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कविता

सावन निमंत्रण दे रहा है
सोम ठाकुर


लौट आओ, माँग के सिंदूर की सौगंध तुमको!
नयन का सावन निमंत्रण दे रहा है।

आज ढलती साँझ में कितना दुखी मन -
यह कहा जाता नहीं है,
मौन रहना चाहता पर बिन कहे भी
अब रहा जाता है,
मीत! अपनों से बिगड़ती है, बुरा क्‍यों मानती हो?
लौट आओ प्राण! पहले प्‍यार की सौगंध तुमको!
प्रीति का बचपन निमंत्रण दे रहा है।

रूठता है रात से भी चाँद कोई
और मंजिल से चरन भी,
रूठ जाते डाल से भी फूल अनगिन,
नींद से गीले नयन भी,
बन गई है बात कुछ ऐसी कि मन में चुभ गई, तो
लौट आओ, मानिनी! है मान की सौगंध तुमको!
बात का निर्धन निमंत्रण दे रहा है।

चूम लूँ मंजिल यही मैं चाहता पर
तुम बिना पग क्‍या चलेगा।
माँगने पर मिल न पाया स्‍नेह तो यह
प्राण-दीपक क्‍या जलेगा!
यह न जलता, किंतु आशा कर रही मजबूर इसको,
लौट आओ काँपते इस दीप की सौगंध तुमको!
ज्‍योति का कन-कन निमंत्रण दे रहा है।

दूर होती जा रही हो तुम लहर-सी
है विवश कोई किनारा,
आज पलकों में समाया जा रहा है
सुरमई आँचल तुम्‍हारा,
हो न जाए दृष्टि से ओझल महावर और मेहँदी,
लौट आओ, सतरंगे श्रृंगार की सौगंध तुमको!
अनमना दर्पन निमंत्रण दे रहा है।

कौन सा मन हो चला गमगीन जिससे
सिसकियाँ भरती दिशाएँ?
आँसुओं का गीत गाना चाहती हैं
पीर से बोझिल घटाएँ,
लो, घिरे बादल, लगी झड़ियाँ, मचलती बिजलियाँ भी,
लौट आओ हारती मनुहार की सौगंध तुमको!
भीगता आँगन निमंत्रण दे रहा है।

लौट आओ माँग के सिंदूर की सौगंध तुमको!
नयन का सावन निमंत्रण दे रहा है।


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