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कहानी

कथा संस्कृति
खंड आठ
पंचतन्त्र एवं हितोपदेश


संपादन - कमलेश्वर

अनुक्रम अन्धा, कुबड़ा और राजकुमारी पीछे     आगे

एक राजा था, उसकी एक गम्भीर समस्या थी। उसने ब्राह्मण बुलवाये। उनसे बताया कि उसके एक ऐसी कन्या हुई है जिसके तीन स्तन हैं। उसने उनसे इस अशुभ के निवारण का कोई उपाय बताने को कहा।

ब्राह्मण बोले, ‘‘यदि किसी राजा की कन्या का कोई अंग न हो या कोई अंग अधिक हो तो उसका अपना चरित्र भी दूषित होता है और उसके पति की मृत्यु भी हो जाती है।

हीनांगी वाऽधिकांगी वा या भवेत् कन्यका नृणाम्।

भर्तुः स्यात् सा विनाशाय, स्वशीलनिधनाय च।

फिर उन्होंने बताया कि इनमें भी तीन स्तनों वाली कन्या से तो और भी अनिष्ट हो जाता है। यदि ऐसी कन्या नजर भी आ जाए तो इससे पिता का नाश होते देर नहीं लगती।

या पुनस्त्रिस्तनी कन्या याति लोचनगोचरम्।

पितरं नाशयत्येव सा द्रुतं, नाऽत्र संशयः।

ब्राह्मण जिस तरह की सलाह देने के लिए बुलाये जाते रहे हैं उस तरह की सलाह उन्होंने दे दी और कहा कि राजा उस कन्या को इस तरह रखे कि उस पर उसकी नजर न पड़ने पाए। यदि कोई इसके साथ विवाह करना चाहे तो उसके साथ इसका विवाह करके उसे राज्य से बाहर निकाल दिया जाए।

राजा ने ऐसा ही किया। उसको एक गुप्त स्थान में इस तरह छिपाकर रखा गया कि किसी भी सूरत में उस पर राजा की नजर न पड़ने पाए। कन्या धीरे-धीरे जवान होती गयी। जब शादी की उम्र हुई तो राजा ने मुनादी फिरा दी कि जो कोई उसकी तीन स्तनों वाली कन्या से विवाह करेगा उसे एक लाख सोने की मुहरें दी जाएँगी पर इसके साथ ही उसे राज्य से बाहर भी निकाल दिया जाएगा।

राजा को मुनादी कराये बहुत दिन बीत गये पर कोई उस कन्या से विवाह करने के लिए नहीं आया। उसी नगर में एक अन्धा रहता था। उसका एक सहायक था। उसका नाम था मन्थरख। वह शरीर से कुबड़ा था। वह उस अन्धे की लाठी पकड़कर चलता था। उन दोनों ने राजा की मुनादी का समाचार सुना पर उस समय उनकी हिम्मत यह कहने की नहीं हुई कि उनमें से कोई उससे विवाह करना चाहता है। जब उन्होंने देखा कि इतने दिन बीत जाने के बाद भी कोई उस कन्या से विवाह करने के लिए तैयार नहीं हुआ तो उन्होंने सोचा कि क्यों न हम एक बार चलकर अपना भाग्य आजमाएँ और उस नगाड़े को छूकर अपना इरादा प्रकट कर दें। यदि राजा मान गया तो राजकुमारी के साथ एक लाख सोने की मुहरें मिल जाएँगी और पूरा जीवन आराम से कटेगा। यदि राजा सुनकर बिगड़ उठा तो अधिक से अधिक जान से मरवा देगा। इससे उन्हें अपने इस नरक जैसे जीवन से छुटकारा तो मिलेगा।

यह तय कर लेने के बाद अन्धे ने उस कुबड़े के साथ जाकर नगाड़े को हाथ लगा दिया। यह नगाड़ा छूने का काम कुछ उसी तरह का था जैसे राजसभा में किसी काम का बीड़ा उठाने का होता है। नगाड़े को छूकर उसने कहा, ‘‘मैं राजकुमारी से विवाह करना चाहता हूँ।’’

राजा के सिपाहियों ने यह बात राजा को बताकर पूछा कि आप जैसी आज्ञा दें वैसा किया जाए।

राजा ने कहा, ‘‘रूप-रंग या उम्र पर न जाओ। कोई अन्धा हो या लँगड़ा, कोढ़ी हो या खंजा, जात हो या बेजात, काला हो या गोरा, जो भी उससे विवाह करना चाहता है उसके साथ विवाह कर दिया जाएगा, पर उसे मेरे राज्य से बाहर अवश्य जाना होगा।

राजा की आज्ञा पाकर उन सिपाहियों ने नदी के किनारे ले जाकर उस अन्धे के साथ उस कन्या का विवाह कर दिया। राजा की ओर से उसे एक लाख मुहरें दे दी गयीं। फिर उसे नाव में बैठाकर मल्लाहों से कहा गया कि वे उसे राज्य से बाहर छोड़ आएँ।

अब वे दूसरे देश में जाकर आराम से रहने लगे। अन्धा तो दिन-रात मजे से चारपाई तोड़ता रहता। घर का सारा काम कुबड़े को सँभालना पड़ता था। इस तरह कुछ दिनों के बाद राजकुमारी का उस कुबड़े मन्थरक से लगाव पैदा हो गया। यह बात तो सारी दुनिया जानती है कि चाहे दुनिया उलट जाए पर कोई स्त्री सती हो ही नहीं सकती। फिर इस तीन स्तनोंवाली कन्या के तो भाग्य में ही चरित्रहीन होना लिख दिया गया था।

एक दिन उस कन्या ने मन्थरक से कहा, ‘‘यह अन्धा हमारी राह का काँटा बना हुआ है। कहीं से जहर ले आओ और इसे पिलाकर ठण्डा कर दिया जाए। फिर हम दोनों खुलकर मौज करें।’’

अगले दिन जब मन्थरक जहर की तलाश में निकला तो उसे एक काला नाग मिल गया। उसे लेकर वह खुश-खुश घर लौटा। उसने राजकुमारी से कहा, ‘‘प्रिये, इस काले नाग को काटकर मसाले के साथ पकाकर इस अन्धे को खिला दो। इसे मछली खाने का बड़ा शौक है। चुपचाप खा लेगा और इसके साथ ही इसकी छुट्टी हो जाएगी।’’

यह कहकर मन्थरक कहीं बाहर चला गया। उस राजकुमारी ने साँप के टुकड़े किये और तेल में भूनकर आग पर पकने को छोड़ दिया। इसी बीच उसे कोई काम आ पड़ा। उसने अन्धे से कहा कि चूल्हे पर मछली पक रही है। वह उसके पास ही बैठ जाए और बीच-बीच में कलछी से चलाता रहे।

मछली का नाम सुनते ही अन्धे की लार टपकने लगी। वह कलछी लेकर उसे चलाने लगा। चलाते समय साँप की जहरीली भाप उसकी आँखों में लगी तो इससे उसका मोतियाबिन्द गलने लगा। भाप उसे बहुत अच्छी लग रही थी इसलिए उसने जमकर सिंकाई की।

उसकी आँख खुली तो उसने देखा कि वहाँ तो मछली के स्थान पर साँप के टुकड़े पड़े हैं। उसकी समझ में न आया कि उसकी पत्नी ने इसे मछली बताकर चलाते रहने को क्यों कहा। उसने इसकी तह में जाने के लिए फिर अपने अन्धा होने का बहाना किया और साँप को मछली मानकर उसमें कलछी घुमाने लगा।

इसी समय कुबड़ा बाहर से आया। उसने राजकुमारी को चूमना और उससे लिपटना शुरू कर दिया। और फिर इसके बाद तो कुछ बाकी रहना नहीं था।

अन्धे को आया क्रोध। वह उठा और टटोलता हुआ उस चारपाई पर पहुँच गया। आसपास कोई हथियार नहीं मिला तो उसने कुबड़े को टाँग से पकड़ा और पूरी ताकत लगाकर घुमाकर राजकुमारी की छाती पर दे मारा। इस चोट के साथ ही राजकुमारी का तीसरा स्तन उसकी छाती में घुस गया। इस तरह घुमाये जाने के कारण जो झटका लगा उससे कुबड़े का कुबड़ापन भी ठीक हो गया।

अब यह भाग्य का खेल नहीं तो और क्या है। भाग्य साथ दे तो उलटे काम के भी सीधे नतीजे निकलते हैं।


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