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आइए पढ़ते हैं : इंदिरा गोस्वामी का उपन्यास :: नीलकंठी ब्रज
धारावाहिक प्रस्तुति (26 जुलाई 2019), मुखपृष्ठ संपादकीय परिवार

दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास
मोहनदास करमचंद गांधी

प्रथम खंड : 23. गोरे सहायक

कौम की लड़ाई में इतने अधिक प्रतिष्ठित गोरों ने हिंदुस्‍तानियों का पक्ष लेकर प्रमुखता से भाग लिया था कि इस स्‍थान पर उन सबका एक साथ परिचय कराना अनुचित नहीं होगा। इससे आगे चलकर जब स्‍थान स्‍थान पर उनके नाम आएँगे तब पाठकों को वे अपरिचित नहीं लगेंगे और लड़ाई का वर्णन करते हुए मुझे उनका परिचय कराने के लिए बीच बीच में रुकना भी नहीं पड़ेगा। जिस क्रम में उनके नाम मैं यहाँ दूँगा उस क्रम को पाठक न तो उनकी प्रतिष्‍ठा के अनुसार मानें और न लड़ाई में उनकी सहायता के मूल्‍य के अनुसार मानें। कुछ हद तक पाठक इस क्रम को गोरे मित्रों के परिचय काल के अनुसार और लड़ाई के उप-विभागों में प्राप्‍त उनकी सहायता के अनुसार मानें।

इनमें सबसे पहला नाम श्री आल्‍बर्ट वेस्‍ट का आता है। कौम के साथ उनका संबंध लड़ाई के पहले ही स्‍थापित हो चुका था। और मेरे साथ तो उनका संबंध इससे भी पहले बंध गया था। मैंने जोहानिसबर्ग में अपना ऑफिस खोला उस समय मेरा परिवार मेरे साथ नहीं था। पाठकों को स्‍मरण होगा कि मैं 1903 में दक्षिण अफ्रीका के हिंदुस्‍तानियों का तार मिलने से एकाएक हिंदुस्‍तान से दक्षिण अफ्रीका के लिए रवाना हो गया था। मन में यह आशा थी कि एक वर्ष के भीतर हिंदुस्‍तान लौट आऊँगा। जोहानिसबर्ग में एक शाकाहार देनेवाला भोजन-गृह था। उसमें मैं सुबह और शाम नियमित रूप से भोजन करने जाता था। वेस्‍ट भी वहाँ आते थे। वहीं हम दोनों का परिचय हुआ था। वे एक अन्‍य गोरे के साथ साझेदारी में प्रेस चलाते थे।

1904 में जोहानिसबर्ग के हिंदुस्‍तानियों में जोर का प्‍लेग फैला। मैं रोगियों की सेवा-शुश्रूषा में लग गया, इसलिए उस भोजन-गृह में मेरा जाना अनियमित हो गया। और जब जाता भी था तो दूसरे जीमनेवालों के आने से पहले ही मैं भोजन कर आता, ताकि दूसरे लोगों को मुझसे प्‍लेग की छूत लगने का कोई भय न रहे। जब लगातार दो दिन तक वेस्‍ट ने मुझे भोजन गृह में नहीं देखा तो वे घबराए। अखबारों से उन्‍हें पता चल गया था कि मैं प्‍लेग के रोगियों की सेवा-शुश्रूषा में लगा हूँ। तीसरे दिन सुबह 6 बजे, जब मैं हाथ-मुँह ही धो रहा था, वेस्‍ट ने आकर मेरे कमरे का दरवाजा खटखटाया। मैंने दरवाजा खोला तो सामने वेस्‍ट का हँसता चेहरा देखा।

वे खुश होकर बोल उठे : ''आपको देखकर मैं निश्चिंत हो गया। भोजन-गृह में आपको देखा नहीं, इसलिए मैं घबरा गया था। अगर मेरी मदद की कोई जरूरत आपको हो तो...

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उद्धव-शतक
जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’

यद्यपि 'उद्धव-शतक' शब्द से यह धारणा बनती है कि इसमें सौ ही छंद होंगे पर यह वास्तविकता नहीं है। इसमें छंद संख्या एक सौ अठारह है। उद्धव-शतक में शताधिक छंदों का विभाजन विषय-वस्तु के क्रम में निर्दिष्ट किया गया है। इस विभाजन पर दृष्टिपात करने से पता चलता है कि इसमें गोपियाँ ही सर्वप्रमुख हैं। उनके पक्ष का कवि ने अनेक रूपों में विस्तार किया है। कहीं भावातिरेक, कहीं तर्कशीलता, कहीं अनुभवों की शृंखला, कहीं उपालंभों की तीव्रता और कहीं व्यंग्य-परिहास से उद्धव की ज्ञान-गरिमा को परास्त करने की चेष्टा की गई है। इसके अनंतर कृष्ण द्वारा मथुरा से उद्धव को ब्रज भेजने का प्रसंग अधिक महत्वपूर्ण है। इसमें मौलिकता, भावमयता और वर्णन कौशल असाधारण है। इसके पश्चात जो प्रसंग अधिक महत्वपूर्ण है वह है ब्रज से लौटे उद्धव का कृष्ण के प्रति निवेदन, जिसमें अपने पक्ष की पराजय का मार्मिक स्वीकार, कृष्ण की प्रेममयी अनुभूति का साक्षात्कार और गोपियों से उनकी प्रीति का प्रगाढ़ संबंध, अंततः ज्ञान और योग मार्ग पर भक्ति की विजय का उद्घोष बनकर सामने आता है। - जगदीश गुप्त

परंपरा
डॉ. सुधा त्रिपाठी, डॉ. सुशील कुमार त्रिपाठी
कालिदास की भारती में राजधर्म

संस्कृति
अखिलेश कुमार दुबे
कुमाऊँनी होली-गीत : परंपरा और प्रयोग

कहानियाँ
वंदना राग
विरासत
ज़ाकिर अली रजनीश
इकामा फी
रविंद्र आरोही
पुनर्जन्म
सविता पाठक
गूलर का फूल

आलोचना
जगन्नाथ दुबे
राजेश जोशी : गहरे निहितार्थो का कवि

विमर्श
डॉ. बलजीत कुमार श्रीवास्तव
लोकसाहित्य का संवर्धन : समस्या और समाधान

मीडिया
पुष्पेंद्र कुमार
हिंदी पत्रकारिता के काल-विभाजन एवं नामकरण की समस्या

कविताएँ
सुजाता

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ISSN 2394-6687

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