आइए पढ़ते हैं : गोपाल सिंह नेपाली के गीत
गांधी साहित्य (06 जुलाई 2018), मुखपृष्ठ संपादकीय परिवार

दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास
मोहनदास करमचंद गांधी

प्रथम खंड : 4. मुसीबतों का सिंहावलोकन- 1

नेटाल

नेटाल के गोरे मालिकों को सिर्फ गुलामों की जरूरत थी। ऐसे मजदूर उन्हें पुसा नहीं सकते थे, जो गिरमिट की अवधि पूरी करने के बाद स्वतंत्र हो सकें और कुछ अंश में भी उनके साथ स्पर्धा कर सकें। ये गिरमिटिया मजदूर नेटाल इसलिए गए थे कि हिंदुस्तान में खेती के धंधे में या दूसरे किसी धंधे में वे सफल नहीं हो पाए थे। फिर भी वे ऐसे नहीं थे कि खेती की उन्हें कोई कल्पना ही न हो अथवा जमीन या खेती की कीमत न समझ सकें। उन्होंने देखा कि नेटाल में यदि वे सिर्फ साग-भाजी भी पैदा करें, तो काफी अच्छी कमाई कर सकते हैं; और यदि जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा भी ले लें, तब तो उससे और ज्यादा कमाई कर सकते हैं। इसलिए बहुत से गिरमिटिया इकरार से मुक्त होने के बाद नेटाल में कोई न कोई छोटा-मोटा धंधा करने लगे। इससे सब मिलाकर तो नेटाल जैसे देश के निवासियों को लाभ ही हुआ। अनेक तरह की साग-भाजी पैदा होने लगी, जो योग्य किसानों के अभाव में पहले पैदा नहीं होती थी। जो साग-भाजी कहीं-कहीं थोड़ी मात्रा में पैदा होती थी वह अब बड़ी मात्रा में पैदा होने लगी। इससे साग-भाजी के भाव एकदम उतर गए। लेकिन यह बात धनी गोरों को अच्छी नहीं लगी। उन्हें लगा कि आज तक जिसे वे अपना एकाधिकार मानते थे, उसमें अब हिस्सा बँटाने वाले पैदा हो गए हैं। इस कारण से इन गरीब गिरमिट-मुक्त हिंदुस्तानियों के विरुद्ध एक आंदोलन नेटाल में शुरू हो गया। पाठकों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि एक ओर तो गोरे लोग अधिकाधिक संख्या में मजदूरों की माँग करते थे, हिंदुस्तान से जितने भी गिरमिटिया आते थे वे सब नेटाल में खप जाते थे; और दूसरी ओर जो हिंदुस्तानी गिरमिट-मुक्त होते थे उन पर अनेक तरह के प्रतिबंध लगाने का आंदोलन चलाते थे। यही था हिंदुस्तानियों की होशियारी और जी-तोड़ मेहनत का बदला!

इस आंदोलन ने अनेक रूप ग्रहण किए थे। गोरों के एक वर्ग ने यह माँग की कि गिरमिट से मुक्त होने वाले मजदूरों को वापस हिंदुस्तान भेज देना चाहिए और इसलिए पुराने इकरारनामे को बदल कर नए इकरारनामे में नए आने वाले मजदूरों से यह शर्त लिखवानी चाहिए कि या तो गिरमिट की अवधि पूरी हो जाने पर वे हिंदुस्तान लौट जाएँगे या फिर से गिरमिट में दाखिल हो जाएँगे। दूसरे वर्ग ने यह विचार प्रकट किया कि गिरमिट से मुक्त होने पर हिंदुस्तानी मजदूर अगर फिर से गिरमिट में दाखिल न होना चाहें, तो उनसे भारी वार्षिक मुंड-कर लिया जाए। इन दोनों वर्गों का उद्देश्य तो एक ही था...

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कहानियाँ
सत्यनारायण पटेल

अपने में ही खोई नई पीढ़ी नहीं जानती कि सांस्कृतिक चेतना की संवाहक लोक-कथाएँ काल की सरहदों से मुक्त कर व्यक्ति के भीतर जीवन का स्पंदन, राग और लय भरती हैं। जानते हैं सत्यनारायण पटेल। इसलिए महानगरीय सभ्यता में आत्म-विस्मृति का जीवन जीते व्यक्ति को जब वे कहानी नहीं, किस्सा सुनाने लगते हैं, तब विज्ञान और तकनीक की भूलभुलैया में हड़बड़ाए 'मानुष' को अनायास अपनी कहन-शक्ति में बाँध लेते हैं; और फिर सूखी जमीन पर भीतर-भीतर धँसते पानी की तरह उसकी अंतश्चेतना पर सवालिया निशान बना काबिज हो जाते हैं। स्याह अँधेरों को अपने हौसलों के बूते चीर देने का विश्वास इन कहानियों की ताकत है जो सबसे पहले अपने भीतर पसरे अँधेरों को चीन्हने की तमीज देता है। भीतरी तड़प और प्रश्नाकुलता को रोचकता का बाना पहना कर लेखक ने कहानी दर कहानी पाठक से अपने वक्त को नई आँख से देखने और नई तरकीब के साथ गढ़ने की अपील की है। भाषा का सृजनात्मक उपयोग और आडंबरहीन ईमानदार कहन-शैली कहानी को अर्थ-व्यंजक भी बनाती है और पाठक को लेखक का राजदार भी। - रोहिणी अग्रवाल

आलोचना
पंकज पराशर
कहानी की स्त्री बनाम स्त्री की कहानी
आलोचना की संस्कृति और मैनेजर पांडेय की आलोचना

स्मरण
मनोज कुमार राय
कुबेरनाथ राय को पढ़ते हुए

विशेष
गंगा सहाय मीणा
हिंदी में शोध

कला
पंकज तिवारी
अनहद की जद में युवा कला

सिनेमा
डिसेंट कुमार साहू
हिंदी फिल्मों में ट्रांसजेंडर

कविताएँ
अर्पण कुमार

कुछ और कहानियाँ
हरीचरन प्रकाश
नाले का तट
मनोज रूपड़ा
ईश्वर का द्वंद्व
गीताश्री
कब ले बीती अमावस के रतिया
दुर्गेश सिंह
हटिया एक्सप्रेस का डिपार्चर

संरक्षक
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(कुलपति)

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ISSN 2394-6687

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