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कविता

उस गाँव में
नीरजा हेमेंद्र


बारिश की रिमझिम
चारों तरफ फैली हरियाली
सृष्टि का अद्भुत, नैसर्गिक सौंदर्य
वह छोटा-सा गाँव
गाँव के मध्य लहराता पीपल का पेड़
छोटा-सा मंदिर
पोखर में उड़ते दूधिया बगुले
स्वतः खिल उठीं असंख्य जलकुंभियाँ
बावजूद इसके
ग्रामीण स्त्रियों की पीड़ाएँ
अदृश्य हैं... अव्यक्त हैं...
उनका घर वाला
शहर गया है मजूरी करने
आएगा महीनों बाद
किसी पर्व पर
लाएगा कुछ पैसे
कुछ खुशियाँ
कुछ रोटियाँ
जाएगा पुनः मजूरी करने
ऋतुएँ आएँगी-जाएँगी
शहर से लोग आएँगे
गाँव के प्राकृतिक सौंदर्य का,
ऋतुओं का आनंद लेने
गाँव की नारी
बारिश में स्वतः उग आई
मखमली हरी घास
गर्मियों में खिल उठे
पलाश, अमलतास
पोखर, जलकुंभियाँ
आम के बौर
कोयल की कूक
इन सबसे अनभिज्ञ
प्रतीक्षा करेगी
किसी पर्व के आने का।


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