आइए पढ़ते हैं : पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ की कहानियाँ
देशांतर इस पखवारे संपादकीय परिवार

बनारस
होर्हे लुईस बोर्हेस

अनुवाद : श्रीकांत दुबे

कोई भ्रम, कोई तिलिस्म
जैसे आईने में उगता किसी उपवन का बिंब,
इन आँखों से अदेखा
एक शहर, शहर मेरे ख्वाबों का,
जो बटता है फासलों को
रेशों से बटी रस्सी की मानिंद
और करता रहता है परिक्रमा
अपने ही दुर्गम भवनों की।

मंदिरों, कूड़े के पहाड़ों, चौक और कारागारों तक से
अँधेरे को खाक करती
चटकार धूप
चढ़ आती है दीवारों के ऊपर तक
और चमकती रहती है
पावन नदी के छ्ल छल पानी में।

गहरी उसाँसें भरता शहर,
जो बिखेर देता है समूचे क्षितिज पर
सितारों का घना झुंड,
नींद और चहलकदमी से सनी
एक उनींदी सुबह में
रोशनी उसकी गलियों को
खोलती है
मानो खोलती हो अपनी बाँहें।

ठीक तभी उठता है सूर्य,
पूर्व में देखती चीजों के कपाट पर
डालता है अपने उजाले की दृष्टि।
मस्जिदों के शिखर से उठती अजान
हवा को गंभीर बनाती
करने लगती है जय-जयकार
एकांत के देवता की
अन्यान्य देवों के उस नगर में।





(और जबकि मैं खेल रहा हूँ
उसके अस्तित्व की ख़ालिश कल्पनाओं से,
वह शहर अब भी आबाद है
दुनिया के तयशुदा कोने में,
अपने निश्चित भूगोल के साथ
जिसमें मेरे सपनों की तरह भरे लोग हैं,
और हैं अस्पताल, बैरक और पीपल के छाँव वाली
सुस्त गलियाँ
और पोपले होंठों वाले लोग भी
जिनके दाँत हमेशा कठुआए रहते हैं)।

(अनुवाद मूल स्पेनिश से)

पंद्रह कहानियाँ
जिंदर

अनुवाद : सुभाष नीरव

जिंदर न सिर्फ पंजाबी के शीर्ष कथाकारों में से एक हैं बल्कि उनकी गिनती शीर्ष भारतीय कथाकारों में की जा सकती है। भारतीय भाषाओं सहित दुनिया की तमाम भाषाओं में उनकी कहानियों का अनुवाद हुआ है। कई बार मंटो की याद दिलाती उनकी कहानियाँ हमें हमारे भीतर के उन गहरे अँधेरे कोनों में ले जाती हैं जहाँ अपराध और हिंसा का भयानक कारोबार जन्म लेता है। राष्ट्र और राज्य की बहस उनकी कहानियों में बार बार उठती है। उनकी कहानियों में विभाजन का गहरा दंश बार बार सिर उठाता है और वहीं से ऐसे बहुत सारे सवाल जन्म लेते हैं जिनका जवाब तलाशना बहुत ही तकलीफदेह तो है पर शायद उन सवालों के जवाब तलाशे बिना हमारी मुक्ति भी नहीं है। जाति और जेंडर के सवाल भी इन कहानियों में बेहद तीखे रूप में पाठकों के सामने होते हैं। ये कहानियाँ अपने पाठकों के भीतर देर और दूर तक बनी रहने वाली कहानियाँ हैं।

आलोचना
सुभाष नीरव
डटकर सामना करती कहानियाँ
(जिंदर की यहाँ प्रस्तुत कहानियों पर एकाग्र)

कथा-चिंतन
रोहिणी अग्रवाल
कौतूहल से आत्मसाक्षात्कार तक फैला कहानी का वितान

विमर्श
लाल्टू
पिछली सदियों में भारत में शिक्षा और विज्ञान-शिक्षा पर कुछ बातें

लंबी कविता
प्रेमशंकर शुक्ल
रोटी एक फूल है

सिनेमा
विमल चंद्र पांडेय
बड़ी गर्म हवा है मियाँ, जो उखड़ा नहीं सूख जावेगा : गर्म हवा
सलीम को दया और सहानुभूति नहीं, रोशनी का पता बताने वाला कोई चाहिए : सलीम लंगड़े पे मत रो

विचार
सत्यम कुमार सिंह
आत्म, इतिहास और जनवाद : ऐरिक हाब्सबाम

कुछ और कहानियाँ
कविता
धूल
लौट आना ली
आवाज दे कहाँ है...
मध्यवर्ती प्रदेश

संरक्षक
प्रो. गिरीश्‍वर मिश्र
(कुलपति)

 संपादक
अरुणेश नीरन
फोन - 07743886879,09451460030
ई-मेल : neeranarunesh48@gmail.com

समन्वयक
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ISSN 2394-6687

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