आइए पढ़ते हैं : धर्मवीर भारती का अविस्मरणीय उपन्यास :: सूरज का सातवाँ घोड़ा
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गान्ही जी
कैलाश गौतम

सिर फूटत हौ, गला कटत हौ, लहू बहत हौ, गान्‍ही जी । देस बँटत हौ, जइसे हरदी धान बँटत हौ, गान्‍ही जी । बेर बिसवतै ररूवा चिरई रोज ररत हौ, गान्‍ही जी । तोहरे घर क' रामै मालिक सबै कहत हौ, गान्‍ही जी ।

हिंसा राहजनी हौ बापू, हौ गुंडई, डकैती, हउवै । देसी खाली बम बनूक हौ, कपड़ा घड़ी बिलैती, हउवै । छुआछूत हौ, ऊँच नीच हौ, जात-पाँत पंचइती हउवै । भाय भतीया, भूल भुलइया, भाषण भीड़ भँड़इती हउवै ।

का बतलाई कहै सुनै मे सरम लगत हौ, गान्‍ही जी । केहुक नांही चित्त ठेकाने बरम लगत हौ, गान्‍ही जी । अइसन तारू चटकल अबकी गरम लगत हौ, गान्‍ही जी । गाभिन हो कि ठाँठ मरकहीं भरम लगत हौ, गान्‍ही जी ।

जे अललै बेइमान इहाँ ऊ डकरै किरिया खाला । लंबा टीका, मधुरी बानी, पंच बनावल जाला । चाम सोहारी, काम सरौता, पेटैपेट घोटाला । एक्‍को करम न छूटल लेकिन, चउचक कंठी माला ।

नोना लगत भीत हौ सगरों गिरत परत हौ गान्‍ही जी । हाड़ परल हौ अँगनै अँगना, मार टरत हौ गान्‍ही जी । झगरा क' जर अनखुन खोजै जहाँ लहत हौ गान्‍ही जी । खसम मार के धूम धाम से गया करत हौ गान्‍ही जी ।

उहै अमीरी उहै गरीबी उहै जमाना अब्‍बौ हौ । कब्‍बौ गयल न जाई जड़ से रोग पुराना अब्‍बौ हौ । दूसर के कब्‍जा में आपन पानी दाना अब्‍बौ हौ । जहाँ खजाना रहल हमेसा उहै खजाना अब्‍बौ हौ ।

कथा कीर्तन बाहर, भीतर जुआ चलत हौ, गान्‍ही जी । माल गलत हौ दुई नंबर क, दाल गलत हौ, गान्‍ही जी । चाल गलत, चउपाल गलत, हर फाल गलत हौ, गान्‍ही जी । ताल गलत, हड़ताल गलत, पड़ताल गलत हौ, गान्‍ही जी ।

घूस पैरवी जोर सिफारिश झूठ नकल मक्‍कारी वाले । देखतै देखत चार दिन में भइलैं महल अटारी वाले । इनके आगे भकुआ जइसे फरसा अउर कुदारी वाले । देहलैं खून पसीना देहलैं तब्‍बौ बहिन मतारी वाले ।

तोहरै नाव बिकत हो सगरो मांस बिकत हौ गान्‍ही जी । ताली पीट रहल हौ दुनिया खूब हँसत हौ गान्‍ही जी । केहु कान भरत हौ केहू मूँग दरत हौ गान्‍ही जी । कहई के हौ सोर धोवाइल पाप फरत हौ गान्‍ही जी ।

जनता बदे जयंती बाबू नेता बदे निसाना हउवै । पिछला साल हवाला वाला अगिला साल बहाना हउवै । आजादी के माने खाली राजघाट तक जाना हउवै । साल भरे में एक बेर बस रघुपति राघव गाना हउवै ।

अइसन चढ़ल भवानी सीरे ना उतरत हौ गान्‍ही जी । आग लगत हौ, धुवाँ उठत हौ, नाक बजत हौ गान्‍ही जी । करिया अच्‍छर भंइस बराबर बेद लिखत हौ गान्‍ही जी । एक समय क' बागड़ बिल्‍ला आज भगत हौ गान्‍ही जी ।

पाँच कहानियाँ
सुभाष पंत

सुभाष पंत हिंदी के उन कथाकारों में हैं जिन्होंने प्रेमचंद की कथा परंपरा को विस्तार दिया है। इनकी कहानियों में हाशिए के समाज का सुख दुख बोलता है। यहाँ प्रस्तुत उनकी पाँच कहानियों - रोटी की महक, एक का पहाड़ा, समुद्र, सँभलकर दादू, स्केलेटर में अपना पैर मत फँसा लेना, और जमूरे के लिए विनम्र सम्मान के साथ - में उनके कथाकार का जादू देखा और महसूस किया जा सकता है। इन कहानियों के चरित्र बेहद संघर्षशील स्थितियों में जीवन यापन कर रहे हैं। उनके सामने दुख और अभाव का पहाड़ है पर उन्होंने न मनुष्यता की ताकत में अपना भरोसा खोया है न ही संघर्ष करना छोड़ा है। इन कहानियों को सुभाष जी की प्रतिनिधि कहानियों के बतौर भी पढ़ा जा सकता है।

संस्मरण
शर्मिला बोहरा जालान
मैं जिन अशोक जी को जानती थी

आलोचना
राजीव कुमार
समसामयिक परिवर्तन का आख्यान
(काशीनाथ सिंह के उपन्यास ‘काशी का अस्सी’ पर एकाग्र)

विमर्श
अवंतिका शुक्ल
हिंदी में स्त्री आत्मकथाएँ और उनका प्रतिरोधी स्वरूप

बाल साहित्य - कहानी
उपासना
सलोनी मेरी दोस्त

सिनेमा
विमल चंद्र पांडेय
तूने किसान का बेटा होकर चोरी की? : दो बीघा जमीन

कविताएँ
मनीषा जैन
प्रदीप शुक्ल

कुछ और कहानियाँ
वंदना राग
देवा रे देवा
गीताश्री
अन्हरिया रात बैरनिया हो राजा
कबीर संजय
सराप
विश्वंभर मिश्र
भगवान की लाठी
दुर्गेश सिंह
जहाज

संरक्षक
प्रो. गिरीश्‍वर मिश्र
(कुलपति)

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ISSN 2394-6687

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