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कविता

गहरे भाव
भारती सिंह


सदियों से
मेरे अंतस की
अलगनी पर
रोज आकर बैठती है
एक चिड़िया
वह अपनी ही भाषा में
करती है कुछ बात
भाषा की अनभिज्ञता
नहीं बनती कभी बाधा
वह अपनी भाषा मुझे देती है
और मैं उस पर बहा देती हूँ
अपने गहरे भाव।
 


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