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कहानी

कथा संस्कृति
खंड आठ
पंचतन्त्र एवं हितोपदेश


संपादन - कमलेश्वर

अनुक्रम चींटियाँ साँप को चट कर गयीं पीछे     आगे

किसी वल्मीक में अतिदर्प नाम का एक काला नाग रहता था। एक दिन वह बिल के रास्ते को छोड़कर किसी दूसरे तंग रास्ते से निकलने लगा। उसका शरीर तो मोटा था और रास्ता सँकरा, इसलिए निकलते समय रगड़ से उसका शरीर छिल गया। अब उसके घाव और खून की गन्ध पाकर चींटियों ने उसे घेर लिया। वह विकल हो गया। वह भागता तो कहाँ भागता और जाता तो कहाँ जाता। चींटियाँ एक-दो तो थीं नहीं। उसका पूरा शरीर घावों से भर गया और उसके प्राण निकल गये।

इसीलिए कह रहा था, बहुत से लोगों का विरोध मोल नहीं लेना चाहिए। अब इस बारे में मुझे खास बात कहनी है। उसे सुनने के बाद आपको जो भी ठीक लगे कीजिए।

मेघवर्ण बोला, ‘‘कहिए। आप जैसा कहेंगे वैसा ही होगा।’’

स्थिरजीवी बोला, ‘‘तो फिर साम आदि के चार उपायों के अलावा जो पाँचवाँ उपाय है उसे सुनें। आप मुझे विद्रोही घोषित कर दें। यह प्रकट न होने दें कि मैं आपसे मिल गया हूँ। इसके लिए मुझे ताड़ना देकर अपनी सभा से निकाल बाहर करें। यह काम इस तरह होना चाहिए कि शत्रु पक्ष के जासूसों को पूरा विश्वास हो जाए कि मुझे दरबार से निकाल दिया गया है। फिर कहीं से नकली खून मँगाकर मेरे शरीर पर जहाँ-तहाँ चुपड़कर इसी बरगद के नीचे पड़ा रहने दें और स्वयं ऋष्यमूक पर्वत की ओर चले जाएँ। वहाँ आप चैन से रहें। इधर मैं शत्रुओं को अपने जाल में फाँसता हूँ। उनका विश्वास पूरी तरह जम जाने के बाद मैं उनके दुर्ग का भेद मालूम कर लूँगा और फिर कभी दिन के समय जब उन्हें दिखाई नहीं देता, मैं उन्हें मार डालूँगा। इसे छोड़कर दूसरा कोई उपाय हमारे पास बचा नहीं है। शत्रुओं के दुर्ग में जान बचाकर भागने के लिए कोई गुप्त मार्ग नहीं है। वे बचकर निकलना भी चाहेंगे तो निकल नहीं पाएँगे। यही उनके सर्वनाश में सहायक होगा। आप तो जानते ही हैं कि कूटनीतिज्ञ उस दुर्ग को दुर्ग नहीं मानते जिससे निकल भागने का कोई रास्ता ही न हो। वह तो दुर्ग के नाम पर जेलखाना हुआ।

और देखिए, मेरे ऊपर जो भी बीते आपको मेरे साथ किसी तरह की दया नहीं दिखानी है। युद्ध के समय में राजा को अपने उन सेवकों को भी सूखे काठ की तरह युद्ध की आग में झोंक देना चाहिए जिन्हें उसने बड़े लाड़-प्यार से पाला हो। राजा अपने सेवकों की रक्षा अपने प्राणों की तरह करता है, उनका पालन-पोषण अपनी काया की तरह करता है, पर किसलिए? इसीलिए न कि जिस दिन शत्रु का सामना होगा उस समय वे काम आएँगे!

इसलिए इस समय मैंने जो सुझाव दिया आपको उसी पर चलना होगा। आप न तो मुझे रोकेंगे न ही मनाएँगे। इतनी बात गुपचुप समझाकर वह भरी सभा में मेघवर्ण से अकारण तकरार करने लगा।

अब उसके दूसरे सेवक स्थिरजीवी को ऊटपटाँग जवाब देते और उलटी-सीधी बातें करते देखकर जब उसका वध करने चले तो मेघवर्ण ने उन्हें रोक दिया, ‘‘आप लोग इसे रहने दें। शत्रुओं का पक्ष लेनेवाले इस दुष्ट को मैं अपने हाथों दण्ड दूँगा।’’ ऐसा कहकर वह उछलकर उसके ऊपर चढ़ गया और हल्के-हल्के उसे चोंच से मारते हुए यह दिखाने लगा कि वह उसे पूरी निर्दयता से मार रहा है। फिर उसके ऊपर मँगाया हुआ खून उँड़ेलकर उसके उपदेश को मानते हुए सपरिवार ऋष्यमूक पर्वत की ओर रवाना हो गया।

इसी अवधि में उल्लुओं की दूती खिंडरिच ने कहीं से मेघवर्ण और स्थिरजीवी के बीच कलह का समाचार सुन लिया। वह झट उलूक राजा के पास जा पहुँची और सारी घटना बताकर बोली कि अब आपका शत्रु डरकर इस स्थान को छोड़कर जाने कहाँ चला गया। उलूकराज ने अपने सैनिकों को ललकारते हुए कहा, ‘‘दौड़ो, उनका पीछा करो। कोई बचकर निकलने न पाए। डरकर भागता हुआ शत्रु बड़े भाग्य से ही हाथ आता है। भागता हुआ शत्रु अपना पुराना स्थान छोड़ चुका रहता है और नये ठिकाने पर जम नहीं पाया रहता है, इसलिए उसकी हालत इतनी डाँवाडोल होती है कि वह बहुत आसानी से काबू में आ जाता है।’’

इस तरह अपने सैनिकों को प्रोत्साहित करके उसने उस बरगद के पेड़ को चारों ओर से घेरकर उसी के नीचे डेरा डाल दिया। उस पेड़ की डाल-डाल छान मारने के बाद भी जब कोई कौआ नहीं मिला तो उसके बन्दीजन उसका गुणगान करने लगे। वह स्वयं पेड़ की सबसे ऊँची शाखा पर बैठकर कहने लगा, पता लगाओ वे किस मार्ग से यहाँ से भागकर गये हैं। नये दुर्ग में पहुँचने से पहले ही उनका सफाया कर दो। क्योंकि यदि शत्रु को टाट की भी ओट मिल जाए तो उसको हराना कठिन हो जाता है। यदि दुर्ग की सुरक्षा मिल गयी तब तो उसका बाल भी बाँका नहीं किया जा सकता।

स्थिरजीवी की ओर इस बीच किसी उल्लू ने ध्यान ही नहीं दिया। वह सोचने लगा कि यदि इनकी नजर मेरे ऊपर पड़ी ही नहीं तब तो मेरा सारा नाटक ही धरा रह जाएगा। कहते हैं कि समझदारी इसमें है कि किसी काम में हाथ ही न डालो। अगर हाथ डाल ही दिया तो उसे अन्त तक निभाओ। आरम्भ करके छोड़ देने से अच्छा तो यह था कि कुछ करते ही नहीं। आरम्भ किया है तो इसे सफल भी बनाना होगा। यदि वे स्वयं मुझे नहीं देख पाते हैं तो मैं अपनी कराह से इनका ध्यान अपनी ओर खींचूँगा। यह सोचकर वह धीरे-धीरे कराहने लगा। उसकी कराह सुनना था कि सारे उल्लू मारने के लिए एक साथ झपट पड़े।

उनको झपटते देखकर उसने कहा, ‘‘अरे भाई, मैं मेघवर्ण का मन्त्री स्थिरजीवी हूँ। मैं तो पहले से ही अधमरा हो चुका हूँ। उसी दुष्ट ने मेरी यह गति बना दी है। मेरी सारी बातें अपने स्वामी से जाकर बताओ। मुझे उनसे कुछ और जरूरी बातें करनी हैं।’’

जब उलूकराज ने स्थिरजीवी की पूरी रामकहानी सुनी तो वह स्वयं उसके पास आया और पूछा, ‘‘आपकी यह दशा कैसे हुई?’’

स्थिरजीवी बोला, ‘‘महाराज, हुआ यह कि वह दुष्ट मेघवर्ण आपके मारे हुए असंख्य कौओं की हालत देखकर क्रोध से भड़क उठा और आपके ऊपर चढ़ाई करने को तैयार हो गया। मैंने उस मूर्ख को उसके भले के लिए समझाया कि मालिक, आपको उलूकराज पर चढ़ाई करने की बात भी नहीं सोचनी चाहिए, क्योंकि हम लोग उनकी तुलना में अधिक कमजोर हैं। नीति यही कहती है कि दुर्बल राजा को अपने से अधिक शक्तिशाली राजा का विरोध करने की बात मन में नहीं लानी चाहिए। उसका तो इससे कुछ बिगड़ेगा नहीं पर चढ़ाई करने वाला उसी तरह मिट जाएगा, जैसे दीये की लौ पर हमला करनेवाले पतंगे जलकर राख हो जाते हैं। इसलिए हमारे पास एक ही उपाय है और वह यह कि हमें उन्हें उपहार आदि देकर सन्धि कर लेनी चाहिए। कहा भी है कि बलवान शत्रु को देखकर ही समझदार राजा को अपना सबकुछ देकर भी अपने प्राण बचा लेना चाहिए। जान बची रही तो धन तो बाद में भी आ जाएगा।

मेरी यह सलाह सुनकर वह मूर्ख भड़क उठा और क्रोध से भरकर मेरे ऊपर उसी समय हमला कर दिया और मार-मारकर मेरी यह गति बना दी। अब तो मैं आपकी ही शरण में हूँ। अधिक क्या कहूँ! अभी तो मुझसे चला-फिरा भी नहीं जा रहा है। चलने-फिरने लगा तो पहले मैं आपको ले चलकर वह जगह दिखाऊँगा जहाँ वे छिपे बैठे हैं। मेघवर्ण का नाश कराने से पहले मेरे जी को शान्ति नहीं।’’

उसकी बात सुनकर अरिमर्दन नाम का वह उल्लू अपने कुल के पुराने मन्त्रियों से सलाह करने लग गया। उसके भी एक नहीं पाँच मन्त्री थे। उनके नाम थे रक्ताक्ष, क्रूराक्ष, दीप्ताक्ष, वक्रनास और प्राकारकर्ण। सबसे पहले रक्ताक्ष से उसने पूछा, ‘‘मन्त्रिवर, शत्रुपक्ष का एक मन्त्री हमारे काबू में आ गया है। इस हालत में हमें क्या करना चाहिए?’’

रक्ताक्ष ने उत्तर दिया, ‘‘महाराज, इसमें इतना सोच-विचार क्या करना। उसको झट मौत के घाट उतार देना चाहिए। कहते हैं, हीनः शत्रु निहन्तव्यो यावत् न बलवान् भवेत्। शत्रु कमजोर हो तभी उसे मार डालना चाहिए। यदि दया करके उसे उस समय छोड़ दिया और वह ताकतवर हो गया तो फिर उसे जीतना कठिन हो जाता है।

और फिर हाथ आया हुआ शत्रु तो हाथ आयी हुई लक्ष्मी होता है। यदि आयी लक्ष्मी को लौटा दिया तो वह शाप देती है। कहते हैं यदि आदमी अवसर की तलाश में रहे तो उसे एक बार अवसर जरूर मिलता है पर यदि उस समय भी आलस्य कर जाए तो अवसर हाथ से निकल जाता है और वह लौटकर फिर नहीं आता।’’


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