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कविता

एक नम सी रागिनी हूँ मैं
भारती सिंह


तुम मुझे देखो तो एक बुत हूँ मैं
तुम मुझे छुओ तो एक अहसास हूँ मैं
तुम मुझे सोचो तो एक खयालात हूँ मैं
तुम मुझे छेड़ो तो सुर हूँ मैं
साज पर रखो तो संगीत हूँ मैं
होठों तक लाओ तो सरगम हूँ मैं
अगर तुम मुझे गुनगुनाओ तो
मीरा का गीत हूँ मैं
इस धरा पर खोजो तो
रंगों की छुअन हूँ मैं
आँखों में भर लो तो ख्वाब हूँ मैं
उसे पलकों तक लाओ तो इंतजार हूँ मैं
प्रेम मे ढूँढ़ो तो राधा हूँ मैं
तुम निभा सको तो एक रिश्ता हूँ मैं
फिर दूर तलक ले जाओ तो
एक परंपरा हूँ मैं
समंदर की लहरों में देखो तो
उसकी उद्दाम तड़प हूँ मैं
तुम मुझे बसंत में निरखो तो
खिली-बिछी पलाश हूँ मैं
फलक तक जाओ तो
चाँद का दाग हूँ मैं
मैं दिन का उजास हूँ
तो रात की मिठास हूँ मैं !

 


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