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कहानी

कथा संस्कृति
खंड : तीन
विदेशी पौराणिक कथाएँ


संपादन - कमलेश्वर

अनुक्रम हेराक्लीज़ - कमल नसीम पीछे     आगे

हेराक्लीज़ अथवा हर्क्युलिस को प्राचीन ग्रीस के वीर योद्धाओं में श्रेष्ठतम माना गया है। शारीरिक-क्षमता, युद्ध-पराक्रम, अद्वितीय साहस, निर्भीकता एवं आत्मविश्वास जैसे गुण केन्द्रस्थ हुए थे उसके व्यक्तित्व में। वह युग ही बाहुबल का था जब बड़े-से-बड़े युद्ध भी आमने-सामने तीरों और तलवारों से हुआ करते थे। अमानवीय शक्ति रखने, परन्तु उसका प्रयोग जन-साधारण के अहित में करने वाले दैत्यों और राक्षसों के दमन के लिए भी कुशाग्र बुद्धि की अपेक्षा लौह-शरीर अधिक आवश्यक हुआ करता था। सुदृढ़ मांसपेशियों के साथ एक विकसित विचारशक्ति का संगम तो दुर्लभ ही होता है और इसका एकमात्र उत्कृष्ट अपवाद है एथेन्स का वीर थीसियस। हेराक्लीज़ अपने समय का सबसे अधिक शक्तिशाली व्यक्ति था। शूरवीरता में सारे संसार में उसका सानी नहीं था। उसकी तुलना देवताओं से की जाती थी। इतना ही नहीं, कई बार तो दुःसाध्य कार्यों में देवता भी हेराक्लीज़ की सहायता लिया करते थे। हेराक्लीज़ ने जिस काम का बीड़ा उठाया, उसे पूरा किया। शत्रु कितना ही भयावह क्यों न हो, यह निश्चित था कि विजय हेराक्लीज़ कीही होगी। उसने सारे जीवन में कभी हार का मुँह नहीं देखा। कई लोग तो उसे देवता मानते हैं लेकिन हेराक्लीज़ नाम के आधार पर इस धारणा का खण्डन किया जा सकता है। हेराक्लीज़ हेरा से बना है और इसका अर्थ है ‘हेरा का गौरव।’ किसी भी ग्रीक देवी-देवता का नाम किसी अन्य के नाम के संयोजन से नहीं बना।

हेराक्लीज़ का जन्म

वीर परसियस का बेटा इलेक्ट्रयों मायसीनी का राजा था। वह अपने सुन्दर एवं उपयोगी चौपायों के लिए बड़ा प्रसिद्ध था। अवसर पाकर टेलिबोन्स और टै़फियन्स ने एक आकस्मिक आक्रमण में उसके चौपाये छीन लिये और उन्हें पुनः प्राप्त करने के असफल प्रयास में इलेक्ट्रयों के आठ बेटे मारे गये। अब इलेक्ट्रयों ने स्वयं शत्रु के विरुद्ध जाने का निश्चय किया और अपनी बेटी ऐल्कमीनी एवं अपना राज्य अपने भतीजे एम्फीट्रयों को कुछ समय के लिए सौंप दिया और यह वचन दिया कि वापसी पर वह ऐल्कमीनी का विवाह एम्फ़ीट्रयों से कर देगा। उसके लौटने तक वह उसकी देखभाल करे। इलेक्ट्रयों के वापस आने पर उसमें और एम्फ़ीट्रयों में कुछ वाद-विवाद हो गया और उसमें अनजाने ही एम्फ़ीट्रयों के हाथों इलेक्ट्रयों की हत्या हो गयी। इस पर एम्फ़ीट्रयों को स्थेनिलस द्वारा देश से निष्कासित कर दिया गया और मायसीनी का राज्य पीलॉप्स के बेटों एटरियस और थेसटीज़ को मिल गया।

एम्फ़ीट्रयों ऐल्कमीनी को साथ लेकर थीब्ज़ गया जहाँ के तात्कालिक राजा क्रियों ने उसे निकट सम्बन्धी हत्या के अपराध से शुद्ध किया और अपने यहाँ शरण दी। ऐल्कमीनी यद्यपि पतिव्रता स्त्री थी पर उसने तब तक एम्फ़ीट्रयों के साथ शयन करने से इनकार कर दिया जब तक कि वह उसके आठ भाइयों की हत्या का प्रतिशोध नहीं लेता। एम्फ़ीट्रयों ने वचन दिया और क्रियों की सहायता से टेलिबोन्स और टैफ़ियन्स पर विजय प्राप्त करके उनका राज्य अपने सम्बन्धियों में वितरित कर दिया।

इधर ज़्यूस की दृष्टि सुन्दरी ऐल्कमीनी पर पड़ चुकी थी लेकिन इस बार देव-सम्राट का उद्देश्य केवल वासना-पूर्ति नहीं बल्कि एक ऐसे बालक को जन्म देना था जो युवावस्था प्राप्त करने पर मनुष्य और देवता दोनों के काम आ सके। एक ऐसे महान शूरवीर की आवश्यकता थी जो दुष्टों का दमन कर सके, दैत्यों और राक्षसों का नाश करके देवताओं की सत्ता को दृढ़ करे और अपने बाहुबल से नये कीर्ति-स्तम्भ स्थापित करे। और ऐसे बालक को धारण करने और जन्म देने के लिए ऐल्कमीनी से अधिक उपयुक्त कोई मर्त्य स्त्री नहीं थी। ऐल्कमीनी अद्वितीय रूप-गुण, गरिमा और बुद्धि की स्वामिनी थी और साथ ही एकनिष्ठ। उसे प्रणय-निवेदन करके वश में करना असम्भव था। अतः ज़्यूस ने एम्फ़ीट्रयों के लौटने से एक दिन पहले उसी का रूप धारण करके ऐल्कमीनी का सम्भोग किया। ऐल्कमीनी ने उसे एम्फ़ीट्रयों ही समझा और यह जान लेने के बाद कि उसके भाइयों का प्रतिशोध लिया जा चुका है, स्वेच्छा से अपने को समर्पित कर दिया। देव-सम्राट ज़्यूस ने उस एक रात को तीन रातों जितना लम्बा कर दिया। उसने देवदूत हेमीज़ द्वारा सूर्य देवता हीलियस को यह सन्देश भेजा कि वह एक दिन घर पर ही विश्राम करे। चन्द्रमा को यह आज्ञा हुई कि वह धीरे-धीरे चले और निद्रा को यह आदेश हुआ कि सारे विश्व को गहरी नींद में सुला दे ताकि कोई यह न जान सके कि पिछली रात एम्फ़ीट्रयों के शयनकक्ष में किन दो आत्माओं का मिलन हुआ। ऐल्कमीनी सारी रात अपने पति की विजय-यात्रा के विवरण सुनती रति-क्रीड़ा में मग्न रही। छत्तीस घण्टे बाद सवेरा हुआ और जब वास्तविक एम्फ़ीट्रयों विजय के गर्व में झूमता और ऐल्कमीनी के भोग की कल्पना से मदमत्त वापस लौटा तो उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि ऐल्कमीनी ने उस उत्साह से उसका स्वागत नहीं किया जिसकी उसे अपेक्षा थी। अपितु सुहाग-शय्या पर उसकी आँखें नींद से बन्द हुई जा रही थीं और एम्फ़ीट्रयों की सिद्धियों में उसे कोई रुचि ही न थी। जब तब जम्हाइयाँ लेती हुई वह कहती, ‘‘कल रात एक पल भी नहीं सोये। अब तो सो जाओ।’’

एम्फ़ीट्रयों को कुछ सन्देह हुआ, अतः उसने थीब्ज़ के प्रसिद्ध भविष्यद्रष्टा टियरेसियस से इस विषय में पूछताछ की और तब उसे वास्तविकता का ज्ञान हुआ। ऐल्कमीनी वह अन्तिम नश्वर स्त्री थी जिसके साथ देव-सम्राट ज़्यूस ने शयन किया। वह ज़्यूस की प्रथम प्रेमिका निओबी की सोलहवीं पीढ़ी में थी और ज़्यूस के जिस पुत्र को उसने जन्म दिया उसके समान पराक्रमी फिर पृथ्वी पर नहीं आया।

इस घटना के लगभग नौ माह बाद अपने उत्साह को दबा सकने में असमर्थ ज़्यूस ओलिम्पस पर गर्व से फूलते हुए कहा कि कुछ ही देर बाद वह एक असाधारण बालक का पिता बनने वाला है। यह बालक हेराक्लीज़ कहलाएगा और परसियस के वंश का सबसे अधिक तेजस्वी शासक होगा। ज़्यूस की पत्नी हेरा तो उसके कामुक स्वभाव के कारण हमेशा परेशान रहती ही थी और ज़्यूस पर वश न चलने के कारण उसकी निर्दोष प्रेमिकाओं और उनके बच्चों को दण्ड देकर अपनी ईर्ष्या को शान्त किया करती थी। उसने तत्काल पता लगाया कि यह बालक किसके गर्भ से जन्म लेने वाला है और ज़्यूस से कसम उठवाकर यह वचन लिया कि उस शाम के ढलने से पहले परसियस के वंश में जो बालक जन्म लेगा वही सम्राट होगा। हेरा की चतुराई ने ज़्यूस को छल लिया क्योंकि ऐल्कमीनी के अतिरिक्त परसियस के वंश में मायसीनी के स्थेनिलस की रानी निसिप्पे भी सात माह के गर्भ से थी। हेरा शीघ्र ही मायसीनी गयी और निसिप्पे को समय से दो माह पूर्व ही प्रसव-वेदना आरम्भ करा दी। अब वह भागी-भागी थीब्ज़ लौटी और घुटने जोड़कर दोनों हाथों की उँगलियाँ एक-दूसरे में फँसाकर अपने कपड़ों में गाँठ लगाकर ऐल्कमीनी के द्वार पर जा बैठी। इस तरह बैठने का यह अर्थ था कि प्रसव-वेदना होने पर भी बालक का जन्म अभी नहीं होगा। वह तब तक इसी तरह बैठी रही, जब तक निसिप्पे के पुत्र यूरिस्थियस का जन्म नहीं हुआ। यूरिस्थियस के जन्म के एक घण्टे बाद हेराक्लीज़ का जन्म हुआ और इस तरह एक घण्टे की देर के कारण हेराक्लीज़ भाग्य से ठगा गया। हेराक्लीज़ का एक जुड़वाँ भाई भी हुआ जिसका नाम था इफ़िक्लीज़। इफ़िक्लीज़ एम्फीट्रयों का पुत्र था।

हेरा ने हेराक्लीज़ के जन्म में विलम्ब करने के लिए कुछ डायनों को ऐल्कमीनी के द्वार पर बैठा दिया था। एक अन्य धारणा यह है कि हेरा ने शिशु-जन्म की अधिष्ठात्री एलिथिया को यह दायित्व सौंपा था और जब वह उस विशेष मुद्रा में ऐल्कमीनी केद्वार पर बैठी थी तो ऐल्कमीनी की एक वफादार दासी ने जान-बूझकर हर्ष से चिल्लाते हुए झूठे ही यह घोषणा कर दी कि स्वामिनी को पुत्र हुआ है। इस पर एलिथिया चौंककर उठ बैठी और उसकी टाँगें और उँगलियाँ खुलते ही हेराक्लीज़ का जन्म हो गया। एलिथिया ने क्रुद्ध होकर इस धृष्टता से हँसती हुई दासी को एक पशु के रूप में परिवर्तित कर दिया।

हेरा का उद्देश्य पूरा हुआ। हेराक्लीज़ से पहले यूरिस्थियस काजन्म हुआ और हेराक्लीज़ अपने उत्तराधिकार से हेरा की ईर्ष्या के कारण वंचित हो गया। जब ज़्यूस को इस बात का पता चला तो वह क्रोध से प्रचण्ड हो उठा। उसने अपनी और हेरा की बेटी ऐटी को इस विषय को अपने पिता से छिपाने के अपराध में ओलिम्पस से नीचे पृथ्वी पर धकेल दिया। बाद में उसने हेरा से इतनी बात मनवायी कि यूरिस्थियस द्वारा निर्दिष्ट अत्यन्त कठिन बारह श्रमों में पूरा उतरने के बाद उसका बेटा हेराक्लीज़ अमरत्व प्राप्त करेगा।

ऐल्कमीनी ने हेरा की ईर्ष्यालु दृष्टि से बचाने के लिए शिशु हेराक्लीज़ को थीब्ज़ की सीमा के बाहर निर्जन प्रदेश में छुड़वा दिया। सर्वज्ञ ज़्यूस ने इस स्थिति का लाभ उठाया और देवी एथीनी को अपनी योजना समझाकर हेरा के पास भेजा। एथीनी सम्राज्ञी हेरा को सैर के बहाने उसी क्षेत्र में ले गयी जहाँ शिशु हेराक्लीज़ पड़ा हुआ था। घूमते-घूमते वे बालक के पास जा पहुँचीं और एथीनी ने अत्यधिक आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा, ‘‘ओह! देखो कितना सुन्दर और स्वस्थ बच्चा है! न जाने किस पागल माँ ने इसे यहाँ इस पथरीले इलाके में मरने के लिए छोड़ दिया है! बेचारा भूखा है! तुम इसे थोड़ा दूध दे दो!’’

हेरा ने बिना सोचे-समझे बच्चे को उठाकर वक्ष से लगा लिया और उसे स्तनपान कराने लगी। लेकिन शिशु हेराक्लीज़ ने उसके स्तन को इतनी जोर से चूसा कि हेरा पीड़ा से चीख उठी और उसे खींचकर अपने वक्ष से अलग किया। दूध की एक धार उछलकर नभ पर जा गिरी और वह आकाशगंगा कहलायी। हेरा गालियाँ देती रह गयी पर हेराक्लीज़ उसका दूध पीकर अमरत्व प्राप्त कर गया। ज़्यूस ने हेरा ही को उसकी धात्री बना दिया। एथीनी ने वह शिशु ऐल्कमीनी को सौंप दिया और उसकी समुचित शिक्षा-दीक्षा का आदेश दिया। ऐल्कमीनी अपनी ही कोख का जाया पुत्र पा कृतार्थ हुई और उसका पालन-पोषण करने लगी। जिस स्थान पर यह घटना घटी उसे ‘हेराक्लीज़ का प्रदेश’ (द प्लेन्स ऑफ़ हेराक्लीज़) के नाम से जाना जाता है।

हेराक्लीज़ के शैशव के सम्बन्ध में एक अन्य घटना का उल्लेख अनेक स्रोतों से मिलता है। उस समय हेराक्लीज़ आठ-नौ माह अथवा एक वर्ष का था। एक शाम ऐल्कमीनी ने हेराक्लीज़ और इफ़िक्लीज़ को नहला-धुलाकर, दूध पिलाकर, दुम्बे की खाल से ढँककर लोरियाँ देकर सुलाया और अपने शयन-कक्ष में चली गयी। आधी रात के समय हेरा ने हेराक्लीज़ को मारने के लिए दो जहरीले नाग एम्फ़ीट्रयों के घर भेजे। वे अपनी विषैली जिह्वा लपलपाते, संगमरमर के फर्श पर बेआवाज फिसलते शिशु-कक्ष में पहुँचे और बच्चों के शरीर पर चढ़ने लगे। दोनों बच्चे उठ बैठे। इफ़िक्लीज़ भय से त्रस्त हो जोर-जोर से रोने लगा और अपना लिहाफ हटाने के प्रयास में बिस्तर से नीचे जा गिरा। उसकी चीखें सुनकर और कक्ष से आता हुआ दिव्य प्रकाश देखकर ऐल्कमीनी भयभीत हो उठी। ‘‘एम्फ़ीट्रयों उठो! उठो! जल्दी करो।’’ कहती हुई वह नंगे पाँव ही उस कमरे की ओर भागी। एम्फ़ीट्रयों छलाँग मारकर उठा और म्यान से तलवार निकाल ली। सारे घर के दासी-दासियाँ हड़बड़ाकर उठ बैठे और हाथ में लैम्प लिये शिशु-कक्ष की ओर दौड़े। तभी कक्ष के झरोखों से आने वाला वह दिव्य प्रकाश लुप्त हो गया। एम्फ़ीट्रयों ने द्वार खोला तो यह देखकर स्तब्ध रह गया कि हेराक्लीज़ के दोनों हाथों में दो लम्बे, काले, जहरीले नाग थे जिन्हें उसने गर्दन से पकड़ा हुआ था। हेराक्लीज़ की मजबूत पकड़ से उनकी आँखें बाहर को आ गयी थीं। शिशु हेराक्लीज़ इन भयानक खिलौनों से किलकारियाँ मारकर खेल रहा था। एम्फ़ीट्रयों को देखकर उसने गर्व से वे दोनों मरे हुए साँप उसके पैरों में फेंक दिये। इफ़िक्लीज़ इस बीच चीखता ही जा रहा था। उसे शान्त कर सुलाने के बाद एम्फीट्रयो और ऐल्कमीनी अपने शयन-कक्ष में लौटे। प्रातःकाल ऐल्कमीनी ने भविष्यद्रष्टा टियरेसियस को बुला भेजा और उसे इस अद्भुत घटना का वृत्तान्त दिया। टियरेसियस ने अपनी ज्योतिहीन, पर दिव्य दृष्टि से हेराक्लीज़ के उज्ज्वल भविष्य को देखा और कहा, ‘‘हेल्कमीनी, आने वाले समय में सन्ध्या समय ऊन बुनती हुई स्त्रियाँ तेरे और तेरे पुत्र के गीत गाया करेंगी। ऐराक्लीज़ पृथ्वी का श्रेष्ठतम वीर होगा।’’ उसने ऐल्कमीनी को यह परामर्श दिया कि वह सूखी लकड़ियों, पत्तों और बाँस के टुकड़ों की एक चिता बनाकर दोनों साँपों को अर्धरात्रि में उस पर जला दे। प्रातःकाल कोई दासी उनकी राख को उस पहाड़ी पर ले जाए जहाँ स्फ़िंक्स बैठी है और उस राख को हवा में उड़ाकर पीछे देखे बिना घर लौट आए। सारे महल को झरने के जल और गन्धक से पवित्र किया जाए ताकि इस घटना का कोई दुष्प्रभाव शेष न रह जाए। महल की छत पर जैतून लगाया जाए और ज़्यूस की वेदी पर एक रीछ की बलि दी जाए। ऐल्कमीनी ने ऐसा ही किया।

इस सन्दर्भ में एक अन्य धारणा यह भी है कि ये साँप हेरा ने नहीं, एम्फ़ीट्रयों ने भेजे थे। वह जानना चाहता था कि इन दोनों बच्चों में से उसका बेटा कौन-सा है। इफ़िक्लीज़ के रोने-चीखने से यह स्पष्ट हो गया कि उसकी रगों में किसी देवता का नहीं, मानव का रक्त है।

हेराक्लीज़ जब बड़ा हुआ तो उसकी शिक्षा का भार विभिन्न विद्या-विशारदों को सौंपा गया। एम्फ़ीट्रयों ने उसे रथ-चालन की शिक्षा दी। कैस्टर ने उसे तलवार चलाने, वार बचाने, पैदल और घुड़सवार सेना का नेतृत्व करने और चक्रव्यूह बनाने की कला सिखायी। देवदूत हेमीज़ के बेटे ऑटोलिकस ने उसे कुश्ती के नियम बताये। ऑटोलिकस अपने समय का सबसे दक्ष बॉक्सर माना जाता था और कुश्ती करते समय उसका चेहरा इतना विकृत हो उठता था कि साधारण व्यक्ति तो उसकी ओर देखने का भी साहस न कर पाता था। यूरिटस ने उसे तीर चलाना सिखाया और इस विद्या में हेराक्लीज़ ऐसा प्रवीण हो गया कि अपने तमाम साथियों को पीछे छोड़ गया।

शस्त्र-विद्या के अतिरिक्त प्राचीन ग्रीस में ललित कलाओं का ज्ञान भी शिक्षा का एक आवश्यक अंग माना जाता था। यूमोलपस से हेराक्लीज़ ने वीणा-वादन और गायन सीखा। उसे दर्शनशास्त्र और नक्षत्र-विद्या का भी अच्छा ज्ञान था। नदी के देवता इसमेनियस के बेटे लायनस ने हेराक्लीज़ को साहित्य से परिचित कराया। एक बार यूमोलपस की अनुपस्थिति में लायनस ने हेराक्लीज़ को गायन-वादन की शिक्षा देनी चाही परन्तु उसके नियम यूमोलपस के नियमो से सर्वथा भिन्न थे। हेराक्लीज़ ने उन्हें अस्वीकार कर दिया और ज्यादा हठ करने और शिक्षक द्वारा मारे जाने पर हेराक्लीज़ ने क्रुद्ध होकर वीणा उठाकर लायनस के सिर पर दे मारी, जिससे तत्क्षण ही उसकी मृत्यु हो गयी। हेराक्लीज़ पर हत्या का अभियोग लगा। उसके अपने पक्ष का स्वयं पोषण किया और रैडमैन्थस का यह विधान उद्धृत किया कि आक्रामक के विरुद्ध शक्ति का प्रयोग सर्वथा न्यायसंगत है। हेराक्लीज़ को इस आधार पर दोषमुक्त किया गया। यद्यपि हेराक्लीज़ बरी हो गया पर एम्फ़ीट्रयों उसके उद्दण्ड स्वभाव के प्रति सशंक हो उठा और उसे नगर से दूर स्थित एक पशुपालन केन्द्र पर भेज दिया जहाँ वह अठारहवें वर्ष तक रहा, और सभी विचारों में दक्षता प्राप्त की। यहाँ उसे अपोलो का जयपत्र-वाहक चुना गया।

हेराक्लीज़ की लम्बाई के विषय में मत-वैभिन्न्य हैं। अपोलोडॉरस के अनुसार वह छः फुट लम्बा था किन्तु पिण्डार के विचार से वह एक छोटे कद का गठीला व्यक्ति था। हेराक्लीज़ की आँखें सुर्ख थीं। उसका तीर और भाले का निशाना अचूक था। दिन के समय वह बहुत कम खाता था। किन्तु रात के समय इतना खाता था कि खाना बनाने वाला परेशान हो जाता। भुना हुआ मांस और जौ के केक उसके प्रिय पकवान थे। वह एक छोटा-सा साफ-सुथरा अधोवस्त्र पहनता था, ऐश्वर्य और विलास में उसकी कोई रुचि नहीं थी। महल की छत के नीचे सोने की अपेक्षा वह खुले आकाश की छाँव में सोना अधिक पसन्द करता था। शकुन और लक्षणों की उसे काफी जानकारी थी और गिद्ध का दिखाई देना वह एक अच्छा शकुन मानता था। वह कहता था कि गिद्ध सभी पक्षियों से अधिक विचारशील और न्यायपरायण हैं क्योंकि वे कभी भी किसी जीवित प्राणी पर आक्रमण नहीं करते। हेराक्लीज़ शत्रु-पक्ष के मृतकों को बिना किसी हील-हुज्जत के अन्तिम संस्कार के लिए लौटा दिया करता था।

अठारह वर्ष की आयु में हेराक्लीज़ का व्यावहारिक जीवन शुरू हुआ एवं अस्त्र-शस्त्र के प्रयोग का समय आया। सीथरों पर्वत पर उन दिनों एक भयानक बाघ विचरण किया करता जो बहुधा एम्फ़ीट्रयों एवं उसके पड़ोसी राजा थेस्पियस के चौपाये उठाकर ले जाता। चौपायों की संख्या घटती जाती और भय से आक्रान्त चरवाहे भी उन्हें चराने ले जाने से घबराते थे। हेराक्लीज़ ने इस बाघ को अकेले ही मारने का बीड़ा उठाया। इसकी एक माँद हेलीकॉन पर्वत पर भी थी। थेस्पिया के राजा ने हेराक्लीज़ का स्वागत किया। इस राजा की पचास पुत्रियाँ थीं। थेस्पियस को भय था कि योग्य वर न मिलने के कारण उसकी बेटियाँ कुमारियाँ ही न रह जाएँ, अतः उसने यह निश्चय किया कि वे सभी हेराक्लीज़ के बच्चों को जन्म दें। ऐसा कहा जाता है कि बाघ को खोजने में हेराक्लीज़ को पचास दिन लगे और हर रात उसने थेस्पियस की एक कन्या का भोग किया। एक मत यह भी है कि उन पचास में से सबसे छोटी लड़की हेराक्लीज़ की अंकशायिनी बनने को सहमत नहीं हुई और उसने बाद में एक मन्दिर की पुजारिन बनकर अपने जीवन के शेष दिन पवित्रता में बिता दिये। बाकी उनचास से हेराक्लीज़ के इक्यावन पुत्र हुए। सबसे बड़ी और सबसे छोटी लड़की ने जुड़वाँ बेटे पैदा किये। एक अन्य धारणा यह है कि हेराक्लीज़ ने एक ही रात में थेस्पियस की सभी कन्याओं का भोग किया।

काफी खोज के बाद हेराक्लीज़ ने बाघ को ढूँढ़ निकाला। और हेलीकॉन पर्वत पर अपनी गदा से उसका अन्त किया। शेर को मारने के बाद हेराक्लीज़ ने उसकी खाल को अधोवस्त्र के रूप में पहन लिया और उसके सिर का शिरस्त्राण धारण कर लिया। थीब्ज़ लौटते हुए उसकी भेंट मिनयाई के कुछ दूतों से हो गयी जो थीब्ज़ से शुल्क वसूलने आये थे।

कुछ ही वर्ष पहले पॉसायडन के पर्व पर एक साधारण से वाद-विवाद में मिन्याई का राजा कलाइमेनस थीब्ज़ के क्रियों के पिता के रथवाहक द्वारा मारा गया। घायल क्लाइमेनस ने मरते समय अपने बेटों से यह वचन लिया कि वे थीब्ज़ से उसकी मृत्यु का बदला लेंगे। उसके बड़े बेटे एरगिनस ने थीब्ज़ पर आक्रमण करके उसे परास्त किया और इस शर्त पर सन्धि की कि थीब्ज का राजा प्रतिवर्ष उसे एक सौ चौपाये भेंट के रूप में देगा। इसी शुल्क को लेने के लिए एरगिनस के दूत प्रतिवर्ष आया करते थे। जब हेराक्लीज़ ने उनके आने का अभिप्राय पूछा तो उन्होंने बड़े दम्भ से यह उत्तर दिया, ‘‘हम तो हर वर्ष थीब्ज़ के वासियों को एरगिनस की कृपाशीलता की याद दिलाने आते हैं कि उसने विजय प्राप्त कर लेने पर भी थीब्ज़ के हर नागरिक के नाक-कान न काटकर सिर्फ सौ चौपायों के शुल्क पर ही उन्हें क्षमा कर दिया।’’

हेराक्लीज़ को यह अपमान सहन नहीं हुआ। उसने एरगिनस के सभी दूतों के नाक-कान काटकर उनके गले में लटकाकर उन्हें वापस मिन्याई भेज दिया। एरगिनस थीब्ज़ का यह दुस्साहस देख कुपित हो उठा और उसने क्रियों के पास यह सन्देश भेजा कि वह उस धृष्ट व्यक्ति को मिन्याई को सौंप दे अन्यथा परिणाम भयंकर होगा। क्रियों भयभीत हो उठा। वह जानता था कि उसे पड़ोसी देशों से सहायता तो क्या सहानुभूति तक नहीं मिलेगी। लेकिन हेराक्लीज़ के लिए यह स्वतन्त्रता की लड़ाई थी। उसने अपने सभी युवक साथियों का आवाहन किया कि वे परतन्त्रता के इस तिरस्करणीय बन्धन को तोड़ने में उसकी सहायता करें। वह थीब्ज़ के सभी मन्दिरों में गया और वहाँ युद्ध में जीतकर शत्रु से अपहृत भेंट में चढ़ाये गये भाले, तलवारें, कवच, शिरस्त्राण और तीर-कमान उतार फेंके। उसकी आवाज पर थीब्ज़ के सभी युवक इकट्ठे हो गये। हेराक्लीज़ ने उन्हें शस्त्र-प्रयोग की शिक्षा दी। देवी एथीनी उसके इस उत्साह और दृढ़ निश्चय को देखकर बड़ी प्रसन्न हुई और उसने स्वयं हेराक्लीज़ को शस्त्रों से सुशोभित किया। अपने सन्देश का कोई उत्तर न पाकर एरगिनस थीब्ज़ पर आक्रमण करने चल पड़ा। लेकिन हेराक्लीज़ ने उसे रास्ते में ही एक सँकरे दर्रे में रोका और इस युद्ध में एरगिनस अपने कई सेनानायकों सहित मारा गया। थीब्ज़ की कोई हानि नहीं हुई। अपितु यह कहना चाहिए कि हेराक्लीज़ ने अकेले ही शत्रु के भाग्य का फैसला कर दिया। एरगिनस को मारने के बाद हेराक्लीज मिन्याई पर चढ़ आया और उसे बुरी तरह आक्रान्त किया। उसने उन दो सुरंगों का मुँह बन्द कर दिया जिनमें से होकर सेफ्रिसस नदी का पानी समुद्र में जाता था। इन सुरंगों के बन्द हो जाने से मिन्याई में बाढ़ आ गयी और उसकी उपजाऊ धरती और सारी फसल पानी में डूब गयी। हेराक्लीज़ का अभिप्राय फसल को नष्ट करना नहीं था। वह तो मिन्याई की घुड़सवार सेना को परास्त करना चाहता था जिस पर वहाँ की प्रजा को बड़ा अभिमान और विश्वास था। लेकिन जन-साधारण का अहित होते देख उसने सुरंगों के द्वार खोल दिये। इस शर्त पर सन्धि हुई कि मिन्याई का राजा थीब्ज़ को प्रतिवर्ष दो सौ चौपाये कर के रूप में देगा। हेराक्लीज़ ने थीब्ज़ के अपमान का बदला ले लिया और विजेता के रूप में थीब्ज़ लौटा। दुर्भाग्यवश इस युद्ध में उसके धाता एम्फिट्रयों की मृत्यु हो गयी।

थीब्ज़ लौटकर हेराक्लीज़ ने इस विजय की स्मृति में एक मन्दिर देव-सम्राट ज़्यूस को अर्पित किया। आर्टेमिस को एक बाघ-प्रतिमा भेंट की और दो पाषाण-प्रतिमाएँ देवी एथीनी को अर्पित कीं। थीब्ज़ वासियों ने उसका स्वागत किया और हेराक्लीज़ की एक प्रतिमा बनायी जिसका नाम रखा गया - ‘नाक काटने वाला हेराक्लीज़।’ क्रियों ने प्रसन्न होकर अपनी बेटी मेगारा का उससे विवाह कर दिया और उसे नगररक्षक नियुक्त किया। मेगारा की छोटी बहन का विवाह इफ़िक्लीज़ से हुआ। विवाह के बाद कुछ वर्षों तक हेराक्लीज़ बड़े सुख से रहा। उसके तीन पुत्र भी हुए। वैसे विभिन्न स्रोतों में उनकी संख्या आठ तक दी जाती है। सुशीला पत्नी, सुन्दर पुत्र और अनेक सुविधाओं के बीच हेराक्लीज़ बड़ा सपाट-सा जीवन व्यतीत कर रहा था। विधि को भला यह अकर्मण्यता क्यों कर सह्य होती? हेराक्लीज़ का जन्म ही एक महान उद्देश्य की पूर्ति के लिए हुआ था।

ईर्ष्यालु हेरा ने इस बार हेराक्लीज़ को दुखी करने का एक और उपाय सोचा। हेराक्लीज़ को पागलपन का दौरा पड़ा। उसे अच्छे-बुरे का कुछ भी ज्ञान न रहा। पागल व्यक्ति की शारीरिक शक्ति वैसे ही अनियन्त्रित हो जाती है फिर हेराक्लीज़ तो पहले ही असाधारण था। विक्षिप्तावस्था में उसने अपने बेटों को जलती हुई आग में जीवित फेंक दिया। इफ़िक्लीज़ के दो बेटे, जो उनके साथ खेल रहे थे, उनका भी यहीं अन्त हुआ। मेगारा जब उन्हें बचाने के लिए दौड़ी तो हेराक्लीज़ ने उसे भी मार डाला। इस दुर्घटना और इसमें मृत्यु को प्राप्त होने वाले व्यक्तियों की स्मृति में थीब्ज़ में सहस्र वर्ष तक वार्षिक तर्पण किया जाता रहा। पहले दिन गालियाँ दी जातीं और पवित्र अग्नि सारी रात जलती। दूसरे दिन अन्त्येष्टि खेलों का आयोजन होता और जीतने वाले को श्वेत सदाबहार से सुशोभित किया जाता था। कहते हैं कि हेराक्लीज़ के इन बेटों के लिए विधि ने बड़ा उन्नत भविष्य नियत किया था। उनमें से एक को आगोस पर शासन करना था, दूसरे को थीब्ज़ औरतीसरे को ओकेलिया पर। हेराक्लीज़ को अपने बेटों से प्यार भी बहुत था। अतः होश आने पर जब उसे अपने ही हाथों हुए इस अनर्थ का पता चला तो दुख, नैराश्य और अपराध-भावना ने उसे घेर लिया। वह कई दिनों तक एक बन्द कमरे में अकेला पड़ा रहा। न वह किसी से मिलता था और न ही अन्न-जल ग्रहण करता था। यद्यपि उसने ये हत्याएँ पागलपन की अवस्था में की थीं पर उसे अपनी प्रिय पत्नी और निरपराध बच्चों की हत्या के अपराध की गुरुता से जीवन बोझिल जान पड़ता था। उसे जीने की कोई इच्छा न रह गयी थी। थीब्ज के निवासी भी उसे अपराधी मानते थे। लोग उसकी छाया से भी घृणा करते। कोई भी उसे शरण देने को प्रस्तुत नहीं था। ऐसी स्थिति में एथेन्स का राजा थीसियस ही एक ऐसा व्यक्ति था जिसने उसका साथ दिया। विक्षिप्तावस्था में अनजाने ही हुए अपराध के लिए वह हेराक्लीज़ को दोषी नहीं मानता था। और यदि यह दोष था तो वह एक गुणग्राही मित्र के नाते उसमें हिस्सा बँटाने को तैयार था। वह हेराक्लीज़ को अपने साथ एथेन्स ले गया। थीसियस की प्रजा ने भी हेराक्लीज़ का स्वागत किया। लेकिन हेराक्लीज़ अपने आपको क्षमा नहीं कर पाया। हर पल उसकी आत्मा उसे धिक्कारती रहती। उसकी पवित्रता के लिए प्रायश्चित्त आवश्यक था। बिना यन्त्रणा और दण्ड के उसका शुद्धिकरण सम्भव नहीं था, अतः वह डेल्फ़ी के प्रश्न-स्थल पर गया। वहाँ देवोपासिका ने उसे पहली बार हेराक्लीज़ के नाम से सम्बोधित किया और उसके लिए यह दण्ड-विधान घोषित किया कि वह बारह वर्ष तक युरिस्थियस की सेवा करे। उसकी प्रत्येक आज्ञा का पालन करने पर और दुस्साध्य श्रमों को पूरा करने के बाद उसे देवत्व की प्राप्ति होगी।

कहते हैं कि इस दण्ड-विधान से हेराक्लीज़ बड़ा निराश हुआ। वह अपने से अश्रेष्ठ व्यक्ति का सेवक नहीं बनना चाहता था। लेकिन अवज्ञा करके देवताओं को रुष्ट करना भी उचित नहीं था। अन्ततः उसने यह विधान स्वीकार किया और यूरिस्थियस की सेवा में प्रस्तुत हो गया। उसकी आज्ञानुसार किये गये बारह दुःसाध्य श्रमों से ही हेराक्लीज़ को अनन्त कीर्ति मिलने वाली थी। ऐसा मत है कि इन श्रमों में देवताओं के आशीर्वाद और उनकी शुभकामनाएँ उसके साथ थीं। इसके अतिरिक्त हेमीज़ ने उसे एक तलवार और अपोलो ने उसे गरुड़ के पंखों वाले बाण और कमान भेंट की। हेफ़ास्टस ने अपने हाथों से बनाया एक वक्षस्त्राण दिया और एथीनी ने वस्त्र। एथीनी और हेफ़ास्टस में सदा ही एक-दूसरे से बढ़कर हेराक्लीज़ की सहायता करने की होड़ लगी रही। पॉसायडन ने द्रुत गति अश्व उपहार के रूप में हेराक्लीज़ को दिये और ज़्यूस ने एक कभी न विंध सकने वाला कवच। लेकिन हेराक्लीज़ ने इन दैवी उपहारों का कुछ विशेष प्रयोग नहीं किया। उसे अपने बाहुबल पर भरोसा था और वह हाथ में केवल जयपत्र की लकड़ी से बनी गदा रखता था। यह गदा भी वह स्वयं ही बनाया करता था। पहली गदा उसने हेलीकॉन पर्वत पर एक वृक्ष काटकर बनायी थी, दूसरी नेमिया में और तीसरी सैरोनिक समुद्र के किनारे पर। इफ़िक्लीज़ का बेटा इओलस इन श्रमों में सदा रथवाहक के रूप में हेराक्लीज़ के साथ रहा।

एक अन्य विवरण के अनुसार हेराक्लीज़ को पागलपन का दौरा टारटॉरस से लौटने पर पड़ा था और इस प्रकार यह घटना उसके जीवन के उत्तरार्द्ध की मानी गयी है।

पहला श्रम : नेमिया का सिंह

यूरिस्थियस ने जो पहला काम हेराक्लीज़ को सौंपा वह था नेमिया के सिंह का वध। यह सिंह साधारण शेरों से कहीं बड़ा और खूँखार था। आगोस और निकटवर्ती प्रदेशों में तो इस नर-भक्षक ने प्रलय मचा रखी थी। साधारण मनुष्यों की तो बात ही क्या, बड़े-बड़े आखेटक और वीर भी उसका सामना करने की सोच तक नहीं पाते थे। वस्तुतः यह सिंह टायफ़ून की सन्तान था जिसे अपोलो ने मारकर एटना में दफनाया था। वैसे इसे किमेरे अथवा आर्थ्रस कुत्ते का वंशज भी बताया जाता है। एक मत यह भी है कि इसे सिमीले ने जन्म दिया था और नेमिया की एक-दो मुँह वाली गुहा में छोड़ दिया था। नेमियावासियों द्वारा उचित बलि-भेंट न मिलने पर सिमीले ने उसे अपने ही देश को नष्ट-भ्रष्ट करने की आज्ञा दी और इस भयावह शेर ने उसका पालन किया। यह भी कहा जाता है कि सिमीले ने इसका सृजन हेरा के आदेशानुसार किया था। इस सिंह की विशेषता यह थी कि उस पर लोहे, काँसे, पत्थर आदि किसी भी धातु से बने शस्त्र का प्रभाव नहीं पड़ता था। उसकी खाल अभेद्य थी।

हेराक्लीज़ नेमिया के इस भयंकर बाघ को मारने के उद्देश्य से आगोस पहुँचा। वहाँ एक दिन उसने एक मजदूर के घर पर बिताया। इसका बेटा भी उसी शेर के हाथों मारा जा चुका था। अतः हेराक्लीज़ का उद्देश्य जानकर वह प्रसन्न हुआ और उसकी सफलता के लिए देवताओं को बलि देने को उद्यत हुआ लेकिन हेराक्लीज़ ने रोकते हुए उससे कहा, ‘‘ठहरो। तीस दिन तक प्रतीक्षा करो। यदि मैं इस सिंह को मारकर जीवित लौट आया तो देव सम्राट ज़्यूस को बलि देना। और यदि न लौटा तो आज से तीसवें दिन मुझे शहीद जानकर श्रद्धांजलि अर्पित करना।’’

दोपहर के समय हेराक्लीज़ नेमिया पर्वत पर पहुँचा। यह प्रदेश उस सिंह की कृपा से बिलकुल निर्जन हो गया था। वहाँ हेराक्लीज़ का मार्गदर्शन करने वाला भी कोई न था। न ही कहीं कोई पगडण्डी दिखाई देती थी। इधर-उधर भटकने के बाद आखिर एक दिन हेराक्लीज़ ट्रेटस पर्वत की उस दोमुँही गुहा पर जा पहुँचा जो इस सिंह की माँद थी। तभी वह शेर आ पहुँचा। उसके मुँह से रक्त टपक रहा था। सम्भवतः वह ताजा-ताजा शिकार करके आया था। हेराक्लीज़ घात लगाये बैठा था। उसने झट प्रत्यंचा चढ़ाकर एक के बाद एक तीर छोड़ने शुरू कर दिये। लेकिन व्यर्थ। शेर के लौह शरीर से टकराकर वे वहीं गिर पड़े और उसे एक खरोंच तक न आयी। अब हेराक्लीज़ ने अपनी तलवार से शत्रु पर आक्रमण किया पर वह इस तरह टूट गयी जैसे शीशे की बनी हो। अब हेराक्लीज़ ने अपनी गदा उठायी और पूरी शक्ति से उसके थूथुन पर प्रहार किया। सिंह आहत तो नहीं हुआ पर अपनी गुहा में घुस गया। घायल शेर की तरह क्रुद्ध हेराक्लीज़ ने अब गुफा के द्वार को जाल लगाकर बन्द किया और दूसरी ओर से शेर से गुत्थमगुत्था होने के लिए भीतर प्रवेश कर गया। जिस सिंह पर लोहे के बने शस्त्रों का कोई प्रभाव न पड़ता था उसकी गर्दन को हेराक्लीज़ ने अपनी सुदृढ़ भुजाओं में तब तक दबाये रखा जब तक उसके प्राण नहीं निकल गये। मृत शेर का शरीर लेकर हेराक्लीज़ तीसवें दिन आगोस लौट आया और वहाँ उस मजदूर के साथ मिलकर ज़्यूस को बलि दी। हेराक्लीज़ ने अपने लिए अब एक नयी गदा बनायी और नेमिया के खेलों में कुछ परिवर्तन करने के बाद मायसीनी लौट आया। यूरिस्थियस ने जब उसे नेमिया के सिंह के शव के साथ जीवित वापस आया देखा तो वह इतना चकित और भयभीत हुआ कि उसने हेराक्लीज़ का नगर में प्रवेश-निषेध कर दिया। उसे आज्ञा हुई कि वह अपनी उपलब्धियों का प्रदर्शन नगर के द्वार पर ही करे। अपोलोडॉरस का तो कहना है कि यूरिस्थियस अपने इस दुर्धर्ष सेवक से इतना अधिक त्रस्त हुआ कि उसने अपने शिल्पियों को आज्ञा देकर कांस्य का एक बहुत बड़ा पात्र बनवाया और उसे पृथ्वी में गाड़ दिया। जब कभी हेराक्लीज़ के आगमन की सूचना मिलती, वह भागकर इस पात्र में छिप जाता और अपनी आज्ञाएँ एक दूत के द्वारा हेराक्लीज़ तक भिजवाता।

इस सिंह की खाल उतारना भी काफी कठिन काम था क्योंकि कोई भी औजार उसे काट न पाता था। बहुत सोच-विचार के बाद हेराक्लीज़ ने उस शेर के अपने ही पंजों से उसे काटा और इस खाल को परिधान के रूप में धारण किया। इससे उत्तम कवच भला कहाँ मिल सकता था। शेर के सिर का उसने शिरस्त्राण धारण किया। शेर की खाल और उसके सिर का शिरस्त्राण पहनने वाले हेराक्लीज़ की दूर-दूर तक धूम मच गयी। उसकी असाधारण शूर-वीरता का लोग लोहा मान गये। विशेष रूप से नेमिया में उसे बड़ा आदर मिला।

दूसरा श्रम : लरना का बहुफणी सर्प

अब यूरिस्थियस ने हेराक्लीज़ को लरना के बहुमुखी साँप को मारने की आज्ञा दी। यह सर्प टायफून और एकीडनी से उत्पन्न हुआ था। और इसका पालन-पोषण हेरा ने किया था। हेरा का उद्देश्य हेराक्लीज़ को त्रस्त करने का था। लरना आगोस से पाँच मील की दूरी पर है और इसके पश्चिम में पाण्टिनस पर्वत है। इस पर्वत के घने वृक्ष नीचे समुद्र के तट तक फैले हुए हैं। इस प्रदेश में कई देवी-देवताओं के पवित्र देवालय हैं और निकट ही वह स्थान है जहाँ से हेडीज़ ने पर्सीफ़नी के साथ टारटॉरस में प्रवेश किया था। इसी पर्वत की गोद में एमीमोनी नदी के उद्गम के पास एक अथाह दलदल में इस बहुफणी सर्प का निवास था। इस साँप के फनों की संख्या के विषय में मतभेद है। बहुधा इसके आठ या नौ सिर बताये जाते हैं, जिनमें से एक अनश्वर था। वैसे कुछ स्रोतों में इनकी संख्या पचास, कहीं सौ तो कहीं दस हजार तक बतायी गयी है। यह इतना विषैला था कि इसकी साँस से ही जीवन नष्ट हो जाता था।

जब हेराक्लीज़ लरना पहुँचा तो देवी एथीनी ने उसका मार्गदर्शन किया और इस सर्प को मारने की विधि बतायी। पहले हेराक्लीज़ ने जलते हुए बाणों के प्रहार से इस बहुफणी सर्प को अपनी माँद से निकलने को विवश किया और फिर अपना साँस रोककर उसे गर्दन से पकड़ लिया। साँप ने उसके शरीर को जकड़ लिया लेकिन हेराक्लीज़ ने परवाह न की और वह गदा के प्रहार से उसके सिर कुचलता गया। लेकिन जो भी फन कटता उसके स्थान पर दो-तीन नये फन निकल आते। स्थिति बड़ी विषम हो उठी। विवश होकर हेराक्लीज़ ने अपने रथवाहक इओलस को चिल्लाकर यह आदेश दिया कि वह अग्नि प्रज्वलित करे। इओलस ने झट कुंज के एक कोने में आग लगा दी। हेराक्लीज़ साँप के फन काटता और इओलस जलती हुई लकड़ी से उसे दाग देता ताकि उसके स्थान पर नये फन न निकल सकें। अब केवल एक सिर बाकी रह गया जो अमर्त्य था। हेराक्लीज़ ने इसको काटकर एक बड़ी चट्टान के नीचे दफना दिया। इस तरह इस भयानक दैत्य का अन्त हुआ। हेराक्लीज़ ने अपने बाण उसके रक्त में बुझा लिये। इससे वे बाण इतने विषैले हो गये कि उनका साधारण-सा स्पर्श भी घातक हो गया।

जब हेराक्लीज़ अपनी इस दूसरी उपलब्धि के बाद मायसीनी लौटा तो यूरिस्थियस ने उसकी इस सफलता को बारह श्रमों में सम्मिलित करने से इनकार कर दिया। उसका कहना था कि हेराक्लीज़ ने इस काम को अकेले नहीं अपितु इओलस की सहायता से सम्पन्न किया है। अतः इसे उसकी उपलब्धि नहीं माना जा सकता।

तीसरा श्रम : सीरिया की मृगी

इस बार हेराक्लीज़ को यूरिस्थियस द्वारा सीरिया की द्रुतगामिनी मृगी को जीवित पकड़ने का आदेश हुआ। वरजिल के अनुसार इस हिरनी के खुर काँसे के और सींग स्वर्ण के थे, जिनमें सूर्य की किरणें प्रतिबिम्बित होने से अनूठी आभा फूटती थी। यह पृथ्वी पर सबसे अधिक तेज दौड़ने वाली मृगी थी और देवी आर्टेमिस को विशेष रूप से प्रिय थी। ऐसा कहा जाता है कि जब आर्टेमिस छोटी-सी ही थी, उसने

एक दिन विशालाकार पाँच हिरनियों को थिसली की एक नदी के किनारे चरते हुए देखा। उनके आकार, सौन्दर्य, सोने के सींग और उनकी फुर्ती से आकृष्ट होकर आर्टेमिस ने उनका पीछा किया और काफी भाग-दौड़ के बाद वह चार मृगियों को पकड़ने में सफल हो गयी। इन चारों को उसने अपने रथ में जोत दिया। लेकिन पाँचवीं मृगी सीरिया के पर्वतों में भाग गयी। क्योंकि वह एक देवी को प्रिय थी, अतः उसको मारना अनुचित था। इसीलिए हेराक्लीज़ को उसे जीवित पकड़ लाने की आज्ञा हुई।

हेराक्लीज़ ने इस मृगी का एक वर्ष तक पीछा किया। इसमें दामिनी की-सी गति थी। आँख झपकते ही न जाने कहाँ पहुँच जाती। कहते हैं कि उसके पीछे-पीछे हेराक्लीज़ पृथ्वी के अन्तिम छोर तक गया। ईस्ट्रिया और हाइपरबोरियन्स के देश तक उसके जाने के तो अनेक संकेत मिलते हैं। एक साल तक भागते-बचते आखिर यह मृगी थककर आर्टेमिसियस पर्वत पर चली गयी। यहाँ हेराक्लीज़ ने भागती हुई मृगी की अगली टाँगों को अपने तीरों के बीच फँसाकर रोक लिया। इससे मृगी की हड्डी में थोड़ी चोट तो लगी पर रक्त नहीं बहा। अब हेराक्लीज़ ने उसे अपने कन्धे पर उठाया और आर्केडिया होता हुआ मायसीनी की ओर तीव्र गति से चल पड़ा। रास्ते में उसकी भेंट देवी आर्टेमिस से हुई। आर्टेमिस उसकी इस धृष्टता से अत्यधिक क्रुद्ध थी लेकिन हेराक्लीज़ एक दास होने के कारण अपने स्वामी की आज्ञापालन करने को विवश था। अतः उसने सारा दोष यूरिस्थियस पर थोपकर, समझा-बुझाकर देवी को प्रसन्न कर लिया। उसे मृगी को मायसीनी ले जाने की अनुमति भी मिल गयी।

इस तरह हेराक्लीज़ का तीसरा श्रम सम्पन्न हुआ।

चौथा श्रम : एरिमैन्थस का वराह

अब हेराक्लीज़ को एरिमैन्थस के भयंकर जंगली वराह को जीवित पकड़ लाने का आदेश हुआ। इस वराह ने एरिमैन्थस पर्वत, आर्केडिया के वनों, लैम्पिया पर्वत और सॉफिस के आस-पास के क्षेत्र में तहलका मचा रखा था।

जब हेराक्लीज़ अपने इस नये अभियान पर चला तो रास्ते में उसे इच्छा न रहते हुए भी कुछ युद्ध करने पड़े। एक तो उसने सॉरस नामक एक लुटेरे को मारा। इसके बाद सेण्टॉर फ़ॉलस ने उसे अपने यहाँ आमन्त्रित किया और उसे खाने के लिए गोश्त तो दिया पर पीने के लिए मदिरा नहीं दी। हेराक्लीज़ को मालूम था कि सेण्टॉर के पास चार पीढ़ी पूर्व मदिरा-देवता डायनायसस द्वारा भेंट किया गया मदिरा-पात्र है जो अभी तक बन्द पड़ा है। उसने फ़ॉलस को वह पात्र खोलने को कहा। फ़ॉलस ने अपने अतिथि की इच्छा का पालन किया; लेकिन जैसे ही वह पात्र खुला मदिरा की नशीली गन्ध दूर-दूर तक फैल गयी। इस पर अन्य सेण्टॉर्ज़ ने क्रुद्ध होकर फ़ॉलस की गुहा पर आक्रमण कर दिया। वे बड़ी-बड़ी चट्टानों के टुकड़े और जलती हुई लकड़ियाँ लेकर हेराक्लीज़ और फ़ॉलस पर टूट पड़े। हेराक्लीज़ ने इस अप्रत्याशित आक्रमण को रोका और फिर उन्हें ऐसा प्रत्युत्तर दिया कि वे भयभीत होकर पीछे दौड़ पड़े। इस लड़ाई में कई सेण्टॉर्ज़ मारे गये। और बचे-खुचे भागकर कैरों की गुहा में छिप गये। हेराक्लीज़ ने वहाँ भी उनका पीछा किया और उसके कमान से छूटा एक तीर भाग्यवश कैरों के घुटने में लग गया। कैरों हेराक्लीज़ का पुराना गुरु और मित्र था और उसे अमरत्व प्राप्त था। हेराक्लीज़ इस आकस्मिक दुर्घटना से बड़ा क्षुब्ध हुआ लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था। कैरों ने अपनी सारी चिकित्सा-बुद्धि लगा दी पर वह जख्म भरा नहीं। मर वह सकता नहीं था, अतः जब तक वह जिया यह घाव उसे सालता रहा। कहते हैं कि बाद में प्रमीथ्युस ने उसकी जगह अनश्वरता स्वीकार की और तब कैरों को मुक्ति मिली। उधरफ़ॉलस हेराक्लीज़ के बाणों का निरीक्षण कर आश्चर्यचकित हो रहा था कि कैसे इतने हट्टे-कट्टे सेण्टार्ज़ एक ही चोट से धराशायी हो गये। दुर्भाग्यवश तीर उसके हाथ से फिसलकर उसके पाँव पर जा गिरा और तत्काल फ़ॉलस की मृत्यु हो गयी। हेराक्लीज़ के बाण बहुफणी सर्प के विष में बुझे हुए थे। हेराक्लीज़ फ़ॉलस का अन्तिम संस्कार विधिवत् करके एरिमैन्थस की ओर बढ़ा।

हेराक्लीज़ ने वराह का पीछा किया और वह उसे जंगल से खदेड़कर हिमाच्छादित प्रदेश में ले गया। बर्फ पर भाग सकने में असमर्थ वराह आसानी से ही हेराक्लीज़ की पकड़ में आ गया और उसे पीठ पर उठाकर वह मायसीनी को आया। छठी शताब्दी के चित्रकार बहुधा बड़े पात्रों, कलशों और फूलदानों पर कन्धे पर वराह को उठाये हुए हेराक्लीज़ और कांस्य के पात्र में से झाँकते हुए भयभीत यूरिस्थियस को अंकित किया करते थे।

ऐसा भी कहा जाता है कि जब हेराक्लीज़ इस वराह को लेकर मायसीनी के बाजार में पहुँचा ही था कि उसे पता चला कि एगनॉट्स कॉलकिस-यात्रा के लिए एकत्रित हो रहे हैं। वह वराह को वहीं छोड़कर यूरिस्थियस से आज्ञा लिये बिना ही सुनहरे भेड़ को प्राप्त करने के इस अभियान में भाग लेने के लिए चल पड़ा।

पाँचवाँ श्रम : पशुशाला की सफाई

एलिस का राजा ऑजियास उन दिनों पृथ्वी पर सबसे अधिक चौपायों का स्वामी था। उसकी पशुशाला मीलों तक फैली हुई थी और उसके चौपायों के चरने के लिए एक विस्तृत क्षेत्र सुरक्षित था। इन सुन्दर, सुडौल, हृष्ट-पुष्ट पशुओं के कारण ऑजियास का दूर-दूर तक नाम था। उसके चौपाये किसी दैवी वरदान के कारण कभी बीमार नहीं पड़ते थे और उनकी प्रजनन-शक्ति भी असाधारण थी। इन पशुओं के साथ-साथ ऑजियास की समृद्धि भी दिन-दूनी, रात-चौगुनी होती जाती थी। कहते हैं कि उसके पास तीन हजार चौपाये थे जिनमें तीन सौ काले साँड थे जिनकी टाँगें सफेद थीं, और दो सौ लाल साँड और बारह अतीव सुन्दर चाँदी से श्वेत बैल थे जो ऑजियास के पिता हीलियस को विशेषतया प्रिय थे। ये बारह बैल शक्तिशाली भी थे और ऑजियास के चौपायों की जंगली जानवरों के आक्रमण से रक्षा करते थे। लेकिन पिछले तीन वर्ष से ऑजियास की पशुशाला की सफाई नहीं हुई थी। परिणामस्वरूप वहाँ गोबर और गन्दगी के ढेर लग गये थे। केवल पशुशाला में ही नहीं, आसपास की घाटियों में जहाँ ये पशु चरने जाया करते थे, गोबर का एक दलदल-सा बन गया था और अब वहाँ खेती भी नहीं हो सकती थी। ऑजियास के पशु तो दैवी कृपा से बीमार पड़ते ही नहीं थे लेकिन इस गन्दगी के कारण मनुष्यों में बीमारियाँ अवश्य फैलने लगी थीं। यूरिस्थियस ने सोचा, क्यों न हेराक्लीज़ को इस काम में प्रयुक्त कर उसे अपमानित किया जाय। गोबर की टोकरियाँ ढोना हेराक्लीज़ जैसे वीर के सर्वथा अयोग्य था लेकिन यूरिस्थियस ने उसे आज्ञा दी कि वह ऑजियास की पशुशाला को एक दिन में साफ करे। हेराक्लीज़ उसका सेवक था, अतः उसे यह विद्वेषपूर्ण आदेश भी मानना पड़ा। जब वह एलिस पहुँचा तो उसकी भेंट ऑजियास से हुई। ऑजियास को ज्ञात नहीं था कि हेराक्लीज़ किस अभिप्राय से आया है। बातचीत के दौरान हेराक्लीज़ ने कहा कि यदि वह उसकी पशुशाला की सफाई एक दिन में कर दे तो ऑजियास उसे क्या देगा। ऑजियास पहले तो इस असम्भव प्रस्ताव पर खूब हँसा और फिर अपने ज्येष्ठ पुत्र फीलियस को साक्षी कर यह वचन दिया कि यदि हेराक्लीज़ ने यह काम सूरज ढलने से पहले समाप्त कर लिया तो वह अपने चौपायों का दसवाँ भाग उसे पारिश्रमिक के रूप में दे देगा।

हेराक्लीज़ ने कुछ सोच-विचार के बाद पशुशाला की चारदीवारी में दो जगह बड़े आकार के छेद किये और उसके बाद पास ही बहने वाली एल्फ़िस और पेनियस नाम की दो नदियों को काटकर उनकी धाराओं को पशुशाला की ओर मोड़ दिया। वेग से बहता हुआ पानी पशुशाला की सारी गन्दगी साथ ही बहा ले गया। इतना ही नहीं, इन धाराओं से आगे चरागाहों और घाटियों की भी सफाई हो गयी और इस तरह रात घिरने से पहले हेराक्लीज़ ने यह असम्भव कार्य सम्पन्न कर दिखाया। इस प्रक्रिया में किसी प्रकार की हानि भी नहीं हुई और सारे प्रदेश में नवजीवन की लहर दौड़ गयी।

ऑजियास को जब यह समाचार मिला तो वह स्तब्ध रह गया। हेराक्लीज़ ने आशातीत काम कर दिखाया था। लेकिन दुष्ट ऑजियास ने उसे पुरस्कृत नहीं किया अपितु उसका पारिश्रमिक देने से भी इनकार कर दिया। उसने कहा कि उन दोनों के बीच कभी कोई अनुबन्ध हुआ ही नहीं। लेकिन ऑजियास के बेटे फीलियस ने अपने पिता के विरुद्ध गवाही दी। इस पर ऑजियास ने उसे एलिस से निष्कासित कर दिया। उधर ऑजियास ने हेराक्लीज़ को उसका अधिकार देने से इनकार कर दिया और इधर यूरिस्थियस ने इस श्रम को स्वीकार नहीं किया। उसका कहना था कि हेराक्लीज़ ने यह काम केवल उसकी आज्ञा से नहीं अपितु ऑजियास से प्रतिदान की अपेक्षा रखकर किया है।

छठा श्रम : स्टिम्फ़ैलिया के पक्षी

आर्केडिया की स्टिम्फ़ैलिया नदी के किनारे रहने वाली इन चिड़ियों का आकार सारस के बराबर था और इनकी चोंच, पंजे और पंख लोहे के बने थे। युद्ध देवता एरीज़ के ये प्रिय पक्षी मानवभक्षी थे। उनकी नुकीली लोहे की चोंच कवच को भेद डालती थी। ये झुण्ड बनाकर उड़तीं और इनके लौह-पंख गिरने से कई प्राणियों की मृत्यु हो जाती। इनके मुँह से कुछ ऐसा लार निकलता था जिससे फसल नष्ट हो जाती थी। ये चिड़ियाँ सम्भवतः मूलतः अरब के मरुस्थल में रहती थीं और फिर वहाँ से प्रव्रजित हो स्टिम्फ़ैलिया नदी के किनारे चली आयी थीं।

हेराक्लीज़ जब वहाँ पहुँचा तो वह इन चिड़ियों की संख्या देखकर आश्चर्यचकित रह गया। वे इतनी थीं कि उन्हें एक-एक कर मारना असम्भव था और जहाँ वे बैठी थीं वहाँ दलदल था। इसलिए उन तक न तो पैदल और न ही नाव के द्वारा पहुँचा जा सकता था। हेराक्लीज़ सोच में पड़ा था कि तभी आविष्कार-कुशल देवी एथीनी प्रकट हुई और उसने ओलिम्पस के शिल्पी हेफ़ास्टस द्वारा बनाया गया लोहे का एक विशाल आहनक उसे दिया। इसे लेकर हेराक्लीज़ पर्वत की चोटी पर चढ़ गया और इस खटक को बजाया। इससे इतनी तेज और भयानक ध्वनि हुई कि वे सारी चिड़ियाँ घबराकर उड़ने लगीं। अब हेराक्लीज़ ने उन्हें लक्ष्य कर बाण फेंके और मृत चिड़ियों के झुण्ड गिरने लगे। इनमें से कुछ काले समुद्र में जा गिरीं जहाँ एगनॉट्स ने उनके शव लहरों पर बहते हुए देखे। जो चिड़ियाँ बचीं, वे ग्रीस से बाहर उड़ गयीं और फिर कभी नहीं लौटीं।

सातवाँ श्रम : क्रीट का साँड

अब यूरिस्थियस ने हेराक्लीज़ को क्रीट के साँड को वश में करने की आज्ञा दी। यह वह साँड था जो ज़्यूस के आदेश पर सुन्दरी यूरोपे को अपनी पीठ पर बिठाकर क्रीट लाया था, या वह जो क्रीट के राजा मायनॉस को पॉसायडन को बलि देने के लिए समुद्र से प्राप्त हुआ था, यह विवादास्पद है। लेकिन उन दिनों इस साँड ने क्रीट में बड़ा तहलका मचा रखा था और फसलें, बाग-बगीचे, चरागाह कुछ भी सुरक्षित नहीं था।

जब हेराक्लीज़ इस साँड को पकड़ने के उद्देश्य से क्रीट पहुँचा तो वहाँ के राजा मायनॉस ने उसका स्वागत किया और उसे हर सम्भव सहायता देने को प्रस्तुत हुआ। लेकिन हेराक्लीज़ ने आग उगलने वाले इस साँड को अकेले ही वश में कर लिया और उसकी पीठ पर सवार होकर मायसीनी पहुँचा। वहाँ यूरिस्थियस ने देवी हेरा के नाम पर उसे फिर स्वतन्त्र कर दिया। मायसीनी से छूटकर यह साँड पहले स्पार्टा, फिर आर्केडिया और अन्त में मैरेंथे पहुँचा, जहाँ थीसियस ने इसे पकड़ा और एथेन्स में देवी एथीनी के मन्दिर पर बलि कर दिया।

वैसे कुछ लेखकों का यह भी विचार है कि क्रीट और मैरेंथे के साँड में कोई साम्य नहीं।

आठवाँ श्रम : डायेमीडीज़ की घोड़ियाँ

थ्रेस के राजा डायेमीडीज़ के पास चार मानव-भक्षी घोड़ियाँ थीं। यह डायेमीडीज़ सम्भवतः युद्ध-देवता एरीज़ का पुत्र था, या एटलस और उसकी बेटी एसटेरी के अवैध सम्बन्ध से उत्पन्न हुआ था। वह स्वभाव से बड़ा उद्दण्ड एवं धूर्त था और अपने अतिथियों तथा अपने देश में आने वाले अनजान पथिकों को अपनी घोड़ियों को खिला दिया करता था। यूरेस्थियस ने हेराक्लीज़ को उन्हें जीवित पकड़कर लाने की आज्ञा दी। जब हेराक्लीज़ ने थ्रेस की ओर प्रस्थान किया तो मायसीनी के बहुत-से उत्साही युवक स्वेच्छा से उसके साथ चल पड़े। रास्ते में अपने मित्र फेरा के राजा एडमेटस को मिलने के बाद हेराक्लीज़ टिरिडा पहुँचा और डायेमीडीज़ के अश्वपालकों को अभिभूत करने के बाद उन घोड़ियों को खदेड़कर समुद्र की ओर ले गया। डायेमीडीज ने अपने साथियों बायस्टोन्स के साथ उसका पीछा किया। डायेमीडीज़ के साथियों की संख्या अपेक्षाकृत काफी अधिक थी, अतः हेराक्लीज़ उन घोड़ियों को अपने विश्वस्त एवं प्रिय साथी एब्डेरस के संरक्षण में छोड़कर पीछे लौटा। उसने एक नदी को काटकर पानी का रुख मोड़ दिया, जिससे निचले तल पर स्थित क्षेत्र में बाढ़ आ गयी। डायेमीडीज़ वापस भागा। हेराक्लीज़ ने उसका पीछा किया और बड़ी संख्या में बायस्टोन्स को मार डाला। डायेमीडीज़ घायल हो गया। हेराक्लीज़ उसे घसीटता हुआ ले गया और उसकी अपनी ही घोड़ियों के आगे डाल दिया। हेराक्लीज़ की अनुपस्थिति में अनियन्त्रित होकर इन मानव-भक्षी बाजिनियों ने उसके साथी एब्डेरस को खा डाला और अब अपने स्वामी डायेमीडीज़ को खाकर उनकी क्षुधा शान्त हुई। अब हेराक्लीज़ को उन्हें वश में करने में कुछ विशेष असुविधा नहीं हुई।

अपने मित्र एब्डेरस की स्मृति में एब्डेरा नगर की नींव डालने के बाद हेराक्लीज़ ने इन घोड़ियों को पहली बार रथ में जोता और मायसीनी पहुँचा। यूरिस्थियस ने इन घोड़ियों को हेरा को समर्पित कर स्वतन्त्र कर दिया। कहते हैं कि ओलिम्पस पर्वत पर जंगली जानवरों ने इनका शिकार किया। लेकिन एक अन्य धारणा यह भी है कि इनके वंशज ट्रॉय के युद्ध के समय थे। बल्कि कुछ लोगों का तो यह विचार है कि इस तरह की घोड़ियाँ एलैग्ज़ैण्डर महान के समय तक थीं।

नौवाँ श्रम : हिप्पॉलिटी की करधनी

इस बार यूरिस्थिस ने हेराक्लीज़ को आज्ञा दी कि वह उसकी बेटी एडमेटी के लिए अमेज़न्स की रानी हिप्पॉलिटी की करधनी लेकर आए। यह करधनी अमेज़न रानी को युद्ध-देवता एरीज़ ने भेंट की थी। हेराक्लीज़ जलपोत पर सवार हो अपने कुछ साथियों सहित थरमाडॉन नदी की ओर चल पड़ा। हेराक्लीज़ इस यात्रा के बीच पैरॉस के द्वीप पर रुका। यह द्वीप संगमरमर के लिए बड़ा प्रसिद्ध था और इसे रैडमैन्थस ने एण्ट्रोजियस के बेटे एल्सियस को भेंट में दिया था। बाद में क्रीट के राजा मायनॉस के चार बेटे भी इसी द्वीप पर बस गये। जब हेराक्लीज़ के दो साथी पानी लेने के लिए गये तो उन्हें मायनॉस के बेटों ने मार डाला। हेराक्लीज़ ने क्रुद्ध होकर उन चारों को मौत के घाट उतार दिया और पैरॉस के वासियों को इतना त्रस्त किया कि उन्होंने राजा एल्सियस और उसके भाई स्थेनलियस को दास के रूप में हेराक्लीज़ को भेंट करके अपनी जान छुड़ायी। इसके बाद हेराक्लीज़, हैलिसपॉण्ट और बासफॉरस होता हुआ मायसिया पहुँचा और वहाँ के एक प्रदेश के राजा लायकस का आतिथ्य स्वीकार किया। लायकस से प्रसन्न होकर हेराक्लीज़ ने शत्रुओं के विरुद्ध उसे सहायता दी और लायकस ने उसके नाम पर एक नगर का नाम हेराक्लाया रखा।

थरमाडॉन नदी के उद्गम पर पहुँचकर हेराक्लीज़ ने थैमिसीरा के बन्दरगाह पर लंगर डाला। यहाँ उस देश की रानी हिप्पॉलिटी उससे मिलने के लिए आयी और उसके गठीले शरीर से इतनी आकृष्ट हुई कि उसने अपनी करधनी हेराक्लीज़ को सप्रेम भेंट कर दी। देवी हेरा को जब यह पता चला तो वह एक अमेज़न स्त्री का रूप धरकर उन्हें हेराक्लीज़ के विरुद्ध भड़काने लगी। उसने यह अफवाह फैला दी कि हेराक्लीज़ हिप्पॉलिटी का अपहरण करने आया है। इस पर अमेज़न्स आगबबूला हो गयी। उन्होंने अपने शस्त्र धारण किये और घोड़ों पर सवार होकर हेराक्लीज़ पर आक्रमण कर दिया। हेराक्लीज़ ने इस अकस्मात् आक्रमण को हिप्पॉलिटी का विश्वासघात समझकर उसे मार डाला। घमासान युद्ध में अमेज़न्स की सभी प्रमुख सेनानायिकाएँ मारी गयीं और उनकी सेना तितर-बितर हो गयी।

कुछ लोगों का यह कहना भी है कि अमेज़न्स की रानी मेलानिप्पे को हेराक्लीज़ ने बन्दी बना लिया था और हिप्पॉलिटी ने अपनी करधनी देकर उसे स्वतन्त्र कराया। एक अन्य विश्वास है कि थीसियस ने अमेज़न्स को अभिभूत करने के बाद हिप्पॉलिटी से विवाह किया था और उसकी मेखला हेराक्लीज़ को भेंट कर दी थी। एक विवरण यह भी है कि हेराक्लीज़ ने हिप्पॉलिटी को युद्ध में परास्त किया। वह कटिबन्धक के बदले में हिप्पॉलिटी को जीवन-दान देना चाहता था पर हिप्पॉलिटी ने जीते जी हार नहीं मानी और उसकी मृत्यु के बाद ही वह करधनी हेराक्लीज़ को मिली।

हेराक्लीज़ वापस लौटा। रास्ते में उसने लायकस के भाई की स्मृति में आयोजित खेलों में भाग लिया। वहाँ के बाक्सिंग चैम्पियन टीशियास को धराशायी किया। बिथीनियन्स को हराया। ट्रॉय में एक जलदैत्य से हीसियानी का परित्राण किया, थैसॉस में बस गये थ्रेसवासियों को परास्त किया और टॉरॉन में प्रोटियस के दो बेटों को कुश्ती में हराया।

मायसीनी पहुँचकर हेराक्लीज़ ने हिप्पॉलिटी की करधनी यूरिस्थियस को दी और उसने अपनी बेटी एडमेटी को। हेराक्लीज़ ने लूट में लाये हुए अमेज़न स्त्रियों के वस्त्र डेल्फ़ी के देवालय में अर्पित कर दिये और हिप्पॉलिटी की युद्ध-कुल्हाड़ी रानी आम्फ़ेल को भेंट कर दी।

इन अमेज़न स्त्रियों से सम्बन्धित विवरण एलैग्ज़ैण्डर महान के समय तक मिलते हैं। ऐसा कहा जाता है कि इनकी रानी ने एलैग्ज़ैण्डर से सन्तान-प्राप्ति की इच्छा से तेरह दिन उसके साथ बिताये थे लेकिन दुर्भाग्यवश इस संयोग के कुछ ही दिन बाद उसकी मृत्यु हो गयी।

दसवाँ श्रम : गेरों के चौपाये

हेराक्लीज़ का दसवाँ श्रम था एरिथाया से गेरों के विश्वविख्यात चौपायों को जीतकर मायसीनी लाना। क्रिसॉर और टाइटन ओसिनस की बेटी कैलीरुई का बेटा गेरों स्पेन में टारटेसस का राजा था और पृथ्वी का सर्वाधिक शक्तिशाली व्यक्ति समझा जाता था। उसके तीन सिर थे, छः हाथ और कमर से ऊपर तीन धड़। उसके चौपाये बहुत सुन्दर थे। उसको चराने और देखभाल करने के लिए उसने युद्ध-देवता एरीज़ के बेटे यूरीशियन की नियुक्ति चरवाहे के रूप में की थी। यूरीशियन के अतिरिक्त टायफ़ून और एकीडनी से उत्पन्न दो सिर वाला भयानक कुत्ता आर्थ्रस इन चौपायों की रखवाली करता था।

यूरोप से होकर यात्रा करते हुए हेराक्लीज़ ने रास्ते में अनेक जंगली जानवरों को मारकर भविष्य में आने वाले यात्रियों के लिए मार्ग सुगम किया। टारटेसस पहुँच कर हेराक्लीज़ ने दो प्रसिद्ध स्तम्भों की स्थापना की - एक यूरोप में और दूसरा अफ्रीका में। इन्हें आज तक ‘पिलर्स ऑफ़ हेराक्लीज़’ के नाम से जाना जाता है। कुछ लोगों का विश्वास है कि ये दो महाद्वीप पहले से ही जुड़े हुए थे और हेराक्लीज़ ने दोनों के मध्य में एक जलधारा काटकर निकाली थी। इसके विपरीत एक अन्य विश्वास यह है कि हेराक्लीज़ ने दो चट्टानों को पास-पास सरकाकर इस रास्ते को तंग कर दिया था ताकि ह्वेल मछलियाँ और अन्य समुद्री दैत्य उसमें से न निकल सकें।

जब हेराक्लीज़ इस कार्य में रत था उस समय सूर्य देवता हीलियस अपने पूर्णयौवन पर था और उसके तेज और गर्मी को सहना असम्भव हो उठा था। हेराक्लीज़ को क्रोध आ गया। उसने हीलियस को लक्ष्य कर एक तीर छोड़ दिया। ऐसा दुस्साहस हीलियस को भला कहाँ सह्य होगा! वह जोर से चीखा। तत्काल ही हेराक्लीज़ को अपनी गलती का एहसास हो गया और उसने अपनी उद्दण्डता के लिए क्षमा माँगते हुए अपने धनुष की प्रत्यंचा उतार दी। हीलियस ने इस विनम्रता से प्रसन्न होकर हेराक्लीज़ को यात्रा के लिए जल-कुमुद के आकार का एक सुनहरी प्याला भेंट किया। लेकिन जब हेराक्लीज़ इस प्याले में बैठकर समुद्र पर से एरिथाया की ओर यात्रा कर रहा था, टाइटन ओसिनस के आदेश पर लहरें उद्दण्ड हो उठीं और हेराक्लीज़ की नैया थपेड़ों से डगमगाने लगी। क्रुद्ध हेराक्लीज़ ने फिर बाण चढ़ाया और ओसिनस को आज्ञा दी कि वह समुद्र को शान्त कर दे अन्यथा वह उसे दण्ड देगा। विवश ओसिनस को उसकी आज्ञा माननी पड़ी।

हेराक्लीज़ एबस पर्वत पर जाकर किनारे लगा। गेरों के चौपाये यहीं पर थे। हेराक्लीज़ को देखते ही आर्थ्रस कुत्ता उस पर झपटा लेकिन हेराक्लीज़ ने अपनी गदा के एक ही वार से उसका काम तमाम कर दिया। चरवाहे यूरीशियन का भी यहीं अन्त हुआ। दोनों रखवालों को मारकर अब हेराक्लीज़ ने गेरों के चौपायों को हाँकनाशुरू किया। पास ही कहीं मेनोटीज़ मृत्यु लोक के देवता हेडीज़ के चौपाये चरा रहा था। उसने हेराक्लीज़ को गेरों के पशु ले जाते हुए देखा। यद्यपि हेराक्लीज़ ने उसके चौपायों को हाथ भी नहीं लगाया था, पर फिर भी वह भागा-भागा गेरों के पास गया और उसे सारी बात बतायी। गेरों वहाँ पहुँचा और हेराक्लीज़ को युद्ध के लिए ललकारा। यद्यपि गेरों को पृथ्वी का सर्वाधिक शक्तिशाली व्यक्ति माना जाता था पर हेराक्लीज़ को उसे मारने में कुछ भी कठिनाई नहीं हुई। उसने बगल में एक तीर छोड़ा जो गेरों के तीनों शरीरों में से होकर निकल गया। या सम्भवतः उसने एक ही बार में तीन तीर छोड़े जिससे उसके तीनों धड़ घायल हो गये। कहते हैं कि ज़्यूस की पत्नी सम्राज्ञी हेरा गेरों की सहायता के लिए ओलिम्पस से आयी लेकिन हेराक्लीज़ का एक बाण उसके दाहिने वक्ष में लगा और वह वापस भाग गयी। इस तरह गेरों को धराशायी करके हेराक्लीज़ अपने चौपायों सहित उस प्याले के आकार की नाव में सवार हुआ और टारटेसस पहुँचकर सधन्यवाद यह भेंट हीलियस को लौटा दी।

ग्यारहवाँ श्रम : हेस्परिडीज़ के सेब

हेराक्लीज़ ने पहले दस श्रम आठ वर्ष और एक मास की अवधि में पूर्ण किये। लेकिन यूरिस्थियस ने दूसरे और पाँचवें श्रम को उसकी उपलब्धियों में सम्मिलित करने से इनकार कर दिया और उसे दो और असाध्य उद्यमों के लिए प्रस्तुत होने का आदेश दिया। इस बार उसे हेस्परिडीज़ के सुनहरे वृक्ष से सेब लाने थे। यह सेब-वृक्ष पृथ्वी-माता ने ज़्यूस और हेरा के पाणिग्रहण के अवसर पर हेरा को भेंट किया था। कहते हैं कि हेरा को यह वृक्ष और इसके फल इतने भले लगे कि उसने इस पेड़ को अपने दैवी उद्यान में लगा दिया और इसकी देखभाल का दायित्व एटलस की पुत्रियों को सौंप दिया। हेस्परिडीज़ सम्भवतः इन्हीं कन्याओं का नाम था। लेकिन हेरा का यह उपवन कहाँ स्थित है, यह कोई नहीं जानता था। एक धारणा है कि यह वृक्ष एटलस पर्वत के ढलान पर आरोपित था। यह वह प्रदेश है जहाँ दिन-भर की यात्रा से श्रान्त हीलियस के अश्व साँझ को पहुँचते हैं। यहाँ एटलस के हजारों चौपाये दिन-भर निर्विघ्न चरा करते हैं। लेकिन यह विवादास्पद है कि हेस्परिडीज़ एटलसपर्वत के उस प्रदेश में रहती थीं जो हाइपरबोरियन जाति से सम्बद्ध है या एटलस के उस भाग में जो मारेटेनिया में है, या अफ्रीका की सीमा पर स्थित ‘वेस्टर्न हार्न’ के नाम से प्रसिद्ध क्षेत्र के समीप दो द्वीपों पर। एक विवरण के अनुसार सम्भवतः इस समय तक एटलस को पृथ्वी का भार वहन करने पर नियुक्त नहीं किया गया था और वह भी अपनी पुत्रियों के साथ इस पेड़ की देख-रेख किया करता था। यद्यपि यह वृक्ष हेरा का था, पर एटलस को भी इसका बड़ा मोह था और इसकी देखभाल में वह गर्व का अनुभव किया करता था। लेकिन एक दिन थेमिस ने यह भविष्यवाणी की कि आने वाले समय में ज़्यूस का एक शक्तिशाली बेटा इस वृक्ष का स्वर्ण लूट ले जाएगा। एटलस ने इस भविष्यवाणी के बाद सुरक्षा के अतिरिक्त प्रबन्ध किये। उद्यान के चारों तरफ दीवार बना दी गयी और हेरा ने कभी आँख न झपकने वाले लेडॉन नामक सर्प को उसकी पहरेदारी पर नियुक्त किया। कुछ स्रोतों के अनुसार इस सर्प का जन्म टायफ़ून और एकीडनी से हुआ था। और कुछ लोगों का कहना है कि यह पृथ्वी-पुत्र था। इसके सौ सिर थे और यह कभी नहीं सोता था।

हेराक्लीज़ को नहीं पता था कि हेस्परिडीज़ का उद्यान कहाँ है। अतः पहला काम तो इसकी स्थिति का पता लगाना था। उसे किसी विश्वस्त सूत्र से ज्ञात हुआ कि नदी का देवता नेरियस उसका मार्ग-दर्शन कर सकता है। अतः वह इलीरिया होता हुआ पो नदी की ओर चल पड़ा। रास्ते में उसकी मुठभेड़ एरीज़ के पुत्र से हुई। अपने पुत्र की सहायता करने के लिए युद्ध-देवता एरीज़ स्वयं हेराक्लीज़ से लड़ने को प्रस्तुत हुआ लेकिन ज़्यूस ने अपना वज्र उन दोनों के मध्य में फेंककर इस स्थिति का निवारण किया।

जब हेराक्लीज़ पो नदी पर पहुँचा तो वहाँ ज़्यूस और थेमिस की पुत्रियों ने उसे नेरियस का पता बताया। नेरियस उस नदी के तट पर सो रहा था। उसके शरीर से पानी टपक रहा था। सदा पानी में रहने के कारण उसके शरीर पर काई और बहुत फिसलन थी। साथ ही उसे यह वरदान था कि वह इच्छानुसार कोई भी आकृति धारण कर सकता था। हेराक्लीज़ ने सोये हुए नेरियस को अपनी लौह-भुजाओं में जकड़ लिया। नेरियस ने बहुत हाथ-पाँव पटके, आकृतियाँ बदलीं पर हेराक्लीज़ की पकड़ से मुक्त नहीं हो सका। अन्त में विवश होकर उसे हेस्परिडीज पहुँचने और सेब लाने का तरीका बताना पड़ा। उसने हेराक्लीज़ को कहा कि वह सेब खुद न तोड़े बल्कि एटलस से आग्रह करे। वैसे कुछ लोगों का यह भी विचार है कि नेरियस ने हेराक्लीज़ को प्रमीथ्युस के पास भेजा था। प्रमीथ्युस ने उसे हेस्परिडीज़ पहुँचने का मार्ग बताया।

जब हेराक्लीज़ हेस्परिडीज़ के उद्यान में पहुँचा, उस समय एटलस पृथ्वी का भार अपने कन्धों पर लिये खड़ा था। इस भार के लिए पल-दो पल के लिए मुक्ति पाने के लिए वह कुछ भी कर सकता था। स्वर्ण वृक्ष के सेब लाने के बदले में हेराक्लीज़ ने पृथ्वी को अपने कन्धों पर लेने का प्रस्ताव किया, जिसे एटलस ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। पृथ्वी को हेराक्लीज़ के कन्धों पर टिकाकर एटलस बाग में गया और तीन सेब तोड़ लाया। लेकिन अब वह स्वतन्त्रता का आनन्द जान चुका था। उन गिने-चुने क्षणों में उसका संसार ही बदल गया था। अब वह किसी मूल्य पर भी उस भार को दुबारा ढोने को तैयार नहीं था, अतः उसने हेराक्लीज़ से कहा, ‘‘मैं ये सेब यूरिस्थियस को पहुँचाकर कुछ ही महीनों में लौट आऊँगा। तुम तब तक पृथ्वी का बोझ सँभाले रहो। वापस लौटते ही मैं इसे अपने कन्धों पर ले लूँगा।’’

हेराक्लीज़ एटलस का अभिप्राय समझ गया। वह इस असहनीय बोझ को अनन्त काल के लिए हेराक्लीज़ के सिर लादकर स्वयं स्वतन्त्र होना चाहता था। हेराक्लीज़ ने प्रकट रूप में इस प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए यह कहा कि एटलस एक पल जरा पृथ्वी को अपने कन्धे पर ले ताकि वह अपने सिर और कन्धों पर एक गद्दा लगा ले। मूर्ख एटलस हेराक्लीज़ की चतुराई से छला गया। उसने झट सेब नीचे रखकर पृथ्वी को उठा लिया। हेराक्लीज़ ने सेब उठाये, अपने कन्धे सीधे किये और एक व्यंग्यपूर्ण अलविदा कहकर वापस चल पड़ा।

हेराक्लीज़ सीधे और सरल रास्ते से मायसीनी नहीं लौटा। उसे तो सदा नये साहसिक उपक्रमों की तलाश थी। लीबिया के मरुस्थल में हेराक्लीज़ को बहुत प्यास लगी। लेकिन रेगिस्तान में पानी कहाँ? हेराक्लीज़ ने जोर से पृथ्वी पर पैर मारा और जल की एक धारा वहाँ फूट निकली। इसी जलधारा ने बाद में लीबिया के मरुस्थल में भटकते हुए एगनॉट्स की जान बचायी।

उन दिनों पॉसायडन और पृथ्वी का पुत्र एण्टायस लीबिया का राजा था। एण्टायस बड़ा शक्तिशाली और कुशल पहलवान था। वह लीबिया आने वाले यात्रियों को दंगल के लिए आमन्त्रित करता और परास्त होने पर उन्हें मार डालता। एण्टायस की सफलता का रहस्य यह था कि वह कुश्ती के समय जब भी पृथ्वी का स्पर्श करता उसकी नष्ट हुई शक्ति का पुनरुन्नयन हो जाता, जबकि दूसरा प्रतियोगी गिरने के बाद क्षीणतर होता चला जाता। एण्टायस क्योंकि पृथ्वी का पुत्र था, अतः माँ की उस पर यह विशेष अनुकम्पा थी। वह विशालाकार होने के कारण एक ऊँची चट्टान के नीचे स्थित गुहा में रहता था, शेरों के मांस का भोजन करता था और सदा शक्ति से अनुप्राणित रहने के लिए नंगी पृथ्वी पर सोता था। पृथ्वी माता को अपने इस बेटे पर बड़ा गर्व था और इसमें सन्देह नहीं कि मल्लयुद्ध में एण्टायस मानव तो क्या देवताओं पर भी भारी पड़ता था।

हेराक्लीज़ और एण्टायस के बीच मल्लयुद्ध अवश्यम्भावी था। दोनों प्रतिद्वन्द्वी तैयार हुए। हेराक्लीज़ ने अपने शरीर पर तेल मला और एण्टायस ने गर्म मिट्टी ताकि वह पृथ्वी से संयुक्त रहे। अखाड़े में दोनों वीरों का सामना हुआ। जल्दी ही हेराक्लीज़ एण्टायस पर हावी हो गया और उसे उठाकर पृथ्वी पर पटक दिया। लेकिन एण्टायस पृथ्वी से पहले से अधिक शक्ति और तेज लेकर उठा। हेराक्लीज़ चकित था। वह बार-बार एण्टायस को गिराता और एण्टायस हर बार दूने वेग से उठ खड़ा होता। हेराक्लीज़ ने तब यह अनुभव किया कि एण्टायस जान-बूझकर भी कभी-कभी गिर पड़ता है। अतः इस बार उसने एण्टायस को दोनों बाँहों में अपने सिर के ऊपर हवा में उठा लिया और उसकी पसलियाँ तोड़ डालीं। एण्टायस बहुत छटपटाया लेकिन हेराक्लीज़ ने उसे तब तक नीचे नहीं फेंका जब तक उसके प्राण नहीं निकल गये।

इसके बाद हेराक्लीज़ एशिया में भ्रमण करता हुआ काकेसस पर्वत पर पहुँचा। यह वही पर्वत था जिस पर प्रमीथ्युस पिछले एक हजार अथवा तीस हजार वर्षों से बँधा अनन्त यन्त्रणा भोग रहा था। उसके हाथ-पाँव श्रृंखलाओं से बँधे थे और टायफ़ून और एकीडनी से उत्पन्न एक भीमकाय गिद्ध उसके जिगर को नोच-नोचकर खाया करता था। मानव-प्रेमी प्रमीथ्युस को यह दण्ड ओलिम्पस से मनुष्य के लिए अग्नि चुराने के अपराध में मिला था। प्रमीथ्युस की यातना अनन्त थी। कहते हैं कि ज़्यूस को अपने इस निर्णय पर अब पश्चात्ताप था क्योंकि दण्डित होने के बाद भी प्रमीथ्युस ने ज़्यूस के प्रति सद्भवाना ही दर्शायी थी। जब प्रमीथ्युस को पता चला कि ज़्यूस थेटिस से विवाह करने की सोच रहा है तो उसने अपने दिव्य ज्ञान से उसे चेतावनी दी कि वह ऐसा न करे। थेटिस को एक ऐसे पुत्र की प्राप्ति होना निश्चित था जो अपने पिता से अधिक बलवान होगा। जब हेराक्लीज़ ने प्रमीथ्युस की मुक्ति के लिए प्रार्थना की तो ज़्यूस ने उसे झट स्वीकार कर लिया। हेराक्लीज़ नेउसकी श्रृंखलाएँ तोड़ डालीं और उस गिद्ध का हृदय अपने बाण से भेद डाला। अब प्रमीथ्युस को हेडीज़ जाने से बचाने के लिए यह आवश्यक था कि कोई अनश्वर प्राणी नश्वरता स्वीकार कर उसकी जगह टारटॉरस जाए। हेराक्लीज़ के बाण से घायल कैरों आज तक अपनी गुहा में पड़ा कराह रहा था, और अपने अमरत्व को कोस रहा था। वह सहर्ष ही प्रमीथ्युस की जगह देह छोड़ने को तैयार हो गया। ज़्यूस ने अमरत्व के इस आदान-प्रदान पर अपनी मोहर भी लगा दी। और इस तरह मानवमात्र का सच्चा मित्र प्रमीथ्युस स्वतन्त्र हुआ। काकेसस पर्वत के निवासी आज तक गिद्ध को मानव का शत्रु मानते हैं और जहाँ कहीं भी उसका घोंसला दिखाई दे उसे जलते हुए बाण फेंककर नष्ट कर देते हैं।वे प्रमीथ्युस की यन्त्रणा का प्रतिशोध ले रहे हैं।

मायसीनी पहुँचकर हेराक्लीज़ ने हेस्परिडीज़ के वे सेब यूरिस्थियस को दिये और उसने उन्हें देवी एथीनी को सौंप दिया। एथीनी ने उन्हें वापस हेस्परिडीज़ को पहुँचा दिया क्योंकि वे हेरा की सम्पत्ति थे और उनका कोई भी अन्य उपयोग उचित नहीं था।

इस तरह हेराक्लीज़ का ग्यारहवाँ श्रम सम्पन्न हुआ।

बारहवाँ श्रम : सेब्रेस का बन्दीकरण

यूरिस्थियस द्वारा निर्दिष्ट ग्यारह श्रम हेराक्लीज़ ने सफलतापूर्वक सम्पन्न किये लेकिन यूरिस्थियस एक दुस्तोष्य स्वामी था और मानव के कल्याणकारी के रूप में जो प्रसिद्धि और जो महिमा हेराक्लीज़ ने इन उपलब्धियों से कमायी थी, वह उसे सहन न थी। अतः उसने बहुत सोच-समझकर एक ऐसा काम हेराक्लीज़ को सौंपा जो पृथ्वी का कोई भी प्राणी नहीं कर सकता था। उसे टारटॉरस के तीन मुँहे कुत्ते सेब्रेस को जीवित पकड़कर लाने की आज्ञा हुई। किसी भी व्यक्ति के लिए सदेह टारटॉरस पहुँचना ही एक बहुत बड़ी बात थी, और वहाँ से जीवित लौट आना तो बिलकुल ही असम्भव-सा था। पर हेराक्लीज़ को तो अपने साथ सेब्रेस को भी लाना था।

हेराक्लीज़ सबसे पहले मृत्युलोक के रहस्यों में दीक्षित होने के लिए इल्युसिस गया। उस समय ऐसी परम्परा थी कि केवल एथेन्स के लोग ही इन रहस्यों में दीक्षित किये जाते थे। अतः पीलियस नाम के एक वृद्ध ने हेराक्लीज़ को दत्तक पुत्र के रूप में ग्रहण किया। सेण्टॉर्ज़ के वध के अपराध से उसका शुद्धीकरण किया गया और तब उसे पाताल लोक के रहस्यों की दीक्षा मिली।

दीक्षा ग्रहण करने के बाद हेराक्लीज़ लेकोनिया के टैनारम अथवा काले समुद्र के पास हेराक्लाया पर स्थित एक्रूसियन पेनिनसुला के रास्ते से टारटॉरस में उतरा। एथीनी और हेमीज़ ने उसका पथ-प्रदर्शन किया और जब कभी वह मार्ग की कठिनाइयों और ठण्डे अन्धकार से निराश हुआ तो उसे सान्त्वना दी। स्टिक्स नदी के किनारे बूढ़ा कैरों सदा की भाँति मृतात्माओं को पार ले जाने के लिए अपनी नाव लिये खड़ा था। वह हेराक्लीज़ की गरज से ऐसा भयभीत हुआ कि बिना कुछ बोले या माँगे ही उसे पार लगा दिया। इस अपराध के लिए हेडीज़ ने उसे एक वर्ष तक बन्दी बनाये रखा। स्टिक्स के उस पार जब हेराक्लीज़ नाव से उतरा तो सभी प्रेतात्माएँ उससे डरकर भाग गयीं। केवल गॉरगन मेडुसा और चमकते हुए शस्त्रों से सज्जित मेलियगर की आत्माएँ ही उसका सामना कर सकीं। हेराक्लीज़ ने उन्हें जीवित समझकर अपनी कटार निकाल ली पर हेमीज़ ने उसे समझाया कि वे मृत हैं और उनसे किसी प्रकार का कोई भय नहीं। इसके बाद वे तीनों कुछ समय तक बातचीत करते रहे। मेलियगर ने हेराक्लीज़ से आग्रह किया कि वह पृथ्वी पर लौटने पर उसकी शोकग्रस्त बहन डियेनियरा को सान्त्वना दे।

टारटॉरस के द्वार के पास हेराक्लीज़ ने दो जीवित व्यक्तियों को एक चट्टान पर स्थित देखा। हेराक्लीज़ को देखते ही वे उसे आर्द्र स्वर में सहायता के लिए पुकारने लगे। ये थे दो परम मित्र-थीसियस और पेरिथु पेरिथु की आकांक्षा थी हेडीज़ की पत्नी पर्सीफ़नी का अपहरण कर उसे अपनी प्रेयसी बनाने की। थीसियस ने मित्र का साथ देने का वचन दिया था। और इस दुस्साहसी आकांक्षा का उन्हें यह दण्ड मिला कि वे टारटॉरस की इस चट्टान पर बने आसनों पर एक बार जो बैठे तो फिर अपनी सारी शक्ति लगाकर भी उठ नहीं सके। अब उन्हें अनन्त काल तक इसी तरह बैठे रहना था। हेराक्लीज़ को आया देख उनकी आँखों में आशा की ज्योति चमकी। हेराक्लीज़ ने भी थीसियस को पहचान लिया और उसका हाथ पकड़कर जोर से खींचा। थीसियस के नितम्बों का बहुत-सा मांस उखड़कर वहीं रह गया पर वह इस कारावास से मुक्त हो गया। अब हेराक्लीज़ ने पेरिथु को स्वतन्त्र करना चाहा लेकिन तभी बड़ी जोर की गर्जना हुई और सारा मृत्युलोक जैसे भूचाल की लपेट में काँपने लगा। स्पष्ट था कि पेरिथु की मुक्ति हेडीज को स्वीकार नहीं। हेराक्लीज़ ने फिर चेष्टा नहीं की। इसके बाद हेराक्लीज़ ने एक चट्टान के नीचे बन्द किये गये एस्कैलेफ़स को स्वतन्त्र किया और प्रेतात्माओं को प्रसन्न करने के लिए हेडीज़ के चौपायों में से एक को पकड़कर उसकी बलि दी। गरम खून से मृतात्माओं में भी एक बार जीवन का आभास जागा। हेडीज़ के चरवाहे मेनोटीज़ को जब इस बात का पता चला तो उसने हेराक्लीज़ को मल्ल युद्ध के लिए ललकारा। हेराक्लीज़ ने उसे पकड़कर इतनी जोर से दबाया कि उसकी पसलियाँ टूट गयीं। तभी पर्सीफ़नी अपने प्रासाद से बाहर आयी और हेराक्लीज़ का स्वागत किया। उसके आग्रह पर ही मेनोटीज के प्राण बचे।

हेराक्लीज़ मृत्युलोक के सम्राट और सम्राज्ञी से मिला और सेब्रेस को पृथ्वी पर ले जाने की इच्छा प्रकट की। हेडीज़ ने कहा कि यदि वह शस्त्रों का प्रयोग किये बिना सेब्रेस को वशीभूत कर सकता है तो उसे सहर्ष ले जाए। एकरों के द्वार पर पहरा देते हुए सेब्रेस को हेराक्लीज़ ने गर्दन से पकड़ लिया। सेब्रेस ने सर्पों से आविष्ट अपने तीनों सिर बहुत पटके पर वह उस मजबूत पकड़ से छूट नहीं सका। उसकी नुकीली पूँछ की मार का हेराक्लीज़ के शेर की खाल से बने अधोवस्त्र पर कोई असर नहीं हुआ। उसके विष टपकाते हुए दाँत भी बेकार साबित हुए। हेराक्लीज़ उसे जंजीर में बाँधकर प्रकाश के देश की ओर वापस चला।

रास्ते में हेराक्लीज़ ने चिनार के उस वृक्ष की पत्तियों का हार सिर पर धारण किया जिसे हेडीज़ ने अपनी प्रेयसी, सुन्दरी ल्यूसी की स्मृति में लगाया था। इन पत्तियों के बाहरी हिस्से का रंग काला था-लेकिन भीतर का भाग हेराक्लीज़ के महिमामय स्वेद कणों के स्पर्श से श्वेत हो गया। इसी कारण श्वेत चिनार हेराक्लीज़ का प्रिय वृक्ष माना जाता है। इसके दो रंग इस बात के प्रतीक हैं कि हेराक्लीज़ ने दोनों लोकों में कठिन परिश्रम किये।

एथीनी की सहायता से हेराक्लीज़ स्टिक्स को पार करके सेब्रेस को खींचता हुआ ट्रॉज़ीन के विवर के पास पहुँचा। इसी विवर के मुख पर थीसियस द्वारा बनवाया गया देवी आर्टेमिस का पवित्र मन्दिर है। यहाँ पाताल की अधिष्ठात्री शक्तियों की वेदियाँ भी हैं। यहीं से हेराक्लीज़ वापस पृथ्वी पर पहुँचा। ऐसा भी कहा जाता है कि हेराक्लीज़ काले समुद्र के पास एकोनी नामक गुहा से बाहर निकला था। यहाँ प्रकाश के संसार से भयभीत सेब्रेस के मुँह से जो लार टपकी वह हरे-भरे खेतों पर फैल गयी और उससे एकोनाइट नामक एक विषैले पौधे का जन्म हुआ। एक अन्य विवरण के अनुसार हेराक्लीज़ टेनेरस से पृथ्वी पर लौटा।

सेब्रेस को लेकर जब हेराक्लीज़ मायसीनी पहुँचा, उस समय यूरिस्थियस एक बलि दे रहा था। यह हेराक्लीज़ का अन्तिम श्रम था और उसके दासत्व की अवधि पूरी हो चुकी थी। लेकिन फिर भी यूरिस्थियस ने बलि के बाद उसे वह अंश दिया जो दास को दिया जाता है। हेराक्लीज़ ने इस अन्याय से क्षुब्ध होकर यूरिस्थियस के तीन बेटों की हत्या कर दी।

इसके बाद दासत्व से मुक्त हेराक्लीज़ अपनी बारह उपलब्धियों का यश लेकर अपने जन्म स्थान थीब्ज़ को लौटा।


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