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कहानी

उम्मीद और रोशनी
नीलम शंकर


रमेश ने उल्टी गिनती गिनना शुरू कर दिया था। इंतजार करते-करते दशहरा तो बीत गया। उम्मीद अभी भी बँधी थी कि शायद छै महीनों से बकाया पगार इकट्ठी ही मिलेगी जैसे पहले होता आया था। अब वह अखबार कहाँ लेता था। सबसे पहले उसने अपने खर्च में यही कटौती की थी कि सौ सवा सौ भी बच जाएगा तो कम से कम दाल की छौंक का घी का खर्चा तो निकल आएगा। अखबार तो वह रोज सबेरे पान की दुकान पर जाता एक अट्ठनी का गुटका पाउच लेता अपने मतलब की खबरों पर नजर दौड़ता। खबर पढ़-पढ़कर मन ही मन कुढ़ता आज इस संस्थान को सरकार इतने दिनो का बोनस डिक्लेयर कर रही कल उस संस्थान का। मन ही मन बुदबुदाया 'साले तनख्वाह न सही कम से कम बोनस ही दे देते तो अच्छा रहता।'

सबसे छोटा वाला कितना दुखी होता हैं जब उसे त्योहार पर नए कपड़े नहीं खरीद पाते। पत्नी अलग 'चार साल से मरी फैक्टरी तरसा के रख दे रही पूजा को भी नहीं नई साड़ी ले पाते बाकी फंक्शन की तो बात दूर।'

बस उसे नहीं शिकायत थी तो अपनी बड़ी बेटी से पता नहीं किस मिट्टी की बनी थी। आजकल का समय न नाज-नखरे, न फैशन, न सजने-सँवरने का शौक बस एक ही काम पढ़ाई और मन बहलाने को माँ के साथ काम में हाथ बँटा लेती। वह सोचता उसकी हर सहेली के पास मोबाइल है पर उसकी बेटी ने कभी कहा तक नहीं। एक दिन उसके दिल ने कचोटा, 'क्यों बेटा तुम्हें जरूरत नहीं पड़ती न, तुम तो मेरे मोबाइल से ही काम चला लेती हो कितनी अच्छी हो।' कहते हुए उसने बेटी को अपने से सटाया तो नहीं लेकिन अपना सर उसके सर पर रख दिया था। वह उसे कभी बेटी नहीं बेटा ही कह कर पुकारता था। ऐसा नहीं कि वह किसी प्रगतिशीलता की वजह से कहता उसे बेटा कहने में सहजता महसूस होती थी।

फिर अब दूसरा त्योहार नजदीक आ रहा दीवाली। जुलाई-अगस्त से न त्योहार ही त्योहार आते रहते हैं। पता नहीं किसने इतने सारे त्योहार बना दिए।

आज के समय में त्योहार क्या खाली-पीली बातों, गानों से मनाए जा सकते हैं। उसकी टेंशन बढ़ने लगती थी। ड्यूटी तो वह रोज जाता था टिफिन लेकर। काम हो न हो पर आठ घंटे तो बिताना ही पड़ता था। जो ऊपरी आदेश था। तभी तो चार-चार, छै-छै महीने की इकट्ठी तनख्वाह मिल जाती थी। अब तो हद कर दी है आठ महीने हो गए, खबरें हवा में उड़ती 'कि जल्दी ही फैक्ट्री पर ताला लगने वाला है।' कभी 'फला कंपनी इसका अधिग्रहण कर लेगी।' तो छँटनी तो करेगी ही अपने हिसाब से रखेगी। कहीं 'मैं भी न आ जाऊँ छँटनी के दायरे में।' यह भय उसे सबसे अधिक सताता।

उम्र के पचास बरस पार कर रहा। इस उमर में किसी दूसरे शहर जाकर काम करना इतना आसान होता है क्या? हर घड़ी यही कशमकश। घर में पत्नी से अलग झाँव-झाँव, खर्चे-पानी को लेकर। कभी गाँव से थोड़ा बहुत अनाज आ गया तो राहत पर बाकी खर्चे तेल, मसाला, सब्जी, दूध अब वह क्या क्या गिनाए। बाहर शहर में तो बरतन माँजना हो तो भी पैसा ही खर्च करो गाँव थोड़े ना कि चूल्हे की राख निकाली, माँजा बरतन चकाचक हो गए। साला... पानी का भी बिल मुँह बाए खड़ा रहता हैं। बिजली तो है ही। जब से बिलिंग का काम निजी कंपनियों को मिल गया है अब चालाकी भी नहीं कर पाता।

जैसे-जैसे दीवाली नजदीक आ रही रमेश की चिंताएँ बढ़ रही। एक दिन पत्नी 'कहो जी पिछले सारे त्योहार तो कंपनी से सुखाढ़ की भेंट चढ़ गए। सारे त्योहार घर जिसकी चारदीवारी में ही किसी तरह निबटा लिया कोई नहीं ही जान पाया होगा। पर दिवाली? इसमें तो ढेर सारा इंतजाम करना पड़ता है। लाइटिंग, घी-तेल के दिए, पटाखे। पहले तो ठीक था पास-पड़ोस में लाई, खील-खिलौना गरी ही प्रसाद में बाँट दिया जाता था और यही चलन भी था। ससुरा पता नहीं कहाँ से अब तो यह सब बंद हो गया सीधे-सीधे मिठाई का डिब्बा चलन में आ गया। खील-बतासे-खिलौना आउटडेटेड हो गया। घर में आता तो सभी के है बस भगवान् जी को भोग लगाओ और जो बचे उसे उसका नया संस्करण दे कर खत्म करो। अब तो कोई भी बच्चा खील-खिलौना नहीं खाता। यह सब तो सफाई कर्मी, धोबी... कुछ ...कुछ ऐसी ही कामगारों के ही बीच में बँट जाता हैं।

रमेश बीवी के साथ त्योहार पर खर्च का हिसाब कम से कम में करने की भी सोच रहे तो भी नहीं जुगाड़ हो पा रहा। पत्नी के दिमाग में एक तरकीब सूझी 'क्यों जी क्यों न इस बार हम सभी गाँव चल चलें, बहुत साल हो गए, कोई भी त्योहार वहाँ नहीं मनाया। केवल आने जाने का भाड़ा ही तो लगेगा।' रमेश को सुझाव तो जँचा पर उसमें भी कई पेंच आ गए। त्योहार का इंतजाम न करना पड़ेगा तो क्या घर वालों को कपड़ा न दिलाना पड़ेगा त्योहार पर। वह भी कर ही दिया तो बच्चे पीछे पड़ जाएँगे। पत्नी न भी बोली मन ही मन तो सोचेगी जरुर। जब सब का बजट बन सकता था तो क्या मेरा नहीं आ सकता?

रमेश ने बहुत गुणा-गणित लगाया। यह सुझाव भी असफलता की भेंट चढ़ गया। जब इंसान पर हल्की-सी भी निराशा की परत चढ़ती हैं और परिस्थितियाँ विषम ही होती जा रही हो तो हताशा परत दर परत चढ़ने लगती हैं। अनेक तरह के पलायनवादी विचार जन्मने लगते हैं। उसे एक अजीब और भयानक विचार आया। क्यों न पत्नी से कह दूँ कि माँ का फोन आया था, अब की पट्टीदारी में कोई मर गया। फिलहाल तो बरसी होने तक त्योहार नहीं मनाया जा सकता। सभी खर्चों से मुक्ति मिल जाएगी। पर इतना बड़ा झूठ बोलने का जिगरा भी तो होना चाहिए। रमेश वह कहाँ से लाए उसे तो अपने मासूम बच्चों का चेहरा याद आने लगता उनकी उम्मीदें तो सीधे पापा रमेश पर ही आकर टिकती हैं। अपने आपको धिक्कारता अपने पौरुष पर भी गाहे-बगाहे प्रश्न चिन्ह लगता। इतना परेशान वह कभी भी नहीं हुआ था।

इस मामले में वह खुशनसीब था कि पत्नी बच्चे ज्यादा तंग करते न थे। पर अपना भी तो जमीर होता हैं जो इन सब से मुक्त नहीं होने देता हैं। मुख्य इंतजाम उसी के माथे पर, किससे शेयर करे अपनी परेशानी। ऐसा नहीं कि इन परेशानियों से वही गुजर रहा होगा आखिर उसके सहकर्मी भी तो हैं उसी के जैसे। ताज्जुब कोई आपस में साझा नहीं कर रहा। समय भी बदलता जा रहा। सुख-दुख जैसे अब बाँटने की परंपरा ही कम होती जा रही हैं। जैसे हर भारतीय परंपरा पर बाजारवाद चढ़ गया। वैसे ही सुख-दुख की बाँटने की परंपरा भी कोई नया रूप ले लेगी। महानगरों में तो हर बात में पैसा चाहे दुखों का हो या सुखों का मौका।

खैर दर्शन बघारने से रमेश का काम नहीं ही चलेगा असलियत में आना ही पड़ेगा। रोज अखबार देख रहा अब शायद कोई खबर आ जाए कि कर्मियों का बकाया भुगतान दीवाली के पहले होगा। सभी महकमों की खबरें आ रही नहीं आ रही तो रमेश की उस कंपनी की जिसमें वह काम करता हैं। केवल त्यौहार की ही चिंता हो रमेश को, ऐसा नहीं था। बेटी के कंप्यूटर कोर्स की सेकंड सेमेस्टर फीस भी मुँह बाए खड़ी है। कई दिनों से उसे टाल रहा। आज कल आज कल। उसे बेटी के सामने सर उठाने में भी ग्लानि हो रही। क्योंकि अब वोह चुप-चुप-सी रहने लगी थी। शब्द से ज्यादा मौन मारक होता है। अब कोर्स तो पूरा कराऊँगा ही कराऊँगा। शादी तो बाद की बात है। वोह भी इंतजाम तो मुझे ही करना है। पहले जो जरुरी है उसे देखें।

कई दिनों की उहापोह। पत्नी को बताएँ की न बताएँ। फिर वही दर्शन घुमड़ रहा। वर्तमान खुशहाल तो भविष्य अपने आप ठीक हो जाएगा, बस अपने पौरुष पर भरोसा होना चाहिए। बैंक गया अपनी फिक्स्ड डिपाजिट तुड़ा देने के संकल्प के साथ। पहले घर में दिए तो जले रोशनी तो हो फिर देखा जाएगा। आखिर हर कोई कुछ न कुछ के इंतजाम में लगा ही होगा ...अब कौन है जो घरेलू मामलात आपस में बाँटता हैं। मैं भी क्यूँ बाँटू।

रोशनी तो घर में होनी ही चाहिए पारंपरिक या आधुनिक या दोनों ही...। कभी-कभी बाहर का उजाला ही भीतर के अँधेरे को कम करता है। फिलवक्त रमेश के पास उम्मीदों की रोशनी थी।


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