आज की प्रविष्टि :: शिव कुमार मिश्र का लेख :: अँग्रेजी राज हिला चुटकी भर नमक से
भाषांतर इस पखवारे देशांतर

कविताएँ
राजा पुनियानी

कुर्सी

बैठने वाले का
इंतजार कर रही थी
बैठी कुर्सी

एक दिन अचानक
वह तो चल पड़ी

क्या करेगा
उस पर बैठने वाला अब ?

दरवाजा

यूँ तो देखने के लिए
पत्रिकाएँ हैं
वाचाल अखबार है
दिमाग सड़ाने वाला टेलीविजन है

देखने के लिए कम-से-कम
दीवार पर टँगा टकटकी लगाए कैलेंडर है
देखने के लिए
बूढ़ी माँ का खगोल ललाट है
छोटी बेटी की छोटी सी अनंत सूरत है
एक खिड़की आकाश
एक किरणपुंज धूप
और एक आईना चाँद है

वैसे खाली दीवार, गहरे कुएँ और टमाटर के अकेले खेत को
ताक सकती थी वह
चिंताओं से खचाखच भरे मन से बाहर
अकेली कहानीनुमा खिड़की को
खिड़की से बाहर उस बेखबर पेड़ को
पेड़ से आगे शहर को जोड़ती कच्ची सड़क को भी
ताक सकती थी वह

लेकिन जाने क्यों
वह तो ताकती रहती है
दरवाजे को ही

उसी कच्ची सड़क से गुजरते परदेशी ने
कभी उससे कहा होगा
उसी दरवाजे से लौट आएगा वह

मन


गाँठ पड़ने का डर है
फिर भी वह किसी को बताती नहीं
एकदम से बता नहीं पाती
मन की बात
जीवन की एक सच्चाई है
अच्छी तरह से पता है उसे -
कि बात कहने पर भी टीसती है मन में
नहीं कहने पर भी
वह सोचती है
छोड़ो - पड़नी है तो पड़े गाँठ
गाँठों में गाँठ बन कर रह जाए जीवन
उस के बंद मन के बक्से में
क्या हो सकता है
पता है किसी को?

2.

एक रात
तालाब में उतरा बादल
वह रात
निर्वाण की एक सुंदर रात थी
तालाब में उतरे बादल में
छिपा था
सफेद गुलाब सा एक चाँद
तालाब के एक टुकड़े में चाँद का चेहरा है
जिसे देख किनारे के पेड़ पर बैठी कोयल
कविता की तरह कुछ बोलती रहती
पता है मुझे - नहीं दे पाऊँगा
पर मन ही मन
तालाब का एक टुकड़ा चाँद तो
मैं तुम्हें कब का सौगात दे चुका हूँ

संपादकीय
अरुणेश नीरन
जनपदीय भाषाएँ, हिंदी से अंतर्संबंध और अंतर्विरोध
तथा आंचलिकता की आधुनिकता

धरोहर
मोहनदास करमचंद गांधी
मेरे सपनों का भारत

मेरी कल्पना का स्वराज्य तभी आएगा जब हमारे मन में यह बात अच्छी तरह जम जाय कि हमें अपना स्वराज्य सत्य और अहिंसा के शुद्ध साधनों द्वारा ही हासिल करना है, उन्हीं के द्वारा हमें उसका संचालन करना है और उन्हीं के द्वारा हमें उसे कायम रखना है। सच्ची लोकसत्ता या जनता का स्वराज्य कभी भी असत्यमय और हिंसक साधनों द्वारा नहीं आ सकता। कारण स्पष्ट और सीधा है : यदि हिंसक और असत्यमय उपायों का प्रयोग किया गया, तो उसका स्वाभाविक परिणाम यह होगा कि सारा विरोध या तो विरोधियों को दबाकर या उनका नाश करके खत्म कर दिया जाएगा। ऐसी स्थिति में वैयक्तिक स्वतंत्रता की रक्षा नहीं हो सकती। वैयक्तिक स्वतंत्रता को प्रकट होने का पूरा अवकाश केवल विशुद्ध अहिंसा पर आधारित शासन में ही मिल सकता है।

कविताएँ
जनपदीय हिंदी - भोजपुरी
धरीक्षण मिश्र

कवि चर्चा
डॉ. वेद प्रकाश पांडेय
धरीक्षण मिश्र : जीवन एवं सृजन

नोबेल पुरस्कार विशेष
डॉ. चंद्रकुमार जैन
मानवता के 'कैलाश' और बाल अधिकारों के 'सत्यार्थी' का संघर्ष

कहानियाँ
अरुणेश नीरन
तोता सुकुल
प्रेमशीला शुक्ल
नागफनी में फूल
अशोक मिश्र
दीनानाथ की चक्की
शशिभूषण द्विवेदी
ब्रह्महत्या

बाल साहित्य - कहानी
दिविक रमेश
किस्सा चाचा तरकीबूराम का

संस्मरण
चंद्रभूषण
बेचैन दौर का रोजनामचा

यात्रा-वृत्तांत
ब्रजेंद्र त्रिपाठी
नौकुचिया में भागवत कथा : भीमताल में प्रवचन

व्यंग्य
शशिकांत सिंह ‘शशि’
इन्फेक्शन

संवाद
डॉ. अमित कुमार विश्वास
समाज में शोषक नहीं बदला बल्कि बदले केवल रूप :
अभिमन्यु अनत

उकाब
एल्फ्रेड टेनिसन

खुरदरी चट्टान को अपने क्रूर पंजों में थाम
वीरान भूमि पर, तप्त सूरज के आयाम
नीलाभ विश्व के वर्तुल, फिर भी नहीं आराम
झुर्रियाँ भरा समुद्र रेंगता हैं नीचे
तीक्ष्ण दृष्टि है उसकी, शिकार के पीछे
तब झपटता है वह बिजली बनकर नीचे।
                   (अनुवाद : किशोर दिवसे)

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