आइए पढ़ते हैं : अमृतलाल नागर की लंबी कहानी :: पाँचवाँ दस्ता
जनपदीय हिंदी - भोजपुरी इस पखवारे (26 मई 2017) संपादकीय परिवार
अमौसा के मेला
कैलाश गौतम

भक्ति के रंग में रँगल गाँव देखा,
धरम में, करम में, सनल गाँव देखा।
अगल में, बगल में सगल गाँव देखा,
अमौसा नहाये चलल गाँव देखा।

एहू हाथे झोरा, ओहू हाथे झोरा,
कान्ही पर बोरा, कपारे पर बोरा।
कमरी में केहू, कथरी में केहू,
रजाई में केहू, दुलाई में केहू।

आजी रँगावत रही गोड़ देखऽ,
हँसत हँउवे बब्बा, तनी जोड़ देखऽ।
घुँघटवे से पूछे पतोहिया कि, अईया,
गठरिया में अब का रखाई बतईहा।

एहर हउवे लुग्गा, ओहर हउवे पूड़ी,
रामायण का लग्गे ह मँड़ुआ के ढूँढ़ी।
चाउर आ चिउरा किनारे के ओरी,
नयका चपलवा अचारे का ओरी।

अमौसा के मेला, अमौसा के मेला।

( इस गठरी और इस व्यवस्था के साथ गाँव का आदमी जब गाँव के बाहर रेलवे स्टेशन पर आता है तब क्या स्थिति होती है ?)

मचल हउवे हल्ला, चढ़ावऽ उतारऽ,
खचाखच भरल रेलगाड़ी निहारऽ।
एहर गुर्री-गुर्रा, ओहर लुर्री-लुर्रा,
आ बीचे में हउव शराफत से बोलऽ
 
चपायल ह केहु, दबायल ह केहू,
घंटन से उपर टँगायल ह केहू।
केहू हक्का-बक्का, केहू लाल-पियर,
केहू फनफनात हउवे जीरा के नियर।

बप्पा रे बप्पा, आ दईया रे दईया,
तनी हम्मे आगे बढ़े देतऽ भईया।
मगर केहू दर से टसकले ना टसके,
टसकले ना टसके, मसकले ना मसके,

छिड़ल ह हिताई-मिताई के चरचा,
पढ़ाई-लिखाई-कमाई के चरचा।
दरोगा के बदली करावत हौ केहू,
लग्गी से पानी पियावत हौ केहू।

अमौसा के मेला, अमौसा के मेला।

( इसी भीड़ में गाँव का एक नया जोड़ा, साल भर के अंदर का ही मामला है, वो भी आया हुआ है। उसकी गति से उसकी अवस्था की जानकारी हो जाती है बाकी आप आगे देखिए...)

गुलब्बन के दुलहिन चलै धीरे धीरे
भरल नाव जइसे नदी तीरे तीरे।
सजल देहि जइसे हो गवने के डोली,
हँसी हौ बताशा शहद हउवे बोली।

देखैली ठोकर बचावेली धक्का,
मने मन छोहारा, मने मन मुनक्का।
फुटेहरा नियरा मुस्किया मुस्किया के
निहारे ली मेला चिहा के चिहा के।
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किशोरीलाल गोस्वामी
गरिमा श्रीवास्तव

1890 में 'प्रणयिनी परिणय' से रचना यात्रा प्रारंभ करने वाले किशोरीलाल गोस्वामी भारतेंदु परवर्ती और पूर्व द्विवेदी युग में अपने 65 उपन्यासों, कुछ नाटकों और कई निबंधों की रचना कर अपने समकालीन और परवर्ती रचनाकारों के प्रेरणा स्रोत बने। वे बालकृष्ण भट्ट, रत्नचंद्र, जगन्मोहन सिंह की परंपरा के उपन्यासकार थे। भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रेरणा से जो लोग साहित्य-लेखन में प्रवृत्त हुए उनमें किशोरीलाल गोस्वामी का नाम प्रमुख है। अपने पहले उपन्यास 'प्रणयिनी परिणय' के निवेदन में बाणभट्ट कृत कादंबरी का उल्लेख और उससे प्रभाव ग्रहण करने वाले गोस्वामी जी पर पारिवारिक एवं साहित्यिक संस्कारों तथा तत्कालीन नवजागरण की चेतना का प्रभाव देखा जा सकता है। रसिक पाठक समुदाय जो अभी पूरी तरह पाश्चात्य रंग में रंगा नहीं था, जिसकी संवेदना के तार अभी तक रीतिकालीन नख-शिख वर्णन, नायक-नायिका प्रेम-विरह से झनझनाते थे, उस पाठक समुदाय की रुचि उपन्यास की ओर मोड़ने का काम किशोरीलाल गोस्वामी ने किया।

कहानियाँ
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एक चोर का बयान
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आलोचना
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कबीर : एक अंतहीन यात्रा

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कविताएँ
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अनुकृति शर्मा
अखिलेश्वर पांडेय

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ISSN 2394-6687

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