आइए पढ़ते हैं : भीष्म साहनी की कहानी : वाङ्चू
इस हफ्ते शब्द चर्चा अन्यत्र

कहियत भिन्न न भिन्न
कुमार रवींद्र की काव्य-नाटिका


अब तो है सत्य यही एकाकी जीवन -
सत्ता से बँधा हुआ
महलों में बंदी मन -
प्रियाहीन साँसों की यह बोझिल यात्रा ही

अब मेरी नियति हुई।
सीते! मैं क्या करूँ?
तुम बिन ये संध्याएँ बार-बार होती हैं-
निष्ठुर है सूर्योदय
आकुल सूर्यास्त भी
और घनी रातों के अंधकार

लघुकथाएँ
हरिशंकर परसाई
चंदे का डर
अपना-पराया
दानी
रसोई घर और पाखाना
सुधार
समझौता

व्यंग्य
कामता प्रसाद सिंह‍ 'काम'
मेरी जेब

विमर्श
ओम थानवी
चिंदी-चिंदी हिंदी

गजलें
हंसराज रहबर
तबीयत में न जाने ख़ाम ऐसी कौन सी शै है
रमेश तैलंग
किसी को ज़िंदगी में जानना आसाँ नहीं होता
जहाँ उम्मीद थी ज़्यादा वहीं से खाली हाथ आए
मेरे जज़्बात में जब भी कभी थोड़ा उबाल आया

अलिफ लैला
किस्सा मछुवारे का
किस्सा गरीक बादशाह और हकीम दूबाँ का
किस्सा भद्र पुरुष और उसके तोते का
किस्सा वजीर का
किस्सा काले द्वीपों के बादशाह का

हाल की प्रविष्टियाँ

यशपाल का संस्मरण
सेवाग्राम के दर्शन

चतुरसेन शास्त्री की कहानी
दुखवा मैं कासे कहूँ मोरी सजनी

पराग मांदले की कहानियाँ
अपेक्षा
मंशाराम
मृगनयनी
शून्यात पूर्णमुदच्यते!
उदास रोशनी में डूबता सूरज

नर्मदा प्रसाद उपाध्याय का ललित निबंध
गुलमोहर गर्मियों में

कविताएँ
ऋतुराज : किशोरी अमोनकर
मनोज कुमार पांडेय : कवि लिखना चाहता है महाकाव्य

अलिफ लैला
किस्सा गधे, बैल और उनके मालिक का
किस्सा व्यापारी और दैत्य का
किस्सा बूढ़े और उसकी हिरनी का
किस्सा दूसरे बूढ़े का जिसके पास दो काले कुत्ते थे
किस्सा तीसरे बूढ़े का जिसके साथ एक खच्चर था

पेटी से खोखे तक
अजित वडनेरकर

धन-दौलत के कई ठिकाने हैं। सबसे बड़ा ठिकाना तो खजाना कहलाता है। तिजौरी (तिजोरी), पेटी या आलमारी छोटे-छोटे खजाने हैं। तिजौरी में गहने-बर्तन-रुपए सब आ जाते हैं। हिंदी में तिजौरी शब्द खूब प्रचलित है। यह आम तौर पर सेठ लोगों के यहाँ रहती है जिनका बड़ा कारोबार होता है। नगदी लेन-देन, गिरवी और सूद पर उधार देने वालों के यहाँ इसके दर्शन हो यूँ छोटी-मोटी तिजौरियाँ दुकानदार भी रखते हैं। तिजौरी शब्द मूल रूप से सेमेटिक भाषा परिवार का है और अरबी, हिब्रू, सीरियाई आदि कई भाषाओं में इसके कई रूप प्रचलित हैं। फारसी, उर्दू, हिंदी का तिजौरी शब्द बना है अरबी के तजारा से जिसका अर्थ होता है व्यापार। इसका हिब्रू रूप है तगार। तजारा का ही क्रिया रूप बना तेजारत (अरबी-फारसी में यही रूप प्रचलित है) जो हिंदी-उर्दू में तिजारत के रूप में प्रचलित है और जिसमें व्यापार अथवा कारोबार करने का भाव है। तुर्की जबान में इसका रूप हुआ तिकरेट

व्यापार से संबंधित के अर्थ में हिंदी में तिजारत से तिजारती जैसा शब्द बना लिया गया है। आश्चर्य है कि जिस हिंदी ने अरबी के तजारा से तिजौरी और तिजारती जैसे शब्द बेधड़क बना लिए, उसने व्यापारी के लिए इसी कड़ी का ताजिर शब्द नहीं अपनाया। हिंदी में व्यापारी के लिए अरबी-फारसी मूल का सौदागर शब्द प्रचलित है। कारोबार से भी कारोबारी जैसा शब्द बना लिया गया जिसका अर्थ भी व्यापारी ही है। गुजरात में तिजौरी उपनाम भी होता है।

तिजौरी दरअसल सामान्य से कुछ अधिक मजबूत पेटी ही होती है। सामान्य दुकानदार तिजौरी के नाम पर पेटी ही रखते हैं। जिस तरह ताजिर यानी व्यापारी का तिजौरी से रिश्ता है वैसे ही पेटी का भी आम भारतीय सेठ से रिश्ता है। सेठ की कल्पना उसके फूले पेट के बिना संभव नहीं है और पेट से ही पेटी का रिश्ता है। पेटी शब्द संस्कृत मूल का है - यह बना है पेटम् या पेटकम् से जिसका अर्थ होता है थैली, संदूक, बक्सा आदि। पेटम् शब्द बना है पिट् धातु से जिसमें भी थैली का ही भाव है। पेट उदर के अर्थ में सर्वाधिक जाना-पहचाना शब्द है। पेट अगर बाहर निकला हो तो तोंद कहलाता है। गले से नीचे की ओर जाती हुई शरीर के मध्य भाग की वह थैली, जिसमें भोजन जमा होता है, पेट कहलाता है। किसी वस्तु के भीतरी-खोखले हिस्से को पेटा कहते हैं।

नदी की तली या जहाज की तली भी पेटा ही कहलाती है। पिटक, पेटिका आदि भी इसी कड़ी के अन्य शब्द हैं। समूचे भारतीय उपमहाद्वीप में हारमोनियम बाजे के लिए पेटी शब्द आम तौर पर इस्तेमाल होता है। इस विदेशी वाद्य की बक्सानुमा आकृति के चलते इसे यह नाम मिला।


मुंबइया बोलचाल में पेटी अपने आप में मुद्रा का पर्याय बन गई है। मुंबई के अंडरवर्ल्ड में पेटी शब्द का अर्थ दस लाख से पच्चीस लाख रुपए तक होता है। इसका मतलब हुआ इतनी रकम से भरी पेटी। भाई लोग एक पेटी, दो पेटी बोलते हैं और समझनेवाले समझ जाते हैं। इसी तरह एक और शब्द है खोखा। पेटी से अगर बात नहीं बनती है तो खोखा माँगा जाता है। खोखा यानी एक करोड़ रुपए। आम तौर पर सड़क किनारे बक्सानुमा निवास और दुकानें, जो लकड़ी अथवा टीन की बनी होती हैं, खोखा कहलाती हैं। सामान भरने के छोटे डिब्बों को भी खोखा कहते हैं। खोल या खोली शब्द भी इसी कड़ी का हिस्सा हैं। महाराष्ट्र में खोल कहते हैं गहराई को। गहरा करने की क्रिया भी खोल ही कहलाती है। खोली से अभिप्राय छोटे कमरे से है। इन तमाम शब्दों का रिश्ता खुड् धातु से है जिसमें गहरा करने या खोदने का भाव है। कुछ विद्वान शुष्क शब्द से खोखला शब्द की व्यत्पत्ति बताते हैं जैसे सूखने के बाद वृक्ष में कोटर हो जाती है। मगर कोटर से ही खोखल का जन्म हुआ होगा, मुझे ऐसा लगता है।  

उपकार
ऑस्कर वाइल्ड

रात का समय था और वह अकेला था। उसने दूर एक भव्य नगरी का प्राचीर देखा और उसकी ओर बढ़ा। जब वह पास पहुँचा तो उसने नगरी के अन्तराल से हास-परिहास के शब्द सुने।

उसने मुख्य द्वार खटखटाया। द्वारपालों ने उसके लिए द्वार खोल दिए।

उसने देखा, भवन मणि का बना है और उसके सामने मणि के अति सुन्दर स्तम्भ खड़े हैं। स्तम्भों पर फूलों के बन्दनवार लटक रहे थे। भवन के भीतर-बाहर चन्दन की मशालें जल रही थीं। उसने भवन के अन्दर प्रवेश किया।

रत्नजटित आसन पर उसने एक व्यक्ति को लेटे पाया, जिसके बालों में गुलाब के लाल फूल लगे थे। उसने उसके पास जाकर उसके कन्धे पर हाथ रखा और कहा, तुम्हारा यह जीने का ढंग कैसा है?

वह युवक उसकी ओर मुड़ा। उसने उसे पहचान लिया, बोला, लेकिन मैं तो पहले कोढ़ी था और तुमने मुझे स्वास्थ्य प्रदान किया। फिर किस तरह जीवन व्यतीत करूँ मैं?

वह तुरन्त उस भवन से बाहर आया। राजमार्ग पर आकर उसने एक स्त्री को देखा जिसका मुखड़ा और परिधान रंगीन थे। उसके नूपुरों में मोती जड़े थे। उसका पीछा एक युवक शिकारी की तरह कर रहा था। स्त्री परम सुन्दरी थी ओर युवक की आँखों में वासना की चमक थी।

उसने तेजी से उसका पीछा किया और नवयुवक का हाथ पकड़कर पूछा, तुम इस स्त्री की ओर क्यों देख रहे थे और इसे तरह क्यों घूर...

वह नवयुवक मुड़ा और उसने पहचान कर कहा - मैं तो अन्धा था। तुमने मुझे दृष्टि प्रदान की। फिर मैं और किसे निहारूँ?

उसने बढ़कर स्त्री का रंगीन आवरण छुआ और कहा, क्या पाप के अलावा कोई और मार्ग नहीं है?

औरत ने पलटकर उसे देखा। पहचान कर हँसी और बोली, लेकिन तुमने तो मेरे पाप क्षमा कर दिए थे और फिर यह मार्ग सुखमय भी है।

वह नगर छोड़कर तत्काल बाहर चला आया।

जब वह नगर के बाहर हो गया तो उसने राजमार्ग के किनारे एक युवक को रोते देखा।

वह उसकी ओर बढ़ा और युवक से बोला, तुम रोते क्यों हो?

युवक ने सिर उठाया और उसे पहचान कर कहा, मैं मर चुका था और तुमने मुझे फिर से जीवन दिया। मैं रोऊँ नहीं तो भला और क्या करूँ?

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