आज की प्रविष्टि :: देवेंद्र कुमार 'बंगाली' की कविताएँ
देशांतर इस हफ्ते विशेष

कविताएँ
त्रिन सूमेत्स

एक

मैं बिलकुल तुम्हारी तरह
चुन सकती हूँ
कि मुझे पीड़ित होना हैं
नहीं
गर तुमने चुन ही लिया है तो
तुम्हारे पास
पूछने को कुछ सवाल जरूर होंगे
और तुमसे पूछने के लिए
औरों के पास होंगे
तुमसे कहीं अधिक

दो

वे सारे शहर, जहाँ तुमने प्यार किया
किसी न किसी अर्थ में एक से हैं
चाहे वो दुनिया के किसी भी कोने पर रहे हों

सबके एक से ही चौराहे हैं
वे एक सी नदी को प्रतिबिंबित करते हैं
और बिलकुल एक जैसे बादल उड़ते हैं
कुछ अर्थों में बिलकुल एक से हैं
कि वे सारे तुम्हारे अपने शहर हैं

तीन

आजकल क्या लिख रहे हो ?
एक जॉर्डन कवि ने पूछा था
'प्रेम के विषय में' मैंने जवाब दिया
आखिरकार प्रेम के अलावा दुनिया में
कुछ और है भी तो नहीं
'वे' मुझसे सहमत थे
सच कुछ भी नहीं है प्रेम के अलावा
फिर उन्होंने अपनी कविता पढ़ी, अरबी में
उनके गालों पर आँसू बह रहे थे
संवेदनशील, मैंने सोचा
फिर वही कविता मुझे अंग्रेजी में सुनाई
जो उनके उस परिवार के बारे में थी
जिसे खत्म कर दिया गया, उनकी ही आँखों के सामने
उनकी माँ, पिता भाई और पत्नी
और सच
उस कविता में भी कुछ नहीं था
प्रेम के सिवा

चार

तुम श्वसन और निश्वसन करते हो
पूरे नौ जीवनों में
अपनी पूरे नौ मौतों में
एक बुद्धिमान कभी जल्दी नहीं करता
वह रुकता है
जब उसे आवश्यक हो किसी मदद की
तब भी जब किसी को आवश्कता हो उसकी मदद की
और जब यह काफी होता है

पाँच

तुम्हे 'माँ 'से लिया गया
और फिर 'माँ' में बदल दिया गया
हर चीज पेट से शुरू होती रही
कुछ अंदर की तरफ रास्ता बनाते रहे
कुछ बाहर की तरफ निकलते रहे
अपनी पसंदीदा जगह की ओर
ताकि रुक सकें कुछ क्षण
तय करते रहे कई 'पेट' से सफर
कि कहीं तो होगी वह बेशकीमती जगह
कम अज कम मैं ऐसा सोचती हूँ
यदि ऐसा नही है,
वे इस तरह से धकियाते क्यों चलते रहे

छह

यह दिन वीर्य, मथि क्रीम और कुछ बूँद रक्त का है
मेरे लिए एक साधारण दिन ही था
तुमने इसे दूर तक पहुँचा दिया
मै तुम्हे दबोच कर
बाहर निकालना चाहती थी
पर देर हो गई
तुम्हारे हाथों ने मेरे हाथों में बदलना शुरू कर दिया
तुम्हारे पैर मेरे पैर हुए जाते हैं
मेरा यकृत तुम्हारा यकृत
एक सुबह, मुझे अजीब सी मितली [गंध] आई थी
तुम लटके हुए थे खुद से मेरे ही अंदर कहीं
मैंने अपना हाथ काट कर तुम्हारे हाथों को मुक्त किया
मैंने अपने ही पैर गँवाए
जब तुम्हारे पैर अपने से अलग किए
तुम्हारे बचे हिस्से भी मैंने ऐसे ही अलग किए
मैंने तुम्हारे अवशेषों का ढेर बनाया
और तुमसे इतना प्यार नहीं किया कि एक सुथरी मौत दे सकूँ

कविताएँ
ज्ञानेंद्रपति

ज्ञानेंद्रपति हिंदी के एक विरल कवि हैं। सिर्फ इस अर्थ में नहीं कि वह लगातार बहुत अच्छी कविताएँ लिख रहे हैं बल्कि इस अर्थ में भी कि वह एक कवि का ही जीवन भी जी रहे हैं। इस अर्थ में भी कि आज जब दुनिया ग्लोबल होने की तरफ भाग रही है तब उन्होंने खाँटी स्थानीय होना चुना है। बनारस उनकी काव्यात्मक दुनिया का केंद्र-बिंदु है और यह अचरज पैदा करने वाली बात है कि भारतीय जन-जीवन के जितने दुर्लभ और सुगढ़ बिंब उनकी कविताओं में मिलते हैं शायद ही किसी अन्य की कविताओं में मिलते हों। इन अर्थों में वह सच्चे जन-कवि कहे जा सकते हैं। वह इस अर्थ में भी बड़े कवि हैं कि जहाँ एक जैसी काव्य-भाषा और काव्य-रूढ़ियों के चलते कवियों के कवि व्यक्तित्व को अलग से पहचानना मुश्किल होता जा रहा है वहीं ज्ञानेंद्रपति की कविताएँ एकदम अलग से पहचानी जा सकती हैं।

कहानियाँ
गाब्रिएल गार्सिया मार्केज
विशाल पंखों वाला बहुत बूढ़ा आदमी
दुनिया के सबसे खूबसूरत आदमी का डूबना

निबंध
डॉ. श्रीराम परिहार
श्रीलंका में रामकथा और शिव आराधना के पुण्य प्रसंग

यात्रा वृत्तांत
इष्ट देव सांकृत्यायन
अतीत का आध्यात्मिक सफर : दतिया-ओरछा

शोध
सुस्मित सौरभ
काव्य में मिथकीय प्रयोग की ऐतिहासिकता

सिनेमा
सलिल सुधाकर
कहाँ-कहाँ से गुजर गया सिनेमा
विनोद विप्लव
हिंदी सिनेमा : कल, आज और कल

हिंद स्वराज
ग्यारहवाँ खंड : हिंदुस्तान की दशा – 4
मोहनदास करमचंद गांधी


पिछले हफ्ते

कहानियाँ
पांडेय बेचन शर्मा उग्र

अगर ‘उग्र’ की रचनाएँ पूर्वाग्रहीत पाठकीयता का त्याग कर पढ़ी जाएँ तो यह कहने में जरा भी हिचक नहीं हो सकती कि वे अपने समय के बृहत्तर राष्ट्रीय आंदोलनों के सृजन-संविधि थे। उनके समय की शायद ही कोई समस्या रही हो जो उनकी कलम की जद से बची हो। ‘उग्र’ को हनना और हुमकना दोनों ही आता था। वे अपने को ‘तुलसीदास का वंशज’ मानते थे। तुलसीदास ने भी ‘हुमकि लात कूबर पर मारा’ था, इसलिए उग्र ने अपने समाज के हर ‘कूबड़’ पर जमकर लात जमाई थी। पूरा द्विवेदी-युग उन्हें ‘हरबोंग’ लेखक मानता था। वे थे भी अजब तंजनिगार। उनकी लेखनी की नियति में दीनता-प्रदर्शन करना लिखा ही नहीं था। उनका कहना था कि क्षमा-याचना वे करें जो ‘परदा के पापा’ थे। पापा ही नहीं पापी भी थे। ‘परदा’ में चाकलेट पापियों से क्षुब्ध होकर ही उन्होंने ‘चाकलेट’ कहानी लिखी। ‘चाकलेट’ के दिनों में ही, वे ‘वीरकन्या’ और ‘प्यारे’ भी लिख रहे थे। ...ये सभी रचनाएँ ‘उग्र’ की मनःसंरचना, उनकी लेखकीय प्रकृति और उनकी भाषिक लोकवाद की आख्यायिका हैं।                          - भवदेव पांडेय

आलोचना
पंकज पराशर
करुणा की चित्रलिपि में जीवन का गद्य
(महादेवी वर्मा के गद्य साहित्य पर एकाग्र)

संस्मरण
उमेश चौहान
नवाबों के शहर में केदारनाथ सिंह और मैं

व्यंग्य
सुशील यादव
नाच न जाने...
शशिकांत सिंह ‘शशि’
लूट इंडिया लूट

कविताएँ
अडोनिस
माधव कौशिक
अमरसिंह रमण
वृंदावनलाल वर्मा

संस्कृति और सौंदर्य
नामवर सिंह

सौंदर्यशास्‍त्र से संपर्क होते ही सौंदर्यबोध संस्‍कृति की पहली शर्त बन गया। सौंदर्य का प्रमुख आधार कलाएँ हैं, इसलिए कलात्‍मक सृजन से जुड़े हुए समस्‍त क्रिया-व्‍यापार को आदर्शीकृत करके संस्‍कृति का अनिवार्य अंग बना दिया गया और यह आवश्‍यक समझा गया कि जो इन कलाओं के सौंदर्य के आस्‍वाद में सक्षम है वही संस्‍कृति का वास्‍तविक अधिकारी है और उसी को 'संस्‍कृत' या कि 'सुसंस्‍कृत' माना जा सकता है। सौंदर्यानुभूति की उपलब्धि संस्‍कृति के लिए आवश्‍यक अर्हता घोषित की गई। एक ओर सौंदर्यानुभूति का स्‍वरूप-निरूपण सौंदर्यशास्‍त्र का केंद्रीय प्रश्‍न बना तो दूसरी ओर सौंदर्यानुभूति की सारी विशेषताएँ संस्कृति के आदर्श तत्‍वों के रूप में समाहित कर ली गईं। 'सामंजस्‍य' और 'संतुलन' जैसी अवधारणाएँ इसी स्‍थानातंरण के उदाहरण हैं। अंतर इतना ही आया कि जो 'सामंजस्‍य' और 'संतुलन' सौंदर्यशास्‍त्र में शुद्ध मानसिक क्षेत्र तक सीमित थे, संस्‍क‍ृति ने उन्‍हें अपनाकर सामाजिक बना लिया और इस प्रकार उनसे व्‍यक्ति के मन को संतुलित और समरस करने के साथ-साथ समाज में संघर्षशील विभिन्‍न वर्गों के बीच भी संतुलन और सामंजस्‍य स्‍थापित करने का काम लिया जाने लगा। संस्‍कृति ने संतुलन और सामंजस्‍य को गरिमा भी प्रदान की। यह स्‍थापना की गई कि जो व्‍यक्ति स्‍वयं संतुलित और समरस हैं वह श्रेष्‍ठ है। इसके विप‍रीत असंतुलित असमंजस मनवाले व्‍यक्ति स्‍तर से नीचे ही नहीं, असामान्‍य हैं और भले लोगों के बीच उठने-बैठने लायक नहीं है। इसी प्रकार समाज को संतुलित और समरस रखना उच्‍चकोटि का सामाजिक कर्म है और जो समाज के इस संतुलन को बिगाड़ता या तोड़ता है वह असामाजिक कार्य करता है - यहाँ तक कि इस कार्य में लगे हुए लोगों को असामाजिक और समाजविरोधी भी कहा जा सकता है। इस प्रसंग में जान-बूझकर असुविधाजनक प्रश्‍नों को न तो उठाया जाता है और न उठाने ही दिया जाता है। जैसे, समाज में संतुलन से किसके हित विशेष रूप से सुरक्षित रहेंगे और कौन से लोग घाटे में रहेंगे? इस संतुलन को बदलनेवाले क्‍या चाहते हैं, किन सुविधाओं की माँग करते हैं, समाज में उनकी स्थिति क्‍या है, आर्थिक सांस्‍कृतिक दृष्टि से ये कितने संपन्‍न या विपन्‍न हैं? इत्यादि।

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