आज की प्रविष्टि : लेख :: कृपाशंकर चौबे :: हिंदी पत्रकारिता को सींचनेवाले बांग्लाभाषी मनीषी
देशांतर इस पखवारे कविता

वनराज
डी.एच. लॉरेंस

सर्दियों और जनवरी की बरसती बर्फ में
बहते पानी के गहरे दर्रे स्याह
घने सनोवर के वृक्ष, नीली गुलमेहँदी
तरल जल की कल-कल, छल-छल
और दूर तक पसरा नागरमोथे का जाल

***

वहाँ हैं इनसान... दो इनसान
इनसान - दुनिया का सबसे भयावह प्राणी!
वे झिझकते हैं बंदूक रखकर भी
पर, हमारे पास तो कुछ भी नहीं!
सबके कदम बढ़ते हैं आगे की ओर
निकलते हैं दो मेक्सिकी अजनबी
घनघोर घनी घाटी से बाहर
अँधेरा... बर्फ और एकाकीपन
गुम होती पगडंडियों पर
क्या कर रहे हैं वे दोनों ?

***

काँधे पर लदी पीली सी गठरी
आखिर क्या है - हिरण!
मूर्खतापूर्ण हँसी से झेंपते हैं वे
जैसे पकड़ी गई हो कोई गलती
और हम भी मुस्कुराते है, उसी तरह
मानो अनजान हों उस दुखांतिका से
क्या सभ्य है वह गहरे चेहरे का इनसान!
और बेबस है हम - वनराज!

***

ओह वनराज...!
पीतवर्णी पर निर्जीव, प्राणहीन
तिरस्कार भरी हँसी से बोला वह
मारा है मैंने इसे आज सुबह
गोल, सुंदर माथा, निष्प्राण कर्ण
काली दमकती धारियाँ
सर्द चेहरा और आँखें बेजान
इनसान - अधिकारी है खुलेपन का
और हम सिमटे घाटी के धुँधलके में

***

यहाँ ऊपर किसी वृक्ष की शाख पर
मिलते हैं कुछ केश गुच्छ
भर आता है मन, आँखें होती हैं नम
गहरा सुराख है नारंगी चट्टान की छाती पर
बिखरी हड्डियाँ, शाखें और फैलती गंध
अब उस राह नहीं जाएँगे कभी वे लोग
क्योंकि यहाँ नहीं गरजेगा वनराज
न होगा कुहासे सा चेहरा और...
न होगी उसकी निहार, चमकीली धारियाँ
नारंगी चट्टानों से बनी घाटी के पेड़ों से
निकालकर अपना चेहरा मुहाने पर
नहीं होगा वह वनराज

***

पर मैं देखता हूँ दूर... दूर... और दूर
रेगिस्तान के क्षितिज का वह धुँधलका
एक स्वप्नमयी मृगमरीचिका
बर्फ जमी पहाड़ी पर, हरे स्थितिप्रज्ञ
क्रिसमस वृक्ष की तरह खड़ा मैं
सोचता हूँ कि इस एकाकी दुनिया में
जगह थी मेरे और वनराज के लिए भी

***

पर... उस पार की दुनिया में
कितनी आसानी से बसने देते हैं हम
इनसानों की अनगिनत बस्तियाँ अनथक
फिर भी कितना अंतर है इन दोनों दुनियाओं में
इनसानों को हम नहीं खोते कभी पर
वनराज को क्यों खो देता है इनसान!


धरोहर
धरीक्षण मिश्र
अलंकार-दर्पण

अलंकार शास्त्र की एक सुदीर्घ परंपरा भारतीय भाषाओं में है। भारतीय काव्यशास्त्र मूल रूप से संस्कृत भाषा में प्रस्तुत हुआ। आगे चलकर आधुनिक भारतीय भाषाओं जैसे हिंदी बंगला, मराठी आदि ने अपने अपने ढंग से शास्त्रचिंतन को आगे विकसित किया। इन भाषाओं की उपभाषाओं और बोलियों में भी मर्मस्पर्शी साहित्य रचा गया। किंतु बोलियों में प्रायः शास्त्रचिंतन का अभाव है। इस दृष्टि से स्व. धरीक्षण मिश्र की कृति ‘अलंकार-दर्पण’ का ऐतिहासिक महत्व है। भोजपुरी में लिखी गई अलंकार शास्त्र पर पहली पुस्तक होने का गौरव ‘अलंकार-दर्पण’ को ही प्राप्त है। लेकिन ‘अलंकार-दर्पण’ का महत्व जितना अलंकार शास्त्र के नाते है, उससे कई गुना अधिक इसके उदाहरणों में समकालीन जीवन के नग्न यथार्थ के चित्रण के लिए है। ...धरीक्षण मिश्र शास्त्र के गंभीर ज्ञाता थे। वे अलंकारों के लक्षण भोजपुरी में बताकर जो उदाहरण रचते हैं, वह हिंदी-प्रदेश के जीवन की एक-एक धड़कन को मूर्त करता है। - रामदेव शुक्ल

पाँच कहानियाँ
संदीप मील
खोट
बाकी मसले
दूजी मीरा
किस्तों की मौत
नया धंधा

संस्मरण
पृथ्वीराज कपूर
कुआँ प्यासे के पास आया

निबंध
गिरीश्वर मिश्र
क्यों पढ़ी जाय संस्कृत ?
मातृभाषा हमारा मानव अधिकार है

आलोचना
वैभव सिंह
यथार्थ में कल्पना, कल्पना में यथार्थ
(संदर्भ : विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास)


विमर्श

देवेंद्र
सरकार और सरोकार नहीं बाजार बदल रहा है स्त्री को

संगीत
अमरेंद्र कुमार शर्मा
भारतीय शास्त्रीय संगीत का स्थापत्य : गंगुबाई हंगल

सिनेमा
विमल चंद्र पांडेय
सबसे अच्छे आदमी की तलाश करती ‘परख’
मुट्ठी में तकदीर और आँखों में उम्मीदों की दिवाली : बूट पालिश

हमारी हिंदी
जगदीप सिंह दाँगी
प्रौद्योगिकी सुलभ है हिंदी!

कविताएँ
शैलजा पाठक
प्रताप सोमवंशी
मोहन सगोरिया

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जो कि सिकुड़ा हुआ बैठा था, वो पत्‍थर
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