आइए पढ़ते हैं : देवेंद्र की कहानियाँ
धारावाहिक प्रस्तुति (15 मार्च 2019), मुखपृष्ठ संपादकीय परिवार

दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास
मोहनदास करमचंद गांधी

प्रथम खंड : 17. पहली फूट

1907 की पहली जुलाई आई। परवाने देनेवाले सरकारी दफ्तर खुले। कौम का आदेश था कि हर एक दफ्तर के सामने खुले आम पिकेटिंग किया जाए - अर्थात दफ्तर जाने के मार्गों पर स्‍वयंसेवक रखे जाएँ और वे दफ्तर में जानेवाले हिंदुस्‍तानियों को वहाँ बिछाए गए जाल से सावधान करें। सब स्‍वयंसेवकों को एक निशानी रखनी होती थी। और सबको यह खास सूचना दी गई थी कि परवाना लेनेवाले किसी भी हिंदुस्‍तानी के साथ वे असभ्‍यता से पेश न आएँ। वे उसका नाम पूछें; और अगर वह अपना नाम न बताए तो उसके साथ जबरदस्‍ती या अशिष्‍टता का व्‍यवहार न करें। वे एशियाटिक ऑफिस में जानेवाले प्रत्‍येक हिंदुस्‍तानी को खूनी कानून के सामने सिर झुकाने से होनेवाले नुकसान का छपा हुआ परिपत्र दें, उसमें क्‍या-कुछ लिखा है यह समझाएँ और पुलिस के साथ भी सभ्‍यता से पेश आएँ। पुलिस गाली दे या मार मारे, तो स्‍वयंसेवक शांति से सहन कर लें; और मार सहन न हो सके तो वहाँ से हट जाएँ। पुलिस उन्‍हें गिरफ्तार करे तो खुशी से गिरफ्तार हो जाएँ। जोहानिसबर्ग में ऐसा कुछ हो तो उसकी सूचना वे मुझे ही करें। अन्‍य स्‍थानों में वे उस उस स्‍थान में नियुक्‍त किए हुए मंत्री को सूचना करें और उसकी सूचनाओं के अनुसार काम करें। पहरेदारों की हर टुकड़ी का एक नेता या नायक होता था। उस नेता के आदेशानुसार अन्‍य पहरेदारों (पिकेटों) को चलना होता था।

ऐसा अनुभव कौम को पहली ही बार हुआ था। 12 वर्ष से ऊपर के सब लोगों को पहरेदार (पिकेट) के रूप में पसंद किया जाता था, इसलिए 12 से 18 वर्ष तक के अनेक किशोर और नवयुवक भी स्‍वयंसेवकों के रूप में भरती हो गए थे। लेकिन ऐसे किसी व्‍यक्ति को किसी भी हालत में नहीं लिया जाता था, जो स्‍थानीय कार्यकर्ताओं से अपरिचित हो। इतनी सावधानी के सिवा प्रत्‍येक सभा में घोषणा करके और अन्‍य प्रकार से लोगों को यह बताया जाता था कि जिन्‍हें नुकसान के डर से या दूसरे किसी कारण से नया परवाना लेने की इच्‍छा हो, लेकिन पिकेट (पहरेदार) का डर लगता हो, उन्‍हें नेताओं की ओर से एक स्‍वयंसेवक दिया जाएगा; वह स्‍वयंसेवक उनके साथ जाकर उन्‍हें एशियाटिक ऑफिस में छोड़ आएगा और वहाँ का काम पूरा हो जाने पर उन्‍हें फिर से स्‍वयंसेवकों के क्षेत्र से बाहर रख आएगा। कुछ लोगों ने, इस सुरक्षितता का लाभ उठाया भी था।

स्‍वयंसेवकों ने हर जगह अपना काम अपार...

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कविताएँ
कृष्णमोहन झा

कृष्णमोहन झा जीवन के खोए हुए रंगों की खोज के कवि हैं। उनकी कविताओं में तरह तरह के दुख हैं, जिनका निजी रंग तो है ही पर उतना ही उनका सार्वजनीन रूप भी है। तभी कोई दुख या कि अपने भीतर को व्यक्त कर पाने की उत्कट चाहना एक दिन सारंगी की तरह बज उठती है। इन अर्थों में उनकी कविताओं में लोक के दुख का धीमा संगीत बजता है। वे समाज में प्रचलित अनेक लोक सत्यों को सिरे से उलट देते हैं और वहाँ अद्भुत रूप से नए अर्थ खुलने लगते हैं। उनकी कविताओं के दुख का एक सिरा प्रकृति के साथ हमारे अलगाव से रिसता है। हमारे भीतर से मिट्टी, पेड़, पानी, हवा, रंग और सुगंध जैसे जैसे गायब होते गए हैं वैसे वैसे उनके न होने की खाली जगहों पर दुख पसरता गया है। उनका कवि अपनी लालसा के आखिरी छोर पर जाकर इन सबको दोबारा पुकारता है क्योंकि वह जानता है कि 'यदि ठीक से पुकारो तो चीजें फिर आ सकती हैं तुम्हारे पास।

स्मरण
जितेंद्र श्रीवास्तव
नामवर सिंह होने का अर्थ

कहानियाँ
नाखून में स्याही - सुदर्शन वशिष्ठ
नए मनसबदार - देवेंद्र चौबे
गुब्बारे - कबीर संजय
भूतों के इर्द-गिर्द - राहुल सिंह
कथा में एक नदी बहती थी - रविंद्र आरोही
सहावर टाउन - संध्या नवोदिता

आलोचना
राजीव कुमार
अभिजात भाव-बोध की संरचना : निर्मल वर्मा की कहानियाँ

समीक्षा
आनंद वर्धन
अनास्था के जंगल में आस्था की खोज

विमर्श
सामिर अमीन
अभी पूँजीवाद का संरचनात्मक संकट है

बलूची कहानियाँ
ख़ुशबू - अख़्तर रिंद
बारिश की दुआ - आरिफ़ ज़िया
ग्वादर के मछुआरे - सुलेमान हाशिम
अपना खाना ख़ुद गर्म करो - इमरान साक़िब
सैंतीस दिन की ज़िंदगी - रिहान रिंद
हाजी साहिब - ग़मख़्वार हयात

संरक्षक
प्रो. गिरीश्‍वर मिश्र
(कुलपति)

 संपादक
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ISSN 2394-6687

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