आइए पढ़ते हैं : ममता कालिया का उपन्यास :: दुक्खम्‌-सुक्खम्‌
भाषांतर इस पखवारे   देशांतर

कविताएँ
सरोज बल
अनुवाद -
 शंकरलाल पुरोहित

देश

बच्चों को गीत गाने कह
बड़े ऊँघ रहे कुरसी पर

देश बूढ़ा हो रहा
हवाएँ न थकने तक
कुछ बदलने वाला नहीं सभ्यता का

टिफिन बक्से में बासी होने लगे
रोटी और तली सब्जी
फेंके हुए पानी में पाउच
सड़क के किनारे अंकुरने लगे

एक परछाईं बैठी है मेड़ पर, देखो
शायद दब गई है वह
उस लंबे सिग्नल टावर तले

हिंसा और मधुमेह के संग तालमेल रख
बढ़ते जा रहे मंदिर और मिठाई की दुकानें
सड़क के किनारे

मशीन कर रही हैं देखभाल हमारी
मशीन तैयार कर रही बाल-बच्चे,
बर्गर और पीजा
मवाद भरे ब्रण को दबाने की तरह
अब आम बात हो गई
मारकाट, खींचतान प्रेम कारोबार

देश कराहता है
मैं बैठा उसके पास
कब क्या हो जाय
मुझे सिर्फ एंबुलेंस के नंबर दो
रख लूँ अभी से सीने की जेब में


सेलोटैप

ये जिस सेलोटैप से
मैं जोड़ आया फटा ड्राइंग खाता
ठीक उसी टैप से
जुड़ सकेगा टूटा हुआ विश्वास
सारे रास्ते उड़ते फिर रहे
फटे कागज-सा इधर-उधर प्रेम
हाट-बजार में दरका अहंकार
यहाँ तक कि मंदिर आरती में
दरकी भक्ति घंटे से पीट कर
फिसल रही नीचे
संपर्क जोड़ने के लिए
इतना नेटवर्क रहते-रहते
गली-गली में क्यों इतने रक्त के छींटे
प्रेम के निषिद्धांचल से चाबी खुलने के बाद
मस्तिष्क में जो अजीब घमासान
अतः दुकान-दुकान पर खोजता फिरता
मैं रविवार भर,
एक सेलोटैप, मन जोड़ने के लिए
टूटे मनों को एक साथ जोड़ रखना
कोई खराब काम नहीं
कम से कम उन्हें फ्रेम में ढाँप
टाँगा जा सके इतिहास की भीत पर
पर बात यह है
आज सब दुकानों पर ताला है।


तनिक छुअन का इंतजार

न छूने तक
ढेला बन पड़ा रहे।
काँच-सा स्वच्
मछली-सा चिकन
दुख-सा ठोस
सुख-सा फिसलन भरा
पिघल जाए
तनिक छूते ही, हलकी आँच में
ह्विस्की ग्लास में लाल
लस्सी ग्लास में सफेद
नींबू पानी में स्वच्छ हो तैरती रहे बर्फ।
अपना कोई रंग नहीं होता
अपना कोई स्वाद नहीं होता।
चीनी डाले मीठा
नमक डाले तीता
विश्वास डाले स्वादिष्ट
संदेह डाले होता खट्टा।
ऐसी यह बर्फ कि
देखते लेने को मन करता
पर लेते न लेते पिघल बह जाती।
थामने पर मुँह में डालने मन करता
पर डालते न डालते जीभ जल जाती।
ऐसी यह बरफ कि
हमारी तनिक ऊष्मता के बदले
उसका सारा ठंडापन जलांजलि देता
प्रेम की तरह।

कविताएँ
जितेंद्र श्रीवास्तव

अपने आपको को ‘जीवन के सपनों का कवि’ कहने वाले जितेंद्र श्रीवास्तव समकालीन हिंदी कविता का एक जरूरी चेहरा हैं। उनकी काव्यात्मक संवेदना बेहद जटिल लगनेवाले विषयों पर इतनी आसानी से कविता संभव कर लेती है कि अचरज में रह जाना पड़ता है। उनके कवि की चिंताओं के केंद्र में समूची पृथ्वी आ जाती है, अपनी पूरी प्रकृति, सपनों और रहवासियों समेत। ये सब अलग अलग हैं ही नहीं अपितु एक बृहत्तर के सजीव हिस्से हैं उनके यहाँ। तभी तो उनकी कविता में जब एक किसान हँसता है तो उस हँसी के असर से फूलों में नूर आ जाता है, घास थोड़ी और मुलायम हो जाती है। यहाँ प्रकृति पृथ्वी के उन हसीन सपनों का ख्याल रखती है जो गहरे अँधेरों में देखे जाते हैं। स्मृतियाँ उनकी कविता का एक और जरूरी रसायन हैं।

निबंध
गिरीश्वर मिश्र
भारतीय जनतंत्र और सामाजिक सरोकार
परिचय दास
होली : सभ्यता की रस लिपि

आलोचना
राकेश बिहारी
बाजार जो सपने बेचता है
देह और प्रेम के कुहासे के बीच
बर्बरता के भीतर, बर्बरता के विरुद्ध
आग का दरिया और डूब के जाने की कोशिश
भूमंडलोत्तर कथा पीढ़ी : विकास और प्रस्थान
(सभी आलेख हिंदी कहानी की ताजा पीढ़ी पर केंद्रित)

विशेष
वैभव सिंह
जादुई यथार्थवाद और मार्खेज
मदनपाल सिंह
पात्रिक मोदियानो और स्मृतियों की भूलभुलैया

यात्रा संस्मरण
दिविक रमेश
खोलो राज वरना पिटो बंधु : छुनछन की रुनझुन

पाँच कहानियाँ
डॉ. आशारानी लाल
आँसू
स्तब्ध
जनपदीय हिंदी - भोजपुरी
चनरमी
मितवा
बुढ़ापा में माई

प्रवासी हिंदी
उल्फत मुखीबोवा
उज्बेकिस्तान में भक्ति साहित्य का अध्ययन

सिनेमा
राहुल सिंह
समंदर और बारिश में भीगी कविता : धोबी घाट

व्यंग्य
अर्चना चतुर्वेदी
गरीबी पर एक गंभीर चर्चा
वसूली करना अपुन से सीखो

बाल साहित्य - कहानियाँ
मनोहर चमोली ‘मनु’
हवाई सैर
गुरु दक्षिणा
बादल क्यों बरसता है

कुछ और कविताएँ
शेषनाथ पांडेय
अच्युतानंद मिश्र
पुरुषोत्तम व्यास

बातचीत
डा. अमित कुमार विश्वास
पश्चिमी खेमे में जाने से मिटती जा रही है भारत की हस्‍ती : प्रो. तुलसीराम

जाओ मेरे प्यारे गुलाब !
एडमंड वॉलर
अनुवाद -
किशोर दिवसे

जाओ मेरे प्यार गुलाब
उससे कह देना तुम जाकर कि
गुम हो रहे हैं पल-पल, छिन-छिन
क्या ...अब वह नहीं जानती कि
जब भी मैं कहता हूँ उसे - प्यारे गुलाब!
महकने लगती है जैसे - खुद ही हो गुलाब !
****
जाओ मेरे प्यारे गुलाब !
उससे कह देना तुम जाकर कि
सुमन, सुधा, सुकेशा, सुनयना है वह
सहेजा है यौवन जिसने, स्याह नजरों से बचाके
रति रंग सजे अंग-अंग, इस देह के वीराने
जो तन था एक शून्य बिना प्रेम भ्रमर के
रीता था यह रति धनु, बिना काम बाण के
****
चाहे तो तुम फिर मुरझा जाना गुलाब !
तुम्हारी आँखों में ही पढ़ लेगी ख्वाब
कि कितने कम थे प्रगाढ़ता के वे पल
कली के खिलने और मुरझाने के बीच कितने अदभुत ! महकते रहे साँसों के बीच
सावन में सारिका के सुरों से गए सींच

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