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कविता

तुमने मुझे गढ़ा है
भारती सिंह


मैं द्रव्य हो उठी हूँ
तुमने मुझे बदला है इस रूप में
मैं अब तक चाक पर
रखी जाने वाली गीली मिट्टी ही थी
जो धीरे-धीरे सूखने की प्रक्रिया में
कोमलता खोती जा रही थी

तुमने मुझे गढ़ा है
तुमने गढ़ा है देह की नदी को
जिसमें भावनाओं की कश्तियाँ
सफीनों तक अटकी पड़ी थी
मैं बह रही हूँ तुम्हारे कसमसाते बाहुपाश में
मेरे मदिर बहाव की गति
तुम्हारी साँसों तक जाती है
मैं तुम्हारे कोमल हथेलियों पर अपना दर्द रख जी लेना चाही थी
तुम मेरी आँखों में सपने भरना चाहते थे
फिर कौन-सा रंग रीत गया ! तुम्हारी कूची ने ही तो रंगों से दूरी नहीं बना ली !!
गढ़े अनगढ़े के बीच
वो कौन सा पर्वत-पीर आ गया था ?
याद है - तुमने कहा था -
एक मुख्तसर-सी रात नवाज दे मुझे
मैं दर्द की रात में, तुम्हारे सुर्ख लबों पर
गीला अहसास सजाना चाहता हूँ
मैंने एक कदम बढ़कर
तुम्हारे उफनते जज्बातों को
पनाह दी थी
तुमने मेरे माथे से लबों तक की दूरी
न जाने कितने लहरों को जकड़ कर
तय की थी
मैंने तुमसे कहा था
तुम भरो रंग,  इस रंगहीन चेहरे पर
रंग सजा दो नेह का
प्रीत में पके गाढ़े रंग को
तनिक और पकने दो
मैं तुम्हारे प्रीत को आयाम दूँगी
तुम्हारे आगोश में बँधे
तुम्हारे और मेरे बीच से
गुजर जाए एक मुसलसल रात
और फिर भी मैं
तुम्हारे प्रेम और अपनी देह के बीच
बहने दूँ एक दरिया ।


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