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कहानी

कथा संस्कृति
खंड : तीन
विदेशी पौराणिक कथाएँ


संपादन - कमलेश्वर

अनुक्रम ईफीसस की नारी - पेट्रोनियस पीछे     आगे

टाइटस पेट्रोनियस आइबिटर (प्रथम शताब्दी) दुनिया का पहला उपन्यासकार माना जा सकता है। उसके उपन्यास ‘सेटिरीकोन’ को सम्राट नीरो ने नष्ट करवा दिया था, क्योंकि वह पेट्रोनियस से नाराज हो गया था। पिछले 500 बरसों में निरन्तर शोध करके विद्वानों ने इस पुस्तक के काफी हिस्से खोज निकाले हैं। यहाँ दी गयी कहानी उपन्यास का एक पात्र यूमोल्पस सुनाता है।

एक समय की बात है कि ईफीसस में एक ऐसी गुणवती शादीशुदा औरत रहती थी कि आस-पास के देशों तक की औरतें उसके दर्शन करने आती थीं। अतः जब उसके पति का देहान्त हो गया, तो सामान्य बातों से ही उसकी सन्तुष्टि नहीं हुई-यानी खुले-उड़ते बालों को नोचने और नंगी छाती को पीटते-पीटते अरथी के आगे चलने से ही उसका गुजारा नहीं हुआ। लोगों की भीड़-की-भीड़ ने प्रशंसा भरी आँखों से देखा कि वह तो दिवंगत के विश्रामस्थल तक जा उतरी है, जहाँ उसने दिन-रात रोना शुरू कर दिया। यह काम वैसे ही एक तहखाने में चलता रहा, जैसा कि यूनानी अक्सर इस तरह के मौकों के लिए इस्तेमाल में लाते हैं। उसके माँ-बाप और रिश्तेदार भी उसे रोक नहीं पाये। वह अपने आपको कष्ट पहुँचाती रही और भूखी रहकर मौत को बुलावा देने लगी। उसने अधिकारियों को भी धमका दिया और वे भी उसे वहीं छोड़कर चले गये। हरेक ने यही सोच लिया कि वह अब मर जाएगी और इस तरह एक अद्वितीय व्यक्तित्व के नष्ट होने का दुख लिये वे सब चले गये।

अनशन का पाँचवाँ दिन। वह काफी कमजोर हो गयी थी। एक स्वामिभक्त नौकरानी उसके साथ बैठी थी। वह भी मालकिन के आँसुओं में अपने आँसू मिला रही थी। समाधि पर जलता दीया जब भी बुझने को होता, वह उसे फिर से भर देती। पूरा नगर उसी की चर्चा कर रहा था और हर वर्ग का हर आदमी यह स्वीकार कर रहा था कि वह पवित्रता और प्रेम के आदर्श के रूप में सबके समक्ष देदीप्यमान है।

अब हुआ यह कि उसी समय प्रान्त के गवर्नर ने आदेश दिया कि उस स्थान के निकट ही, जहाँ कि वह नारी शोकमग्न थी, कुछ लुटेरों को क्रॉस पर लटका दिया जाए। अतः अगले दिन उस सिपाही ने, जो कि सभी क्रॉसों पर लटके शरीरों की रखवाली कर रहा था-ताकि कोई उन्हें वहाँ से उतारकर उनकी समाधि न बना दे-समाधियों के बीच, कुछ ही दूर, कुछ रोशनी देखी, और साथ ही उसे किसी शोकमग्ना का रुदन भी सुनाई दिया। जिज्ञासा मनुष्य-स्वभाव की मूलभूत कमजोरी है। उसी के वशीभूत उसने यह जानना चाहा कि कौन रो रहा है और वहाँ हो क्या रहा है?

वह तहखाने के भीतर गया। जब उसे वहाँ एक खूबसूरत औरत दिखाई दी, तो वह चकराकर रुक गया, जैसे उसने कोई पाताल-सुन्दरी या पाताल-कन्या देख ली हो! तब उसे वहाँ पड़ा शव दिखाई दिया। उसने उस औरत की आँसू भरी आँखें देखीं और चेहरे पर नाखूनों से पड़ी खरोंचें देखीं। पूरे दृश्य का अर्थ उसकी समझ में आ गया और यह भी उसे मालूम हो गया कि वह क्षति उस सुन्दरी के लिए किस कदर असह्य रही है। वह अपना भोजन भी वहीं समाधि के भीतर ले आया और शोकमग्ना से निवेदन करने लगा कि वह उस दुःख से अपने आपको उबारे और उन आहों से अपने दिल को न तोड़े, जो किसी का भला नहीं कर सकतीं। एक-न-एक दिन सभी का ऐसे ही अन्त होना होता है...आदि-आदि-बस वही उपदेश भरे वाक्य, जिनके द्वारा सभी लोग आत्माओं की समानता स्थापित करने की चेष्टा किया करते हैं।

पर उसने उसकी हमदर्दी की ओर कोई ध्यान नहीं दिया, बल्कि अपनी छाती और भी ज्यादा जोर से पीटने लगी और अपनी लटें नोच-नोचकर मुर्दे पर बिखेरने लगी। बहरहाल, सिपाही ने भी हार नहीं मानी। वह औरत को प्रोत्साहित करने की कोशिश में लगा रहा, और कहता रहा कि वह कुछ खा ले। आखिरकार नौकरानी ने-बेशक शराब की गन्ध से पसीजकर-दोनों हाथ पसारकर उस सिपाही का आमन्त्रण स्वीकार कर लिया और फिर, शराब और भोजन से नयी स्फूर्ति पाकर उसने भी सिपाही का समर्थन करना शुरू कर दिया-अब वे दोनों मालकिन की जिद के खुले विरोधी बन चुके थे।

‘‘अगर आप भूख के मारे बेहोश हो गयीं, या आपने अपने आपको जिन्दा दफन कर डाला, या आपने समय के पूर्व ही श्वास त्याग दिया, तो उससे आपको क्या मिलेगा? क्या आपका यह ख्याल है कि राख या दफन हो चुका प्राणी देख-सुन सकता है? आप फिर से नयी जिन्दगी क्यों नहीं शुरू करतीं? आप औरतों की-सी यह मूर्खता छोड़ क्यों नहीं देतीं और जब तक मौका मिलता है, खुली हवा की जिन्दगी का आराम क्यों नहीं भोगतीं? आपके सामने पड़े आपके पति के शरीर से ही यह आवाज आप तक आ रही होगी कि जीयो! जीयो!’’

जब किसी को खाने और जीने के लिए कहा जाए, तो उसके लिए यह बड़ा मुश्किल होता है कि वह बात की तरफ ध्यान न दे। अतः उस औरत ने भी, चूँकि भूख के मारे वह बेहाल हो चुकी थी, अपना व्रत तोड़ डालने का इरादा कर लिया। अन्ततः उसने भी उतनी ही ललचायी नजर से पेट भर डाला, जिससे उसकी नौकरानी ने भरा था।

खैर, यह तो आप जानते ही हैं कि अच्छा खाना मिल जाए, तो आदमी का शरीर क्या माँग करने लगता है। जिन तर्कों के आधार पर सिपाही ने उसे जीवित रहने के लिए तैयार कर लिया था, उन्हीं तर्कों को उसने एक बार फिर फेंकना शुरू किया। पर इस बार किसी और उद्देश्य से - यानी यह कि वह अपनी ‘पवित्रता’ को भी त्याग दे। उस गुणवान नारी ने सिपाही को एक नजर देखा : वह जवान था, देखने में अच्छा लग रहा था, और फिर उसकी बातों का तो जवाब ही नहीं था। दूसरी ओर उसकी नौकरानी भी उसे बार-बार कह रही थी कि मेरे दिल की पुकार सुनिए, मालकिन -

‘‘क्या आप आनन्ददायी प्यार से भी झगड़ा करेंगी? और क्या यह याद नहीं करेंगी कि आप किसकी भूमि पर विश्राम कर रही हैं?’’

बात को लटकाने से क्या फायदा! औरत ने अपने शरीर का एक के बाद एक भाग समर्पित करना शुरू कर दिया, और सिपाही भी मनमानी करने लगा। उसने भी सिपाही को आलिंगन-बद्ध कर लिया और इस तरह उन्होंने केवल वह रात उसी तरह नहीं गुजार दी, बल्कि अगली भी और उससे अगली भी। उसने इस बात की सावधानी बरती थी कि तहखाने का द्वार बन्द कर लिया था, ताकि कोई मित्र या अजनबी मिलने आए, तो यही समझकर लौट जाए कि गुणों की उस खान ने अपने पति के शव पर ही अपने प्राण त्याग दिये हैं।

सिपाही ने भी उसकी खूबसूरती और रहस्य से मुग्ध होकर, जहाँ तक उसकी तनख्वाह साथ देती थी, उसने ऐशो-इशरत का सामान खरीदा और जैसे ही अन्धकार घिर आया, सामान को समाधि तक पहुँचा आया। और उधर जब क्रॉस पर चढ़े किसी लुटेरे के माँ-बाप ने यह देखा कि चौकीदार कितना लापरवाह है, तो उन्होंने एक रात उसके शरीर को क्रॉस से उतारा और आवश्यक अन्तिम संस्कार करके चलते बने।

सिपाही अपना कर्तव्य पूरा नहीं कर रहा था। उसकी अनुपस्थिति में ही यह हो सका। पर अगले दिन जब उसने यह देखा कि एक क्रॉस पर से तो मुर्दा ही गायब है, तो वह डर गया कि अब तो उसे सजा मिलेगी ही। वह भागा-भागा गया और उसने सारी बात उस औरत को बतायी। उसने कहा, ‘‘मैं कोर्ट मार्शल की प्रतीक्षा नहीं करूँगा। उससे अच्छा तो यही है कि मैं अपनी ही तलवार से अपने आपको सजा दे दूँ! अब अच्छा यही होगा कि तुम एक और मुर्दे के लिए जगह बनाओ, ताकि एक ही समाधि में तुम्हारा पति और प्रेमी, दोनों विश्राम पा सकें।’’

लेकिन वह औरत जितनी गुणवान थी, उतनी ही दयालु भी थी। ‘‘देवता नहीं चाहते,’’ वह बोली, ‘‘कि मैं एक ही स्थान पर और एक ही समय पर उन दोनों व्यक्तियों का अन्तिम संस्कार सम्पन्न करूँ, जिन्हें मैं सबसे ज्यादा चाहती हूँ। मैं एक जीवित आदमी को मरते हुए देखूँ, इससे तो बेहतर होगा कि मैं एक मृत आदमी को क्रॉस पर चढ़ता हुआ देखूँ।’’

तब उसने सिपाही से कहा कि तुम मेरे पति के शव को ताबूत में से निकालो और उसे खाली क्रॉस पर चढ़ा दो। सिपाही ने उस गुणवती के अत्युत्तम सुझाव से फायदा उठाया और अगले दिन लोग यह देखकर हैरान थे कि एक मृत आदमी क्रॉस पर कैसे चढ़ गया!


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