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यात्रावृत्त

इश्क हो जाएगा यहाँ के समंदर, द्वीपों व हवाओं से
प्रतिभा कटियार


यूँ तो हर यात्रा जेहनी मरम्मत का काम करती है। लेकिन कुछ यात्राएँ हमारा प्रस्थान बिंदु भी होती हैं। हमें क्षुद्रतम से उठाकर उच्चतम तक कभी-कभी अन्यतम तक लेकर जाती हैं। मोह, माया, विलास, कामनाओं से मुक्त कराती हैं। ऐंद्रिक अनुभूतियों से भर देती हैं। समूची यात्रा किसी इबादत की तरह मालूम होती है। प्रकृति के अलौकिक मंजर के आगे हमारा व्यक्तित्व सजदे में झुक जाता है और सजदे से उठते वक्त छूट जाते हैं तमाम विकार। अंडमान की यात्रा ऐसी ही एक यात्रा है...

साँसों का रीचार्ज

साँसों का रीचार्ज कराया है कभी? यात्राएँ साँसों का रीचार्ज होती हैं... जिंदगी का टॉपअप। पता भी नहीं चलता कि कब साँस लेते-लेते हम जीना भूलने लगे। ऐसे ही एक रोज थकी हुई साँसों से उकताकर फिर से जूते के फीते कसे, पीठ पर एक छोटा सा बैग लिया और खुद को रख दिया अंडमान निकोबार के रास्तों पर। कैसी तो बारिश थी उस रोज, मानो न जाने देने का इसरार घुला हो उसमें। बारिशों से दोस्ती है अपनी। बारिश की बूँदों को हथेलियों में थामते हुए कहती हूँ कि तेरे ही देश जा रही हूँ। समंदर के गाँव में... नारियल के पेड़ों की छाँव में। इस बार जिन रास्तों को चुना था वहाँ सड़कों की सीमाएँ खत्म हो जाती हैं। पोर्ट ब्लेयर जाने के लिए या तो हवाई जहाज या पानी के जहाज से ही जाया जा सकता है। धरती के छोरों से कटे इस द्वीप पर पहुँचने की इच्छा में यह जानने की इच्छा भी शामिल थी कैसा होगा वो कोना जहाँ रेल या बस की यात्रा से पहुँचा ही नहीं जा सकता। 556 द्वीपों व पत्थर की चट्टानों वाला वाला अंडमान निकोबार अपने ऐतिहासिक, सांस्कृतिक व भौगोलिक संपदा के चलते काफी महत्वपूर्ण है। सुना था कि अब तक इस जगह को हम मनुष्यों की आमद से होने वाले नुकसान से बचाया जा सका है, तो वह भी देखने की इच्छा थी।

रोमांच से शुरुआत

जब हम घर से निकलते हैं तो कितना भी योजनाबद्ध ढंग से निकलें, कुछ न कुछ चौंकाने वाली बात हमारा इंतजार कर ही रही होती है। शुरुआत ट्रेन छूटने से हुई। यात्रा का रोमांच शुरू हो चुका था। हमारे पास टिकट थी लेकिन ट्रेन नहीं, जो ट्रेन सामने थी उसका टिकट हमारे पास नहीं था... हम हसरत से ट्रेन को और उसमें बैठे लोगों को देख रहे थे। जिंदगी के न जाने कितने लम्हे, कितने रिश्ते याद आ गए जिनमें कभी हम नहीं थे कभी वो नहीं थे। न जाने कितने लम्हे मुकम्मल होते-होते रह गए। अपने चेहरे पर बेचैनी के भाव लिए हम ट्रेन के इर्द-गिर्द मँडरा रहे थे कि ट्रेन के टीटी ने हमारी परेशानी पर अपनी विनम्रता की मुहर लगाई और हमारे टिकट बनाए, यकीनन पेनॉल्टी के साथ। समंदर की आवाजों की पुकार में ऐसी शिद्दत थी कि पेनॉल्टी के पैसे जाना बुरा नहीं लग रहा था।

पंखों के उगने का इंतजार

पोर्ट ब्लेयर जाने के लिए चेन्नई, कलकत्ता और दिल्ली से फ्लाइट के जरिए पहुँचा जा सकता है। दिल्ली से सुबह 6.15 की फ्लाइट पकड़ने के लिए हम रात साढ़े ग्यारह बजे एयरपोर्ट पहुँच गए। क्योंकि हमारी ट्रेन ने हमें 11 बजे दिल्ली पहुँचा दिया था। एक पूरी रात हमें दिल्ली के डोमेस्टिक एयरपोर्ट पर पंखों के उगने के इंतजार में बितानी थी। यात्राओं के दौरान यूँ स्टेशन पर, एयरपोर्ट पर बैठकर लंबे इंतजार का लुत्फ बहुत बार ले चुकी हूँ। मुझे ऐसे इंतजार काफी रूमानी लगते हैं। पूरी रात आँखों में बिताना, सोचना हरे समंदर के बारे में जहाँ जाकर खुद को भूल जाने का इरादा टिकट की बुकिंग के साथ ही बैग में पैक हो गया था। हमारी यात्राएँ तब शुरू नहीं होतीं जब हमारे हाथ में टिकट होती है और कदम घर की दहलीज से बाहर निकलते हैं, बल्कि वो तब से शुरू हो जाती हैं जब हम यात्रा की ख्वाहिश करते हैं, जेहन में ही योजनाएँ बनाने लगते हैं।

पानी से प्रेम बचपन से ही नदियों, नहरों और पोखरों के आसपास मँडराने को मजबूर करता रहा है। गोवा में पहली बार समंदर देखकर लगा था कि बस अब तक यहीं होने को मन भटक रहा था। लंबे समय से समंदर ख्वाब में आता था। बातें करता था। उसकी लहरें हाथ थामकर दूर तक ले जाती थी। समंदर के मोह के चलते ही पोर्ट ब्लेयर की बात जे़हन में आई। जुलाई-अगस्त से यहाँ जाने की योजना आकार लेने लगी। यकीनन तब से ही मैंने खुद को अंडमान की यात्रा में पाना महसूस करना शुरू कर दिया था। बिना अंदर की यात्रा किए बाहर की यात्राएँ अधूरी ही रह जाती हैं फिर वो चाहे जिंदगी की यात्रा हो या शहरों की। अपने भीतर न जाने कितनी यात्राएँ समेटे हुए मैं जिंदगी के सफर पर चलती जा रही हूँ। शहरों के सफर पर भी।

वक्त मुनासिब सा

अक्टूबर से मार्च का समय पोर्ट ब्लेयर जाने के लिए माकूल है यह पता था। इसी बीच बच्चों की विंटर वैकेशन ने सोने पर सुहागा का काम किया और जनवरी का पहला सप्ताह इस यात्रा के नाम लिखा। इस यात्रा के लिए पहले से बनाई गई योजना बेहतर होती है। इससे एयर टिकट सही दामों में उपलब्ध हो जाती हैं और अगर किसी पैकेज टूर के जरिए जाना है तो उनकी कीमतों में भी काफी रियायत मिलती है। वहाँ पहुँचकर साथी पर्यटकों से मालूम हुआ कि ज्यादातर लोगों ने जुलाई अगस्त में बुकिंग करा रखी थी।

पक्की रात की कच्ची सुबह

एक पूरी रात एयरपोर्ट पर जागते हुए बिताना, कॉफी पीना, लोगों के इंतजार को देखना, महसूस करना ये सब यात्रा का हिस्सा ही तो थे। जागी हुई रातें और ऊँघती सुबहें तो मुझे यूँ भी बहुत पसंद हैं। अगर उन जागती रातों में कॉफी की खुशबू हो, ठंड की सिहरन और एक रोमांचक यात्रा की जुंबिश तो बात ही क्या। मैंने कभी किसी पर्यटक को कभी टेंशन में नहीं देखा है। बड़ी से बड़ी असुविधा उनकी मुस्कुराहट को कम नहीं कर पाती और यहीं उनके भीतर का राहगीर उनका साथ देता है। वरना, आधे घंटे की टेन की देरी भी लोगों की भौंहे सिकोड़ने को काफी होती हैं। लोगों के चेहरे के हाव-भाव देखकर आसानी से उनमें से पर्यटक कौन है जाना जा सकता है। तकरीबन पाँच बजे अपने हाथ में बोर्डिंग पास लेकर दिल्ली की उस कच्ची सी सुबह में दाखिल होना अच्छा एहसास था। कच्ची सुबह इसलिए कि इसके पहले सुबह पूरी तरह से अपनी आँखें खोलती हमें दिल्ली छोड़ देना था। पक्की रात का पूरापन बादलों की गोद में छुपा था। सूरज को पहली बार हवा में उगते देखना था। कोहरे के चलते फ्लाइट लेट होने का खतरा टल चुका था क्योंकि बीती रात बारिश की रात थी। ठीक वक्त पर हमने कलकत्ता के लिए उड़ान भरी। फिर कलकत्ता से पोर्ट ब्लेयर।

वीर सावरकर एयरपोर्ट

कलकत्ता से पोर्ट ब्लेयर तक की दूरी हवाई जहाज से दो घंटे में पूरी होती। रास्ते भर बादलों का खेल जारी रहा। लेकिन जैसे ही एयरहोस्टेस ने कुर्सी की पेटी बाँधने का संकेत दिया, नीचे का समंदर आँखों में भरने लगा। इतनी ऊँचाई से समंदर और द्वीप खूबसूरत खिलौने जैसे लग रहे थे। धीरे-धीरे समंदर और साफ नजर आने लगे, नारियल के पेड़ भी, आईलैंड भी। हमारे भीतर का रोमांच अब छलकने लगा था। हम तयशुदा वक्त पर वीर सावरकर एयरपोर्ट पर पहुँचे। शहर के बदले हुए तापमान ने हमारा मुस्कुराकर स्वागत किया। स्वेटर और जैकेट उतरकर हाथों में पहुँच चुके थे। होटल पहुँचते ही सामान पटककर, खाना खाकर अगर खाना है तो हमें भागना था क्योंकि यहाँ पहुँचकर एक-एक लम्हे की कीमत समझ में आने लगी थी। अबाडीन बाजार को देखते हुए, शहर से गुजरते हुए होटल तक पहुँचना। ये पोर्ट ब्लेयर शहर से पहली वाकफियत थी। पहली मुलाकात।

होटल पहुँचकर सुंदर रंगोलियों ने, यहाँ के लोगों की मुस्कुराहटों ने, मीठे नारियल पानी के वेलकम ड्रिंक ने तृप्त कर दिया। दिल से आवाज आई... यहीं बस यहीं तो होना था तुझे कबसे।

सेल्यूलर जेल : यातनाएँ, जुल्म, कराहें, आजाद भारत की इबादतगाह

सबसे पहले हमें सेल्यूलर जेल जाना था। यह बिल्कुल उस तरह है जैसे किसी भी अच्छे काम की शुरुआत हम अपनी इबादतगाहों से करना पसंद करते हैं। सेल्यूलर जेल ऐसी ही इबादतगाह है। जिस आजादी को हम साँस-साँस जीते हैं, भोगते हैं अक्सर उसकी कीमत को समझे बगैर उसे हासिल करने को कितना लहू बहा, कितनी यातनाएँ कितने जुल्म सहे हमारे देशवासियों ने। यह जेल उस संघर्ष, उस जज्बे का जिंदा दस्तावेज है। यहाँ की दीवारों पर हजारों कहानियाँ दर्ज हैं। जनरल बोवेरी के जुल्मों की दास्तान, क्रूर सजाओं का इतिहास, फाँसी के फंदों पर दर्ज अनगिनत आजादी के दीवानों की गर्दनों के निशान। एक पुराना पीपल का पेड़ जो तमाम क्रूरताओं का साक्षी है। समंदर गवाह है उन अंतिम चीखों का। पाठ्यपुस्तकों में दर्ज किसी पाठ को पढ़ते वक्त कभी ऐसे एहसास जागते नहीं जैसे यहाँ आकर जागते हैं। कि रगों के भीतर दौड़ता लहू उबाल सा लेता हुआ महसूस होता है और आँखों से वो उबाल बहकर बाहर आने को व्याकुल होता है। अपनी आजादी के आगे सर झुक जाता है और सवाल भी उठते हैं कई कि जिस आजादी के लिए इतना लहू बहा, इतनी यातनाओं से गुजरे लोग उसे क्या हम सचमुच मान दे पा रहे हैं? साढ़े तेरह बाई साढ़े सात फिट की कोठरियों वाली 693 कोठरियाँ, जिनमें से झाँकता एक झरोखा वो भी ढका हुआ कि बाहर के कोई मौसम गलती से भी अंदर न जा सकें। अब भी इस ऐतिहासिक जेल के अंदर से कराहों की आवाजें आती हैं, उन कराहों पर इंकलाब जिंदाबाद की मुहर चस्पा होती है जो क्रूर यातना देने वालों के ठहाकों के मुँह पर तमाचे सी मालूम होती है।

वीर सावरकर की कोठरी में खड़े होकर मानो उस पूरे दौर को आँखों के सामने से गुजरता हुआ देखा जा सकता हो। फाँसीघर के ठीक सामने वाली वो कोठरी जान-बूझकर उन्हें दी गई थी ताकि हर फाँसी वो देखें। हमारा गाइड आनंद कोई इतिहासवेत्ता नहीं था। 2006 से वो यहाँ गाइड के तौर पर काम कर रहा है। गंभीर और सजग नौजवान। वो कहता है कि मुझे अच्छा लगता है अपने देश के इतिहास से लोगों को रू-ब-रू करवाना। लेकिन वो यह भी कहता है कि इस गेट से बाहर निकलते ही लोग सब भूल जाते हैं। हम भी उस गेट के बाहर निकले लेकिन शाम का लाइट एंड साउंड शो देखने को कुछ ही देर में लौट आने के लिए। लाइट एंड साउंड शो जो इतिहास की मार्मिक दास्तान को जिंदा करता है।

कॉर्बियन्स कॉव बीच : वो पहली लहर का जादू

सेल्यूलर जेल से बाहर निकलते हुए कदम भी भारी थे और दिल भी। अपनी आजादी की कीमत बहुत ज्यादा महसूस होने लगी थी। उसी भारी मन से हम कॉर्बियन्स कॉव बीच के किनारे जा पहुँचे। समंदर की उन लहरों को मानो हमारे दिल की हालत का अंदाजा था। वो भीतर समाये भारीपन को हल्का करने का हुनर जानती थीं। पहले पहल बीच के किनारे टहलने से जो शुरुआत होती है वो भला पूरा सराबोर होने से कम पर कब मानती है। शाम ढलने को थी। नारियल के पेड़ों के झुरमुट, सामने उफनाता विशाल समंदर। चंद कदमों का ही सफर हमने तय किया बाकी का सारा सफर लहरों ने खुद तय कर लिया। वो महबूब से हुई पहली मुलाकात सा आलम था। हाँ, ना... हाँ ना... के बीच झिझक, संकोच पूरा भीगने की इच्छा भी और दामन बचाने की मशक्कत भी और आखिर में समर्पण का सुख। सराबोर होने का सुख। समंदर की हेठी, जिद, अठखेलियों और शदीद मोहब्बत के आगे घुटने टेक देने का सुख। हार के जीत जाने का सुख। सब लोग यही कहते हुए बीच के किनारे गए थे कि आज सिर्फ समंदर देखेंगे भीगेंगे नहीं क्योंकि कोई भी दूसरे जोड़े कपड़े लेकर नहीं गया था लेकिन सब के सब भीग चुके थे। जो नहीं भीगे थे वो सचमुच अभागे ही थे, जीवन के सूखे हुए लोग।

अपनी संपूर्णता के साथ आया खूबसूरत सा दिन बीत चुका था, शाम कंधे से आ लगी थी। हम लौटे तो खुद को रात के हवाले करके। दिन बीत चुका था लेकिन अहसास में बचा हुआ था। कुछ दिन कभी न बीतने की क्षमता रखते हैं... ये ऐसे ही दिन थे। पोर्ट ब्लेयर में यह हमारी पहली रात थी। हम सोना नहीं चाहते थे। सोकर खोना नहीं चाहते थे कुछ भी। डिनर के बाद दूर तक टहलने जाने का सुख, थकान से चूर होने के बावजूद लगातार चलते जाने की इच्छा...

रॉस आइलैंड

अगली सुबह पोर्ट ब्लेयर का पहला सूर्योदय देखने की थी। सुबह पाँच बजे उठकर ही साथ के लोग जा डटे समंदर के किनारे। आठ बजे हमें निकल जाना था रॉस आइलैंड के लिए। राजीव गांधी वाटर स्पोर्ट्स क्लब से रॉस आइलैंड के लिए फेरी जाती हैं। पानी में चलने वाली बड़ी बोट। एम वी जया हमारी बोट का नाम था। उसमें बैठना, लाइफ जैकेट पहनना और चल पड़ना लहरों को चीरते हुए। चंद मिनटों की वो नन्ही सी दूरी भी काफी रोमांचक लगी। यह धीरे-धीरे समंदर के प्रेम की तरफ बढ़ना, उसमें और गहरे उतरने की यात्रा का यह दूसरा पड़ाव था। समंदर के बीच में खुद को पाना, बेहद साफ पानी में तैरती मछलियों को देख पाना... संयोग भर नहीं था। रॉस आइलैंड मगरमच्छ के जबड़े के आकार का आइलैंड है। इसे अंग्रेजों ने अपना मुख्यालय बनाया था। यहाँ के खंडहर उस दौर की विलासिता का बयान करने में पूरी तरह सक्षम हैं। अंग्रेजों के शानो-शौकत वाले बंगले, क्लब, ऑफिस, गिरजे सब बेहद भव्यता लिए हुए रहे होंगे यह उन खंडहरों में दर्ज था। उन खंडहरों के करीब जाने पर, उन्हें छूकर देखने पर उनके पार से नीले समंदर और नारियल के ऊचे पेड़ों को देखते हुए महसूस हुआ कि हमारे ही देश में हम पर ही राज करने वालों ने खुद कितना भव्य जीवन जिया। यहाँ घूमते हुए हमें बार-बार हिरन और मोर मिले। हिरन जिन्हें आप छू सकते हैं, जो आपको देखकर डर के भागते नहीं। इसी रॉस आइलैंड की खूबसूरती को कैमरे में कैद करते-करते एक जगह अवाक रह गए हम। बेहद शानदार दृश्य सामने था। लाइट हाउस। तकरीबन सौ या शायद उससे ज्यादा ही सीढ़ियाँ उतरने के बाद लकड़ी का एक पुल समंदर के ठीक बीच में। पतला सा पुल जिस पर चलते हुए समंदर के सीने पर सर रखने का सुख महसूस किया जा सकता था। वो पुल लाइट हाउस तक ले जाता है। वो लाइट हाउस जिसकी तस्वीर हर बीस रुपये के नोट पर छपी हुई देखी जा सकती है। उस पुल पर जाने के लिए एक बार तो सबकी हिम्मत नहीं होती, ऊपर से वहीं के कुछ लड़कों ने यह कहकर डरा भी दिया कि वहाँ जाना सुरक्षित नहीं है। ज्यादातर कदम कुछ दूर से लौट गए। कुछ कदम थोड़ा और आगे बढ़े लेकिन लकड़ी के उस पुल के ठीक बीचोंबीच जाकर मैंने खुद को एकदम अकेला ही पाया। सामने लहराता समंदर और सिर्फ मैं। कोई भीड़ नहीं, कोई फोटोग्राफी नहीं। सुख के लम्हे बस। न, मुझे तैरना नहीं आता लेकिन डूबने से डर भी नहीं लगता, कि मरने से पहले अगर जी लिए तो बुरा क्या है... हालाँकि वहाँ से लौटकर माँ की डाँट पड़ती है लेकिन जो सुख मैं लेकर लौटी थी उसके आगे कोई ताकीद, कोई डाँट छू भी नहीं सकती थी। मन सुख से सराबोर था। समंदर हमारी प्यास को जगाने का हुनर जानता है। पपड़ाए होठों पर पानी की कुछ बूँदें रखने को हम नारियल के पेड़ों की ओर देखते हैं... सामने से नारियल पानी लेकर आता कोई दिखता है। जहाँ प्यास जगे, वहीं प्यास बुझाने के उपाय भी मौजूद हों इससे बेहतर भी क्या होगा।

अंडर वॉटर वॉक : जिंदगी भर न भूलने वाला अनुभव

रॉस आइलैंड से वापस लौटने के बाद हमें जाना था अंडर वॉटर वॉक के लिए। जिसे इसके पहले डिस्कवरी पर या हिंदी फिल्म जिंदगी मिलेगी न दोबारा में ही देखा था। सच कहूँ तो पानी देखकर खिल उठने वाली मैं इस अनुभव के लिए रोमांचित भी थी और थोड़ी डरी हुई भी। समंदर के भीतर 26 फुट की गहराई में उतरकर समुद्री जीवन को खुली आँखों से देखना, क्या मुझसे हो पाएगा? अंदर से खुद को मजबूत कर रही थी कि जरूर... होगा। मुझे जाना ही है समंदर के भीतर। लेकिन जब वहाँ पहुँचकर काफी लोगों को डरते हुए, बिना जाए वापस आते हुए देखा तो घबराहट बढ़ी। फिर भी उस डर को हावी नहीं होने दिया। अपने उत्साह को कम नहीं होने दिया। पानी में पहली सीढ़ी पर कदम रखा, दूसरी पर... तीसरी पर... अब तक सब ठीक था। समंदर कमर के ऊपर तक आ चुका था। चौथी सीढ़ी पर पाँव रखते ही पानी सीने तक आ पहुँचा... पाँचवी सीढ़ी पर पाँव रखते ही पानी में गुड़प हो जाना था। बस यही... एक लम्हा हमें जीतना होता है। मैं हारने लगी। घबराहट में पाँव ऊपर की तरफ बढ़ने लगे। मुझसे नहीं होगा... ऐसा महसूस हुआ। दोबारा कोशिश की और इस बार नजर भर के समंदर को देख लिया। दूर तक फैला विशाल समंदर और उसके भीतर उतरती मैं... फिर से घबराहट हुई और मैं फिर वापस पलटी। साँसों की रफ्तार तेज हो चुकी थी। रोमांचक अनुभव को लिए बगैर वापस लौटना नहीं चाह रही थी। डर को काबू में किया और इस बार पाँचवी सीढ़ी पर कदम रख ही दिया। ऊपर से एक हेलमेट मेरे कंधे पर आ गिरा... बस सब आसान होता गया। पानी के भीतर न कोई डर, न घबराहट बस अद्भुत, अलौकिक सौंदर्य से भरी दुनिया... अप्रतिम अनुभव। पानी के भीतर उड़ने जैसा। थोड़ी ही देर में जमीन पैरों को छूने लगी। अब हमें समंदर के भीतर चलना था ठीक वैसे ही जैसे जमीन पर चलते हैं। समुद्री वनस्पतियों को छूकर देखना, जीवों को छूकर देखना, मछलियों को अपने पास से गुजरते हुए देखने, अपनी हथेलियों पर कंधों पर चलते देखना। मानो कोई सपना देख रहे हों। बेहद खूबसूरत अनुभव से हम रू-ब-रू हो रहे थे। वो बीस मिनट का अंडर वॉटर वॉक जीवन का सबसे खूबसूरत रोमांचक वॉक था। वापस लौटे तो शरीर ही नहीं मन भी भीगा हुआ था। सुख की सिहरन थी। होंठ धीरे से बुदबुदाए कि जिंदगी न मिलेगी दोबारा...

हम वापस लौट तो रहे थे होटल के कमरों की तरफ लेकिन हम जानते थे कि समंदर के उस हिस्से में हम छूट गए हैं। और समंदर हमारे भीतर जज्ब हो गया है। उसी शाम हमारे कुछ साथी चिड़िया टापू की ओर रवाना हो गए... लेकिन हम छूट ही गए कि हमें अपने भीतर समाए अनुभवों को जज्ब होने के लिए भी कुछ वक्त चाहिए था। अपनी मुट्ठियों को बार-बार खोलना और बंद करना... मानो समंदर को बूँद बूँद सोख लेने की कामना।

हैवेन सा हैवलॉक

आते समय किसी ने कहा था कि हैवलॉक तो बहुत ही सुंदर है तो मुझे लगा कि जो अनुभव अब तक हो चुके हैं क्या उससे भी बेहतर कुछ संभव है? अगली सुबह हैवलॉक के लिए रवाना होना था। सारी रात सपने में समंदर लहराता रहा, मछलियाँ आसपास से होकर गुजरती रहीं। हैवलॉक के लिए हमें करीब 11.30 बजे निकलना था। सुबह के वक्त में पोर्ट ब्लेयर शहर के जीवन को देखने के इरादे से यूँ ही निकल पड़े थे। तभी दोस्तों का ख्याल आया कि उनके लिए समंदर के इस शहर से कुछ तो ले जाना चाहिए। सागरिका यहाँ एक सुंदर सा शो-रूम है जहाँ सीप से बनी चीजें सही कीमत पर मिलती हैं। यह सरकारी शॉप है इसलिए बार्गनिंग जैसी कोई दिक्कत नहीं थी। ढेर सारी छोटी-बड़ी चीजें, मोतियों के गहने, शंख जूट का सामान लेकर हम लौटे तब तक हमारे कूच करने का समय हो चुका था। बस कि हमारी प्यास नारियल की तरफ देख रही थी। हाथों में नारियल थामे पानी पीते हुए हम पहुँचे पानी वाले जहाज से यात्रा करने के लिए। एयरपोर्ट जैसी ही औपचारिकताएँ निभाते हुए बोर्डिंग पास लेने के बाद मैक्रूज के भीतर पहुँचना। पोर्ट ब्लेयर से हैवलॉक की दूरी मैक्रूज से दो घंटे में तय हुई। सारे रास्ते समंदर के बीचोंबीच होने का सुख हाथे थामे रहा। हैवलॉक पहुँचते-पहुँचते शाम घिरने को हो आई थी। बस से अपने रिसॉर्ट तक की यात्रा के दौरान ही समझ में आ चुका था कि यह जगह अलौकिक सौंदर्य सहेजे है। इस जगह का नाम हैवलॉक जिस भी वजह से रखा गया हो लेकिन हमारे भीतर के सारे लॉक खुल रहे थे और एक हैवेन यानी स्वर्ग से साक्षात्कार हो रहा था। इतनी शुद्ध हवा, इतना गाढ़ा हरा... सारा रास्ता आँखों में सुख भर रहा था। सुपारी के ऊँचे-ऊँचे पेड़... बस कि खामोश उन हवाओं को ओढ़े रहने को जी चाह रहा था। हैवलॉक हमें अनलॉक कर रहा था। अपने भीतर की सुंदरता भी यहाँ की सुंदरता के साये में खुलने लगी थी, बिखरने लगी थी। बेहद खूबसूरत रिसॉर्ट हमारे वेलकम के लिए तैनात था लेकिन हम हैवलॉक की पहली शाम कमरों में गुजारने को तैयार नहीं थे। सामान कमरों में फेंककर तुरंत भागे राधानगर बीच की तरफ। राधानगर बीच जो हमारे रिर्सार्ट से जरा सी दूरी पर था। एशिया का सबसे खूबसूरत बीच। सूरज शरारत के मूड में था। हमारे वहाँ पहुँचने के ठीक पहले वो समंदर में डुबकी लगा चुका था। डूबे हुए सूरज की छूटी हुई लाल रोशनी में राधानगर बीच के किनारों पर टहलना, हैवलॉक की पहली शाम को समेटना था।

दिन भर पानी-पानी - एलीफेंट बीच

हमें शाम को ही बता दिया गया था कि अगले दिन अल्सुबह हमें एलीफेंट बीच के लिए रवाना होना है। हमें मालूम था कि यहाँ बहुत सारे वाटर स्पोर्ट्स जैसे स्नॉकर्लिंग, जेटस्की, स्कूबा डाइविंग, बनाना राइड, सोफा राइड वगैरह करने को मिलेंगे। इन वॉटर स्पोर्ट्स को लेकर एक काफी रोमांच भी था, थोड़ा भय भी। हालाँकि अंडर वॉटर वॉक के बाद हौसला बढ़ा हुआ था। एलीफेंट बीच तक पहुँचना भी एक शानदार अनुभव था। बीती शाम मैक्रूज से आते वक्त कुछ तेज रफ्तार बोट्स बीच समंदर से गुजरते हुई दिखी थीं और मन में यह ख्याल आ रहा था कि काश ऐसी किसी बोट पर हम भी हो पाते। नहीं पता था कि यह शहर मन में बुनी गई ख्वाहिशों को सुन भी लेता है और पूरा भी कर देता है। हमारे सामने वही बोट थी। खुली हुई बोट, जिसमें सिर्फ हम थे। वो तेज स्पीड में चली तो मानो सब छूटने लगा। समंदर को काटती उसकी गति पानी को उछालकर हमारे ऊपर फेंक रही थी। इस तरह भीगने का सुख अनिवर्चनीय था। हैवलॉक से एलीफेंट बीच तक का यह बीस मिनट का रास्ता अब तक तय किये गए तमाम रास्तों में श्रेष्ठतम था। किसी ख्वाब को जीने जैसा। बाहर एक विशाल समंदर था और असीम शांति थी अंदर। चाहकर भी हम अपने जीवन की किसी कड़वाहट को, अकराहट को याद नहीं कर पा रहे थे। कितना विशाल है जीवन, कितने सौंदर्य से भरा और हम कितनी तुच्छ वजहों में उसे जाया करते रहते हैं। क्षुद्रतम से उच्चतम की यह यात्रा। जिस दिन हम अपनी परेशानियों को प्रकृति के हवाले करते हैं, खुद को उसके हवाले करते हैं रास्ते खुलने लगते हैं मुझे नहीं मालूम ईश्वर होना क्या होता है लेकिन प्रकृति के करीब होते ही जीवन की मामूली समस्याएँ निर्मूल होती देखी हैं। खुद पर हँसी भी आई कि कितनी बेवजह सी वजहों को सर पर उठाए फिरते हैं हम।

एलीफेंट बीच आ चुका था। भीतर का समंदर बाहर के समंदर से मिलने को बेताब था। कि पानी में भागते चले जाना... और अंदर... और अंदर...। अपनी-अपनी पसंद के वाटर स्पोर्ट्स चुनना। बीच समंदर में जेटस्की पर निकलना, कुछ स्नॉकर्लिंग में जुटे थे, कुछ बीच नहाने में। तकरीबन तीन घंटे इस बीच पर समंदर के और भीतर उतरते जाने के थे। कि जी भरके उसको अपनी आगोश में भर लेने का दिन। आँखें मूँदे पानी में लेटे रहने का दिन... रोमांचक खेलों का दिन... चुपके से किसी को याद करने का दिन... लौटते वक्त मन तृप्त था।

राधानगर बीच

अब बाकी बचा दिन हमारे हवाले थे। यह हैवलॉक में हमारा आखिरी दिन भी था। लंच के बाद का सारा समय राधानगर बीच के लिए बचा था। जब मन भरा हो तो भूख प्यास भी जाती रहती है। हम राधानगर बीच आज पूरी तैयारी से गए थे। भीगने की भी और सूरज से कल का हिसाब लेने की भी। समंदर बहुत शदीद प्रेमी होते हैं। हमें बस अपने प्रेम का इजहार भर करना होता है, बस कुछ कदमों का फासला तय करना होता है बाकी वो आपको अपनी मोहब्बत में घसीटकर इतनी दूर ले जाते हैं कि आप वापस नहीं लौट सकते। हमने एक लहर को छुआ, कुछ सीपियाँ उठाईं और कोई लहर दौड़ते हुए आकर कदमों से लिपट गई। चंद लम्हों में हम लहरों के खेल में शामिल थे। सराबोर थे। लेकिन सूरज आज भी हमें ठेंगा दिखा गया। ऐन डूबने से ठीक पहले कमबख्त बादलों में जा छुपा। कब दिन बीता, कब रात हुई कुछ खबर नहीं... दिन भर समंदर में रहा शरीर, नमक नमक सा शरीर... लौटना अब सिर्फ एक शब्द था जिस पर पाँव चल रहे थे। हालाँकि लौट कोई नहीं रहा था। सब वहीं छूट गए थे। चाँद को अपनी हथेली पर उगाए आसमान भी आज इठला ही रहा था। नारियल और सुपारी के पेड़ों के बीच से झाँकता चाँद... ये रात जागने की रात थी। ख्वाहिशों के जागने की रात, उम्मीदों के जागने की रात... अपनी हथेलियों में अपना वजूद महसूस करने की रात। वो जो एक समंदर भीतर रहा करता है उसे आज मुक्त करने की रात। दूर कोई गिटार बजा रहा था, कोई धुन हवाओं में उतरा रही थी... रात अपने सफर पर मुसलसल चले जा रही थी।

वापसी एक उपक्रम

सुबह हमें वापस पोर्ट ब्लेयर लौटना था। बैग में सामान रखते हुए महसूस हो रहा था कि यहाँ क्या लेकर आए थे और क्या लेकर जा रहे हैं। एक सामान ही है जो जैसे आया वैसे वापस जा रहा था बाकी सब उलट-पुलट हो चुका था। हमारे वजूद का कोई हिस्सा यहीं छूट गया था, यहाँ के जंगल, समंदर, सीपी, शंख, मछलियाँ, चाँद, सूरज और शांति सब हमारे जेहन में पैक हो गए थे। हैवलॉक ने हमें वाकई अनलॉक कर दिया था तमाम झंझावातों से, मुश्किलों से परेशानियों से। अब सिर्फ शांति और सुकून बचा था।

पोर्ट ब्लेयर, आखिरी दिन

पोर्ट ब्लेयर में हमारा आखिरी दिन था। हम अंदर से खूब भरे हुए थे। हमारे भीतर का भराव हमें मौन करता है। उस मौन की उँगली थामे हमने पोर्ट ब्लेयर शहर की अन्य ऐतिहासिक इमारतों संग्रहालय, एक्वेरियम आदि का रुख किया। पैदल बाजारों में घूमते रहे। दुकानों पर रुके बगैर। एक मीठी सी शाम काँधों से आ लगी थी। ठंडी हवा, पोर्ट ब्लेयर की आखिरी शाम और एक गहरा मौन लिए हम मुफीद ठिकाने की तलाश में जॉगर्स पार्क जा पहुँचे। इतनी शांत शामें कम ही मिलती हैं। हवा में ऐसी ताजगी कि देर तक बस साँसें लेने को ही जी चाहे। कैमरे थक चुके थे, मन भरे हुए थे। जॉगर्स पार्क के कुछ चक्कर लगाने के बाद किसी कोने पर यूँ ही पसर जाना और ताकना डूबते हुए सूरज को।

वापस कौन आया लौटकर

अगली सुबह हम वापसी के लिए एयरपोर्ट के लिए चल पड़े। एक आखिरी बार अबाडीन बाजार से गुजरते हुए, एक आखिरी बार नारियल पानी पीते हुए। एयरपोर्ट पहुँचने से ठीक पहले मालूम हुआ कि हमारी फ्लाइट का कोई अता-पता ही नहीं। दिल्ली का कोहरा हवाई उड़ानें रोके खड़ा था। साथ के कुछ लोग मुस्कुरा उठे... कुछ देर और इस शहर में। एक पूरा दिन पोर्ट ब्लेयर के एयरपोर्ट पर फ्लाइट के आने के इंतजार में बिताने का रोमांच इस यात्रा के सुख को बढ़ा ही रहा था। हालात यूँ भी बन रहे थे कि हो सकता है यहीं रुकना पड़े एक दिन और या शायद कलकत्ता में। या शायद अगले दिन चाटर्ड प्लेन मँगवाया जाए... न जाने कितनी बातें, न जाने कितने कयास... लेकिन इस शहर से मिली सुकून की भरावन ने ऐसा हाथ थामा हुआ था कि सब कुछ सुंदर लग रहा था। दिल के भीतर एक गुनगुना एहसास था। पल भर को भी आँखें बंद करो तो विशाल हरा समंदर लहराता नजर आता।

लौटकर आने पर अहसास हुआ कि जो गया था वो कोई और है और जो लौटा है वो कोई और। एक सुकून अब तक तारी है... सेल्यूलर जेल के गेट के बाहर निकलने के बाद भी वो अहसास छूटे नहीं हैं...


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हिंदी समय में प्रतिभा कटियार की रचनाएँ