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बाल साहित्य

रिजल्ट
अमिताभ शंकर राय चौधरी


स्कूल ड्रेस और आज? कोई नहीं पहनता। सभी बच्चे रंगीन शर्ट, टी शर्ट या फ्राक, टॉप और कैप्री पहन कर आए हैं। यानी पार्टी ड्रेस। आज सालाना इम्तहान का रिजल्ट जो निकलेगा। स्कूल के सामने आइसक्रीम, कोल्ड ड्रिंकस् और चिप्स के ठेले लगे हुए हैं। उधर गुब्बारेवाला भी खड़ा है। उम्मीदों के गुब्बारे उड़ाते हुए। इक्के दुक्के नन्हे गॉहक सौदा ले रहे हैं। भीड़ होगी तो रिजल्ट निकलने के बाद।

टेंपो से उतरते हुए करन बोला, ''अरे यार, तुझे मालूम है - मेरे डैडी ने तो यू.के.जी. में पढ़ा ही नहीं।''

''हमारे डैडी का एडमिशन भी सीधे क्लास टू में हुआ था। कहते हैं उस समय एल.के.जी. यू.के.जी. थे ही नहीं। वाह!'' वाटर बॉटल को गले में लटकाते हुए सुबोध भी उतर आया।

दोनों के यू.के.जी. के रिजल्ट आज निकलेंगे। दोनों क्लास वन में जाएँगे। नर्सरी से स्कूल। जीवन के हर्डल रेस में एक दीवार डाँकना!

बच्चों की भीड़ से जाते हुए सुबोध बोला, ''अभी तो मेरे डैडी के ऑफिस में जाने कौन सा टेस्ट हुआ। पता नहीं कैसी परीक्षा है कि उसके रिजल्ट भी नहीं निकलते।''

''हॉ, मम्मी कहती है कि पास हो गए तो सैलरी बढ़ जाती है। बड़ों के तो मजे होते हैं। हमारा रिजल्ट अच्छा हो, तो भी तो मम्मी के सामने ही हाथ फैलाने पड़ेंगे।''

फिर दो एक दोस्तों से हाई हैल्लो!

करन ने सुबोध की शर्ट खींच ली, ''उसे देख, अध्ययन को - आएगा तो फर्स्ट। मगर ऐसे मुँह लटका कर घूम रहा है, मानो सचमुच फेल हो गया है। और वो - वो देख - उसकी मम्मी, - उधर गार्डेन में बैठ कर हनुमान चालीसा बड़बड़ा रही है। क्या सर्कस है!''

''करन, डर तो मुझे भी लग रहा है।''सुबोध के चेहरे पर बादल मँडराने लगे।

''छोड़ न यार। पहले रिजल्ट तो निकलने दे। फिसलने के पहले ही रोने से क्या फायदा?''

''तू तो जानता ही है, मैथ से मेरा माथा खराब हो जाता है। डैडी ने कह दिया है, अबकी मैथ खराब हुआ तो -!''

''इन पापा लोगों का और कोई काम नहीं होता क्या? सभी अपने बेटों के सामने ढिशूम ढिशूम बन जाते हैं। मम्मी लोग कितनी अच्छी होती हैं।''

''क्योंकि वे भी तो अपने बचपन में मैथ से डरती थीं।'' दोनों यार हँसने लगते हैं।

''बस, बात न सुनने पर रो देती हैं। वही सबसे बुरी बात होती है।'' दोनों एक दूसरे का हाथ थामे आगे बढ़ जाते हैं।

टन् टन् टन्... इतने में घंटी बजी। प्रेयर। भाशण का तोहफा - इस रिजल्ट से मत घबड़ाना। जिंदगी का सफर लंबा है। हर दिन एक एग्जाम। हिम्मत से काम लो! नेक्सट सेशन में मेहनत से पढ़ना... आदि, इत्यादि, वगैरह। फिर क्लास के अंदर। हाथ में रिजल्ट। मैडम की तिरछी निगाहें। दोनों बाहर आ गए...

सुबोध ने सबसे पहले मैथ के मार्क्स को ही देखा। चेहरे के बादल पानी बरसानेवाले ही थे।

''क्या हुआ बे?''

''वही हुआ जिसका डर था। मैथ में चौपट !''

करन सोच में पड़ गया। दोस्त के लिए उसके सीने में प्यार का पानी छलछलाने लगा। सुबोध के कंधे पर हाथ रखकर उसने उसके कान में कहा, ''तू चल, मेरे साथ।''

''कहाँ?''

''अरे चल तो -।''

दोनों को देखकर मैथ टीचर मुस्कुराई, ''क्या बात है?''

''मैम!'' करन उनके पास जाकर खड़ा हो गया, ''मैम, मेरे मार्क्स में से सुबोध को आधा दे दीजिए न। आपको अलग से उसका नंबर नहीं बढ़ाना है। वरना उसके डैडी उसे डाँटेंगे। देखिए वह रो रहा था। खुश हो जाएगा। दे दीजिए न मैम, प्लीज!''


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