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कविता

प्रेम-पत्र
नीरजा हेमेंद्र


आज पुनः मुझे मिला है
तुम्हारा पत्र
भारी-सा लिफाफा बता रहा है
बहुत कुछ है इसमें
तुम्हारी भावनाएँ
तुम्हारा अथाह प्रेम
मुझे पत्र लिखने का सुख
तो कदाचित् मुझसे वियोग की तुम्हारी पीड़ा भी
सब कुछ है इसमें
मैंने लिफाफा खोले बिना ही
पढ़ लिया है सब कुछ
फिर भी मैं पढ़ूँगी तुम्हारा पत्र
स्पर्श करूँगी तुम्हारा प्रेम
बंद लिफाफे को दोनों हथेलियों में दबा कर
मै जा पहुँची हूँ
स्वर्णिम क्षितिज के नीचे
प्रेम सिक्त नम हवाओं में तुम्हारा प्रेम
करने लगा है मुझे स्पर्श
उस शिला पर बैठ कर मैंने खोल लिया है तुम्हारा पत्र
जिस पर मैं अपने अकेले पलों में बैठती हूँ तुम्हारे साथ
पत्र जिसमें सब कुछ है
उस प्यारे से उलाहने के साथ
कि तुमने पुनः लिखा है मुझे छोटा-सा पत्र
साथ में तुमने यह भी लिखा है
कि कोई बात नहीं प्रिये! लिफाफे के रिक्त स्थान से मैं ले लूँगा
तुम्हारा प्रेम असीमित...।
मुझे आज पुनः मिला है तुम्हारा पत्र...।


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