आइए पढ़ते हैं : बेढब बनारसी की अद्वितीय व्यंग्य कृति :: लफ़्टंट पिगसन की डायरी
लोक इस पखवारे संपादकीय परिवार

लोक कथाएँ
गीता गैरोला

कोई भूत मेरा पैर तुम्हारी पीठ की तरफ ले जा रहा है

ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों में घने जंगलों के बीच एक पहाड़ी गाँव था। ठेठ गाँव के बीच में घर होना ही था, वैसे ही जैसे पहाड़ियों के घर होते हैं। जिस जमाने की ये बात है उस जमाने में पहाड़ी गाँवों के बाशिंदे नहाने के लिए नदी, खाले, धारे, पन्यारे में जाते थे। ये सभी जगहें खुली होतीं इसलिए औरतें इन जगहों में कैसे नहातीं। और हाँ इन सभी जगहों में तो दिन में ही जाया जा सकता था। दिन में सभी औरतें घर में पाले मवेशियों का, खेत का, जंगल का, परिवार के बूढ़ों का, बच्चों का काम करती थीं। वैसे भी पहाड़ी औरतें किस के लिए नहातीं। सुआ (प्रेमी, पिया) तो परदेशी। बड़ी बूड़ियाँ समझातीं जादा नहाना, रोज बाल बनाना पातरों का काम होता है भले घरों की बेटी-ब्वारियों का नहीं। हाँ तो भले घरों की ये बेटी-ब्वारियाँ रात को ओबरे (गोठ) में नहातीं। ऐसी ही एक घनघोर अँधेरी रात में सास नहा रही थी। बहू सास की पीठ से मैल रगड़ रही थी। घोर अँधेरे में सास की पीठ थी बहू के हाथ थे और दो आवाजें थी। तभी ब्वारी की डगमगाती आवाज सास को सुनाई दी। जी (सास को पहाड़ में केवल जी भी बोला जाता है) मैं तुम्हारी पीठ को हाथों से रगड़ रही हूँ पर मेरा पैर आगे जा रहा है। ऐसा लगता है कि कोई भूत खबेश जबरदस्ती मेरा पैर तुम्हारी पीठ की तरफ ले जा रहा है। अँधेरे में ही बहू को सास की हिलकती पीठ के साथ गहरी रुदन वाली सिसकी सुनाई दी। हे ब्वारी धो ले बाबा, पैर से ही धो ले। ये मेरा किया है जो तेरे पैर उठा रहा है कोई भूत खबेस नहीं है। पहाड़ी गाँव की उस घनघोर अँधियारी रात में तमाम पेड़ पौधे कंकड़ पत्थर दो औरतों के आँसुओं से टपकने लगे।

गले में घंटी

सुदूर पहाड़ी गाँव में पठाली से छाए लाल मिट्टी और गोबर से लिपे एक घर के कोने में लगाई जांद्री (चक्की) में झुरझुराती पूस की बर्फीली झुसमुसी भोर में उस घर की बूढ़ी दादी घुर्र-घुर्र गेहूँ पीस रही थी। उम्र की मारी जब पीसते-पीसते ऊँघने लगती तो घुर्र-घुर्र थमने लगती। घर की मुखिया अपने बिस्तर से सटा कर रखे टिमरू के लंबे सोंटे से पिस्वार की पीठ को कोंच देती। सोंटे की कोंच से बिलबिलाती पिस्वार हाथों को तेजी से घुमाने लगती घुर्र...घुरर्र। मुखिया ने तरतीब निकली, अगर पिस्वार के गले में बैलों वाली घंटी बाँध दूँ तो जितनी देर ये पीसती रहेगी गले में बँधी घंटी टन्न-टन्न बजती रहेगी और दूसरे दिन से झुसमुसी भोर जांद्री की घुर्र-घुर्र के साथ घंटी की टन्न-टन्न से गूँजने लगी। एक दिन घंटी गायब। पूरे घर का ओना कोना छान मारा। घंटी के तो जैसे पैर लग गए। घर में मची सरबरी में घर का चार-पाँच बरस का बच्चा भी शामिल हो गया पर बच्चे को ये समझ नहीं आया कि पूरा घर ढूँढ़ क्या रहा है। जब उसे पता चला कि घंटी की खोज हो रही है। वो बोला अरे घंटी तो मैंने छिपाई है। लो भई घंटी हाजिर। अरे माँ ये घंटी मैंने तेरे लिए छुपाई है। बूढ़ी हो के जब तू पीसेगी तो मैं यही घंटी तेरे गले में बाँधूँगा।

अंडे से अंडमान
(यात्रा संस्मरण)
श्रीप्रकाश शुक्ल

कैसे छूटा होगा हमारे पुरखों का घर, जब उनके साथ परिवार भी नहीं था या कि कैसे विदा किया होगा परिवार ने यह जानते हुए कि घर अब इनकी नसीब में नहीं है। काला पानी इस घर से हजारों मील दूर है और जो वहाँ जाता है लौटकर नहीं आता। वहाँ पिउ को संदेश भेजने वाले भौंरे व काग भी नहीं जा सकते और वहाँ से कोई लौटकर आ भी नहीं सकता क्योंकि खारे पानी में रहने वाली साम्राज्यवादी सुरसा उन्हें लौटने नहीं देगी। कहीं पढ़ी हुई यह घटना भी याद आ रही थी कि वीर सावरकर को कई महीने रहने के बाद ही पता चला था कि उनके बड़े भाई भी काला पानी में ही हैं। तो क्या काला पानी विभाजित करता है। नहीं आज का तो जोड़ता है। अपने पुरखों की स्मृति से। हम इसी जोड़ की तलाश में जा रहे थे यद्यपि पुराने दिनों को सोचकर बहुत कुछ हमारे भीतर टूट भी रहा था। बस कुछ टूटे न टूटे एक कायर तो टूटे। ‘काला पानी’ हमारे भीतर के इसी कायर को टूटने की अनोखी दास्तान है जो अपने भीतर एक जगता इतिहास छुपाए है जिसे हमारी व्यवस्था के काइयाँपन ने ओझल कर रखा है। संभव है भारत सरकार ने इसी के निमित्त काला पानी में पर्यटन को बढ़ावा दिया हो लेकिन पर्यटन भी कहाँ उस जज्बे को समझ सकता है जो यहाँ के 572 टापुओं में कैद है।

कहानियाँ
जयश्री रॉय
संधि
कायांतर
ड्राइविंग लाइसेन्स
थोड़ी सी जमीं, थोड़ा आसमाँ...
फुरा के आँसू और पिघला हुआ इंद्रधनुष
मोहे रँग दो लाल...
अहल्या
दौड़
काँच के फूल

जनपदीय हिंदी - संस्मरण
विद्यानिवास मिश्र
इमली के बीया

निबंध
कुबेरनाथ राय
भाषा बहता नीर

विमर्श
सुप्रिया पाठक
मिथकों में स्त्री अस्मिता और भीष्म साहनी

सिनेमा
विमल चंद्र पांडेय
बारिश की बूँदों सी कोमल ‘बरान’
‘द कलर ऑफ पैराडाईज’ और ‘फादर’ : पिता-पुत्र संबंधों की दो इबारतें
 
कविताएँ
अविनाश मिश्र

संरक्षक
प्रो. गिरीश्‍वर मिश्र
(कुलपति)

 संपादक
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फोन - 07152 - 252148
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ISSN 2394-6687

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