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कविता

पहला प्रेम
सोनी पांडेय


जब तुम पहली बार मिले
मौसम कुछ गुलाबी हुआ था
तभी से गाँठे लिए फिरती हूँ
दुपट्टे के कोर में गुलाबी रंग...

मेरे दुपट्टे के कोर से निकल कर
छिटकता है चाँदनी के चँदावे में
गुलाबी रंग
प्रेम इस तरह गुलाबी होता है

हर चाहने वालों के लिए प्रेम
चाँदनी रातों में...

मेरे दुपट्टे से निकलकर
फैलता है गुलाबी रंग
जब जागता है सूरज
हर चाहने वाले के मन में
मिसरी सा घुल जाता है
गुलाबी रंग
इस तरह प्रेम जवान होता है
जब सूरज थोड़ा सुनहरा होता है...

जाते-जाते बसंत
तुम रंग गए
प्रेम के गुलाबी रंग में
मेरी डायरी के पीले पड़े पन्नों में
बचा है
सन्दूक के नीचले कपड़ों में दबा
मह-मह महकता
महुए के गंध में घुला
प्रेम का गुलाबी रंग...

तुम भूल गए
जाते बसंत के साथ
इस लिए जब लौटना
हमारी गली में
महसूसना
हवाओं में तैरता मिलेगा
मेरे प्रेम का गुलाबी रंग...
 


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