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वैचारिकी

स्त्री सन्दर्भ और नवगीत
अंजना दुबे


स्त्री सन्दर्भ,नारी विमर्श,नारीवाद भारतीय साहित्य के लिए कोई नई बात,वाद,विमर्श या विचार नहीं है. वैदिक काल से लेकर आज तक भारतीय वांग्मय में नारी उपस्थित रही है,कहीं रचयिता बनकर तो कहीं वर्ण्य विषय के रूप में तो कहीं प्रकृति के रूप में.वर्तमान साहित्य और कला की अन्य विधाओं में स्त्रियों को लेकर जो वाद या विमर्श चला वह बहुदा पश्चिम की नकल ही अधिक है जिसमें नारी स्वातन्त्र्य का अर्थ उन्मुक्त यौन संबंध, अश्लीलता, फैशन परस्ती के रूप में ही ग्रहण किया गया.वहाँ नारी विमर्श का शिकार हो फैशन की वस्तु, कुंठा-चित्रण और उसकी अभिव्यक्ति बनकर पूरी तरह बेचारी अथवा दया अथवा जुगुप्सा की पात्र हो गयी.वह केवल देह, वासना भरी उच्छृन्खल देह बना दी गयी.इसके विपरीत समकालीन गीतिकाव्य में स्त्री के विविध रूपों, भावों, विचारों को बड़े सटीक, सहज-सरल-तरल-आत्मीय और सारग्राही रूप में व्यक्त किया गया है.समकालीन गीत नारी के सम्पूर्ण जीवन की विसंगतियों, असमानताओं एवं विद्रूपताओं को रेखांकित ही नहीं करता वरन् उसके हिमालयन व्यक्तित्व के जीवन सत्यों एवं मूल्यों की विवेचना करते हुए नारी समाज को प्रोत्साहित भी करता है। वह पुरुष एवं आज की नारी के मध्य एक सामंजस्य बनाये रखने का सेतु है जो उन दोनों की हकीकत को उजागर करते हुए एक नये समाज के निर्माण के लिए सतत् संकल्पित है। वह भारतीय नारी के मानक-मूल्यों-प्रेम, समर्पण, सहनशीलता, कर्तव्यनिष्ठा, करूणा, सेवा और त्याग की भावना को स्वीकार भी करता है और घर के भीतर से बाहर तक नारी अस्तित्व एवं सुरक्षा के लिए चिंतित भी है।

वैदिक काल में स्त्रियों को जो सम्मान, समानता का अधिकार मिला हुआ था वह कई एक कारणों से बाद में घटता गया.जहाँ पहले वह सहधर्मिणी थी, यज्ञ आदि संस्कारों में सहभागी ही नहीं होती थी स्वयं संपन्न भी कराती थी, शास्त्रार्थ करती थी, बाद में स्थिति यह आ गयी कि उसे घर की चहार-दीवारी के भीतर ही कैद कर दिया गया.उसकी स्वतंत्रता, अस्तित्व, अस्मिता पर कई प्रश्नचिन्ह लग गये.जैसे-जैसे हमारा समाज तथाकथित सभ्य होता गया स्त्री के संबंध में उसके विचार संकुचित और ओछे होते गए. ऐसा लगता है कि सभ्यता और स्त्री की सुरक्षा जैसे दो विरोधी बातें हो गयी.गीतकार समाज से प्रश्न करता है कि ये कैसा असुरक्षित समय आ गया जहाँ हमारी बच्चियाँ हरदम डरी-सहमी रहती हैं-

"आ गए हैं हम कहाँ यह,बेटियाँ सहमी-डरी हैं,

संवेदना आदिम निरंकुश दीख रही है,

स्याह कैसा पृष्ठ यह तो लिख रही है,

व्याप्त है चुप्पी अजब-सी,बेटियाँ सहमी-डरी हैं." [1]

समाज में आज यदि कोई सबसे ज्यादा असुरक्षित, दमित, पीड़ित है तो वह स्त्री ही है.भले ही आज वह घर की चारदीवारों में कैद नहीं है,शिक्षित है, आर्थिक रूप से स्वतंत्र है किन्तु आज भी उसकी अस्मिता असुरक्षित है.महिलाओं के विरूद्ध हिंसक घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं.नौकरी के लिए निकली बेटी को घर आने में थोड़ी भी देर होने पर माँ का हृदय अनेकानेक आशंकाओं से धड़कने लगता है.उसके मन में बुरे-बुरे ख्याल आने लगते हैं.यहाँ बेटी के लिए माँ की चिंता बड़ी स्वाभाविक बन पड़ी है-

"रात घनी होती जाती है माँ हूँ माँ घबरा जाती है

कविता,अभी न घर आई है

बार-बार आँखों के आगे कौंध रही वह डरावनी सी

खूनी कोठी चीख दबा कर,हविस मिटाकर

जहाँ दरिन्दे खा जाते हैं बोटी-बोटी" [2]

स्त्री को देवी के रूप में पूजने वाले देश में यदि कोई सबसे अधिक शोषित, दमित, पीड़ित है तो वह स्त्री ही है.कन्या-भ्रूणहत्या, दहेज के लिए हत्या, बलात्कार, घरेलु हिंसा क्या नहीं सहन करना पड़ रहा है उसे? क्या घर क्या दफ्तर क्या बाजार क्या गली-मुहल्ले,क्या धार्मिक स्थल आज नारी कहीं सुरक्षित नहीं है-

"घर में, बस में या कि रेल में बोलो कहाँ सुरक्षित नारी

जला रही सब पावन रिश्ते आज वासना की चिंगारी" [3]

सच तो यह है कि स्त्री व्यवहारिक जीवन में समाज के लिए योनी से अधिक कुछ नहीं होती.बेटी वाला घर उस फलदार वृक्ष के समान होता है जिस पर पत्थर पड़ने-ही पड़ने हैं.जैसे ही बेटी बड़ी हुई नहीं कि माँ-बाप के सामने उसकी सुरक्षा की चिंता मुँह बाये खड़ी हो जाती है जो उनकी रातों की नींद और दिन का चैन भी छीन लेती है.एक बेटी के माँ-बाप की चिंता बड़ी मर्मस्पर्शी बन पड़ी है-

"जिस दिन माँ ने बेटी को साड़ी पहनाई

उस दिन से ही नींद नहीं आँखों में आई

मोड़-मोड़ पर नागफनी ने फण फैलाए

गली-गली से खतरों के संदेशे आए

जिस दिन घर को लगी घूरने नजर पराई

पर्दे लगने लगे अचानक ज्यादा झीने

सदियों जैसे मुझको लगने लगे महीने

जिस दिन दरपन देख स्वयं बेटी शरमाई" [4]

घर हो या बाहर आज हर स्थान उसके लिए भयानक रूप से असुरक्षित हो गया है.कौन अपना है और कौन पराया यह पहचान भी कठिन हो गयी है, किस पर विश्वास करे और किस पर अविश्वास? जहाँ करीबी रिश्ते ही उसे निगलने को तैयार हैं बाहर वालों की कौन कहे? ऐसे भयानक रूप से असुरक्षित, दमघोंटू, अविश्वसनीय वातावरण में उसका खुलकर साँस लेना,जीना,अपने पैरों पर खड़ा होना भी दूभर हो गया है.गीतकार ने चिड़िया के मध्यम से लड़की की पीड़ा को मर्मस्पर्शी ढंग से व्यक्त कर सम्पूर्ण समाज के ऊपर प्रश्न लगा दिया है-

"नन्ही चिड़िया सोच रही है कैसे भरूँ उड़ान?

आसमान में झुण्ड लगा है गिद्धों,बाजों का

वहशीपन कायम है घर के ही दरवाजों का

ऐसे में कैसे मुमकिन है अपनों की पहचान?

कदम-कदम पर अनहोनी के अपने खतरे हैं

किया भरोसा जिस पर,उसने ही पर कतरे हैं

हर दिन हर पल की दहशत अब छीन रही मुस्कान" [5]

एक ओर उसे लक्ष्मी-सरस्वती-काली के रूप में मन्दिरों में प्रतिष्ठित कर उससे धन-वैभव, विद्या-बुद्धि और शक्ति की कामना की जाती है और दूसरी ओर जब अपने ही घर में बेटी पैदा होती है तो घर भर में सन्नाटा छा जाता है;यहाँ तक कि सोहर के बोलों में भी उसका कहीं जिक्र तक नहीं आता.इसे विरोधाभास कहें या पाखंड? इसे माँ की विडंबना कहें या दुर्भाग्य या भय कि स्वयं एक स्त्री होने के बाद भी जब वह कन्या जन्मती है तो स्वयं को अपराधिन महसूस करती है.गीतकार इसी पाखंड पर करार प्रहार करते हुआ लिखता है-

"राहू ग्रसी जैसी चंदनिया जैसी आती है बिन्नी

सोहर में क्यों इतना शोर मचाती है बिन्नी

बाप औपचारिक है माँ अपराधिन गुमसुम है

भाई खुश है अलबत्ता मंगलाचरण गुम है

दादी का चेहरा उदास कर जाती है बिन्नी

महक उठा आँगन पैयां-पैयां रुनझुन-रुनझुन

उत्सव नहीं जनम दिन नहीं लरजते नहीं सगुन

बचा-खुचा भाई का जूठा खाती है बिन्नी" [6]

पैदा होते ही माँ-बाप उसे हर पल यह याद दिलाते हैं कि उसका असली घर यह नहीं उसका ससुराल है.बेटी उस अनदेखे, अनबूझे संसार के ढेर सारे सपने संजोती है, कल्पना में एक सुंदर दुनिया बसाती है.किन्तु जब हकीकत में वह अपने 'असली' घर पहुंचती है तो उसे क्या मिलता है? मौत! दहेज के लोभी ससुराल वाले उसके सारे स्वप्नों के साथ उसे भी जला कर मार डालते हैं-

"फल गिरता केवल धरती पर चिमनी सिर्फ बहू पर गिरती

सास,ननद,देवर सब घर में पर स्टोव्ह न इन पर फटता

सिर्फ बहू के आगे पीछे जालिम मौत नाचती फिरती

घर में गैस मगर चौके में मिलती घासलेट की कुप्पी

आधी रात बना क्यों भोजन इस पर सास साधती चुप्पी" [7]

नारी सशक्तिकरण, नारी स्वातन्त्र्य जैसे तमाम नारों-आंदोलनों-वादों-विमर्शों के बाद भी उसकी स्थिति वैसी ही है.शोषण उसकी नियति बन गया है चाहे तन का हो या श्रम का.आज भी वह हाड़-माँस की मानवी नहीं सिर्फ योनी समझी जाती है.आज भी उसके जन्म पर घर भर में उदासी छा जाती है.माँ जो स्वयं एक बेटी है, स्त्री है का बेटी के जन्म पर उदास होना उसे कटघरे में खड़ा कर देता है.यह कैसी विडंबना है कि सन्तति को निरन्तरता देने वाली का जन्म आज भी दुर्घटना ही है? आखिर जन्मते ही हम उसे क्या संस्कार दे रहे हैं? ये प्रश्न हर एक संवेदनशील हृदय को झिंझोड़ देते हैं-

"माँ,तुमने कब था यह समझा औरत होना है दुर्घटना

मैं जन्मी तो पापा रोए दुखी हुई थीं तुम भी

पुरुष-दासता की नियति से उबर न पायीं तुम भी

कैसा यह संस्कार दिया है पूरे जीवन भर लड़ना" [8]

स्त्री होने की पीड़ा, उसके जीवन की विडंबना, त्रासदी को एक स्त्री से अधिक कोई नहीं समझ सकता. इसलिए बेटी के जन्म पर माँ का रोना सदा उसकी पुत्र अभिलाषा का द्योतक नहीं होता वरन अपनी बेटी का असुरक्षित भविष्य माँ को भयभीत कर देता है.कभी वह पैदा होने के पहले ही मार दी जाती है तो कभी दहेज की बलि चढ़ जाती है, यदि इन सब से बच भी जाए तो मनुष्य के रूप में शैतान भेड़िये उसे अपनी हवस का शिकार बना जीते-जी मार डालते हैं.माँ, बहन, पत्नी, सखी, प्रिय, भाभी सब रिश्ते जैसे बेमानी हो गए हैं.अब स्त्री हाड़-माँस की मानवी नहीं सिर्फ योनी बनकर रह गई है, तभी तो छोटी-छोटी अबोध-दुधमुँही बच्चियाँ भी इन शैतानों की गिद्ध दृष्टि से बच नहीं पातीं.बेटियों के लिए समाज में आज इतना असुरक्षित वातावरण हो गया है कि किसी पर भी विश्वास नहीं किया जा सकता.पड़ोसी, रिश्तेदार, बच्चे, जवान, बूढ़े हर पुरुष से उसे खतरा है.गीतकार माताओं को अपनी बच्चियों को दुनिया की गंदी निगाहों से बचाकर रखने की ताकीद देता है-

"छुपा लो गोद में बच्ची पड़ोसी मार डालेगा

रहो तुम व्यस्त चौके में मगर आँगन न ओझल हो

अगर हैं बेटियाँ घर में सुरक्षा भी मुकम्मल हो

बुढ़ापे में कहा किसने कि मन चंचल नहीं होता

पिता का मित्र भी एकांत में 'अंकल' नहीं होता

अगर कुछ हो गया तो दर्द सारी उम्र सालेगा" [9]

हमारे देश में मर्यादाएँ भी एकांगी हैं.कुल-खानदान की सारी मर्यादाओं का बोझ घर की लड़कियों पर ही होता है.सारी वर्जनाएँ, नसीहतें, नियम, धर्म-कर्म के कड़े बंधन सब स्त्री के कंधों पर डालकर चालाक पुरुष-प्रधान समाज स्वयं को नारी का हितचिन्तक कहने का तमगा भी स्वयं ही ले लेता है.लड़कियों को घर में कैद कर स्वयं छुट्टे सांड की तरह इधर-उधर मुँह मारने का अधिकार भी स्वयं प्रदत्त है.क्या स्त्री की मर्यादा की चादर इतनी झीनी होती है कि एक इंच भी इधर-उधर होने पर पूरे खानदान की इज्जत तार-तार हो जाती है? यह तो किसी भी स्वस्थ समाज के लिए के लिए हितकर नहीं है.आखिर कब तक एकांगी मर्यादाओं का बोझ अकेली स्त्री ढोएगी? गीतकार समाज के ऐसे समस्त दोगलेपन को उभाड़कर उनकी शल्यक्रिया करना चाहता है ताकि रोग को जड़ से समाप्त किया जा सके-

"कुछ रस्मों में कुछ बंधन में

बंधकर खड़ी हुई लड़की बड़ी हुई

बिटिया क्या है बापू की इज्जत का झंडा है

ऐसी पगड़ी है जिसके होते सिर नंगा है" [10]

स्त्री और वह भी गरीब परिवार की यह तो कोढ़ में खाज जैसी स्थिति हो जाती है.'गरीब की लुगाई,गाँव भर की भौजाई' हो जाती है.दिन दहाड़े घरों से लड़कियाँ उठा ली जाती हैं.कहाँ जाएँ? किससे फरियाद करें? पुलिस हाथ-पर-हाथ धरे बैठी रहती है रिपोर्ट भी नहीं लिखती-

"पारवती है गुम हफ्तों से थाना,डांट भगा देता है

अब तक रपट न लिख पाई है"[11]

और यदि कभी पुलिस रपट लिख भी ले तो सामन्ती सोच वाला पिता अपने बाहुबल और धनबल से अपने कुकर्मी बेटे को साफ़ बचा ही नहीं लेता वरन अपनी सन्तान की इस दरिंदगी को उसका मन बहलाव, जन्मसिद्ध अधिकार कहकर उसे और बढ़ावा ही देता है.आखिर ये किस युग की सोच है? कैसी सभ्यता है, कैसे संस्कार हैं? संवेदनहीन पिता अपने पुत्र को बचाने के लिए ऐसे-ऐसे तर्क देता है मानों लड़के ने किसी जीती-जागती लड़की से नहीं वरन किसी रबर की गुड़िया से पहले खेला और फिर मन भर जाने के बाद उसे तोड़ दिया.कैसी हैवानियत है, कैसी दरिंदगी और संवेदनहीनता! इस गीत में गीतकार समाज के ऐसे ही क्रूर चेहरे को बेनकाब करता है-

"अब की बेर बचा लो थानेदार

अपने जोरावर ने आज जनानी मार दई

लाजवती करुणा या ममता

ऐसा ही कुछ नाम लिखो जी

उमर लिखो बालिग़ जो है सो

चाल-चलन बदनाम लिखो जी

टोकाटोकी करत रही हर बार

सो पठ्ठे ने बार पकर चूल्हे में बार दई" [12]

कितना क्रूरता पूर्ण है ऐसा कहना कि-

"कारे केस गुलबिया मुखड़ा काया से केसर झरता-सा

कही मान लेती चुप रहती दाम दिया अच्छा खासा

पर वह ठहरी सावित्री औतार

गंगाजली सरीखी गंगा पार उतार दई" [13]

आज हम इक्कीसवी सदी में जी रहे हैं.आधुनिक कहे जाने वाले सारे उपकरण, वस्तुएँ, परिधान, रहन-सहन के तौर-तरीके अपना कर जल्द-से जल्द आधुनिक कहे जाने के लिए उतावले हैं.पाश्चात्य संस्कृति को तेजी से अपना रहे हैं और अपनी संस्कृति को पुरातन, पिछड़ी, असभ्य और गँवारू कहकर उससे मुँह मोड़ रहे हैं; पर अफ़सोस ये हम सिर्फ ऊपरी या सतही रूप से आधुनिक बन रहे हैं, वैचारिक रूप से आज भी हम अत्यंत पिछड़े हैं, तभी तो स्त्री को पैर की जूती, बच्चे उत्पन्न करने की मशीन, घरेलू नौकर, और यौन सुख देने वाली बेजान गुड़िया से अधिक महत्व नहीं देते.बच्चा अपने घर से यही संस्कार प्राप्त करता है. अपने घर में पिता, दादा-दादी और अन्य लोगों द्वारा स्त्री के साथ किये जा दुर्व्यवहारों को देखकर ही वह बड़ा होता है और उसके मन में भी यही भावना घर कर जाती है कि वह पुरुष होने के कारण श्रेष्ठ है और लड़की होती ही है उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए.यही सोच उसे बड़े होने पर किसी भी लड़की को बिना उसकी मर्जी के अपनी हवस का शिकार बनाने की छूट दे देती है.पहले बलात्कार और फिर अपना अपराध छिपाने के लिए क्रूरता पूर्वक हत्या! समाचार पत्र रोज ही ऐसे अमानवीय समाचारों से भरे रहते हैं-

"सेक्स उतर आया हिंसा पर बालाओं का करता मर्डर

दुराचार की खबरों से है पेपर लथपथ

महिलाओं का सड़कों पर है आन्दोलन रथ

कोमल कोमल हाथों में है गैंगरेप का खूनी बैनर" [14]

पुरुष समाज की इसी गंदी सोच के चलते आज स्त्रियों का घर के बाहर निकलना दूभर हो गया है.लड़की घर के बाहर निकली नहीं कि हजारों लोलुप आँखों, अश्लील फब्तियों, घृणित स्पर्शों, भद्दे इशारों से उसकी देह और उससे ज्यादा उसकी आत्मा लहूलुहान हो जाती है.ये शहर हैं या जंगल जहाँ लड़की खूंखार भेड़ियों से बचने कातर हिरणी के समान गली-मुहल्लों, रास्तों से कतराकर-सहमकर निकलती है-

"आज महानगर में भी जब लड़की चलती है,

लगता कातर हिरनी जंगल बीच गुजरती है.

देह तीक्ष्ण बाणों से अक्सर बिंध-बिंध जाती है

लोलुप आतुर हिंसक तक से घिर-घिर जाती है,

मौन झुकी आँखों को अपनी ढाल बना करके

बेर बबूलों बीच अमोले-सा वह पलती है." [15]

क्या गाँव क्या शहर और क्या महानगर कहीं भी नारी सुरक्षित नहीं है.न अपनों के बीच न परायों के, न अनपढ़ों के न पढ़े लिखों के.महानगरों में नारी-स्वातन्त्र्य, स्त्री-पुरुष समानता के बहुत नारे लगाए जाते हैं. दूरदर्शन या अन्य मंचों पर बैठकर नारी के अधिकारों की चर्चा खूब जोर-शोर से चलती है.पर आज जिस नारी को स्वतंत्रता मिली है वह कनाट-प्लेस सभ्यता का ही अंग है.मजदूर वर्ग, मध्य वर्ग की कामकाजी या घरेलू स्त्री आज भी शोषित ही है.घर से उच्चशिक्षा प्राप्त करने या नौकरी करने निकली अकेली लड़की तो अनायास ही सबके मनोरंजन का साधन बन जाती है.गीतकार उस नारी की व्यथा को बहुत गहरे अनुभव करता है-

"मुँह पे छींटे और पीठ पर आँखें सहती है;

महानगर में एक अकेली लड़की रहती है,

ज्यों-ज्यों बढ़ती भीड़,अकेलापन भी बढ़ता है,

नजरों का भूखा नाग,पाँव से ऊपर चढ़ता है,

घर की यादें माँ की चिठ्ठी गाल से होकर बहती है." [16]

देश की राजधानी दिल्ली भी लड़कियों के लिए सुरक्षित नहीं है.१६ दिसंबर २०१४ की रात दिलवालों की दिल्ली में 'दामिनी' के साथ जो बर्बर व्यवहार हुआ उसने सारे देश को झकझोर कर रख दिया.उस दिन केवल एक लड़की की अस्मिता नहीं लुटी वरन देश की हर लड़की की इज्जत सरेराह लुटी थी.उस दिन स्त्री जाति के हृदय में जो अपमान का घाव लगा वह शायद ही कभी भुला पाए.'दामिनी','निर्भया' या जो भी नाम दें उसके साथ हुए वीभत्स व्यवहार के बाद हर माँ का हृदय काँप-काँप जाता है जब भी उसकी लड़की घर से बाहर निकलती है.दिल्ली ही क्या देश के हर कोने में हर दिन ऐसी ही क्रूरतम घटनाएँ होती हैं और हम उन्हें पढ़कर, सुनकर, देखकर सिर्फ जुबानी प्रतिक्रिया देकर शांत हो जाते हैं.सत्ता पर बैठे जिम्मेदार लोग हों या कानून निर्माता, न्यायपालिका, मीडिया हो या कानून का रक्षक पुलिस महकमा हर ऐसी घटना के बाद थोड़ी सरगर्मी दिखाते जरुर हैं लेकिन उतनी ही जल्द भूल भी जाते हैं.गीतकार भी उस पीड़ा से अकुलाकर जिम्मेदार लोगों को अपने कर्तव्यों की याद दिलाता है-

"चिनगारी बो गयी दामिनी तुलसी चौरा शोकग्रस्त है

पावन स्वस्तिक अस्त-व्यस्त है

मेंहदी-महावर की पीड़ा से सुलग रही उत्तप्त रागिनी

सपनों का हत्यारा मौसम धधक उठा अंगारा मौसम

जाग उठी महिषासुरमर्दिनी क्रुद्ध कालिका खल-विनाशिनी

हे गिरगिट के नव अवतारो सत्ता के रंगीन सियारो

सावधान हो जाग गयी है जन-गण-मन की क्रुद्ध बाघिनी" [17]

आज भले ही लड़कियाँ पढ़-लिख कर अपने पैरों पर खड़ी हो गई हैं लेकिन माँ अपने अनुभव से यह अच्छी तरह जानती है कि पुरुष सत्तात्मक समाज में उसकी नियति क्या है.इसीलिए शहर से दूर नौकरी के लिए जाती बेटी का आगत उसे आशंकित कर देता है.वह उसे ढेर सारी नसीहतें देकर भेजती है.यह कितना दुखद है कि नारी जबसे घर के बाहर आत्मनिर्भर होने निकली उसका शोषण और अधिक बढ़ गया है.यहाँ बेटी के असुरक्षित भविष्य का भय माँ के साथ-साथ गीतकार की संवेदना का बाँध तोड़ देता है.निश्चित ही एक पुरुष हृदय से निकली एक स्त्री की आवाज गीतकार की संवेदनशीलता का चरम है-

"नई नौकरी है कविता की नए शहर में आई है

याद कर रही माँ की शिक्षा गाँठ बाँध कर लाई है

नियम कायदे के भीतर ही दफ्तर को निबटाना है

बुरी नजर का बॉस अगर हो छोड़ नौकरी आना है

अक्सर ऊँचे पद के सपनों ने इज्जत लुटवाई है

नारी-शोषण बढ़ा तभी जब वह स्पर्धा में आई है" [18]

पुरुष प्रधान समाज में स्त्री कभी सम्मान की अधिकारिणी नहीं रही.अपनी योग्यता के बल पर यदि

कभी वह उच्च पद पर पहुँच भी जाती है तो सभी की आँखों की किरकिरी बन जाती है.पुरुष का अहमवादी मन उसे किसी स्त्री अधिकारी के अधीन काम करने से रोकता है.उसकी ईमानदारी, तेज-तर्रारपन, योग्यता उसे नागवार गुजरता है और उसका दमित अहं अंततः स्त्री के विरूद्ध अपनाए जाने वाले सबसे बड़े अस्त्र का प्रयोग करता है-चरित्र हनन.पुरुष उसकी कीर्ति को धूमिल करता है.पर ऐसे समय धैर्य और साहस का परिचय देकर वह पुरुष वर्चस्व को अंगूठा दिखाती है.वास्तव में स्त्री सशक्तिकरण का सही रूप यहीं दिखाई देता है-

"कोयल थानेदार हुई बागों की चिंता में बीमार हुई

चातक की चितवन में व्यंग्य और कौवों की आँखों में छुरी हुई

कलरव ने रूप लिया बहसों का भाषा पहले से खुरदुरी हुई

.............................................................................

कोयल ने मगरमच्छ को नाथा चुनमुन चिड़िया ने जयघोष किया

विपद-तिमिर में सीता साकार हुई कोयल थानेदार हुई" [19]

पुरुष की नजरों में स्त्री आज भी सिर्फ भोग की वस्तु ही है-

"पुरुषों की निगाह में नारी होती है नूतन गाड़ी

धँस गैराज में गई कि पुरजा -पुरजा खा-जाय कबाड़ी" [20]

भूमण्डलीकरण के कुप्रभाव से स्त्री समाज भी अछूता नहीं रहा.वीरेंद्र आस्तिक जी मानते हैं कि भूमण्डलीकरण स्त्री अस्मिता का ह्रास कर रहा है.आज के युग में लड़कियाँ भी पहले जैसी नहीं रहीं.समय के साथ उनमें सकारात्मक के साथ ही अनेक नकारात्मक परिवर्तन भी हुए हैं.शिक्षा और परंपरा जैसे परस्पर दो विरोधी बातें हो गईं हैं.आज जो जितना शिक्षित है उतना ही परंपरा विमुख भी.आधुनिक होना बुरा नहीं लेकिन आधुनिकता के फेर में अपनी सभ्यता, संस्कृति, स्वाभाविकता, अपनी पहचान, परंपरा को खोना निश्चित ही चिंतनीय है.आधुनिकीकरण के फेर ने हमारी लड़कियों को पथभ्रष्ट कर दिया है.गीतकार इस नकारात्मक बदलाव से चिंतित हैं-

"अब न पहले सी रहीं ये लड़कियाँ

अब न मानस पाठ करतीं अब नहीं करती निटिंग

वक्त की तहजीब में है फिल्म,कॉलेज,मार्केटिंग

फ़ास्ट-फूडो में किचन-किंग ये न बेलें रोटियाँ

जाति-कुल इतिहास से बेफिक्र,साथी प्रिंस है

टॉप खिड़कीदार,लेकिन हाँ,कमर पर जीन्स है

बेअसर इन पर हुई हैं डैड की भी झिड़कियाँ

बर्थडे हो या अन्नप्राशन गीत गाने में झिझकतीं

कैसटों के गीत पर ये बंद कमरों में थिरकतीं" [21]

नवगीतकारों ने इन सभी की विसंगतियों और स्थापनाओं को अपनी लेखनी का विषय बनाया है.नारी-मुक्ति, स्त्री सशक्तिकरण और नारीवाद के नारों ने स्त्रियाँ का कुछ भला भले ही न किया हो बिगाड़ा बहुत कुछ है.शहर की नारियों के ऊपर अर्धनग्नता की होड़ में फैशनपरस्ती सिर पर चढ़ी हुई है।नारी सशक्तिकरण का अर्थ यह तो नहीं है.पर अफ़सोस कुछेक अधकचरी सोच की स्त्रियों ने नग्नता, उन्मुक्त यौन संबंधों की स्वतंत्रता को ही असली नारी सशक्तिकरण मान एक तरह से स्वयं को पुरुष समाज के लिए और अधिक भोग्या, बिकाऊ, सहज उपलब्ध ही बनाया है.चंद स्त्रियों के ऐसे अभद्र व्यवहार ने संपूर्ण नारी समाज को शर्मिंदा किया है और समाज को उसपर अँगुली उठाने, बाजारू समझने का मौका भी दिया है.समकालीन गीत स्त्रियों के ऐसे रूप को मान्यता नहीं देता.क्योंकि यह रूप भी अपने मनबहलाव के लिए पुरुष समाज के द्वारा ही दिया गया है, उसके ऊपर नारीमुक्ति का लेबल चिपकाकर.यह भी स्त्री-शोषण का ही एक रूप है जिसे वह समझ नहीं पाती और झूठी आजादी का झुनझुना थामे शोषित होती रहती है.गीतकार ऐसे रूप की भर्त्सना करता है-

"उसे पता है नजरें कैसे खींचे अपनी ओर

कसनी कितनी और कहाँ पर ढीली करनी डोर

महुआ कभी कभी अंगारे अधरों से बरसाना

सीख लिया लम्पटताओं को ऐन कैन उकसाना

मंच मिला तो पंख खोलकर बन जाती है मोर

जगमग लानों-दीवानों से पैमाने जोड़े

शील-शौर्य,कर्मठता टा-टा,राग-रंग ओढ़े

रात ठहाकों,ठुमकों वाली,गुमसुम गुमसुम भोर" [22]

स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था-'पश्चिम की नारी पहले प्रेयसी है, फिर पत्नी और फिर माँ जबकि भारत की नारी पहले माँ है, फिर पत्नी इसके बाद प्रेयसी।यह एक बुनियादी अन्तर है।परन्तु आज भारत की नारी ने पश्चिम की नकल में अपनी बुनियादी नारी-मूल्यों की चिंता उतार फेंकी है।उसने नये, वस्त्रों आभूषणों और रिश्तों की लपालप में जीवन-मूल्यों को ताक पर रख दिया है।भारतीयता की चन्दनी गंध लिये नारी का बाजारू बनना गीतकार को गहरे क्षोभ से भर देता है-

"चंदनी चेहरे बने क्यों हाट के सामान?

मगर अधरों पर सजाते जीत की मुस्कान?

कौन ग्राहक कौन चाहक,कठिन है पहचान?

इन्द्रधनुषी रंग तितली को दिया किसने?

पंखुड़ी का तन गुलाबी है किया किसने?

क्यों भटकती नदी प्यासी रेत में अनजान? [23]

गीतकार स्त्रियों के इस सांस्कृतिक पतन पर क्षुब्ध तो है,पर ऐसे चित्र बहुत कम ही हैं जहाँ स्त्रियों को

गर्हित रूप में दिखाया गया है.अधिकांश जगह उसके नितांत भारतीय रूप की ही अभिव्यक्ति है.वह कहीं

अपाला है तो कहीं गार्गी, कहीं मीरा है तो कहीं महादेवी और कहीं एनीबेसेंट है तो कहीं मदर टेरेसा। वह अपनी हर भूमिका में पुरुष के साथ ही संतुलित जीवन जीना चाहती है जिसमें कभी उससे भूल हो जाती है तो कभी वह पुरुष की क्रूरता और छद्म का शिकार हो जाती है।

इक्कीसवी सदी में जब लड़कियाँ हर क्षेत्र में लड़कों के कँधे से कँधा मिलाकर चल रही हैं, उन्नति के नए -नए शिखर छू रहीं हैं यह तर्क कितना खोखला लगता है कि पुत्र ही कुल का उद्धार करता है, बुढ़ापे में माँ-बाप का सहारा बनता है,उनकी अर्थी को कंधा देता है.समाज ये हक बेटियों को देकर तो देखे वे बेटों से भी अधिक जिम्मेदारी से अपना कर्तव्य निभाएँगी.यहाँ गीतकार ऐसे सब रीति-रिवाजों, परंपराओं, कुप्रथाओं को जलाकर भस्म कर देना चाहता है जो बेटे-बेटियों में अंतर कर एक को उच्च और दूसरे को हीन सिद्ध करती हैं-

" निरर्थक है कि बेटे से यहाँ पर वंश चलता है

नहीं है सच कि बेटे से पिता का पेट पलता है

पिता की चिठ्ठियाँ भूला,बहन की राखियाँ भूला

गया जब से बहू लेकर,वो माँ की हिचकियाँ भूला

यही है काम बेटों का,तो उनको छुट्टियाँ दे दो.

कहा किसने कि बेटा ही करेगा नौकरी-धंधा

कहा किसने कि देगा पुत्र ही बस बाप को कंधा

अगर ऐसा नियम है तो मुझे फिर तीलियाँ दे दो" [24]

स्त्री और पुरुष दोनों के सम्मिलन से ही एक संतुलित समाज बनता है, जो स्वस्थ सामाजिक संरचना के लिए अत्यंत आवश्यक है.इनमें से यदि एक का पलड़ा भारी और दूसरे का कमजोर रहा तो संतुलन बिखर जाएगा परिणामत: समाज का रूप भी.यही कारण है कि वह समाज से बेटियों के सम्मान-समत्व की बात करता है,ताकि स्वस्थ समाज की रचना की जा सके.पुत्र तो एक कुल को तारता है जबकि बेटियाँ दो-दो कुलों को तारती हैं.बेटा बेईमान हो सकता है बेटियाँ नहीं.विवाह होते ही बेटा तो पराया हो जाता है पर पराया धन कहलाने वाली बेटियाँ जीवन के अंतिम क्षण तक पीहर को नहीं भुला पातीं.नया घर बसाने, घर-गृहस्थी में डूबने पर भी उसका आधा मन हमेशा माँ-बाप पर ही लगा रहता है.माँ-बाप की बीमारी की खबर सुनकर वह दवा बन झट उपस्थित हो जाती है.ऐसी ममतालु बेटियों से बैर क्यों?

"सलोनी बेटियों को तुम पराया धन नहीं कहना

पिया के पास है फिर भी,पिता के पास उसका मन

हुई बीमार जब-जब माँ चली आई दवाई बन

अरे,इस लाड़ली को उम्र-भर की पूँजियाँ दे दो" [25]

समकालीन गीत ने नारी के समूचे जीवन- संघर्ष और विसंगतियों को विमर्श का विषय बनाया है। इस युग की नारी चेतना सम्पन्न और मुक्ति के प्रश्न उठाने लगी है। वह पुरुष सत्ता का विकल्प नहीं ढूँढ़ती मगर वह उसके स्नेह के साथ रहकर एक साझे का सम्मानजनक जीवन जीना चाहती है।वह समकालीन कविता की भाँति साहित्यिक गाली-गलौज की भाषा प्रयोग कर अपने आक्रोश को व्यक्त नहीं करती बल्कि वह उसके साथ मैत्री भाव बनाकर जीना चाहती है.वह स्वछन्द नहीं बनना चाहती वरन पुरुष के साथ रहकर भी अपनी स्वतंत्र सत्ता, अपना अस्तित्व, अपनी अर्थवत्ता बनाए रखना चाहती है-

"तुमने क्या समझा था मुझको?

हिमगिरी जैसी गल जाऊँगी?आँसू बनकर ढल जाउंगी?

छलनाओं की घोर यन्त्रणा,मौन साधकर सह जाऊँगी?

क्या अबला समझा था मुझको?

पाषण हृदय!तुम क्या जानो,अंतर्मन की अकुलाहट को

तुमने समझा होगा,थक कर,पीड़ा मन की कह जाऊँगी?

क्या उथला समझा था मुझको? [26]

आज समाज तेजी से परिवर्तित हो रहा है.कुछ गिनी-चुनी अधकचरी, पुरुषों के हाथों की कठपुतली महिलाओं की बात छोड़ दें तो स्त्रियों की सोच में तेजी से अंतर आ रहा है.अब वह स्वतंत्रता और स्वछंदता, नग्नता और स्वालंबन, बाजारुपन और आत्मसम्मान का अंतर भलीभाँति जानने लगी है और पुरुषों के षड्यंत्रों को भी.स्त्री शोषण का सबसे बड़ा कारण उसकी आर्थिक परतन्त्रता ही है,किन्तु आज नारी अपने पैरों पर खड़ी ही नहीं हो रही है,वरन किसी पुरुष की भांति पूरे परिवार का भरण-पोषण का दायित्व भी बखूबी निभा रही है.अस्तु गीतकार लड़कियों के भविष्य को लेकर पूरी तरह आश्वस्त है, उसे विश्वास है कि अपने पैरों पर खड़ी आत्मविश्वास से लबरेज यह लड़की एक दिन समाज से लड़के-लड़कियों के भेद को समाप्त कर देगी,समाज की बन्ध्या सोच को उर्वर करेगी और पुरुष की हठधर्मिता, व्यर्थ के दंभ को तोड़ देगी-

"लड़की जाग गयी है,अब वह,घर-बाहर सब सँभाल लेगी.

पाँवों से जमीन नापेगी,हाथों से आकाश रचेगी,

आँखों से भूगोल खयालों से ऊँचा इतिहास रचेगी.

हल करने के लिए,वक्त को,नई सदी के सवाल देगी.

'चौका-बर्तन' करते-करते,'क' से कंप्यूटर लिख देगी;

तपते सूरज को-अपनी चन्दनी हथेली पर रख लेगी.

'बेटा-बेटी' दोनों बन कर,'भरम'सभी के निकाल देगी.

हठधर्मी कर रहे-'दम्भ' की,ऊँची 'पगड़ी' उछाल देगी." [27]

यहाँ उसकी वैयक्तिक संवेदना का भी सामाजीकरण होता चलता है, यही समकालीन गीत का वैशिष्ट्य है। परन्तु समकालीन गीत में वैचारिक समन्वय और वैश्विक नारी की प्रेम-भावना पर अधिक जोर दिया गया है। यह लोकमंगल की भावना की महत्तम कड़ी है। यह मानवतावादी सोच और धारणा भारतीय चिंतन के धरातल पर पल्लवित हुई है।समकालीन कविता के नुमाइंदों ने नारी-चेतना के बंद दरवाजे खोलने का दावा किया है किंतु उसकी समस्याओं का निदान नहीं खोजा है जो गीतकारों ने तलाशने की कोशिश की है। स्पष्ट है कि इन सभी गीतकारों ने जोखिम उठाते हुए स्त्री के यौन अस्तित्व को ही नहीं, इंसानी और सामाजिक गरिमा को भी शब्द देने की नम्र कोशिश की है।

-अंजना दुबे

परास्नातक शिक्षिका (हिंदी)

जवाहर नवोदय विद्यालय अरनियाकला

जिला-शाजापुर(म.प्र.)

8462855747



[1] बेटियाँ सहमी डरी हैं:रमेशचन्द्र पन्त,नवगीत का लोकधर्मी सौन्दर्यबोध,कोणार्क प्रकाशन दिल्ली,२०१६,पृ.३६०

[2] . दिन क्या बुरे थे:वीरेंद्र आस्तिक,कल्पना प्रकाशन दिल्ली,२०१२,पृ.७८

[3] दो चेहरे कब तक ओढ़ोगे: ये हवा से बोल देना/दिनेश प्रभात, विजन पब्लिकेशन भोपाल,प्रथम संस्करण,२०१३,पृ.८८

[4] नींद नहीं आँखों में आई:डॉ.मधुसूदन साहा,गीत-वसुधा:सं.नचिकेता,युगांतर प्रकाशन दिल्ली,२०१३,पृ.३३०

[5] वहशीपन कायम है:योगेन्द्र वर्मा 'व्योम',नवगीत का लोकधर्मी सौन्दर्यबोध:सं.राधेश्याम बन्धु,कोणार्क प्रकाशन,२०१६,४३९

[6] कनबतियां:महेश अनघ,अनुभव प्रकाशन गाजियाबाद,२०११,पृ.२७

[7] चिमनी सिर्फ बहू पर गिरती:झमाझम बारिश में-दिनेश प्रभात, विजन पब्लिकेशन भोपाल,प्रथम संस्करण,२००३,पृ.११४-११५

[8] दिन क्या बुरे थे:वीरेंद्र आस्तिक,कल्पना प्रकाशन दिल्ली,२०१२,पृ.७९

[9] पड़ोसी मार डालेगा: ये हवा से बोल देना/दिनेश प्रभात, विजन पब्लिकेशन भोपाल,प्रथम संस्करण,२०१३,पृ.१२

[10] गीत तीन:रामबाबू रस्तोगी,शब्दायन:सं.निर्मल शुक्ल,ऊत्रयं प्रकाशन लखनऊ,२०१२,पृ.५७८

[11] दिन क्या बुरे थे:वीरेंद्र आस्तिक,कल्पना प्रकाशन दिल्ली,२०१२,पृ.७८

[12] कनबतियां:महेश अनघ,अनुभव प्रकाशन गाजियाबाद,२०११,पृ.१०९

[13] कनबतियां:महेश अनघ,अनुभव प्रकाशन गाजियाबाद,२०११,पृ.१०९

[14] दृश्य देखकर:वीरेंद्र आस्तिक,नयी सदी के नवगीत(भाग-दो):सं.डॉ.ओमप्रकाश सिंह,नमन प्रकाशन दिल्ली,२०१६,पृ.१५८

[15] महानगर में लड़की:ओम धीरज,नयी सदी के नवगीत(भाग-तीन):सं.डॉ.ओमप्रकाश सिंह,नमन प्रकाशन दिल्ली,२०१६,पृ.१५७

[16] रामकिशोर दहिया,अभिव्यक्ति ऑनलाइन पत्रिका से उद्धृत

[17] झील अनबुझी प्यास की:डॉ.रामसनेही लाल शर्मा 'यायावर',उत्तरायण प्रकाशन लखनऊ,२०१६,पृ.६९

[18] दिन क्या बुरे थे:वीरेंद्र आस्तिक,कल्पना प्रकाशन दिल्ली,२०१२,पृ.७७

[19] आकाश तो जीने नहीं देता:वीरेंद्र आस्तिक,शब्द सेतु प्रकाशन दिल्ली,२००२,पृ.३९

[20] दिन क्या बुरे थे:वीरेंद्र आस्तिक,कल्पना प्रकाशन दिल्ली,२०१२,पृ.७७

[21] दिन क्या बुरे थे:वीरेंद्र आस्तिक,कल्पना प्रकाशन दिल्ली,२०१२,पृ.७२-७३

[22] किन्तु मन हारा नहीं है:श्याम नारायण श्रीवास्तव,उत्तरायण प्रकाशन लखनऊ,२००९,पृ.३७-३८

[23] एक गुमसुम धूप:राधेश्याम बन्धु,कोणार्क प्रकाशन दिल्ली,२००८,पृ.७३-७४

[24] मुझे फिर तीलियाँ दे दो: झमाझम बारिश में-दिनेश प्रभात, विजन पब्लिकेशन भोपाल,प्रथम संस्करण,२००३ ,पृ.११२-११३

[25] मुझे फिर तीलियाँ दे दो: झमाझम बारिश में-दिनेश प्रभात, विजन पब्लिकेशन भोपाल,प्रथम संस्करण,२००३ ,पृ.११२-११३

[26] तुमने क्या समझा था!:वर्षा रश्मि,शब्दायन:सं.निर्मल शुक्ल,उत्तरायण प्रकाशन लखनऊ,२०१२,पृ.९२६

[27] कैसे बुने चदरिया साधो:डॉ.राधेश्याम शुक्ल,अनुभव प्रकाशन गाजियाबाद,२०१२,पृ.१३४


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