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कविता

जंगल की भाषाएँ बोलें
माहेश्वर तिवारी


शहरों के छोड़कर मुहावरे
आओ हम जंगल की भाषाएँ बोलें

जिनमें हैं
चिड़ियों के धारदार गीत
खरगोशों का भोलापन
कोंपल की सुर्ख पसलियों में
दुबका बैठा
फूलों जैसा कोमल मन
कम से कम एक बार और सही
हम आदिम-गंधों के हो लें

पेड़ों का पेड़ों से
गहरा भाईचारा
उकड़ूँ बैठे हुए पहाड़
जेठ की अग्नि-गाथा पर
छा जाने वाला
पोर-पोर हरियल आषाढ़
बंद हो गई है जो छंदों की
जंग लगी खिड़की हम खोलें


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