आज की प्रविष्टि :: सूरज प्रकाश की कहानियाँ
देशांतर इस हफ्ते धरोहर

कविताएँ
अनसतासिस विस्तोनतिस

ए आर एस पोइतिका

कविता कोई पत्ता नही
जिसे सड़कों पर हवा बुहार दे
यह समंदर भी नहीं
जिस पर जहाज लंगर डाल ले
नहीं है यह नीला आसमान
और स्वच्छ वातावरण
कविता दुनिया के
सीने पर गड़ा एक खूँटा है
एक चमकदार चाकू है
जो कस्बों में सीधा घुपा है
एक कविता संताप है
एक चमकदार धातु
बर्फ, एक गहरा घाव
एक कविता कठोर है
पोलिहाइड्रल हीरा
कठोर, गढ़ा हुआ संगमरमर
तेज हवा, एशिया की एक नदी
कविता आवाज नहीं है
चिड़िया की मौत की
यह गोली है  इतिहास के क्षितिज में
कविता कोई कुम्हलाता फूल नहीं
यह संलेपित दर्द है

अनाबेल ली

तुम्हारी आँखें
पाले और महावृष्टि के साथ
सर्दियों का उतरना हैं
सुनसान कब्रिस्तान अपनी धूल
और अनजाने पदचिह्नों को उतार देते हैं
तारों और फूलों की खूनी बरसात
देह का खून
तुम्हारी आँखें खोखली दीवारें
जिससे कि विदेशी सेना गुजर सके
समंदर के ऊपर से हवा की ठिठुरन
झुर्रियाँ भविष्य में फीकी पड़ जाती हैं
रात खाली कफन में कसमसाती है
रोशनी से भी ज्यादा गहरी
आसमान धरती पर दफन हुआ
तटों की खोखली खोपड़ियाँ
समुद्री शैवाल पर परावर्तन
रोशनी की मोमबत्ती बन गया
भूमिगत धाराएँ और अंधकार
तुम्हारी आँखें
मौत और महामारी से भरपूर

NON EST

सुनसान सड़कें, पितलाए क्षितिज
खाली कुर्सियाँ और उसके पदचिह्न
एक गुप्त बुखार शहर खा रहा है
छितराई रोशनी, फीका रक्त
उसने अपनी जेब में अपनी उँगलियाँ चटखाईं
अपने दिमाग को वाष्पित होते देखा
गच्च मगज, सुलगने को तैयार
एक घायल दिन, वह हौले से फुसफुसाता है
पदचिह्न, फिर पदचिह्न, गली से दूर तक
पदचिह्न दूर पदचिह्नों से...

नरक लंडन जैसा ही नगर है

सूरज - भूसा भरा बाज
समंदर - पानी की दीवार
लकवा ग्रस्त रोशनी दूर काँप रही है
मोटरें जगह पार कर रहीं हैं
परछाईं, गतिहीन गलियाँ, इमारतें
लय की हानि
घोंघे की तरह खुलता एक शब्द
और कसाईघर की स्मृति, उसकी
गहरी दृष्टि में कलिया गईं
जो दूसरे समुद्रों को पीछे छोड़ देतीं हैं
वह पुनः प्रोत्साहन की चाहना करता है
जब कि रोशनी उसे नंगा करती है
जब कि दिन उस पर फंदा कसता है

ग्राउंड, 1

अपनी धुँधली आँखों के ऊपर
बुरे कुत्तों की आकृतियाँ उड़तीं हैं
कल की आग से निकली राखें
खाल के भीतर तक घुपा खालीपन
ज्ञान के फेंटम  
मरे हुए क्रोमोसोम्स
और पत्थरयुगीन बदलाव रहित
जड़ जमाए हैं वहाँ, तुम यहाँ
कल तुम ठीक कर लोगे
तुम्हारी खाल में रोपा गया भविष्य
रेंगता हुआ, तुम्हारा मांस कुतरता है
क्योंकि तुम दरार का खुलाव हो
आने वाला दिन एक नदी था
और अब केवल अंधकार है
केवल अँधेरे और नींद में चलने वाले की सीढ़ियाँ
आरा उन सलवटों पर इस्त्री करता है
इसके बाद कुछ नहीं, और उसके बाद
समय के पिघलने के लिए
और प्राकृतिक दृष्यों के लुप्त होने की शुरुआत के लिए
बड़ी मौत की घनघनाहट तुम्हे बधिर कर देती है
तुम्हारे समय को हड़प लेती है, भविष्य की फंतासी
तुम्हारे चिथड़ा कपड़े उड़ रहे हैं
जलप्रपात तुम्हारे विचार छेद रहे हैं
ऐसी रात में, फूस का खेत
और तुम्हारे सिर के ऊपर आसमान
एक मटमैला ओढ़न
                (अनुवाद - रति सक्सेना)

कहानियाँ
प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा हिंदी के उन कथाकारों में हैं जो बिना किसी शोर के धीरे धीरे पाठकों के भीतर उतरते गए हैं। वर्तमान का शायद ही कोई पहलू हो जो उनकी कहानियों से अछूता रह गया हो। इन कहानियों में बदलते हुए समय का सच छुपा हुआ है। उनकी कहानियों के चरित्र सुर्ख या स्याह न होकर इन दोनों के बीच में कहीं अपने लिए जगह खोजते हैं क्योंकि यह कहानियाँ किसी तरीके के अतिरेक में न फँसकर जीवन में धँसती हैं। यहाँ प्रस्तुत उनकी तेरह कहानियाँ अजगर करे न चाकरी, कहानी के आर-पार, जहाज के पंक्षी, तीसरी चिट्ठी, दाँत, परीक्षा, हिजड़े, पिज्जा और छेदीलाल, बचपन, भूकंप, मातम, यस सर और श्रद्धांजलि उनके कथाकार की एक प्रतिनिधि बानगी पेश करती हैं।

आलोचना
राकेश बिहारी
सपनों के अंत के समारोह का इनकार
(ज्ञानरंजन की कहानियों पर एकाग्र)
सैद्धांतिकी से व्यावहारिकी तक की बीहड़ यात्रा
(संजीव की कहानियों पर एकाग्र)

संस्मरण
गोपालराम गहमरी
भारतेंदु हरिश्चंद्र

निबंध
भारतेंदु हरिश्चंद्र
भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है

सिनेमा
कृपाशंकर चौबे
समानांतर सिनेमा के सारथी : राय से ऋतुपर्ण तक

कविताएँ
आस्तीक वाजपेयी
ब्रजेंद्र त्रिपाठी

हिंद स्वराज
छठवाँ खंड : सभ्यता का दर्शन
मोहनदास करमचंद गांधी


पिछले हफ्ते

समकालीन हिंदी उपन्यास और पारिस्थितिकीय संकट
रोहिणी अग्रवाल

'प्रकृति पर मनुष्य की विजय को लेकर ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं, क्योंकि ऐसी हर जीत हमसे अपना बदला लेती है। पहली बार तो हमें वही परिणाम मिलता है जो हमने चाहा था, लेकिन दूसरी और तीसरी दफा इसके अप्रत्याशित प्रभाव दिखाई पड़ते हैं जो पहली बार के प्रत्याशित प्रभाव का प्रायः निषेध कर देते हैं। इस तरह हर कदम पर हमें यह चेतावनी मिलती है कि हम प्रकृति पर शासन नहीं करते, जैसे कोई विजेता विदेशी लोगों पर शासन करता है। हम प्रकृति पर इस तरह शासन नहीं कर सकते जैसे हम उसके बाहर खड़े हों, क्योंकि मांस, रक्त और मस्तिष्क सहित प्रकृति से जुड़े हुए हैं और उसी के बीच हमारा अस्तित्व है। प्रकृति पर हमारी उस्तादी का मतलब सिर्फ इतना है कि दूसरे प्राणियों के मुकाबले प्रकृति को जानने और उसके नियमों को सही ढंग से लागू करने की सामर्थ्य हममें ज्यादा है। समय बीतने के साथ-साथ हमारा प्रकृति के इन नियमों के बारे में ज्ञान भी बढ़ता जाता है; और उसी के साथ प्रकृति के पारंपरिक स्वरूप में हस्तक्षेप करने के तात्कालिक और दूरगामी परिणामों के बारे में हमारी समझ भी बढ़ती जाती है। यह ज्ञान जितना आगे बढ़ेगा, उतना ही मनुष्य को प्रकृति के साथ अपनी अविभाज्यता का ज्ञान होगा। उसी के साथ मस्तिष्क और पदार्थ, मनुष्य और प्रकृति, चेतना और शरीर से संबंधित अंतर्विरोध की प्रकृतिविरोधी व्यर्थता का अहसास होगा।' (फ्रेडरिक एंगेल्स, डायलेक्टिक्स ऑव नेचर)

कहानियाँ
शिवपूजन सहाय
कहानी का प्लॉट
गाब्रिएल गार्सिया मार्केज
नीले कुत्ते की आँखें
राजकमल चौधरी
जलते हुए मकान में कुछ लोग
मधु कांकरिया
उसे बुद्ध ने काटा
राकेश मिश्र
बाकी धुआँ रहने दिया

उपन्यास
सुधाकर अदीब
अथ मूषक उवाच

स्मरण - मार्केज
प्रियदर्शन
यथार्थ का जादू चला गया

शोध-निबंध
राजीव रंजन गिरि
सामंती जमाने में भक्ति-आंदोलन : अवसान और अर्थवत्ता

कविताएँ
प्रकाश उदय
अभिमन्यु अनत
ताद्यूश रोजेविच
चंद्रधर शर्मा गुलेरी

दोहे
अमीर खुसरो

रैनी चढ़ी रसूल की सो रंग मौला के हाथ।
जिसके कपरे रँग दिए सो धन धन वाके भाग।।

खुसरो बाजी प्रेम की मैं खेलूँ पी के संग।
जीत गयी तो पिया मोरे हारी पी के संग।।

चकवा चकवी दो जने इन मत मारो कोय।
ये मारे करतार के रैन बिछोया होय।।

उजवल बरन अधीन तन एक चित्त दो ध्यान।
देखत में तो साधु है पर निपट पाप की खान।।

श्याम सेत गोरी लिए जनमत भई अनीत।
एक पल में फिर जात है जोगी काके मीत।।

पंखा होकर मैं डुली, साती तेरा चाव।
मुझ जलती का जनम गयो तेरे लेखन भाव।।

नदी किनारे मैं खड़ी सो पानी झिलमिल होय।
पी गोरे मैं साँवरी अब किस विध मिलना होय।।

साजन ये मत जानियो तोहे बिछड़त मोको चैन।
दिया जलत है रात में और जिया जलत बिन रैन।।

रैन बिना जग दुखी और दुखी चंद्र बिन रैन।
तुम बिन साजन मैं दुखी और दुखी दरस बिन नैन।।

अँगना तो परबत भयो, देहरी भई विदेस।
जा बाबुल घर आपने, मैं चली पिया के देस।।

खुसरो पाती प्रेम की बिरला बाँचे कोय।
वेद, कुरान, पोथी पढ़े, प्रेम बिना का होय।।

खुसरो रैन सुहाग की, जागी पी के संग।
तन मेरो मन पीउ को, दोउ भए एक रंग।।

खुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वा की धार।
जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार।।

गोरी सोवे सेज पर, मुख पर डारे केस।
चल खुसरो घर आपने, साँझ भई चहुँ देस।।

खुसरो मौला के रूठते, पीर के सरने जाय।
खुसरो पीर के रूठते, मौला नहिं होत सहाय।।


दोहे
रसखान

प्रेम-अयनि श्रीराधिका, प्रेम-बरन नँदनंद।
प्रेमवाटिका के दोऊ, माली मालिन द्वंद्व।।

प्रेम-प्रेम सब कोउ कहत, प्रेम न जानत कोय।
जो जन जानै प्रेम तो, मरै जगत क्यौं रोय।।

प्रेम अगम अनुपम अमित, सागर सरिस बखान।
जो आवत एहि ढिग, बहुरि, जात नाहिं रसखान।।

प्रेम-बारुनी छानिकै, बरुन भए जलधीस।
प्रेमहिं तें विष-पान करि, पूजे जात गिरीस।।

प्रेम-रूप दर्पन अहो, रचै अजूबो खेल।
यामें अपनो रूप कछु लखि परिहै अनमेल।।

कमलतंतु सो छीन अरु, कठिन खड़ग की धार।
अति सूधो टेढ़ो बहुरि, प्रेमपंथ अनिवार।।

प्रेम प्रेम सब कोउ कहै, कठिन प्रेम की फाँस।
प्रान तरफि निकरै नहीं, केवल चलत उसाँस।।

प्रेम हरी को रूप है, त्यौंच हरि प्रेम स्वधरूप।
एक होई द्वै यों लसैं, ज्यौंच सूरज अरु धूप।।

प्रेमफाँस मैं फँसि मरे, सोई जिए सदाहिं।
प्रेममरम जाने बिना, मरि कोई जीवत नाहिं।।

अकथ कहानी प्रेम की, जानत लैली खूब।
दो तनहूँ जहँ एक ये, मन मिलाइ महबूब।।

आवश्यक सूचना

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