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कविता

देवदार मुखिया होता है
सौरभ पांडेय


हर उस जिंदा कुनबे का, जो
जाने वैभव क्या होता है,
देवदार मुखिया होता है।

संबंधों के नाम स्वार्थ का
खुला खेल है, चाव नहीं है
अपने थे जो, वितरागी हैं
आपस में समभाव नहीं है
बीती बातें बादल-बादल,
कुहा-कुहा-सी फैल रही हैं
नए ढंग के बर्तावों में
आलोड़न का ताव नहीं है
नए जमाने के ढब में क्या 
जन मन से दुखिया होता है?

घर-घर का तब साझा चूल्हा
घर-घर आग दिया करता था
मिलजुल ताप सहा करते थे
मौसम सब बढ़िया करता था
पर्वत का 'परिवार' भला था
संबंधों की हरियाली में
आँगन-द्वार हँसा करते थे
पुलकित गाँव जिया करता था
देवदार चुप सोच रहा, फिर
हासिल क्यों घटिया होता है?

देवदार संदर्भ सहेजे
वर्तमान को देख रहा है
आपसदारी, लेना-देना,
आखर-पाई, लेख रहा है
क्या होता है जगत-निभाना
ढहता मान बचाने में
चाहत ’मीन’ सदा ही होती
सुलभ सदा ही ’मेख’ रहा है
जो निभ जाए वही नियामत
वर्ना तो बकिया होता है।


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