आज की प्रविष्टि :: भीमराव आंबेडकर :: विमर्श :: हिंदुत्व का दर्शन
कवि-परंपरा इस हफ्ते विशेष

कविताएँ
त्रिलोचन

तुलसी बाबा

तुलसी बाबा, भाषा मैंने तुमसे सीखी
मेरी सजग चेतना में तुम रमे हुए हो।
कह सकते थे तुम सब कड़वी, मीठी तीखी।
प्रखर काल की धारा पर तुम जमे हुए हो।
और वृक्ष गिर गए मगर तुम थमे हुए हो।
कभी राम से अपना कुछ भी नहीं दुराया,
देखा, तुम उन के चरणों पर नमे हुए हो।
विश्व बदर था हाथ तुम्हारे उक्त फुराया,
तेज तुम्हारा था कि अमंगल वृक्ष झुराया,
मंगल का तरु उगा; देख कर उसकी छाया,
विघ्न विपद के घन सरके, मुँह नहीं चुराया।
आठों पहर राम के रहे, राम-गुन गाया।

यज्ञ रहा, तप रहा तुम्हारा जीवन भू पर।
भक्त हुए, उठ गए राम से भी, यों ऊपर।

काशी का जुलहा

ब्राह्मण को तुकारने वाला वह काशी का
जुलहा जो अपने घर नित्य सूत तनता था
लोगों की नंगई ढाँकता था। आशी का
उन्मूलन करता था जिसका विष बनता था
जाति वर्ण अंहकार। कब्रें खनता था
मुल्लों मौलवियों की झूठी शान के लिए
रूढ़ि और भेड़ियाधसान को वह हनता था
शब्द बाण से। जीता था बस ज्ञान के लिए
गिरे हुओं को खड़ा कर गया मान के लिए।
राम नाम का सुआ शून्य के महल में रहा,
पंथ-पंथ को देखा सम्यक ध्यान के लिए
गुरु की महिमा गाई, वचन विचार कर कहा।

साईं की दी चादर ज्यों की त्यों धर दीनी
इड़ा-पिंगला-सुखमन के तारों की बीनी।

ग़ालिब

ग़ालिब गैर नहीं हैं, अपनों से अपने हैं।
ग़ालिब की बोली ही आज हमारी बोली
है। नवीन आँखों में जो नवीन सपने हैं
वे ग़ालिब के सपने हैं। ग़ालिब ने खोली
गाँठ जटिल जीवन की। बात और वह बोली
आप तुली थी; हलकेपन का नाम नहीं था।
सुख की आँखों ने दुख देखा और ठिठोली
की, यों जी बहलाया। बेशक दाम नहीं था
उनकी अंटी में। दुनिया से काम नहीं था
लेकिन उसको साँस-साँस पर तोल रहे थे।
अपना कहने को क्या था? धन धाम नहीं था।
सत्य बोलता था जब-जब मुँह खोल रहे थे।

ग़ालिब होकर रहे, जीत कर दुनिया छोड़ी
कवि थे, अक्षर में अक्षर की महिमा जोड़ी।

नागार्जुन

नागार्जुन - काया दुबली, आकार मझोला,
आँखें धँसी हुई घन भौंहें, चौड़ा माथा,
तीखी दृष्टि, बड़ा सिर। इस में ऐसा क्या था
जिस से यह जन असामान्य है। पूरा चोला
कुछ विचित्र है, पतले हाथ पैर। वह बोला
जब कविता के बोल तब लगा सत्य सुना था,
इस जन का यश, जिस ने जीवन-तत्व चुना था;
खुला बात में बात बात में जीवन खोला।
अपने दुख को देखा सब के ऊपर छाया,
आह पी गया, हँसी व्यंग्य की ऊपर आई,
काँटों में कलिका गुलाब की भू पर आई
भली भाँति देखा, किस ने क्या खोया क्या पाया।

हानि लाभ दोनों का उसने गायन गाया
कभी व्यंग्य उपहास कभी आँखें भर आईं।

सॉनेट का पथ

इधर त्रिलोचन सॉनेट के ही पथ पर दौड़ा
सॉनेट सॉनेट सॉनेट सॉनेट क्या कर डाला
यह उस ने भी अजब तमाशा। मन की माला
गले डाल ली। इस सॉनेट का रस्ता चौड़ा
अधिक नहीं है। कसे कसाए भाव अनूठे
ऐसे आएँ जैसे किला आगरा में जो
नग है, दिखलाता है पूरे ताजमहल को।
गेय रहे, एकान्विति हो। उस ने तो झूठे
ठाट-बाट बाँधे हैं। चीज किराए की है।
स्पेंसर, सिडनी, शेक्सपियर, मिल्टन की वाणी
वर्ड्सवर्थ, कीट्स की अनवरत प्रिय कल्याणी
स्वर-धारा है, उस ने नई चीज क्या दी है!

सॉनेट से मजाक भी उसने खूब किया है,
जहाँ तहाँ कुछ रंग व्यंग्य का छिड़क दिया है।

सत्य के प्रयोग अथवा
आत्मकथा

(पहला भाग)
मोहनदास करमचंद गांधी

इन प्रयोगों के बारे में मैं किसी भी प्रकार की संपूर्णता का दावा नहीं करता। जिस तरह वैज्ञानिक अपने प्रयोग अतिशय नियम-पूर्वक, विचार-पूर्वक और बारीकी से करता है फिर भी उनसे उत्पन्न परिणामों को अंतिम नही कहता, अथवा वे परिणाम सच्चे ही हैं इस बारे में भी वह सशंक नहीं तो तटस्थ अवश्य रहता है, अपने प्रयोगों के विषय में मेरा भी वैसा ही दावा है। मैंने खूब आत्म-निरीक्षण किया है, एक-एक भाव की जाँच की है, उसका पृथक्करण किया है। किंतु उसमें से निकले हुए परिणाम सबके लिए अंतिम ही हैं, वे सच हैं अथवा वे ही सच हैं ऐसा दावा मैं कभी करना नहीं चाहता। हाँ, यह दावा मैं अवश्य करता हूँ कि मेरी दृष्टि से ये सच हैं और इस समय तो अंतिम जैसे ही मालूम पड़ते हैं। अगर न मालूम हों तो मुझे उनके सहारे कोई भी कार्य खड़ा नहीं करना चाहिए। लेकिन मैं तो पग पग पर जिन जिन वस्तुओं को देखता हूँ, उनके त्याज्य और ग्राह्य ऐसे दो भाग कर लेता हूँ और जिन्हें ग्राह्य समझता हूँ उनके अनुसार अपना आचरण बना लेता हूँ। और जब तक इस तरह बना हुआ आचरण मुझे अर्थात मेरी बुद्धि को और आत्मा को संतोष देता है, तब तक मुझे उसके शुभ परिणामों के बारे में अविचलित विश्वास रखना ही चाहिए।

कहानियाँ
अभिमन्यु अनत
जहर और दवा
इतिहास का वर्तमान
अब कल आएगा यमराज

आलोचना
संतोष भदौरिया
नहीं होती, कहीं भी खत्म कविता नहीं होती
राहुल सिंह
आस्वाद के अलग धरातल से प्रतिरोध की महीन आवाजें

निबंध
देवेंद्रनाथ शर्मा
कृपया गंदा मत कीजिए

विमर्श
सुषम बेदी
अमरीका में हिंदी : एक सिंहावलोकन

कविता
सुमित्रानंदन पंत
बापू के प्रति


पिछले हफ्ते

निबंध
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पुनर्पाठ
सुंदरम शांडिल्य
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जान्हवी, जैनेंद्र और प्रेम

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जेल-डायरी

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यश मालवीय
टीवी की शौकीन हमारी नानी जी

कविताएँ
संजय चतुर्वेदी

जिसके हम मामा हैं
शरद जोशी

एक सज्जन बनारस पहुँचे। स्टेशन पर उतरे ही थे कि एक लड़का दौड़ता आया।

'मामाजी! मामाजी!' - लड़के ने लपक कर चरण छूए।

वे पहचाने नहीं। बोले - 'तुम कौन?'

'मैं मुन्ना। आप पहचाने नहीं मुझे?'

'मुन्ना?' वे सोचने लगे।

'हाँ, मुन्ना। भूल गए आप मामाजी! खैर, कोई बात नहीं, इतने साल भी तो हो गए।'

'तुम यहाँ कैसे?'

'मैं आजकल यहीं हूँ।'

'अ'अच्छा।'

'हाँ।'

मामाजी अपने भानजे के साथ बनारस घूमने लगे। चलो, कोई साथ तो मिला। कभी इस मंदिर, कभी उस मंदिर।

फिर पहुँचे गंगाघाट। सोचा, नहा लें।

'मुन्ना, नहा लें?'

'जरूर नहाइए मामाजी! बनारस आए हैं और नहाएँगे नहीं, यह कैसे हो सकता है?'

मामाजी ने गंगा में डुबकी लगाई। हर-हर गंगे।

बाहर निकले तो सामान गायब, कपड़े गायब! लड़का... मुन्ना भी गायब!

'मुन्ना... ए मुन्ना!'

मगर मुन्ना वहाँ हो तो मिले। वे तौलिया लपेट कर खड़े हैं।

'क्यों भाई साहब, आपने मुन्ना को देखा है?'

'कौन मुन्ना?'

'वही जिसके हम मामा हैं।'

'मैं समझा नहीं।'

'अ'अरे, हम जिसके मामा हैं वो मुन्ना।'

वे तौलिया लपेटे यहाँ से वहाँ दौड़ते रहे। मुन्ना नहीं मिला।


भारतीय नागरिक और भारतीय वोटर के नाते हमारी यही स्थिति है मित्रो! चुनाव के मौसम में कोई आता है और हमारे चरणों में गिर जाता है। मुझे नहीं पहचाना मैं चुनाव का उम्मीदवार। होनेवाला एम.पी.। मुझे नहीं पहचाना? आप प्रजातंत्र की गंगा में डुबकी लगाते हैं। बाहर निकलने पर आप देखते हैं कि वह शख्स जो कल आपके चरण छूता था, आपका वोट लेकर गायब हो गया। वोटों की पूरी पेटी लेकर भाग गया।

समस्याओं के घाट पर हम तौलिया लपेटे खड़े हैं। सबसे पूछ रहे हैं - क्यों साहब, वह कहीं आपको नजर आया? अरे वही, जिसके हम वोटर हैं। वही, जिसके हम मामा हैं।

पाँच साल इसी तरह तौलिया लपेटे, घाट पर खड़े बीत जाते हैं।

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