आज की प्रविष्टि :: सुनीता जैन की आत्मकथा
देशांतर इस हफ्ते विशेष

कविताएँ
खुआन रामोन खिमेनेज

किसको पता है क्या हो रहा है

किसको पता है क्या हो रहा है हर घंटे के उस ओर
कितनी बार सूरज उगा
वहाँ, पहाड़ के पीछे !
कितनी ही बार दूर उमड़ता चमकता बादल
बन गया सुनहरा गर्जन!
यह गुलाब विष था।
उस तलवार ने जन्म दिया।
मैंने फूलों के मैदान की कल्पना की थी
एक सड़क के खत्म होने पर,
और खुद को दलदल में धँसा पाया।
मैं मानव की महानता के बारे में सोच रहा था,
और मैंने खुद को परमात्मा पाया।

मैं मैं नहीं हूँ


मैं मैं नहीं हूँ
मैं वह हूँ जो
मेरे साथ चल रहा है, जिसे मैं नहीं देख सकता हूँ।
और यदा कदा जिसके यहाँ मैं जाता हूँ,
और जिसे कभी कभी मैं भूल जाता हूँ;
मैं बात करता हूँ, तो चुप रहता है वह, जो एक
मैं नफरत करता हूँ तब क्षमाशील और प्यारा बना जाता है,
मैं घर के अंदर हूँ तो वह बाहर चल देता है,
मैं मर जाऊँगा तो खड़ा रहेगा वह,

कविता


उस व्याकुल बालक सी मैं
हाथ पकड़ कर घसीटते हैं वे जिसे
दुनिया के त्यौहार से।
अफसोस कि मेरी आँखें लगी रहती हैं
चीजों पर...
और कितने दुख की बात है वे उनसे दूर ले जाते हैं।

मोगुए


मोगुए, माँ और भाइयो।
साफ सुथरा और गर्मीला, घर।
आहा क्या धूप है कितना आराम
दूधिया होते कब्रिस्तान में!
पल भर में, प्यार अकेला पड़ जाता है।
समुद्र का अस्तित्व नहीं रहता; अंगूर के
खेत, लालिमायुक्त और समतल,
शून्य पर चमकती तेज रोशनी सी है दुनिया
और सारहीन शून्य पर चमकती हुई रोशनी।
यहाँ बहुत छला गया हूँ मैं!
सबसे बढ़िया बात यहाँ मर जाना है,
बस वही छुटकारा है, जो मैं शिद्दत से चाहता हूँ,
जो सूर्यास्त में मिल जाता है।

जीवन
जिसे मैं सोचता था मुझ पर यश का द्वार बंद होना,
दरअसल इस स्पष्टता की ओर
खुलता हुआ दरवाजा था :
अनाम देश

कोई भी नष्ट नहीं कर सकता, एक के बाद एक
सदा सत्य की ओर,
खुलते जाने वाले दरवाजों वाले इस रास्ते को :
अनुमान से परे जीवन!

मैं वापस नहीं आऊँगा


मैं वापस नहीं आऊँगा। और शांत और खामोश गुनगुनी सी रात दुनिया को लोरी सुनाएगी अपने अकेले चाँद की चाँदनी में।

मेरा शरीर नहीं होगा, और चौपट खुली खिड़की से, एक ताजा झोंका आकर मेरी आत्मा के बारे में पूछेगा।

मैं नहीं जानता किसी को मेरी दोहरी अनुपस्थिति का इंतजार है या नहीं, या दुलारते बिलखते लोगों में से कौन मेरी स्मृति को चूमेगा।

फिर भी, तारे और फूल रहेंगे, आहें और उम्मीदें होंगी, पेड़ों की छाया तले रास्तों में प्रेम पनपता रहेगा।

और वह पियानो इस शांत रात की तरह बजता रहेगा, और मेरी खिड़की के चौखटे में, उसे ध्यान मगन हो सुनने वाला कोई न होगा।

सूर्यास्त

आह, सोने के जाने की अद्भुत ध्वनि,
सोने का अब अनंत काल में जाना;
कितना दुखद है हमारे लिए सुनना
सोने का अनंत काल में जाना,
यह खामोशी बनी रहेगी
उसके सोने के बिना जो अनंत काल के लिए प्रस्थान कर रहा है !
                (अनुवाद - सरिता शर्मा)

बिदेशिया
(नाटक)
 भिखारी ठाकुर

भिखारी ठाकुर बंगाल के पुनर्जागरण आंदोलन से प्रभावित होकर जब अपने गाँव कुतुबपुर (सारण) लौटे, तो उन्होंने अपने समाज और उसकी विविध सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक समस्याओं को बड़ी सूक्ष्मता तथा संवेदनशीलता से देखा। पहले से चल रहे किसी आंदोलन की धारा में सम्मिलित हो विलीन हो जाने के बदले उन्होंने अपनी शैक्षिक क्षमता, जातीय स्थिति और अंतर्निहित वैयक्तिक विशेषताओं पर चिंतन किया तथा सकारात्मक ढंग से पुनर्जागरण को लोकनाटक, लोकभजन, गीत, कविता और 'तमासा' के माध्यम से भोजपुरिया समाज में पहुँचाने का निर्णय लिया। भिखारी ठाकुर ने सन 1919 से 1965 ई. तक अनेक लोकनाटकों के अतिरिक्त लोकभजन, कीर्तन, कविता, गीत आदि विधाओं में सैकड़ों रचनाओं की रचना की और नाट्य-मंडली का विधिवत गठन किया। उस मंडली को अभिनय, गायन, वादन, नृत्य एवं व्यवस्था की दृष्टि से निरंतर प्रशिक्षित किया और गाँव गाँव घूमकर भोजपुरी क्षेत्र में सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक जागरण का संदेश फैलाया। भिखारी ठाकुर के इन लोकनाटकों, गीतों, कविताओं तथा प्रवचनों को व्यापक लोकप्रियता प्राप्त हुई। गरीब, उपेक्षित और अशिक्षित भोजपुरिया जनता ने भिखारी ठाकुर को अपार स्नेह और अटूट समर्थन दिया।
                    - नागेंद्र प्रसाद सिंह (भिखारी ठाकुर रचनावली के संपादक)

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पदयात्री संत और भूदान यज्ञ
विनोबा भावे की जयंती (11 सितंबर) पर विशेष

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प्रभु जोशी
हिंदी के विस्थापन का दौर
हिंदी दिवस (14 सितंबर) पर विशेष

यात्रा-वृत्तांत
एकांत श्रीवास्तव
नो हार्ड शोल्डर फॉर फोर हंड्रेड यार्ड्स : लंदन

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प्रेमचंद सहजवाला
शिकार
दिशा...
दोस्ती
ईथर
सुरंग
दो ईडियट

कविताएँ
मृत्युंजय
राजेंद्र प्रसाद पांडेय

हिंद स्वराज
चौदहवाँ खंड : हिंदुस्तान कैसे आजाद हो ?
मोहनदास करमचंद गांधी


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भारतीय सिनेमा में पहली बार

कविताएँ - देशांतर
मारीना त्स्वेतायेवा

गीत
गिरिधर करुण

गीत नहीं गा पाता हूँ मैं

अब तो अपने गीत नहीं गा पाता हूँ मैं।
जाना चाहूँ जहाँ नहीं जा पाता हूँ मैं।।

         सहज नहीं रह गया
         रोज का मिलना-जुलना,
         बेहद मुश्किल लगता है
         कुछ कहना-सुनना,
अपनी इस परवशता पर पछताता हूँ मैं।

         चुपके-चुपके सबकुछ
         कितना बदल गया है,
         अचरज है दरपन
         शबनम सा पिघल गया है,
अपनी ही परछाई से डर जाता हूँ मैं।

         किसको किससे मतलब
         किसको किसका गम है,
         मेरा मन वृंदावन
         उनका तो संगम है,
मेहँदी रची गदोरी सा सुख पाता हूँ मैं।

         कहने को तो सब अपने हैं
         कौन पराया,
         अपना होने का किसने
         विश्‍वास दिलाया,
अपनी इस तनहाई से घबराता हूँ मैं।

दिन बौना हो गया

दिन बौना हो गया
सुबह-शाम की दूरी
नापता हुआ सूरज
कछुवा था,
मृगछौना हो गया।

लंबी पतली सुई की तरह
तनी हुई चुभती थी जो किरन
अगहन आते ही
उसका गौना हो गया।

पलिहर के बानर को
सूझता नहीं नर्तन
ऊधो के निरगुन की
फॅसरी में है गरदन,
नदी-ताल गीत हुए
छठ के संगीत हुए
ओस चाट कर गेंहुवन
अब तो अतीत हुए,
धूप दूर से कनखी मारती
गतर-गतर सिहरावन दागती,
शीत के प्रकोप से बचाने में
गिरवी घर का गहना हो गया!

संपादकीय सूचना

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(कुलपति)

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फोन - 07743886879
09451460030
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फोन - 08275409685
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संपादकीय सहयोगी
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