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कहानी

कथा संस्कृति
खंड : तीन
विदेशी पौराणिक कथाएँ


संपादन - कमलेश्वर

अनुक्रम प्रमथ्यु का विद्रोह - जे. एच. आनन्द पीछे     आगे

प्रमथ्यु यूनानी पुराण-कथाओं का एक प्रमुख पात्र है। उसे मानव जाति का जन्मदाता बताया जाता है। राक्षसों और देवताओं की लड़ाई में उसने देवताओं का साथ दिया था। लड़ाई समाप्त होने पर उसे देवता मनोनीत किया गया, लेकिन उसने अपना सम्पूर्ण जीवन देवताओं को समर्पित न करके मानव जाति को समर्पित कर दिया। इसलिए देवता उससे नाराज हो गये और उसे भयंकर यातनाएँ सहनी पड़ीं। इस पौराणिक कथा का काल 8वीं सदी ई. पू. माना गया है।

आरगोस नगर के राजा इनाकोस के दरबार में देवताओं के सरपंच जीयस की लोलुप दृष्टि इनाकोस की पुत्री आइओ पर पड़ी, जो उसकी पत्नी हीरा के मन्दिर की पुजारिन थी। वह उसके दिव्य सौन्दर्य से मुग्ध हो गया। पर वह अपनी पत्नी हीरा की प्रखर दृष्टि से अपनी कामना को छिपा न सका। हीरा का क्रोध प्रतिद्वन्द्वी आइओ के प्रति भड़क उठा, मनुष्य जाति की कन्या देवता जीयस का कण्ठहार बने? असम्भव! उसने उपयुक्त अवसर पर आइओ की हत्या करने का निश्चय किया। जीयस हीरा के क्रोध से परिचित था। उसकी कितनी ही प्रेमिकाएँ हीरा की ईर्ष्या की बलि-वेदी पर चढ़ चुकी थीं। अतः उसने हीरा की पुजारिन को सफेद गाय के रूप में बदल दिया। हीरा ने जीयस के कार्य के प्रति अनभिज्ञता प्रदर्शित करने का बहाना किया। वह ओलिम्पस पर्वत पहुँची। बारह प्रमुख देवताओं और उनकी देवियों के मध्य उच्च स्वर्ण-सिंहासन पर जीयस बैठा था। उसकी दाहिनी ओर हीरा का स्वर्ण-आसन था।

जब हीरा ने देवी-देवताओं की सभा में प्रवेश किया, तब उसके प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए सब देवी-देवता खड़े हो गये।

जीयस ने पूछा, ‘‘आरगोस के छह मन्दिर छोड़कर यहाँ आने का कारण?’’

‘‘मैं एक वस्तु आपसे माँगने आयी हूँ।’’

‘‘जो कुछ मेरा है, वह सब तुम्हारा है।’’

‘‘मैंने राजा इनाकोस की चरई में एक सफेद गाय को चरते हुए देखा है - वह गाय मुझे चाहिए।’’ इतना कहकर देवी हीरा अपने सिंहासन पर बैठ गयी।

जीयस ने देवी-देवताओं के सम्मुख यह स्वीकार करना उचित नहीं समझा कि उसने हीरा की क्रोधाग्नि से बचाने के लिए आइओ को गाय में परिवर्तित कर दिया है, और वह सफेद गाय आइओ है। अतः उसने हीरा को गाय प्रदान कर दी। हीरा ने अपने सेवक महाराक्षस आरगुस को, जिसके सहस्र नेत्र थे, आदेश दिया कि वह गाय की रात-दिन चौकसी करे, आरगुस आधी आँखों से सोता था और आधी आँखों से जागता था।

जीयस अभी सिंहासन से उठा भी नहीं था कि क्रोनोस के पुत्र ने प्रवेश किया।

‘‘ओ जीयस, मानव जाति के स्रष्टा प्रमथ्यु से मेरी रक्षा कीजिए!’’

‘‘क्रोनोस के पुत्र, प्रमथ्यु तो तुम्हारा मित्र है। उसने कई बार पृथ्वी के राक्षसों से तुम्हारी रक्षा की है।’’

‘‘जीयस, वह मनुष्यों की सहायता से मेरा सिंहासन छीनना चाहता है, वह मेरे स्थान पर किसी अन्य देवता को प्रतिष्ठित करना चाहता है।’’

‘‘अर्थात् वह मेरे अधिकार में हस्तक्षेप करना चाहता है? वह देवता नहीं, वरन् मनुष्य है। हमने उसे देवता का पद प्रदान किया है, क्योंकि उसने तीतानों के विद्रोह के समय हमारी सहायता की थी।’’ जीयस का क्रोध उफनने लगा।

‘‘जीयस, प्रमथ्यु आगम-द्रष्टा है, उसने यह भविष्यवाणी की है कि आपके सिंहासन पर शीघ्र ही आपका पुत्र आपको मारकर बैठेगा। इसके अतिरिक्त उसने मानव जाति की स्त्री आइओ के प्रति आपके प्रेम की खुले शब्दों में निन्दा की है।’’

उपस्थित देवी-देवताओं में काना-फूसी होने लगी।

जीयस ने गरजकर कहा, ‘‘जो कोई मेरी आज्ञा का उल्लंघन करने का साहस करेगा, मैं उसको पकड़कर प्रायान्धकार तारतरूस लोक में फेंक दूँगा। तब उसे ज्ञात होगा कि मैं कितना शक्तिमान हूँ, देवताओं का सरपंच हूँ। कोई भी देवता मेरे सम्मुख आकर अपनी शक्ति का परीक्षण कर सकता है। हेफास्तुस!’’

अग्नि-देवता हेफास्तुस ने अपने आसन से उठकर जीयस से कहा, ‘‘आदेश के लिए मैं प्रस्तुत हूँ।’’

‘‘प्रमथ्यु ने हमसे विद्रोह किया है। उसने मानव जाति का नेतृत्व करने का साहस किया है। यह उसकी धूर्तता है। तुम शक्ति के देवता क्रेतोस और हिंसा के देवता बिआ को अपने साथ ले जाओ और प्रमथ्यु को पकड़कर, उसे अविनाशी श्रृंखला से बाँधकर काकेशस पर्वत की चोटी से टाँग दो। मैं वहाँ अपना गरुड़ भेजूँगा, जो दिन में नोच-नोचकर उसका कलेजा खाएगा। जितना कलेजे का मांस वह दिन में खाएगा, उतना मांस रात में पुनः बढ़ जाएगा। इस प्रकार उसकी यातना का कभी अन्त न होगा।’’

हेफास्तुस, क्रेतोस और बिआ अपने प्रभु के आदेशों का पालन करने चले गये।

उनके जाने के पश्चात जीयस ने अपने पुत्र हर्मीस से कहा, ‘‘पुत्र, मैंने तुम्हें पशुओं की रक्षा करने का दायित्व सौंपा है। तुम उनके रक्षक हो।’’

‘‘आज्ञा, जीयस!’’

‘‘तुम बाँसुरी-वादक हो। तुमने ही बाँसुरी का आविष्कार किया है। तुम बाँसुरी के मधुर स्वर से मेरी सफेद गाय की रक्षा कर सकते हो।’’

‘‘मैं अपने प्रभु के आदेश का अक्षरशः पालन करूँगा।’’

हर्मीस आरगोस नगर पहुँचा। हीरा के मन्दिर में सफेद गाय बँधी थी। सहस्र नेत्रों वाला आरगुस राक्षस अपनी आधी आँखों से उस पर दृष्टि गड़ाये हुए था। हर्मीस ने मन्द स्वर में बाँसुरी बजाना आरम्भ किया। आरगुस हर्मीस के संगीत स्वरों से सो गया। पशुओं के रक्षक देवता हर्मीस ने तुरन्त अपनी तलवार निकालकर एक ही वार से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। गाय मुक्त हो गयी।

आरगुस की हत्या से हीरा की क्रोधाग्नि में घृत पड़ गया। उसने कहा, ‘‘मैं शपथ खाती हूँ, यह गाय मृत्यु यन्त्रणा के कारण एक देश से दूसरे देश में भटकती रहेगी। इसको कभी शान्ति नहीं मिलेगी। और तू आरगुस, तूने मेरी सेवा में अपने प्राण दिये, इसलिए मैं अपने प्रिय पक्षी मयूर के पंखों पर तेरे सहस्र नेत्र अंकित करती हूँ।’’

अतः कुद्ध हीरा ने गाय के पीछे गोमक्षिका (डांस) लगा दी, जो उसको अपने पैने डंक से अंकुश मारती थी। आइओ मृत्युयन्त्रणा से कराहती हुई पहाड़ियों, घाटियों, नदियों और सागरों को पार करती एक देश से दूसरे देश में भटकने लगी। वह एक क्षण भी विश्राम के लिए बैठ नहीं पाती थी। मर्मान्तक पीड़ा के कारण उसके मुख से सतत कराह निकल रही थी - ‘‘ओ जीयस, क्या तुझे मेरी पीड़ा नहीं दिखाई दे रही है? तूने कितनी ही बार मुझसे अपना प्रेम प्रकट किया था। क्या मुझे ऐसे ही भटकता हुआ देखता रहेगा? क्या तू मुझे शान्ति, विश्राम नहीं प्रदान करेगा? मैं तुझसे प्रार्थना करती हूँ, मुझे मार डाल। यह पीड़ा असहनीय है!’’

आइओ नहीं जानती थी कि उसका आर्तनाद ऐसा व्यक्ति सुन रहा था, जो जीयस के हाथों उससे कहीं अधिक कष्ट पा रहा था। जब आइओ ने अपना सिर ऊपर उठाया, तो उसे दूर एक विशालकाय आकृति दिखाई दी। जब उसने ध्यान से देखा, तो उसे ऐसा परिलक्षित हुआ कि विशालकाय आकृति नंगी चट्टान पर टँगी है और उसके चारों ओर चिल्लाता हुआ गरुड़ मँडरा रहा है। आइओ के कानों में शोक-सन्तप्त, वेदनामय स्वर पड़े - ‘‘ओ इनाकोस की पुत्री आइओ, कहाँ से आ रही है? इस निर्जन स्थान में तेरे आने का क्या कारण है? क्या जीयस का प्रेम तुझे इस हिम-स्थली में ले आया है?’’

आइओ उसके और निकट गयी। आश्चर्य और भय सम्मिश्रित आवाज में उसने पूछा, ‘‘तुम्हें मेरा नाम और मेरे कष्ट के विषय में कैसे ज्ञात हुआ? पर तुमने कौन-सा अपराध किया है, जो तुम्हें इस प्रकार चट्टान पर कील ठोंककर टाँगा गया है? तुम्हारी आकृति से स्पष्ट है कि तुम कोई देवता हो, मनुष्य नहीं, क्योंकि ऐसी आकृतिवाले देवता अथवा महानायक ओलिम्पस पर्वत से उतरकर हम मनुष्यों के मध्य आते हैं।’’

आकृति ने कहा, ‘‘आइओ, तू जिस देवता को देख रही है, वह प्रमथ्यु है, जो मनुष्यों के लिए ओलिम्पस पर्वत से अग्नि उतारकर लाया था, जिसने तुम्हारी मानव जाति को गृह-निर्माण की कला सिखायी थी, जिसने तुम्हें खेती करना सिखाया था, जिसने तुम्हें सिखाया था कि किस प्रकार सूत काता जाता है। मैंने तुम्हें, मनुष्य जाति को ज्ञान-विज्ञान दिया, संस्कृति और कला दी, तुम्हें पशु-जीवन से निकालकर सभ्य, सुसंस्कृत किया। आइओ, तुम मनुष्य और जीयस देवता एक ही वसुन्धरा-माँ की सन्तान हो, दोनों में एक ही श्वास है, देवता मनुष्य से कदापि श्रेष्ठ नहीं है।’’

आइओ विलाप करने लगी - ‘‘मानव जाति के जनक प्रमथ्यु, तुमने हमारे कल्याण के लिए जीयस के कोप को मोल लिया!’’

‘‘जीयस मेरी देह को नष्ट कर सकता है। मेरे अन्तर को नहीं। क्रोनोस के पुत्र को भय था कि मैं मनुष्यों की सहायता से उसे सिंहासनच्युत कर किसी अन्य देवता को उसके स्थान पर प्रतिष्ठित करूँगा और इसलिए मैंने मनुष्य जाति को देवताओं के समकक्ष उन्नत किया है। वह मेरे भले कार्य भूल गया, जो मैंने उसके हितार्थ सम्पन्न किये थे। उसने जीयस को उभाड़ा और मुझे ओलिम्पस पर्वत पर धोखे से ले गया और छल-कपट से अविनाशी श्रृंखला से बाँध दिया। हेफास्तुस और बिआ मुझे इस चट्टान पर टाँग गये। यहाँ ग्रीष्म में आग बरसती है, ठण्ड में बर्फ! यह गरुड़ दिन में मेरा कलेजा खाता है। रात में कलेजे का मांस फिर बढ़ जाता है। मैं पीड़ित हूँ, पर निराश नहीं, क्योंकि मैं जानता हूँ, आइओ, मैंने मनुष्य जाति के लिए सत्कार्य किये हैं। तुम मनुष्य मेरा सम्मान करते हो, इसलिए कि मैंने तुम्हें शीत, भूख और रोग से बचाया है। मैं आगम-द्रष्टा हूँ। मैं जानता हूँ कि जैसे जीयस अपने पिता को मारकर सिंहासन पर बैठा था, वैसे ही उसका पुत्र उसे मारकर ओलिम्पस के सिंहासन पर बैठेगा।’’

‘‘ओ मानवजाति के पिता, अपने शब्द वापस ले लो। जीयस ने मेरी कामना की है।’’ आइओ का सन्ताप फूट पड़ा।

‘‘यह नियति है, आइओ! तेरे दुखों का भी अन्त समीप नहीं है। तू अनेक युगों तक इसी प्रकार भटकती रहेगी। यदि तू मेरे कथन को सुनकर ही पराजय स्वीकार कर लेगी, तो आगामी घटनाओं का सामना कैसे करेगी?’’

‘‘नहीं, पिता इन विपत्तियों-दुखों से अच्छा यह है कि मैं मर जाऊँ!’’

‘‘इकानोस की पुत्री, ऐसा मत बोल! अपनी आँखों से जीयस का पतन और मेरी मुक्ति देखेगी। तेरा ही वंशज हरक्युलिस इस गरुड़ को मारकर मुझे श्रृंखला-मुक्त करेगा। इसलिए अपने दुख और पीड़ा को साहस से सह जा। आइओ, मुझे अनेक पीढ़ियों तक इसी चट्टान से लटकते रहना है। तेरा दुख मेरी अपेक्षा कम है, इसी बात पर सन्तोष कर। स्मरण रख, अन्त में सत्य की विजय होगी और जीयस अपने सिंहासन से नीचे फेंक दिया जाएगा। देख, हर्मीस आ रहा है!’’

आइओ करुण क्रन्दन करती हुई आगे बढ़ गयी।

हर्मीस निकट आया। उसने कहा, ‘‘प्रमथ्यु, क्या तू अब भी मनुष्य जाति के पक्ष में रहेगा और देवताओं के सरपंच जीयस के सम्मुख घुटने नहीं टेकेगा?’’

प्रमथ्यु व्यंग्य से हँस पड़ा, उसके अट्टहास से हर्मीस घबरा गया। वह भीषण यातनोन्मुख प्रमथ्यु के निकट खड़ा नहीं रह सका। काकेशस पर्वत से बर्फीला पवन बहा और प्रमथ्यु की देह को बेधता हुआ चला गया। पर्वत से काले बादल नीचे उतरे और उन्होंने प्रमथ्यु की चट्टान को घेर लिया। तभी सम्पूर्ण पर्वत नींव सहित हिल उठा। आकाश के एक कोने से विद्युत चमकती हुई निकली और दूसरे कोने पर लुप्त हो गयी। पर उसके बाद ही विद्युत का चमकना तेज हो गया। प्रमथ्यु की आँखें चौंधियाने लगीं। मेघ-गर्जन से उसके कान फटने लगे। जीयस की समस्त प्राकृतिक शक्तियाँ प्रमथ्यु को तहस-नहस करने के लिए उमड़ पड़ीं। परन्तु प्रमथ्यु उनके आगे नहीं झुका। तूफान और बढ़ गया। प्रमथ्यु की देह आग की लपटों में घिर गयी, फिर भी कोलाहल के मध्य से प्रमथ्यु की आवाज सुनाई देती रही - ‘‘जीयस, एक दिन अवश्य ही सत्कार्यों की विजय होगी, अन्याय का सिर कुचला जाएगा और तू सदा के लिए मिट जाएगा।’’


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