में पार्टी थी घर में। शहर के तमाम बड़े लोग, पत्रकार सब आमंत्रित थे। स्मिता बिटिया (अरे ये क्या कह रहा है, आदत कितना भी बदलना चाहो बदलती क्यों नहीं, मेमसाब को इस बात से दिक्कत है कि साहब, मेमसाहब न कह कर वह उन्हें उनके नाम से या बबुआ या बिटिया कह कर बुलाया) नहीं, मेमसाहब ने चार दिन पहले से उसे पेर रखा था। हाड़-हाड़ दुख रहा है उसका। सोचा था पार्टी खत्म होगी और वह चादर तान कर सो जाएगा। परंतु कहाँ...। पार्टी खत्म होने से पहले ही यह तमाशा शुरू। अब नींद भी आए तो कैसे? छोटे भाई की उम्र के बबुआ जिन्हें बहुत हद तक अपने ही हाथों से पाल-पोस कर बड़ा किया है उन्हें यूँ पूरी रात कलपते देख भला वह सो कैसे सकता है।

अच्छा भला स्वस्थ पुरुष डील-डौल, कद-काठी सब विशालकाय, बहुत हद तक कथा-कहानियों में वर्णित देवताओं जैसा, यूँ सरेआम फूट-फूट कर रोना शुरू कर दे तो देखनेवालों के लिए तमाशा ही हो जाएगा न? वो तो भला हो स्मिता बिटि... नहीं मेमसाहब का उन्होंने लोगों से कहा शिव बाहर से आज ही लौटे हैं सो थके-हारे हैं और उनसे भी आते ही थोड़ी बहस हो गई... डोंट टेक अदरवाईज...। और उसकी सहायता से उन्हें आराम करने के बहाने कोठी के पिछले हिस्से में बने आउट हाऊस में ला बंद किया। चाभी उसे थमाई और पार्टी में यूँ आ घुली मिली जैसे कुछ हुआ ही न हो। आमतौर पर हर ऐरे-गैरे के मुँह न लगनेवाली मेमसा आज सब से न सिर्फ मुस्करा-मुस्करा कर बतिया रही थीं बल्कि उनकी टुच्ची बातों पर भी हँस-हँस कर दुहरी हुई जा रही थीं। खाने-पीने का खास इंतजाम, सुरा और अंत में उपहारस्वरूप दिए गए बंद लिफाफे।

उसे अच्छा लगा, इसीलिए लोग कहते हैं पढ़े-लिखे लोगों की बात ही अलग होती है। उसका मन तो घबड़ा ही उठा था, जाने अब क्या हो? स्मिता मेमसा की जगह अगर उसके या उस जैसे किसी अन्य परिवार की बहू-बेटी हुई होती तो...? राजस्थान के एक बहुत बड़े घराने से ताल्लुक रखनेवाली लंबी, गोरी-चिट्टी मेमसा जितनी तेजी से फर्र-फर्र अँग्रेजी बोलती हैं शायद दिमाग उससे भी ज्यादा तेज चलता है उनका। उसने अपने कानों को उँगली लगाई थी, वह स्मिता मेमसा की तुलना अपने जैसे गरीबों लोगों की बहू-बेटियों से क्यों करने लगा... सठियाने लगा है वह भी। उम्र भी तो साठ के ऊपर हो चली होगी। कितनी ऊपर? वह सोचता रहा पर हिसाब नहीं लगा पाया...

मास्साब 'शिव बबुआ के पिताजी' हमेशा कहा करते थे कुछ तो पढ़ ले हरी, थोड़ा बहुत ही अक्षरज्ञान, गिनती तक ही। मेरे शर्म की सोच कर ही पढ़ कि मास्टर साहब के घर का कोई अनपढ़ न कहलाए। कि आगे छोटी-छोटी जरूरतों के लिए तुझे आश्रित न रहना पड़े। किंतु वह मुस्करा कर रह जाता। हार कर उन्होंने कोशिश ही छोड़ दी। मास्टर रामजी प्रसाद सिंह सीधे-सहज, उतनी ही सरल उनकी पत्नी सरला देवी। वे अक्सर सरला देवी से कहते - ''जैसे मोर अपने ही पैर को देख कर शरमा उठता है यह हरिया भी मेरे लिए वैसा ही है। इसे देख कर हमेशा मेरे मन में एक हूक जगती है कि शायद मुझमें ही कोई कमी रही होगी कि इसके दिमाग के भूस में कुछ भी नहीं डाल सका।'' जब छोटा था मैं यह सुन कर भी खिखियाता रहता, थोड़ा बड़ा हुआ तो उनका यह दुख मुझे भी कुछ क्षणों के लिए उदास कर जाता और आज...

उनके ही पुण्य-प्रताप होंगे कि शिव बबुआ इतेक बड़े आदमी बन पाए। उसने कभी मास्साब को ऊँचा बोलते नहीं सुना, न ही गुस्सा करते। थाली में जो कुछ भी पड़ जाए खुशी-खुशी खा लेते। जब कभी तीज-त्योहारों पर शिव बबुआ का कपड़ा खरीदा तो उसके भी लिए। कहते भी - हमारा बड़ा बेटा तो यही हुआ न, थोड़ा बमपिलाट जरूर है... फिर उससे कहते - हम अगर न रहें तो शिब्बू की देखभाल बड़े भाई जैसा ही करना...

उस पूरे इलाके में एक ही स्कूल था। मुखिया, विधायक सब तो उन्हीं के पढ़ाए हुए निकले थे। किसकी हिम्मत थी कि उनके सामने आँखें उठा कर बात करे। हवेली के ठीक पीछे जब रतिया की लाश मिली तो पुलिस के आने से पहले ही जमींदार साहब मास्साब से मिलने आए। दोनों बचपन के मित्र। उन्होंने खुल कर कहा था - ''अब तुमसे क्या छुपाऊँ रामजी, श्रीपद का हाल किसी से छिपा नहीं। बेटा हुआ तो क्या, कद में तो बित्ता ऊँचा हो गया है। बात ही नहीं समझता। मैं आगे से उसे बिल्कुल बाँध कर रखूँगा। तुमसे ज्यादा कुछ नहीं चाहता। पुरानी दोस्ती की खातिर बस इतना सा उपकार कर देना। पुलिस अगर पूछे तो इतना भर कह देना कि वह पिछले एक सप्ताह से तुम्हें गाँव में दिखा ही नहीं।'' पुरानी दोस्ती का भी लिहाज छोड़ते हुए मास्साब ने तब बिना किसी आवेश के अपने धीर-गंभीर स्वर में इतना ही कहा था - ''यह तो तू था कि मैं तेरी बात इतनी देर तक सुनता रहा। मेरा शिब्बू भी ऐसा करता तो मैं उसका भी पक्ष नहीं लेता... और रतिया भी तो इसी गाँव की बेटी थी। उस दिन डरी-सहमी आई थी मेरे घर। मैंने जब कारण पूछा तो फूट-फूट कर रोने लगी थी। मैंने सब जानने-बूझने के बाद भी सांत्वना दी थी। पाँच दिनों बाद ही गौना था उसका पर उसके पहले ही वह ऊपर पहुँचा दी गई और वह भी किस हाल में। माफ करना भाई, मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता... यह ग्लानि ही मेरे लिए कम नहीं कि कह कर भी मैं उसकी रक्षा नहीं कर सका।'' हरपत ठाकुर उस दिन सिर झुकाए घर से निकल पड़े थे। इसी तरह की न जाने कितनी स्मृतियाँ, कितनी घटनाएँ...

...शिव बबुआ की आऊट हाऊस से आती चीखें भी कम विदारक नहीं थी। पर अब उतनी बेचैनी नहीं होती जैसी पहले हो जाया करती थी। वह जानता है ऐसे ही रोते-सुबकते आँखें लग जाएँगी उनकी और कल सुबह जब उठेंगे वे तो बिल्कुल स्वस्थ सहज। चेहरे पर आज की घटनाओं की परछाईं तक नहीं। उसे हैरत होती है कैसे संभव हो पाता है यह! और क्या है जिसे इतनी जल्दी बिसरा भी देते हैं वे...

वह याद कर रहा था ऐसा पहली बार कब हुआ था! दिन-तिथि-सालों की गिनती तो उसे आती नहीं... क्या मेमसा से शादी के बाद...।? जब यह मकान बन रहा था तब? ...नहीं इससे भी बहुत पहले... जब उन्होंने इंजीनियरिंग में दाखिला लिया था तभी - शादी तो इसके कई वर्षों बाद हुई। हाँ साहब तब मेमसा की छोटी बहन को ट्यूशन पढ़ाने उनके घर जरूर जाया करते थे। कई-कई परीक्षाएँ देने, दिन-रात मेहनत करते रहने के बाद भी शिव बबुआ का नाम सिर्फ एडमिशन के लिस्ट में उस एक जगह के लिए ही आया था जहाँ दाखिले के लिए डोनेशन के रूप में बड़ी रकम की पेशकश की गई थी। शिव बबुआ बहुत उदास थे इतनी बड़ी रकम... मेमसा के पिताजी ने तब अपनी जिद से पैसे दे कर दाखिला करवाया था उनका। उसे याद आया उन दिनों साहब बहुत उदास रहा करते थे। एक दिन जब कारण पूछा तो बोले - ''पता नहीं सर मुझ पर इतने मेहरबान क्यों हुए जा रहे हैं। मैंने कई बार कहा भी अब की बार नहीं हुआ तो क्या, अगली बार जरूर मेरा एडमिशन इससे कहीं बेहतर इंस्टीटयूट में हो जाएगा। वे बेकार परेशान न हों। पर वे मानते ही नहीं, कहते हैं - ''समय बर्बाद करने से क्या फायदा अगले साल तक। एक साल यूँ ही बीत जाएगा। एडमिशन ले कर वह समय अपनी पढ़ाई में बिताओ न शिव।'' यह तो उनका अहसान अपने सिर ले लेनेवाली बात हुई न। वैसे ही उनके...'' मुझे यह कोई चिंतावाली बात नहीं लगी थी - ''अरे वो देत हैं तो अपनी इच्छा से, तू कौनो माँगने तो नहीं जात हौ। फिर अगर तोहार इच्छा नाही तो मत लो'' ''...वही तो नहीं हो पा रहा हरिका। मैं आज भी अगर खुल कर इनकार नहीं कर सका तो समय हाथ से फिसल जाएगा। कल एडमिशन की आखिरी तारीख है और वो मानेंगे नहीं।'' ''ई कोई जबर्दस्ती है का? मन नहीं तो मना कर दो। बातचीत रुपये-पैसे में कोई लाई-लपट नाही। मास्साब को याद करो, उन्हीं के बिटवा हो।'' मेरी बातों से जैसे उन्हें कोई राह मिली हो। ''देखना आज मैं उन्हें जरूर मना कर दूँगा।'' वे साईकिल से हौले-हौले गुनगुनाते उस दिन ट्यूशन के लिए निकले थे। मैं हँस पड़ा था अब जा कर बात समझ में आई। इसी के लिए कब से मुँह लटकाए हुए थे...

पर तब के जूते के तस्मे बाँध कर निकले शिव बबुआ जब देर रात तक घर नहीं लौट कर आए तो मन घबड़ा उठा था। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। बना हुआ खाना यूँ ही पड़ा हुआ था पर पेट में जाए तो कैसे? कभी भी उन्हें बिना खिलाए खाने की आदत जो नहीं। वह पूरा दिन यूँ ही बीत गया था, दूसरा दिन भी। दूसरे दिन शाम वो थके हारे घर लौटे थे। पूछने पर कहा - ''एडमिशन ले लिया। काका खाना लाओ बहुत जोरों की भूख लगी है। मैं जब खाना ले कर आया तो वे खुली खिड़कियों को बंद कर रहे थे, इन्हें खुला मत छोड़ा करो काका, देखो तो माँ-बाबूजी की तसवीर पे कितनी मोटी धूल की परत है। वे अपनी उँगलियों से तसवीर को साफ कर रहे थे, देखो तो कितनी धूल... मैंने उनकी उँगलियाँ देखी, वे एकदम सुथरी थीं। तसवीर मैंने सुबह ही झाड़ी थी।

वे खाट पर बैठे थे धम्म से। ''माँ-बाबूजी की तसवीर पर धूल है। इतनी सारी धूल। वे सिसक रहे थे औार सिसकियों में एक ही धुन थी, एक ही शब्द था - ''धूल'' ...मैंने उन्हें समझाने-सँभालने की खातिर यूँ ही कहा था - ''मैं झाड़न मारना भूल गया था, मुझसे ही गलती हो गई मैं ध्यान दूँगा बबुआ'' ...पर उन्होंने जैसे कुछ सुना ही नहीं। वह रात बहुत लंबी थी, बहुत काली... पर सुबह पर उसके कालेपन का कोई साया नहीं था। सुबह शिव बबुआ देर तक नहीं जगे थे और मैंने उन्हें जगाया भी नहीं था। जब नींद टूटी तो बिल्कुल हडबड़ाए से उठे थे वे ''काका इतना दिन चढ़ आया और आपने मुझे उठाया तक नहीं। कॉलेज का पहला दिन है आज।'' फिर दौड-दौड़ कर मैंने सारा काम किया और वे कॉलेज के लिए निकल पड़े थे...

दूसरी बार कब? ....कुछ याद नहीं आ रहा। फिर तो एक लंबा सिलसिला था दबता-उभरता, सुगबुगाता रह-रह कर। पर शादी के ठीक पहले बस एक बार। उस समय भी मन में वही झिझक। उतने बड़े घर की उतने लाड़-प्यार से पली लड़की, कैसे निभेगा उनका संग-साथ? पर हरी ने देखा था एक दबी-ढकी खुशी भी थी उन आँखों में स्मिता मेमसा जैसी खूबसूरत, पढ़ी-लिखी, बड़े घर की लड़की को पा लेने की चाह की। वे कुछ खास नहीं बोले थे तब, बस इतनी ही कहा था - ''ब्याह-शादी बहुत दिमाग से लेनेवाला फैसला होता है और बबुआ अब यह जिम्मेदारी आपकी ही है कारण कि मास्साब तो अब है नहीं सो जो निर्णय लीजिएगा सो बहुत सोच-समझ कर। उसके मन में इस रिश्तों को ले कर उलझनें-आशंकाएँ और भय थे। पर उसने अपने इस भय को समेटा था। वह मना भी करे तो किस हक से। ठीक है बड़े भाई के नाई मान्यता है उसकी पर है तो वह एक नौकर ही... और अगर उसने मना भी किया तो कौन सा मान ही लेंगे वो। न जाने कौन सी छड़ी है उन साहेब के पास, कौन-सा मोहन-मंत्र। कोई तो लाचारी होती होगी, ना-ना कहते शिव बबुआ राजी-खुशी जहाँ हामी भर आते हैं। क्या पिता दिखते है उनमें उन्हें? पिता की छाया-छवि? इसीलिए इनकार नहीं कर पाते होंगे वे उनके किसी बात पे। मन में शिव के लिए अचानक ढेर सा लाड़ उमड़ आया है। उनकी आँखों की यह दबी-दबी चमक और उभर कर आए। सुखी रहें वे, चाहे जैसे भी।

खाइयाँ बहुत चौड़ी होती हैं जिंदगी की... टुकड़े-टुकड़े में टूटता आदमी साबुत दिख सकता है / चेहरा नहीं होता हमेशा मन का आईना / मन को थाह लेनेवाली आँखें दूसरी होती हैं... कलेजे में पिघलते दर्द को महसूस करने के लिए जरूरी होता है वह कलेजा / जहाँ साँस की तरह साँस लेता हो कोई नाजुक सा उजला-धवल, कोमल खरगोश / जो छूने भर से पिघल जाने की ताब रखता हो...।

सैम और स्वीटी को जर्बदस्ती सुला कर आई स्मिता तब से फोन खड़काए जा रही थी; अखबार के दफ्तरों से ले कर मंत्रियों तक। वह तो उसके आइ.ए.एस. और अब समाज सेवी पिता के जर्बदस्त पर्सनल कांटैक्ट थे वर्ना बड़ी मुश्किल होती। पिता को सब से संबंध बनाने का शौक था। घर में आए दिन बड़े-बड़े लोगों का जमावड़ा होता था। आए दिन पार्टियाँ और उन पार्टियों की जान होती थी पिता की दुलारी बिटिया 'स्मिता'। कान्वेंट एजुकेटेड, सभा सोसायटी में रमी रहनेवाली स्मिता उन दिनों सोचा करती थी, उसके लिए पिता ऐसा पति ढूँढ़ेंगे जिसका जोड़ा ढूँढ़ने से न मिलेगा। शायद आकाश से ही सीधे उसके लिए किसी को उतारा जाए। कैसे-कैसे लड़कों के तब रिश्ते आ रहे थे, पर पिता थे कि नाक पर मक्खी ही न बैठने दे रहे थे। किसी में उन्हें कुछ कमी नजर आती, किसी में कुछ। उन दिनों उसके पैर तो जैसे जमीन पर थमते ही नहीं थे। सहेलियाँ कहतीं ''भई सिम्मो से हमारा मुकाबला ही क्या, ये अपने पिता की दुलारी बिटिया है; इसके लिए कोई राजकुमार ही ढूँढ़ा जाएगा।'' ऐसी बातों को सुन कर वह कहती तो कुछ नहीं थी बस एक गर्वोन्नत मुस्कान उसके चेहरे को और-और खिला जाती।

हाँ पिता ने उसके लिए बिल्कुल अनोखा वर ही ढूँढ़ा था। दिन-रात घर में आने-जानेवाला शिव प्रसाद जिससे वह भर-मुँह बोलना तक पसंद नहीं करती थी; जिसके लिए चाय का कप भेजा जाता तो वह नाक-भौंह सिकोड़ती थी - ''रोज-रोज भिजवाना क्या जरूरी है?'' उसी शिवप्रसाद को पिताजी ने उसके दूल्हे के रूप में देखा था। पिता का विरोध नामुकिन था पर उनके निर्णय से उसे यूँ लगा जैसे भीतर-ही-भीतर काठ मार गया हो। वह दिन-दिन भर रोती रहती पर उसके इस अरण्य रोदन को सुननेवाला कौन बैठा था? घर में दूसरा था ही कौन? एक छोटी बहन, कुछ नौकर-नौकरानियाँ जिन्हें उसकी शादी के नाम पर बस खुशियाँ-ही-खुशियाँ, फायदे-ही-फायदे नजर आ रहे थे। यूँ भी शादी पूर्व लड़कियों का रोना कोई अनहोनी बात तो है नहीं जो उनका ध्यान खिंचता? ऐसे में उसे माँ बहुत याद आती, वह सोचती माँ होती तो कतई ऐसा न होने देती। जिस माँ का उसने चेहरा तक नहीं देखा था उन्हें शादी के पूर्व बहुत याद किया।

विवाह की नियत तिथि आ पहुँची थी। सुबह कुछ रस्मों से फारिग ही हुई थी कि इन दिनों चार-चार दिन तक अपना चेहरा तक न दिखानेवाले पिता उसके कमरे में आते दिखे थे। उनके आते ही सारे लोग कमरा छोड़ कर निकल गए थे। उन्होंने कहा था - ''सिम्मी, मुझे तुमसे कुछ बातें करनी है, थोड़ी देर मेरे पास बैठो... मैं जानता हूँ तुम इस संबंध से खुश नहीं हो, तुमने शायद कुछ दूसरी अपेक्षाएँ पाल रखी थी। पर मुझे यही उचित लगा। काफी सोच-समझ कर यह निर्णय लिया है। मैंने हर दृष्टिकोण से शिव को तुम्हारे उपयुक्त पाया। वह किसी तरह से बुरा नहीं। न शक्ल-सूरत, न अक्ल और सीरत से। हाँ तुम्हारी तरह कान्वेंट एजुकेटेड नहीं है, फर्राटेदार अँग्रेजी नहीं बोलता। पर मैंने अपने अनुभव से यही सीखा है कि ऊपर से आधुनिक दिखनेवाले लोग अक्सर भीतर से बहुत संकीर्ण और पोंगापंथी होते हैं और उनकी जिंदगी का यह स्वरूप बहुत पास से ही देखने पर नजर आता है। तुम्हारी माँ नहीं है बेटा, तुम दोनों को, उसमें भी खास कर के तुम्हें मैंने बहुत लाड़ से पाला है। तुम्हें कोई कष्ट न हो इसके लिए मैं चौबीसों घंटे चिंतित रहता था। मेरे इस प्यार ने तुम्हें उच्शृंखल और जिद्दी भी बनाया है, इसलिए मैं तुम्हारे भविष्य को ले कर काफी चिंतित रहा हूँ। अगर तुम्हारे लिए सही व्यक्ति का चयन मैं नहीं कर पाता और तुम कष्ट पाती तो यह मेरे लिए जिंदगी भर का सोग हो जाता। तुम्हारे लिए मुझे ऐसे किसी व्यक्ति की तलाश थी जो तुम्हारे हर व्यवहार को शालीनता से झेले, तुम्हारी हर बाते माने। शिव वैसा ही है, जो तुम चाहोगी वह वही करेगा। यही तुम्हारे जीवन-सुख की कुंजी थी। मुझे अपराधी न समझना...।'' इतना कहते-कहते शांत-संयमशील पिता की आवाज भर्रा उठी थी मेरे सिर पर हाथ फेरते वे कमरे से निकल गए थे...

वह ये सब कुछ याद करके मुस्करा दी थी। पिताजी ने ठीक ही तो कहा था शिबू बिल्कुल सीधा-सादा था। आजतक घर में वही होता है, जो वह चाहती है। माँ-बाप उसके थे नहीं, सो ससुराल का चक्कर भी नहीं रहा। नहीं तो उसने अपनी अच्छी-खासी तेज-तर्रार सहेलियों को भी बलि के बकरे की तरह ससुराल में हर वक्त मिमियाते ही देखा है। उसी की तरह शिबू भी हर मामले में पूरी तरह से उसके पिता पर आश्रित हैं। पिताजी की इच्छा के विरुद्ध वह कभी नहीं जाता, चाहे मन से वह कार्य उसकी इच्छा या सिद्धांत के प्रतिकूल ही क्यों ने हो। जमीन कहाँ ली जाए, घर का मॉडल कैसा हो, बच्चे किस स्कूल में जाएँ, सारे निर्णय उसके यानि मूल में उसके पिता के ही थे। बैंक खाते उसके नाम से हैं, घर की साज-सज्जा उसके मनोनुकूल। पिछले साल जब पिता को दिल का पहला दौरा पड़ा तो शिव दौड़-धूप करके दिन-रात एक किए हुए था। रात-रात भर उनके सिरहाने जागा रहता; जबकि उनकी बेटी होने के बावजूद उससे इतना नहीं हो पाता था। सिक्ता (छोटी बहन) अपने पति के नए जगह पर हुए तबादले के कारण पिता को देखने तक भी न आ पाई थी कि पति को खुद कुछ करने की आदत नहीं। वह नहीं होगी तो उसकी देखभाल कौन करेगा; नई जगह होने की वजह से नौकर भी बिल्कुल नए थे। और तो और शिव ने पिता की इच्छा का मान रखते हुए राजनीति में भी प्रवेश किया। पिता को राजनीति का शौक बचपन से था और अब वे चाहते थे कि उनका कोई अपना, बहुत अपना राजनीति में जाए। एक तरह से नौसिखुआ होने के बावजूद पिता के समाजसेवा, सलाहों-संपर्को और खुद शिव की साफ-सुथरी स्वप्नदर्शी छवि भी उनके यहाँ तक पहुँचने में सहायक रही। इन परिस्थितियों में शादी के वक्त पिता की गलत लगनेवाली बातों का महत्व समझ में आया था। वह उनकी दूरंदेशी दृष्टि की कायल हो उठी थी। सचमुच उसे जिंदगी से कोई शिकायत नहीं...

बस एक ही दुख है जो इस भरी-पूरी गृहस्थी को घुन की तरह खा रहा है और उसे हर पल सालता रहता है - वह है शिव का हर साल-दो-साल में इस तरह बहकना और बर्राना। वह तो कहो कि ऐसे दौरे बड़े कम समय के लिए आते हैं, वर्ना...। उसने एक साइकेट्रिस्ट से भी बातें की थी मगर उसने बगैर शिव से बातचीत किए कोई भी राय देने से इनकार कर दिया। उसने शिव से जब उसके दौरों और उसे साइकेट्रिस्ट से दिखाने की बात की तो वह भड़क उठा था - ''अच्छा भला खा-कमा रहा हूँ कभी चीखा-चिल्लाया, डाँटा नहीं, बच्चों से कभी कड़े स्वर में बात नहीं की। यह तो मेरे पागलपन की ही निशानी है, तुम्हें पागल ही नजर आऊँगा। रईस घरों की लड़कियों को हम जैसे गरीब लोग पागल ही दिखते हैं...'' उसका प्रतिवाद 'शिव सुनो तो...' ''कहानियाँ गढ़ने की आदत हो चली हैं, मैं रोता हूँ, चीखता चिल्लाता हूँ अब यह किस्सा गढ़ लिया। मुझसे पीछा छुड़ाना है तो पागल करार देने की जरूरत नहीं। मैं खुद तुम्हें और बच्चों को छोड़ कर चला जाऊँगा। साइकेट्रिस्ट के यहाँ नहीं।''

वह आक्रोश में डूब चला था। किसी हद तक उसकी बात सही भी थी, जब ठीक होने पर उसे कुछ भी याद नहीं रहता तो फिर वह कैसे मान ले अपनी इस बीमारी को? वह होती तो मान लेती क्या? फिर उसने ज्यादा जोर भी नहीं दिया। उस दिन जिंदगी में पहली बार शिव ने उसे 'ना' कहा था। वह फिर कहे और वह नकार दे उसे अच्छा नहीं लगेगा। ना सुनने की उसकी आदत कभी नहीं रही। न पहले पापा के घर में और न अब उसके अपने घर में। फिर वह डॉक्टर से अकेले मिलने गई थी, उसे सारी बात बताई। डॉक्टर ने एक राह निकाली थी 'जब उन्हें हादसे के बाद कुछ याद ही नहीं रहता तो बेहतर यही होगा कि जब वह दौरे से गुजर रहे हों तो तभी मैं उन्हें देख लूँ। अगर मैं उस समय उपलब्ध न हुआ तो बगैर छेड़े आप लोग उन्हें अकेला छोड़ देंगे, यही बेहतर उपाय है।'' स्मिता के चेहरे पर आए प्रश्न को पढ़ते हुए डाक्टर ने अपनी बात पूरी की थी।

आज फिर शिव आऊट-हाऊस में पड़ा अकेला चीख-रो रहा है, उसकी आँखों की नींद और चैन छीनता हुआ। उसने याद करना चाहा था, ऐसा पहली बार उसके सामने कब हुआ? तब उसकी शादी के कुछ दिन ही बीते थे। वह और शिव तब पापा के यहाँ ही रहा करते थे। यह मकान बन रहा था। हरि का यहीं रह कर देखभाल करते थे। एक दिन वह भी मकान बनते देखने आई थी कि देखा शिव कुछ लोगों पर बिगड़ रहा है। वह पास पहुँची तो सारा माजरा समझ में आ गया था, वे कुछ ठीकेदार थे जो बीच में कुछ छुट्टियाँ आने की वजह से सीमेंट और छड़ की सप्लाई न मिलने की बात जान कर सारा माल ट्रकों में ढुलवा लाए थे कि काम बीच में न रुके। उसे आया देख कर शिव के चढ़ते तेवर कुछ उतरे थे; वह थोड़ा हल्का हुआ था। स्मिता ने शिव से कहा था वह इन लोगों को मना कर दे रही है, वो चिंता और तनाव सिर न मोले अभी तो उसे दौरे पर भी जाना है, जाने की तैयारी भी बाकी है। वह जब लौट कर के आया तो तीन दिनों के भीतर ही मकान बन कर तैयार था और रेडीमेड बना-बनाया बहाना भी कि पापा ने छड़ और सीमेंट का इंतजाम करवाया कि नियत तिथि पर गृहप्रवेश हो सके। पता नहीं शिव यह राज जान भी पाया कि नहीं।

वह ठीक गृहप्रवेश से पहलेवाले दिन की रात थी। शिव देर रात गए दौरे से थका-हारा लौटा था। तब बच्चे भी कहाँ थे, सैम और स्वीटी, शिव का दिया नाम 'समय और सुकृति। पर उसे इन पुरातनपंथी नामों से चिढ़ है। इक्कीसवीं सदी के बच्चे, जन्मते ही जिनका वास्ता कंप्यूटर, इंटरनेट की दुनिया से जुड़ गया हो उनका नाम समय और सुकृति? तब उसके पिता ने ही उसे समझाया था। स्मिता कभी-कभी उसे भी अपने मन की कर लेने दिया कर। तुझे नहीं पसंद यह नाम तो उन्हें सैम, स्वीटी कह कर बुलाना हाँ तो सैम और स्वीटी का जन्म उसके काफी बाद में हुआ। वह डर रही थी, शिव मकान के बनिस्वत कुछ न पूछे। पूछे भी तो किसका डर पड़ा है, वह एक बार तन कर बोली नहीं कि वह चुप हुआ। हमेशा तो यही होता है। और जब रेडीमेड बहाना तैयार ही है फिर कैसा डर? घंटी बजी थीं, उसे पता था शिव ही होगा। दरवाजा खोला तो उसकी उड़ी हुई रंगत को देख कर सहम गई थी। मन को समझाया तीन दिन से बाहर घूम रहा है, थकान है और क्या? हरि का को जगाने की बजाय उसने शिव के लिए पहली बार कॉफी खुद बनाने की सोची। वह दो मिनट में आने की बात कह कर किचेन में घुसी थी, कॉफी मिली नहीं कि उसकी थकान दूर हुई, वह भी तब क्यों नहीं जब स्मिता खुद कर बना कर देगी।

कमरे से किचेन की दूरी बहुत नहीं थी। कॉफी बनाते वक्त पता नहीं क्यों उसे बार-बार ये लग रहा था कि शिव किसी से बात कर रहा है। किससे बात कर रहा है वह? क्या हरि का उठ गए! उठ गए थे तो किचेन में आ कर हाथ बँटवाना था न। शिव ने भी इन्हें सिर चढ़ा कर रखा है, कहता है, इन्होंने ही मुझे पाला-पोसा है। पर उन्हें खुद भी तो कुछ सोचना चाहिए? यह तो वही है जो उन्हें जमीन दिखाए रहती है, वर्ना वह खुद को घर का मालिक ही समझने लगेंगे। शुरू-शुरू में तो बेटी कह कर ही पुकारना शुरू कर दिया था। होगा शिव बेटा, बबुआ, वह बेटी-बहू नहीं। अब यही बाकी रह गया है कि ...कॉफी ले कर वह कमरे के तरफ बढ़ी ही थी कि पहले बुदबुदाती-सी लगती शिव की आवाज उसे चीख और रुदन में बदलती दिखी। उसने उसे झकझोरा 'शिव कॉफी ले लो' पर वह तो जैसे किसी दूसरी दुनिया में डूबा हुआ था। अस्फुट से स्वर को उसने पकड़ना चाहा, क्या बुदबुदा रहा है वह? उसने देखा वह बार-बार कह रहा था 'तसवीर पर धूल क्यों' है, क्यों हैं तसवीर पर धूल ऽऽ एकटक अपने माँ-पिताजी की तसवीर को देखता हुआ वह जार-जार रो रहा था। कभी उसकी मुट्ठियाँ गुस्से से हवा में लहरा उठती तो कभी वह दीवार में सिर दे मारता। वह अजीब से पशोपेश में फँसी थी उसकी छठी-इंद्रिय ने कहा 'लगता है इसे आज किसी ने पिला दिया है, हैंगओवर हैं। नींबू दो।' वह किचेन के तरफ बढ़ी ही थी कि हरि का उसे दौड़ कर आते दिखे, उसे समझाया - ''घबड़ाना नहीं, बिटिया, पता नहीं इसे क्या हो जाता है कभी-कभी। पिछले सालों से ही ऐसा हो रहा है, पर 4-5 घंटे में ठीक भी हो जाता है। ना, नीबू से क्या होगा! शराब पीनेवाला जीव यह नहीं ठहरा। बस समझदारी से सब सँभाल लो, पढ़ी-लिखी होशियार लड़की हो। हाँ अबकी डॉक्टर से जरूर दिखा देना। पहले भी मैंने कई बार सोचा। पर बेटा मानूँ या भाई कहूँ, है तो मालिक ही। कहते नहीं बना कभी कि तुम्हें कभी-कभी पता नहीं क्या हो जाता है। और कहता भी तो मानते क्या? लगता कि बुढ़ऊ का दिमाग फिर गया है! उस दिन पहली बार उसे न उनका बिटिया कहना बुरा लगा, न उन्हें टोका ही।

वह रात उस पर बहुत भारी बीती थी। शिव पूरी रात अपने कमरे में चक्कर काटता, बड़बड़ाता रहा। वह सोफे पर ड्राइंगरूम में सोचती औंधी पड़ी थी और हरि का नीचे कालीन पर उसके पाँव के पास - उसे समझाते, ढाँढ़स बँधाते। सुबह की खुनक भरी हवा ने सिर्फ हमारी आँखों को ही झपकी नहीं दी थी, थके-हारे शिव को भी सुला दिया था। अगला दिन असमान्य नहीं था। सूरज ने रात की कालिमा के साथ-साथ जैसे उस दुःस्वप्न के टुकड़ों को भी झाड़ बुहार फेंका था। शिव सामान्य ढंग से मेहमानों की अगवानी में जुट चला था और फिर सब कुछ शुभ-शुभ बीता; गृहप्रवेश का भव्य आयोजन भी... आज इसीलिए मन बेचैन तो है पर पहले जैसा नहीं। वह जानती है कल का दिन सामान्य होगा। पर अबकी वह शिव को चाहे जैसे हो साइकेट्रिस्ट के पास ले जाएगी। पता नहीं कैसा संयोग है कि दौरे के समय वह बाहर गया हुआ है। हर ऐरे-गैरे को दिखाने का तो अब सवाल भी नहीं उठता। पहले की बात अलग थी अब की और। अब भी वह अफवाहों को दबाने में कितनी मुश्किल से कामयाब हुई है, एक बार जहाँ बात फैली तो फिर थमती क्या! और सब बना बनाया खेल खत्म। कितनी मुश्किल से शिव मुख्यमंत्री बना है यह तो यह उसे पता है या फिर उसके रिटायर्ड पिता को। उसकी अपनी समझ अलग थी और हालात की पेचीदगी अलग। इतने तिकड़म-पेंचों की उसे खबर भी लगी होती तो वह कहाँ तैयार होनेवाला था। यूँ भी कहाँ तैयार हो रहा था वह... वह तो पिता के कृष्ण-उवाच की कृतज्ञ है जिसने आखिरकार उसे कर्मक्षेत्र में पाँव डालने को मजबूर कर दिया।

भारी पलकों से उसने घड़ी की ओर देखा, सुबह के चार बजनेवाले हैं। शिव के कमरे से आती आवाजें भी अब धीमी हो चली हैं, शायद थोड़ी देर में सो जाए। इतनी चिंता की शायद जरूरत नहीं, सब कुछ ठीक हो जाएगा। सारी बातचीत तो हो ही गई है... पर अबकि डा. गुप्ता के विदेश से आते ही वह...

ढीले छोड़े गए स्नायु और बंद होती पलकों के बावजूद उसके दिमाग में एक प्रश्न कौंधा, बच्चे तो सो गए थे। वह खुद उन्हें सुला कर लौटी थी पर यह आवाज...। यह तो उन्हीं की है। बड़े डर से गए हैं बेचारे, कहीं जग कर आपस में उस घटना के बारे में बातें तो नहीं कर रहे... बच्चे ठहरे, उन्हें इन पेचीदगियों से बचाना-दूर रखना होगा।

बचपन देख सकता है अपनी सपनीली आँखों से आगामी समय का सच / यह दीगर प्रश्न है वह उससे घृणा करे या प्यार / या फिर संवेदना...? / वह बदल नहीं सकता कोई सच / वह सिर्फ द्रष्टा हो सकता है / तटस्थ वक्ता... संवेदी-सहज-सच्चा भी... / यह एक मिथ है - बचपन हमेशा भोला होता है।

''भाई, मम्मी ने डैडी को कमरे में अकेला क्यों बंद कर दिया? डैड को भूख नहीं लगी हागी? वे क्या खाएँगे बोलो? मम्मी गंदी है। डैड को कमरे में बंद करके खुद पार्टी में खाती रहीं।''

''स्वीट बेबी, मॉम के बारे में ऐसा नहीं कहते। मॉम भी तो डैड के रोने से दुखी और परेशान थीं। फिर घर आए लोगों को कौन देखता, कौन सँभालता, मॉम बड़ी है स्वीटी, उनके बारे में गंदी बात नहीं बोलते... डैड पागलों की तरह बिहेव कर रहे थे तो मॉम क्या करती, बोलो? ...डैड बड़े अजीब हैं, मुझे यूँ भी मॉम जितने अच्छे नहीं लगते। हमसे ज्यादा बात भी नहीं करते। मॉम ही तो चीजें दिलवाती है। तेरी बार्बी डॉल, खिलौने-कपड़े सब तो वही ला कर देती हैं। फिर भी तू उन्हें गंदा बताती है... नहीं।'' स्वीटी भाई के बड़प्पन से प्रभावित तो हुई पर डैड गंदे हैं का तर्क फिर भी उसके गले नहीं उतरा - ''फिर भी भाई मॉम को डैड के कमरे में खाना तो रखवा देना था न? खुद भूखी रह लेंगी क्या! फास्ट में भी दिन भर खाती रहती हैं; हमें, आया सबको डाँटती है, भूख के गुस्से से। डैड भूख से रो रहे हों तो? मुझे भूख लगती है और रामू का थोड़ी देर करते हैं तो लगता है रो पड़ूँ। मॉम को पूछना तो चाहिए था, वो क्यों रो-चीख रहे हैं। सीधे ले जा कर 'आऊट हाऊस' में बंद कर दिया... आउट हाउस तो यूँ भी मुझे भुतहा लगता है...''

''बस तुझे तो पेट की चिंता पड़ी रहती है। मैं कहाँ रोता हूँ भूख से? लड़के बात-बात पर नहीं रोते। लड़कियाँ रोती हैं। डैड का भी सबके सामने रोना मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। मुझे तो अभी भी सोच कर शर्म आ रही है, इतना बड़ा आदमी बच्चों जैसा कहीं सबके सामने रोएगा, छी...सब कैसे मुँह छिपा कर हँस रहे थे। देखा था तूने कैसे धूल क्यों हैं... कहे जा रहे थे, कहाँ थी तसवीर पर धूल! बस यूँ ही रोना-हल्ला करना शुरू कर दिया।''

''...पर भाई वो उनके मॉम-डैड की तसवीर थी न। उनको वे प्यार करते होंगे तभी तो रो रहे थे। मेरी पुरानी बार्बी को डॉगी ने जब चबा डाला था, मैं कितना रोई थी। और तुम... तुम कहते हो लड़के नहीं रोते, रोनेवाले लड़के गंदे होते हैं, जब तुम्हारी स्केट गायब हो गई थी, कैसे गुमशुम हो गए थे तुम, कुछ बोलते ही नहीं थे, तब जा कर हँसे थे जब मॉम ने नया स्केट ला कर दिया...''

''पर मैं रोया तो नहीं था न? और फिर मरे हुए लोगों की तसवीर और मेरी स्केट या तुम्हारी बार्बी में कंपेरिजन करती है? क्या वो इस तसवीर से हमारी तरह खेलते हैं। वो तो न गायब हुई है, न फटी है। गंदी भी कहाँ थी, रोज तो रामू का उसे झाड़ते हैं झूठ-मूठ हंगामा किया कि पार्टी में भी फिर मजा ही नहीं आया...''

''भाई, वो उनके मम्मी-डैडी की तसवीर है, अगर मॉम को कुछ हो जाए तो हम उनकी तसवीर प्यार से नहीं रखेंगे, डैड नहीं रहें तो... नानाजी के यहाँ नानीजी की तसवीर नहीं लगी! मॉम उन्हें प्रणाम नहीं करतीं, हमसे नहीं करवाती? माली को नहीं कहती कि उस पर ताजे फूलों की माला चढ़ाया करे! वैसे ही वो भी तो डैड के मॉम डैड हैं।''

''छीः स्वीटी तू गंदी, मॉम के मरने की बात करती है, मैं तुमसे बातें नहीं करता।

"...मॉम बता रही थी न वो लोग (डैड के मॉम-डैड) गरीब थे। देखती नहीं तसवीर में उनके कपड़े कैसे हैं! नानाजी इज सो स्वीट ऽऽ... नानाजी की तरह उनका शहर में मकान भी नहीं था। नानाजी हमें कितना सामान देते हैं, देते हैं न!''

''पर भाई मम्मी को डैड को यूँ अकेले कमरे में तो बंद नहीं करना चाहिए था न! उन्हें अकेले में डर भी तो लग रहा होगा? चलो पहले मॉम पार्टी में थी पर बाद में भी तो उन्होंने एक बार भी डैड को जा कर नहीं देखा। मैं देख आऊँ डैड को? पर कैसे? मुझे भी तो अकेले डर लगेगा। तुम चलोगे मेरे साथ...।''

स्वीटी, मॉम ने कहा था न डैड सुबह ठीक हो जाएँगे। तू घबड़ा नहीं मॉम कभी झूठ नहीं बोलती। हम जल्दी सो जाएँगे तो सुबह भी जल्द होगी, सुबह होगी तो डैड भी ठीक हो जाएँगे, यही कहा था न मॉम ने। चल मॉम का कहना मान कर हम दोनों जल्दी सो जाएँ, वन... टू... थ्रीऽऽऽ, देखे पहले कौन सोता है?

सुबह हमेशा उजाला देती है, यह एक भरम है सुहावना / अँधेरा जब परत-परत बैठता है भीतर। तहें मुटाती है रात की / अँधेरा हावी हो सकता है, सुबह पर / अँधेरे की अनदेखी, गुनाह है...

स्मिता की नींद जब टूटी उसका सिर भारी-भारी लग रहा था, घड़ी पर निगाह फेरी - अरे दिन के ग्यारह बज गए! धीरे-धीरे रात का सारा वाकया उसकी आँखों के आगे जाग उठा। अलस मन यह सोच कर हल्का हो उठा था अब तक शिव नार्मल हो चुका होगा। कहीं रात भर जागने के कारण उसकी आँख अब तक लगी हो! वह उठ कर आऊट हाऊस के तरफ बढ़ी।

यह क्या दरवाजा अब तक लॉक ही है, हरि का ने खोला नहीं? ...वह तो लॉक दरवाजे से पीठ लगाए सिर घुटनों में दिए बैठे हैं। लॉन में स्वीटी और सैम यूँ खड़े हैं जैसे बच्चे नहीं, बच्चों की दो प्रस्तर प्रतिमाएँ साथ-साथ खड़ी कर दी गई हों। उसने ध्यान दिया शिव के चीखने-बिसुरेन की आवाज अभी तक कमरे से बाहर गूँज रही थी। शिव की धुँआई आवाजों में भरी वह सुबह उसे यूँ लगी जैसे शोकगीत की कोई धुन... जैसे उदास मटमैली-सी कोई पुरानी-धुरानी तसवीर...


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