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कविता

एक इंटरव्यू
स्नेहमयी चौधरी


मैंने बच्चे को नहलाती
खाना पकाती
कपड़े धोती
औरत से पूछा
'सुना तुमने पैंतीस साल हो गए
देश को आजाद हुए?'
उसने कहा 'अच्छा...'
फिर 'पैंतीस साल' दोहराकर
आँगन बुहारने लगी
दफ्तर जाती हुई बैग लटकाए
बस की भीड़ में खड़ी औरत से
यही बात मैंने कही
उसने उत्तर दिया
'तभी तो रोज दौड़ती-भागती
दफ्तर जाती हूँ मुझे क्या मालूम नहीं !'
राशन-सब्जी और मिट्टी के तेल का पीपा लिए
बाजार से आती औरत से
मैंने फिर वही प्रश्न पूछा
उसने कहा 'पर हमारे भाग में कहाँ !'
फिर मुझे शर्म आई
आखि़रकार मैंने अपने से ही पूछा
'पैतींस साल आजादी के...
मेरे हिस्से में क्या आया?'
उत्तर मैं जो दे सकती थी,
वह था...


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