आज की प्रविष्टि :: हरिराम द्विवेदी की कविता गंगाशतक
भाषांतर इस पखवारे देशांतर

कविताएँ
अरुण कोलटकर
अनुवाद : निशिकांत ठकार

चीख

बिलकुल अभी-अभी तक जहाँ
हिरोशिमा था
उस दिशा से आनेवाले

व मियुकी पुल से बहनेवाले
परछाइयों के रेले में
देखा है क्या किसी ने

एक स्कूली लड़की को
खून का किमोनो पहनी हुई
दग्धकेशा

गाल पर लटक रही है नीचे
उसकी दाहिनी आँख
खाँचे से बाहर फेंकी गई

उसके मुँह से उग आया है एक पेड़
चीखों का
किसी को भी न सुनाई देनेवाली

उसका स्कूल डूब गया है हमेशा के लिए
आग के दरिया में
उसके घर-बार समेत, गाँव समेत

वह दिखाई दी है क्या किसी को
या किसी के कैमरे को
और क्या हुआ आगे फिर उसका

अंतिम अश्रु

सारी गंदगी निकल जाने दे
अपनी आँखों से

सारी गौलक्षियाँ, नालियाँ गधे
गंधर्वनगरियाँ गीध
देवता, दानव, हिंदू औ’ मुसलमान
सुंता हुए और बेसुंते लौंडे व
जन्नते दोजखे मसीहा चूहे
वारांगनाएँ तारांगन सारे
सवा लाख भुनगे
डेढ़ लाख भड़घए औ’ नौ लाख भड़भूँजे
खानाजंगी बंधुकलह महाभारत क्रूसेड जिहाद सगरे
कसमसाते शहर
हनुमानचालीसा एकी संतेचालीसा
यहाँ के बारह लौंडोवाले सर्वपल्ली बम व ब्रह्मास्त्र
खोपड़ियों के टीले रचनेवाले चैंगीज़खान तैमूरलंग नादिरशाह
अपनी तिरसठ बीवियों की बिजन करनेवाले अफ़जलखान
यहाँ के यातनाशिविर मासग्रेव लाश ढेर गैस चेंबर
यहाँ के वंशच्छेद सर्पसत्र फायनल सोल्यूशन एश्निक क्लेंजिंग
रायट, कत्ल
इक्कीस बार पृथ्वी को निःक्षत्रिय बना याकि
निर्ज्यू निष्कनानी निर्हुर्त्तु निर्तुत्सी निर्बुद्ध निर्मूर्तिपूजक
निरिंका निरैजटैक निर्रेइंडियन निर्हिन्दु निर्मुसलमान बना
विशुद्ध द्वेष के कुंड में हाथ धोकर मुक्त होनेवाले परशुराम
यहाँ के धर्म यहाँ की जातियाँ व उपजातियाँ
युगोंयुगों तक रिसते रहनेवाले मानसिक जख्म और अस्मिताएँ
गैंग्रीनग्रस्त
यहाँ के पंडे मुल्ला पुजारी पाद्री शंकराचार्य रब्बी लामा पोप खलीफा
यक्ष किन्नर गंधर्व राक्षस देव दैत्य असुर ब्रह्मराक्षस बरुवे बैताल
पलंबर व इलैक्ट्रीशियन
ग्यारह रुद्र चौदह मनु अट्ठाईस व्यास
अट्ठासी हजार ऊर्ध्वरेता
छत्तीस हजार तीन सौ तैंतीस देवता चंद्रपान करनेवाले
यहाँ की गुंडाशाहियाँ भीड़शाहियाँ दमनशाहियाँ मारपीटशाहियाँ
यहाँ के सीजर यहाँ के चक्रवर्ती यहाँ के फ्यूरर यहाँ के
अश्वत्थामा व ऐखमन
डगमगानेवाले इंद्र यहाँ के
हजार हाथों से रिश्वत लेनेवाले सहस्रार्जुन
ग्यारह सिरोंवाले वितंडावादी अवलोकितेश्वर
और दाहिनी सूँड़वाले कवि

यह सारी गंदगी बह जाएगी
तेरी आँखों से
तब विशुद्ध अश्रु
मात्र एक ही
बचा रह जाएगा अंत में
उसे बस सँभालकर रखना आँख में

वही काम आएगा
फिर नए सिरे से सृष्टि का
निर्माण करने

अरी
विश्वात्मके

संपादकीय
अरुणेश नीरन
पक्षी आत्मा

धरोहर
प्रेमशंकर मिश्र
कविताएँ

ये कविताएँ हैं? कितनी दूर तक कविताएँ हैं? इसे आप सुधी पाठक जानें। क्योंकि आज कविता का कोई मानक, कोई अनुशासन या कोई शास्त्र नहीं रह गया है मेरे देखने में। कविता आज सिद्धि न रहकर अपनी-अपनी अन्यान्य सिद्धियों विशेष की साधिका मात्र है। एक खेमे की कविता दूसरे खेमे के लिए कूड़ा घोषित हो रही है। संतुष्ट इसलिए हूँ कि मैंने कभी भी प्रचलित अर्थों में कवि होने का भ्रम नहीं पाला है। मेरे तई ये पंक्तियाँ समय समय पर मेरी निजी जरूरतों की उपज रही हैं। थोड़ा और साफ करूँ तो मैं हमेशा से स्थितियों को सहता और समझौता करता रहा हूँ। फिर भी कुछ असहनीय स्थितियों से उबरने के लिए प्रतिक्रियास्वरूप ऐसी पंक्तियाँ बरबस निकलती हैं। ...कितनी दूर तक इस संक्रांतिकाल में ये शब्द ये पंक्तियाँ आप के भी काम आ सकेंगी मैं नहीं कह पा रहा हूँ।

संस्मरण
वागीश शुक्ल
चाचा जी

स्मृति
शिव कुमार मिश्र
कवि, पत्रकार और राजनेता : पंडित बाल कृष्‍ण शर्मा 'नवीन'

शिवकुमार मिश्र का पूरा जीवन जनसंघर्षों में बीता। वे अलग अलग आंदोलनों में शरीक रहे। कई बार गिरफ्तार हुए। आपातकाल के समय उन्हें लंबे समय तक कुख्यात 'मीसा' कानून के तहत जेल में रखा गया। वे बेहद ईमानदार समाजकर्मी रहे। किसानों मजदूरों के बीच काम किया। रचनात्मक मोर्चे पर भी वह लगातार सक्रिय रहे। दिनांक 22 जनवरी को उनका न रहना हमारे बीच से एक ऐसे राजनीति विज्ञानी, संस्कृति कर्मी, और जनपक्षधर चिंतक का जाना है जिसकी क्षतिपूर्ति संभव नहीं। कवि-कथाकार 'उदय प्रकाश' के शब्दों में 'वे एक चलते-फिरते विश्वकोश थे। भारत के राजनीतिक इतिहास की तमाम घटनाएँ पूरे विस्तार के साथ उनकी उँगलियों पर थीं।' इस मौके पर हम उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए उनका एक आलेख यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं।

जनपदीय हिंदी - अवधी
तीन कहानियाँ
विद्या विंदु सिंह
भैरो क माई
लड्डू गोपाल
जहाँ जोगिया नचावे दुइ हरिना

रचना प्रक्रिया
विद्या विंदु सिंह
कहानी रचै क कहानी

जनपदीय हिंदी - भोजपुरी
संस्मरण
गोपेश्वर सिंह
भोजपुरी के पहिलका सोप आपेरा - लोहा सिंह

निबंध
गिरीश्वर मिश्र
सांस्कृतिक बदलाव का समय

दो कहानियाँ
शशिभूषण द्विवेदी
खिड़की
विप्लव

आलोचना
पंकज पराशर
केसव कहि न जाइ का कहिए!
(संदर्भ : रामचरितमानस में संत-असंत और काव्य-विचार)

व्यंग्य
संजय जोशी "सजग"
आत्म चिंतन पर चिंतन
सावधान! मैं किताब लिख रहा हूँ

बाल साहित्य - कहानी
ज़ाकिर अली रजनीश
मनसुखा की सीख

कुछ और कविताएँ
राहुल देव
अंजना वर्मा
वंदना गुप्ता

बातचीत
डॉ. अमित कुमार विश्वास
‘शब्द और कर्म’ तथा ‘साहित्य और इतिहास दृष्टि’ लेकर हिंदी आलोचना के क्षेत्र में आया : मैनेजर पांडेय

नन्हीं मासूम कली
विलियम वर्ड्सवर्थ
अनुवाद -
किशोर दिवसे

सूरज की किरणों और भीगी फुहारों में
खिलती रही एक कली बीते तीन बरसों में
आतुर प्रकृति ने कहा - प्रेम के आवेग में
नहीं खिला कोई फूल मेरी सूनी गोद में
निसर्ग के नियम और सदा संवेगों के संग
उस मासूम में खिलेंगे प्रेम के अगणित रंग
चंचल चितवन चहकेगी मेरे संग-संग
पर्वतों, पहाड़ियों और पसरे मैदानों पर
निकुंज और वनों की सर्पिल पगडंडियों पर
धरती और स्वर्ग पर... धरती और स्वर्ग पर
महसूस करेगी वह एक आत्मस्फूर्ति
और अंतर्चेतना - प्रज्ज्वलन पर शमन
कुलाँचें भरेगी वह मृग शावक बनकर
आनंदित होती है जो हरीतिमा देखकर
या, पगडंडियों से रिसते झरनों से
और बन जाएगी वृक्ष सुगंधित सा
मन होगा उसका शांत और गंभीर
मौन, स्पंदित सजीवों की तरह
कपसीले गुच्छों जैसे सारे मेघ समूह
लेकर आएँगे उसके लिए धुनकनी

आँधी, बवंडर और तूफान में भी
देखना वह नहीं होगी विफल
वह लावण्य जो उसे बनाकर देगा
यौवना... प्रकृति की ईश्वरीय अनुकंपा से
मध्य रात्रि के सितारे होंगे उसके प्रिय
कान लगाकर सुनेगी वह अनेकों बार
जहाँ नदियाँ करती होंगी उन्मुक्त नर्तन
प्रतिबिंब होंगे... अनचीन्हे, अबूझ
संगीत के सुर जो सजेंगे लहरों से!
तब एकाकार होंगी उसके कांतिवान चेहरे पर
उमंग और उल्लास की जीवंत संवेदनाएँ।

संपादकीय सूचना

संरक्षक
प्रो. गिरीश्‍वर मिश्र
(कुलपति)

संपादक
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