आइए पढ़ते हैं : भवानीप्रसाद मिश्र की कविताएँ
विशेष इस पखवारे संपादकीय परिवार

लघुकथाएँ
शरद जोशी

लक्ष्य की रक्षा

एक था कछुआ, एक था खरगोश जैसा कि सब जानते हैं। खरगोश ने कछुए को संसद, राजनीतिक मंच और प्रेस के बयानों में चुनौती दी - अगर आगे बढ़ने का इतना ही दम है, तो हमसे पहले मंजिल पर पहुँचकर दिखाओ। रेस आरंभ हुई। खरगोश दौड़ा, कछुआ चला धीरे-धीरे अपनी चाल।

जैसा कि सब जानते हैं आगे जाकर खरगोश एक वृक्ष के नीचे आराम करने लगा। उसने संवाददाताओं को बताया कि वह राष्ट्र की समस्याओं पर गंभीर चिंतन कर रहा है, क्योंकि उसे जल्दी ही लक्ष्य तक पहुँचना है। यह कहकर वह सो गया। कछुआ लक्ष्य तक धीरे-धीरे पहुँचने लगा।

जब खरगोश सो कर उठा, उसने देखा कि कछुआ आगे बढ़ गया है, उसके हारने और बदनामी के स्पष्ट आसार हैं। खरगोश ने तुरंत आपातकाल घोषित कर दिया। उसने अपने बयान में कहा कि प्रतिगामी पिछड़ी और कंजरवेटिव (रूढ़िवादी) ताकतें आगे बढ़ रही हैं, जिनसे देश को बचाना बहुत जरूरी है। और लक्ष्य छूने के पूर्व कछुआ गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया।

 


बुद्धिजीवियों का दायित्व

लोमड़ी पेड़ के नीचे पहुँची। उसने देखा ऊपर की डाल पर एक कौवा बैठा है, जिसने मुँह में रोटी दाब रखी है। लोमड़ी ने सोचा कि अगर कौवा गलती से मुँह खोल दे तो रोटी नीचे गिर जाएगी। नीचे गिर जाए तो मैं खा लूँ।

लोमड़ी ने कौवे से कहा, 'भैया कौवे! तुम तो मुक्त प्राणी हो, तुम्हारी बुद्धि, वाणी और तर्क का लोहा सभी मानते हैं। मार्क्सवाद पर तुम्हारी पकड़ भी गहरी है। वर्तमान परिस्थितियों में एक बुद्धिजीवी के दायित्व पर तुम्हारे विचार जानकर मुझे बहुत प्रसन्नता होगी। यों भी तुम ऊँचाई पर बैठे हो, भाषण देकर हमें मार्गदर्शन देना तुम्हें शोभा देगा। बोलो... मुँह खोलो कौवे!'

इमर्जेंसी का काल था। कौवे बहुत होशियार हो गए थे। चोंच से रोटी निकाल अपने हाथ में ले धीरे से कौवे ने कहा - 'लोमड़ी बाई, शासन ने हम बुद्धिजीवियों को यह रोटी इसी शर्त पर दी है कि इसे मुँह में ले हम अपनी चोंच को बंद रखें। मैं जरा प्रतिबद्ध हो गया हूँ आजकल, क्षमा करें। यों मैं स्वतंत्र हूँ, यह सही है और आश्चर्य नहीं समय आने पर मैं बोलूँ भी।'

इतना कहकर कौवे ने फिर रोटी चोंच में दबा ली।

ग्यारह कहानियाँ
शानी

शानी हिंदी के विशिष्ट कथाकार हैं। सिर्फ इसलिए नहीं कि उन्होंने हिंदी को ‘काला जल’ जैसा उपन्यास दिया। बल्कि इसलिए भी कि उन्होंने एक नाव के यात्री, चहल्लुम, जगह दो, रहमत के फरिश्ते आएँगे, जली हुई रस्सी, जहाँपनाह जंगल, जनाजा, डाली नहीं फूलती, दोज़खी, बिरादरी, बोलने वाले जानवर और युद्ध जैसी अनेकों कहानियाँ भी लिखीं जो शानी ही लिख सकते थे शायद। यह कहानियाँ भारतीय लोकतंत्र पर एक गहरे सवाल की तरह हैं जिनके जवाब आज तक नहीं तलाशे गए हैं। बिरादरी और युद्ध जैसी कहानियाँ भारतीय समाज की वास्तविक स्थितियों की एक भयावह तस्वीर हमारे सामने रखती हैं जहाँ अल्पसंख्यक पहचान के लोग दिन प्रतिदिन संदिग्ध होते गए हैं। और इसी के बरक्स भारतीय राज्य के प्रति अपनी निष्ठा साबित करते रहने के लिए विवश भी।

विशेष
रमण सिन्हा
अनुवादक रामविलास शर्मा

विमर्श
राहुल सिंह
मध्य वर्ग की अवधारणा और हिंदी साहित्य

सिनेमा
सचिन तिवारी
साहित्य और सिनेमा : अंतर्संबंध

रंगमंच
देवेंद्र राज अंकुर
आषाढ़ का एक दिन : एक रंगमंचीय अध्ययन

बाल साहित्य - कविताएँ
अपर्णा शर्मा
जादूगर
विनती
सूर्य नारायण
कान ज्ञान

कविताएँ
सर्वेंद्र विक्रम
स्वप्निल श्रीवास्तव

देशांतर - कहानियाँ
गाब्रिएल गार्सिया मार्केज
ऐसे ही किसी दिन
बड़ी अम्मा का फ्यूनरल
गाँव में कुछ बहुत बुरा होने वाला है
दुनिया के सबसे खूबसूरत आदमी का डूबना
विशाल पंखों वाला बहुत बूढ़ा आदमी
नीले कुत्ते की आँखें

संरक्षक
प्रो. गिरीश्‍वर मिश्र
(कुलपति)

 संपादक
अरुणेश नीरन
फोन - 07743886879,09451460030
ई-मेल : neeranarunesh48@gmail.com

समन्वयक
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ISSN 2394-6687

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