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शोध

सूखा बरगद - मध्यवर्गीय मुस्लिम समाज की मानसिकता
स्वाती सिंह


मुस्लिम समाज की आर्थिक बदहाली के बहाने अल्पसंख्यक लोगों की समस्याएँ उजागर करने वाली रचनाओं से अलग 'सूखा बरगद' को पढ़ते समय और पढ़ने के बाद यह महसूस किया जा सकता है कि मंजूर एहतेशाम ने मध्यवर्गीय मुस्लिम समाज के अपने प्रत्यक्ष अनुभवों का उपन्यास में भरपूर प्रयोग किया है। विभाजन के बाद भारत में रह गए मुसलमानों विशेषतः शिक्षित मध्यवर्गीय मुसलमानों की मानसिकता का बयान 'सूखा बरगद' के कथ्य का एक अहम पक्ष है।

चाहे हिंदू हो या मुस्लिम समुदाय, उसमें मध्यवर्ग का एक खास स्थान होता है। विशेषतः पढ़ा लिखा मध्यवर्ग समाज की उन्नति, बौद्धिक विकास और परिवर्तन में वृद्धि करता है। मध्यवर्ग का उदय औद्योगीकरण और नगरीकरण के समांतर हुआ है, अतः इसमें परिवर्तनकामी सोच के प्रमाण भी मिलते हैं। हालाँकि मध्यवर्ग के अपने अंतर्विरोध कुछ कम नहीं होते। एक ही समय में वह प्रगतिशीलता के प्रमाण देता है तो कहीं अंधविश्वास और रूढ़िवाद का समर्थक भी होता है। सामाजिक संरचना में मध्यवर्ग की हैसियत 'त्रिशंकु' की तरह मानी गई है। त्रिशंकु एक पौराणिक पात्र है, जीवित ही स्वर्ग जाना चाहता था। लेकिन वह स्वर्ग और धरती के बीच लटका रह गया। मध्यवर्ग की आकांक्षा होती है कि वह समाज के उच्चवर्ग के समकक्ष हो जाए इसके लिए वह तरह-तरह के दिखावे करता है। लेकिन उच्च वर्ग का अहंकार और अभिजात्य उसे स्वीकार नहीं करता। इसके फलस्वरूप वह निम्नवर्ग से तो कट ही जाता है, उच्च वर्ग उसे स्वीकारता नहीं है, वह अपनी जड़ों से भी उखड़ जाता है।

मंजूर एहतेशाम का 'सूखा बरगद' मुस्लिम समाज खासकर मध्यवर्गीय मुस्लिम समाज की सोच और उनकी जीवनगत समस्याओं का व्यापक प्रमाणिक और प्रभावशाली चित्रण करता है। लेखक ने संप्रदाय निरपेक्ष रचनात्मक दृष्टि अपनाते हुए अपने समाज की मानसिक बनावट को उजागर किया है। यह उपन्यास बताता है कि मुस्लिम समाज अपने अर्थहीन हो चुके अतीत-गौरव के कारण ऐसी रूढ़ियों से अभी तक छुटकारा नहीं पा सका है जो कि उसकी तरक्की में बाधक हैं। भारतीय हिंदू समाज के मध्यवर्ग की तरह यह समाज भी दिखावे के फेर में आकर खोखला समाज बनता जा रहा है। ऐसा समाज जो शिक्षा और समाज से संबंधित नई सोच से तालमेल बिठाने में असमर्थ हो रहा है। अपनी अभिजातीय दृष्टि के कारण यह समाज अपने से नीचे जीवन गुजारने वाले अपनी ही बिरादरी के लोगों के साथ बराबरी का व्यवहार नहीं करता और स्वयं को वह अंधविश्वास, अशिक्षा और अज्ञानता के ऐसे जाल में जकड़ता जा रहा है, जहाँ से बाहर निकलने का कोई रास्ता दिखाई नहीं देता है।

'सूखा बरगद' में मंजूर एहतेशाम ने शिक्षित मुस्लिम परिवार को केंद्र में रखा है। उदार विचारों के अब्बू और परंपरा प्रिय अम्मी के वैचारिक संघर्ष और उससे उत्पन्न व्यावहारिक कठिनाइयों के बीच बच्चों - रशीदा और सुहैल की परवरिश होती है। एक ओर माँ से प्राप्त संस्कार हैं जो समाज में रूढ़ियों के रूप में प्रचलित है, दूसरी ओर अब्बू के माध्यम से नए सोच, नए जमाने की हवा है जो बच्चों के मानसिक-बौद्धिक विकास को सही दिशा देती है। उपन्यास की कहानी रशीदा के अवलोकन बिंदु से अधिकतर कही गई है। उसमें परिवार के दो तरह के मूल्यों के बीच में झूलते रहने और फिर अपना एक रास्ता चुन लेने का साहस है और वह बदले हुए जमाने की अपने पैरों पर खड़ी, अपने कैरियर के प्रति जागरूक मुस्लिम युवती के रूप में आश्वस्त करती है। उपन्यासकार ने दिखाया है कि अनेक बाधाओं से जूझते हुए वह न केवल उच्चशिक्षा प्राप्त करती है, बल्कि आकाशवाणी में नौकरी करने की हिम्मत भी करती है। रशीदा के माध्यम से उपन्यासकार ने मध्यवर्ग की मानसिकता पर कहीं सीधे तो कहीं संकेतों में अर्थपूर्ण टिप्पणियाँ की हैं। ये टिप्पणियाँ आरोपित और मात्र वैचारिक न होकर उपन्यासकार के अनुभव संसार से छन कर निकली लगती है। इनसे पता चलता है कि अनुभव की प्रामाणिकता 'समय की प्रामाणिकता' बन कर कृति में उपस्थित है और सतही न होकर पात्रों की गहरी संवेदना के रूप में व्यक्त हुई है।

यह उपन्यास एक स्त्री-चरित्र रशीदा के माध्यम से कहानी कहता है। रशीदा एक बेहद मजबूत पात्र है। वह पेचीदा और अनदेखे रास्ते के बीच अपने लिए नई राह का चुनाव करती है। वह जिस रूढ़िग्रस्त समाज में आँखें खोलती है; उसे हर मोड़ पर खुली आँखों से देखती है। उसकी पड़ताल करती है और अपने निष्कर्ष देती है। वह आत्मनिर्भर और अपना रास्ता चुनना और अपनी बात पर कायम रहना कठिन काम है। तमाम मुश्किलों से जूझते हुए भी रशीदा उच्च शिक्षा पाने के बाद आकाशवाणी में नौकरी करती है और अपने समय और समाज की तार्किक आलोचना करने के साथ-साथ तरक्की के सूत्र भी प्रस्तुत करती है। खानदान के दरख्त जिसे मुसलमान परिवारों में 'शजरा' कहा जाता है, को आधार बना कर रशीदा ने मध्यवर्गीय मनोवृत्ति का अच्छा और सटीक विश्लेषण किया है। अपनी कुलीनता का दंभ, अपने रक्त की शुद्धता का आग्रह न केवल मुसलमान मध्यवर्ग की विडंबना है, अपितु यह पूरे मध्यवर्ग की सीमा है। मंजूर एहतेशाम ने इस मध्यवर्गीय दुराग्रह के स्वरूप को व्यक्त करने के साथ-साथ इसके दूरगामी परिणामों पर भी निगाह डाली है। इस सिलसिले में एक लंबा उद्धरण अनुचित न होगा - "इस खानदानी शजरे की काट-छाँट करने वाली इसे तरतीब देने और इस बात का फैसला करने वाली कि किस शाख को कहाँ खत्म हो जाना चाहिए, किसे याद रखना अथवा किसकी ओर से लापरवाह हो जाना चाहिए, एक विशेष मध्यवर्गीय मनोवृत्ति लगती है, जिसे न तो इस बात का गुमान या गलतफहमी होती कि उनमें कोई ऐसा भी पैदा हो सकता है जो अकेला सारे शजरों-सिलसिलों पर भारी पड़े, न ही इतनी हिम्मत और हौसला कि वह अपने खानदानी दरख्त पर चोरी, बदमाशी और एक सीमा से नीचे की गरीबी और हरा-भरा पनपता देख सके। जो मध्यवर्गीय संस्कारों की इज्जत-आबरू बचाए रखने के लिए किसी प्रकार की बेईमानी करने से भी नहीं चूकती और जिसकी मंशा बस इतनी ही होती है कि खम ठोंक कर दुनिया से कह सके - देखा! हमारा खून कितनी पीढ़ियों से बिना किसी मिलावट के चला आ रहा है।"

मंजूर एहतेशाम ने 'सूखा बरगद' में मुस्लिम समाज में व्याप्त गौरवशाली लेकिन आज निरर्थक साबित हो चुके अतीत के मोह को निशाना बनाते हैं। यह समाज अपनी खानदानी कुलीनता की दुहाई देते हुए वह अक्सर भूल जाता है कि वह सब अतीत की बात थी और आज जमाना बदल चुका है। यह खोखला दंभ उन्हें आगे बढ़ने से रोकता है। उच्चवर्गीय रक्त की शुद्धता बात करना यह दर्शाता है कि जमाने के साथ उनकी सोच नहीं बदली है। जबकि यह सब आज अर्थहीन हो चुका है। इससे व्यक्ति का व्यक्तित्व खंडित होता है और उसका आचरण शक के दायरे में आ जाता है। अम्मी अपने पिता के बारे में बड़े गर्व से बताती है। उन्हें बताते हुए बड़ा अभिमान होता है कि उनके पिता नवाब के बावर्चीखाने में काम करते थे। सुहैल इस पर व्यंग्य करते हुए कहता है - साफ-साफ कहिए ना कि महल में बावर्ची थे। खाना बनाते थे। यह वास्तविकता है कि अम्मी के परिवार का अतीत भी इतना खुशहाल नहीं रहा है फिर भी उन्हें उस पर गर्व है। जबकि अब्बू यथार्थवादी हैं। वह आसानी से कह देते हैं कि वे मामूली सिपाही के बेटे हैं। यही आधुनिक दृष्टि है। लेकिन अतीत के व्यायोह में फँसे और अपनी हीनता-ग्रंथि को कुलीनता के दंभ से ढकने में सूचना मध्यवर्ग आज भी जुटा हुआ है।

सुहैल के मित्र विजय और रशीदा की बातचीत में इस महत्वपूर्ण सत्य को कहा गया है कि मध्यवर्गीय व्यक्ति यदि कोई सामंती सोच से थोड़ा हटता है तो प्राचीन परंपरा और संस्कृति के गुणगान में लग जाता है। विजय का कथन था कि हिंदुस्तान की संस्कृति पर गर्वित होना अनुचित नहीं है। यहाँ रशीदा का विचार स्वयं उपन्यासकार का विचार लाता है। वह साफ कहती है - "लेकिन क्या जो बस उसी का कसीदा पढ़ते रहना काफी है? तुम नहीं समझते कि यह संस्कृति जैसे शब्द अगर डिक्शनरी से निकाल दिए जाएँ तो देश के लिए बहुत अच्छा होगा?" उसका सुझाव है - 'सारे लोग पास्ट से नाता तोड़ कर किसी ऐसी चीज को अपनाएँ जो आज के इनसान के दिमाग के ज्यादा करीब हो।"

पूँजीवादी मानसिकता के प्रसार ने मुस्लिम मध्यवर्ग कों खूब प्रभावित किया है। जहाँ रक्त की शुद्धता निर्णायक हुआ करती थी, वहा अब रिश्तों का निर्धारण 'संपन्नता से होने लगा है।' 'गरीबी' को अभिशाप समझ कर गरीब रिश्तेदारों के प्रति उपेक्षा और अवज्ञा का भाव और अमीरों का सम्मान बढ़ जाना एक खतरनाक प्रवृत्ति है, जिसे उपन्यासकार ने गंभीरता से लिया है।

"मध्यवर्ग दुनिया की दूसरी सैकड़ों बुराइयों को फिर भी बर्दाश्त कर सकता है, उनकी ओर से आँखें मूँद सकता है, लेकिन एक बुराई ऐसी है, जिसे कबूल करने की कोशिश में लाख चाह कर भी कामयाब न हो सका। चोर-कातिल, बेईमान आदि हद तक खंदा-पेशानी से कबूल - एक सीमा से नीचे की गरीबी पसंद नहीं।"

यही वजह है कि आज 'खानदान' का नाम लेते समय दूरदराज के ताल्लुक वाले अमीर लोगों की गणना तो होती है, खून के हिसाब से बेहद करीब रिश्तेदार गरीब होने से खानदान के बाहर गिने जाते हैं। यह सोच और इस सोच का व्यावहारिक रूप मध्यवर्गीय परिवार का एक जीता जागता प्रमाण है। मुस्लिम समाज के लिए तो यह और भी चिंताजनक है, क्योंकि वहाँ जाति और वर्ग पर आधारित विभाजन मान्य नहीं है। उपन्यासकार ने इस प्रकार की मनोवृत्ति को बहुत सलीके से खारिज किया है। उसने दिखाया है कि किस तरह अब्बू के समय में उनके परिवार को खानदान में महत्वपूर्ण दर्जा हासिल था क्योंकि वे संपन्नता की परिधि में आ जाते थे। लेकिन उनकी मृत्यु के बाद परिवार की उपेक्षा शुरू हो जाती है। लोग बिना किसी जोखिम या डर के लापरवाही का सुलूक करने लगते हैं। परवेज जैसे कुछ रोशन दिमाग अवश्य इस मनोवृत्ति से बचे हुए हैं, इसलिए रशीदा और सुहैल से बहुत अपनेपन के साथ मिलते हैं। परवेज के आने पर उनके यहाँ रिश्तेदारों की भीड़ जुटने लगती है लेकिन परवेज इन अजनबी रिश्तों के बोझ को बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं। उनके मुल्क छोड़ने के कारणों में एक यह भी प्रमुख कारण है कोई भी चला आ रहा है - यह चचा जान हैं! यह मामू जान हैं! दावतें हो रही हैं, रोज अजनबी और बेवकूफ लोगों को खफा करने के डर से आप उनकी खिदमत में हाजिरी दे रहे हैं। मैं कहता हूँ - क्यो? मैं अपनी मर्जी से क्यों नहीं आ जा सकता? यह कथन संकेत देता है कि पढ़े-लिखे युवा अब मध्यवर्गीय दिखावे की प्रवृत्ति से ऊब चले और अपनी शर्तों पर जीने के इच्छुक हैं।"

पढ़ा-लिखा मुसलमान मध्यवर्गीय मनोवृत्ति से उबरने की कोशिश में है। अब्बू, परवेज, रशीदा, सुहैल आदि पात्रों का आत्मसंघर्ष इस संदर्भ में दर्शनीय है। ये सभी प्रगतिशील विचारों की रोशनी में नए रास्तों की ओर बढ़ रहे हैं।

मंजूर रहतेशाम ने देश-विभाजन, औद्योगिकरण, जनतांत्रिक व्यवस्था, नगरीकरण आदि परिवर्तनों की पृष्ठभूमि में मुस्लिम मध्यवर्ग की समस्याओं को विस्तार से बयान किया है। इस बयान के भीतर से ही समाधान की दिशाएँ भी खुलती हैं। हालाँकि अन्य समाजों की तरह मुस्लिम समाज भी आधुनिकता के संपर्क में आया है, सोच-विचार, खान-पान के तरीके बदले हैं, फिर भी उसकी खासी शक्ति आज भी धार्मिक-सामाजिक रूढ़ियों से टकराने और जुझने में जाया हो रही है।

यद्यपि मुस्लिम मध्यवर्ग और हिंदू मध्यवर्ग की अधिकतर समस्याएँ एक जैसी हैं। लेकिन उपन्यासकार ने एक ऐसी समस्या उठाई है, जिसका संबंध मूलतः मुसलमानों के धार्मिक विश्वास से है। इस विश्वास की तहत सूअर का मांस खाना मुसलमान-मात्र के लिए वर्जित है, ठीक वैसे, जैसे किसी हिंदू के लिए गाय का मांस। आने वाली सुहैल की पीढ़ी को वे अधिक उदारवादी और वैज्ञानिक सोच वाली देखना चाहते हैं। सुहैल को इस बात के संदर्भ में वे कहते हैं - "जब दो हिंदू एक-दूसरे से लड़ते हैं या एक मुसलमान एक-दूसरे को छुरा मार देता है, तो असगर-साहब को उनकी जिहालत पर कोई दुख नहीं होता, लेकिन अगर एक हिंदू और मुसमान में तू-तू मैं-मैं भी हो जाए तो उन्हें उसके पीछे सियासत ही सियासत नजर आती है।"

रशीदा के माध्यम से बार-बार यह बात दोहराई गई है कि उनके परिवार की पहचान उनके सामाजिक-आर्थिक स्थिति के कारण निर्धारित होती है, ना कि एक संप्रदाय विशेष से होती है। रशीदा की सोच में हिंदू-मुसलमान का सामाजिक-आर्थिक स्थिति को एक-सा बनाने वाले कारण यहाँ की सामाजिक और आर्थिक नीतियों पर निर्भर है। लेकिन धर्म के आधार पर राजनीति करने वाले इसे नहीं मानते। वे इसका आधार धर्म में ही ढूँढ़ते हैं और इसके लिए निरंतर कोशिश करने में लगे है कि हिंदू-मुसलमान संप्रदाय इस पर विश्वास करें और इस आधार पर आपसी-मतभेद बने रहे। सिर्फ हिंदू-मुसलमान को दो संप्रदायों में बाँटकर अपना महत्व बढ़ाना भ्रष्ट राजनीति का प्रथम मुद्दा बना हुआ है। मानवीय संवदेनाओं का लोप हो रहा है। कल तक भाईचारे रहने वालों के मन में एक-दूसरे के प्रति विद्वेष भरने वाले प्रसंगों का बोलबाला बढ़ता जा रहा है।

'सूखा बरगद' में उपन्यासकार का सरोकार मुख्यतः दो मुद्दों से संबंधित है। एक ओर उपन्यासकार का पूरा ध्यान स्वातंत्रयोत्तर भारत में मध्यवर्गीय मुस्लिम समाज की मानसिकता के बयान के प्रति रहा है, दूसरी ओर अल्पसंख्यक समाज में असुरक्षा के कारणों की शिनाख्त करना भी उसका एक उद्देश्य है।

मध्यवर्गीय मुस्लिम समाज की मानसिकता के तीन विशेष पक्ष 'सूखा बरगद' के मध्य से संबंधित हैं। मध्यवर्गीय मनोवृत्तियों - अतीत मोह, व्यर्थ का दिखावा और कथनी-करनी में भेद आदि को अल्पसंख्यक समाज में भी रूढ़ियों के रूप में रेखांकित किया गया है। कुलीनता, रक्त की शुद्धता के प्रति मुसलमानों में दंभ की हद तक पहुँचा हुआ आदरभाव है। लेकिन 'गरीबी' एक अभिशाप है। गरीब रिश्तेदार से दूसरों के संबंध क्रमशः शिथिल पड़ते जाते हैं। 'सूखा बरगद' में अब्बू के परिवार का खानदान में धीरे-धीरे हाशिये पर पहुँच जाना इस प्रवृत्ति का प्रमाण है। पढ़े-लिखे मध्यवर्गीय युवा जरूर इस मनोवृत्ति का उल्लंघन करने के लिए प्रयास कर रहे हैं।

मंजूर एहतेशाम ने 'सूखा बरगद' में आजादी के बाद से लेकर आठवें दशक तक के राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक बदलाव की प्रवृत्ति को अभिव्यक्त करने की कोशिश की है और इस व्यापक संदर्भ में मध्यवर्ग के जीवन यथार्थ को चित्रित करना चाहा है। मुस्लिम जीवन के यथार्थ और उनकी बदलती सोच को वह बहुत गहराई और प्रमाणिकता के साथ चित्रित करने में सफल हुए हैं।


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