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बात-चीत

मैं कथक को नहीं, बल्कि तहजीब को प्रस्तुत करती हूँ : रानी खानम
अवंतिका शुक्ल


लखनऊ घराने की प्रख्यात कथक नृत्यांगना रानी खानम आजादी के बाद भारत की पहली मुस्लिम कत्थक नृत्यांगना हैं, जिन्होंने खुद को इस ऊँचाई पर स्थापित किया है। अपने कर्म एवं विचारों से मजबूत रानी ने कथक का प्रारंभ वंदना के स्थान पर अजान से कर कथक की धर्मनिरपेक्ष परंपरा को मजबूत करने में अपना एक कदम आगे बढ़ाया है। सूफी परंपरा को साथ में लेकर कथक में उन्होंने अभिनव प्रयोग किए, साथ ही सामाजिक सरोकारों से भी नृत्य को जोड़ा। रानी खानम के निवास स्थान पर की गई इस बातचीत में उनके जीवन के विभिन्न संघर्षों और चुनौतियों पर प्रमुखता से बात की गई है।

अवंतिका शुक्ल : सबसे पहले आप अपने बचपन के बारे में बताइए। आपका रुझान इस नृत्‍य की तरफ कैसे हुआ?

रानी खानम : मेरी पैदाइश एक मुस्लिम परिवार में हुई थी। जहाँ पर नाच गाना नहीं होता था। मेरा मानना है कि कलाकार पैदाइशी होता है। सुर ताल से लगाव हो जाता है। अगर खुदा ने आपको कलाकार बनाकर भेजा है, तो आपकी रूह भी वैसी ही हो जाती है। उन्‍हीं चीजों की तरफ आप आकर्षित होने लगते है। बचपन में मुझे शास्‍त्रीय गीतों से बहुत लगाव था। बहुत समझ में नहीं आते थे पर एक सम्‍मोहन उनकी तरफ खींचता था। बचपन से मैं बहुत जिज्ञासु रही हूँ। मुझे अपने आप से सवाल करना अच्‍छा लगता था। अक्‍सर मैं शीशे में खुद से बातें करती रहती थी। मैं कौन हूँ? कहाँ से आई हूँ? क्यों आई हूँ? परिवार वाले कहते थे, यह कुछ अलग है। मैं बहुत संवेदनशील थी, कम बात करती थी। बचपन से तह तय होती रही हैं। परिवार वालों के सहयोग से मैंने गुरु फतेह अली खाँ साहब से कथक नृत्‍य सीखने की शुरुआत की। मेरे भाई और मेरी पढ़ाई-लिखाई के लिए हमें दिल्‍ली लाने की तैयारी की गई। इस प्रकार हमारी शिक्षा शुरू हुई। दिल्ली आने के बाद मन में हुआ कि यहाँ आए हैं, तो कथक केंद्र में भी कथक सीखेंगे। बिरजू महाराज जी का बहुत नाम सुना था, सो यह इच्‍छा भी थी कि उनसे नृत्‍य सीखा जाए। मेरे भीतर नाच को लेकर जुनून था, मैं घंटों रियाज करती थी। जब तक कोई मुझे रोकने को नहीं कहता था, तब तक मैं रुकती नहीं थी। फिर मेरा एडमीशन कथक केंद्र नई दिल्‍ली में हो गया। यहाँ मुझे श्रीमती रेवा विद्यार्थी जी से सीखने का मौका मिला। किसी विद्यार्थी के लिए वे बेहतरीन गुरुओं में से एक थी। उनसे तीन-चार साल नृत्‍य सीखने के बाद मैं पं. बिरजू महाराज के पास गई और वहाँ से तालीम हासिल की। मेरा जो नाच का तरीका है या सफर है, उसकी शुरुआत यहीं से होती है।

अवंतिका शुक्ल : आप बिहार के गोपालगंज इलाके से आती हैं। इस इलाके के एक मुस्लिम परिवार की बेटी होने के नाते इस नृत्‍य में आपका आना कैसा रहा, सामान्‍य या आपको संघर्ष करना पड़ा?

रानी खानम : शुरुआत में तो परिवार को ही संघर्ष करना पड़ा। बचपन में तो समझ में आता नहीं है क्‍योंकि हर चीज हमें तश्‍तरी में सजी मिलती है। ऐसा नहीं था कि हर चीज मेरे माँगने पर तुरंत मिल ही जाए फिर भी मेरी माँ और नानी ने मेरे लिए काफी संघर्ष किया। आर्थिक स्थिति काफी प्रभावित करती है। छोटी जगह से उठकर बड़े शहर जाना, घर लेना, बच्‍चों को पढ़ाना, नाच सिखवाना यह सब छोटी बातें नहीं हैं। यह बड़ी बात है। मेरी माँ ने बहुत संघर्ष किया और उनके मन में यह बात थी कि मेरी बेटी कुछ न कुछ जरूर बनेगी। आज मैं जो हूँ, मेरी माँ के कारण ही हूँ आज वो नहीं रही, पर सारा श्रेय उनको जाता है। जब मैं तालीम ले रही थी तो मैं उनकी तकलीफ देखती थी। आर्थिक स्थिति को लेकर कुछ दिक्‍कतें या फिर मेरा कोई गॉड फादर नहीं था, कॉन्‍टेक्‍ट नहीं थे। यह तकलीफें मेरे दिल में घर करती चली गई। यहीं से शुरुआत होती है, अपने आप को खोजने की, कुछ कर गुजरने की। मुझे लगा कि जब मेरे ऊपर इतनी मेहनत की जा रही है, तो मुझे भी कुछ बनना है। पहले तो मेरे मन में था कि मुझे डांसर बनना है पर फिर लगा कि डांसर तो हर गली शहर में मिल जाते हैं। मुझे राष्‍ट्रीय स्‍तर के नर्तकों में भी सबसे आगे की श्रेणी की नर्तकी बनना है। एक खास काम करके मुझे खुद को जुदा रखना है, काम में नयापन लाकर, एक खोज करके। कई नए काम मैं करती रहती हूँ जैसे कि कथक नृत्‍य में सूफियाना प्रभाव शामिल करने वाली मैं पहली मुस्लिम नर्तकी हूँ। मैंने इस्‍लामिक वर्सेज को लेकर नाचा है। तमाम बदिशों को लेकर, फैज़, गालिब, जॉक की रचनाओं को लेकर काम कर रही हूँ। समुदाय आधारित काम भी करती हूँ, जैसे महिलाओं के मुद्दों पर खासतौर पर मुस्लिम महिलाओं के मुद्दों पर।

अवंतिका शुक्ल : आपने अपने नृत्‍य के माध्‍यम से किस प्रकार के मुद्दे उठाए हैं?

रानी खानम : मैं एक मुस्लिम महिला हूँ तो मेरे भीतर मुस्लिम महिलाओं को लेकर एक तकलीफ रही है। मैंने देखा कि नृत्‍य की शुरुआत कैसे होती है। जैसे मैं अपने दिन की शुरुआत नमाज या अजान से करती हूँ। जब मैं नृत्य सीखने लगी तो मैं वंदना आदि के संपर्क में आई। ठीक है। वो भी मैंने किया। मैं इन मामलों में खुले दिमाग की रही हूँ क्‍योंकि उसके भीतर (वंदना) की आत्‍मा मैं देखती थी। क्‍योंकि हर कला की आत्‍मा में एक दैवीय शक्ति है। कहीं ना कहीं भक्ति की तरफ से ही नृत्‍य शुरू हुआ, बाद में लोग इसे मनोरंजन के रूप में ले गए। पर इनपुट मनोरंजन ही है। वैसे इसका आधार भक्ति ही है, जैसे पुराण हैं, भगवद्गीता है। एक बार मुझसे कहा गया कि आप वंदना से शुरू करिए, तो मैंने सोचा कि मैं तो खुदा को मानती हूँ और वैसे दोनों बात तो एक ही है। तो फिर मैंने अल्‍लाह ही अल्लाह, तू दिलेशान से ही नृत्‍य की शुरुआत की, क्‍योंकि वो भी खुदा की ही इबादत थी। मैंने शिविर नामक एक अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्‍ट भी लिया, जिसमें घरेलू हिंसा के मुद्दे को केंद्र में रखा कि किस तरह हर किस्‍म की महिलाओं के साथ यह हिंसा होती है। ऐसा नहीं कि यह सिर्फ गाँव की महिलाओं के साथ ही होती है। बल्कि कस्बे, नगर, महानगर सभी की महिलाएँ इससे जूझती हैं। मैंने अलग-अलग श्रेणियों की महिलाओं को लेकर कि उन पर किस-किस प्रकार से हिंसा होती है, नृत्‍य के माध्‍यम से प्रस्‍तुत किया। साथ ही कैसे वे मानसिक रूप से प्रताड़ित की जाती हैं। दूसरा मैंने एड्स पर भी काम किया। कई बार वे खुद इसका शिकार बन जाती हैं, बहुत सी को अनचाहे अपने पतियों से भी यह बीमारी मिल जाती है। इन चीजों पर मैंने गंभीरता से काम किया है। बहुत सारे प्रश्‍न थे, भीतर तक झिंझोड़ने वाले। मुझे लगता है कि प्रदर्शनकारी कला मानवता के लिए एक औजार (tool) की तरह काम करती है। एक इनसान के भीतर हम प्रदर्शनकारी कला का जो रूप देखते हैं या अगर हम प्रदर्शन कला को एक जगह खड़ा करके देखते है, तो मेरा मानना है कि हर देश, शहर की प्रदर्शन कला उसका आईना होती है। मगर उस देश की प्रदर्शनकारी कलाएँ बहुत ऊपर आई हों तो वो उस देश की समृद्धि का सूचक होता है। किसी देश की समृद्धि का आईना उसकी संस्‍कृति होती है। जहाँ संस्‍कृति चोटी पर जाती है, उस देश को आप बहुत समृद्ध मान सकते हैं। यह एक अलग रूप है। पर अगर हम प्रदर्शन कला को समुदाय (Community Base) के लिए उपयोग करने लगे तो इससे बड़ी बात कुछ नहीं है। कलाकार का कर्तव्‍य सिर्फ नाचकर रह जाना ही नहीं है। नाच सिर्फ कुछ हजार एलीट (उच्‍च वर्ग) लोगों के लिए ही नहीं बना है। आप उस लीक से निकलिए व आम आदमी तक पहुँचिए, नहीं तो आप सर्कस करने लगते हैं। मिमिक्री करते हैं। अगर आप एक बड़ा कार्यक्रम कमानी ऑडीटोरियम में उच्‍च वर्ग को देते हैं, तो वही प्रोग्राम अगर आप मेला में देते हैं, तो वह अलग होता है, क्‍योंकि मेले में हर तरह के लोग आते हैं, उसमें आपको उनका मनोरंजन करना होता है। पर यही कार्यक्रम आप किसी खास मकसद या खास मुद्दे के लिए करते हैं, तो आप उसमें प्रदर्शन कला को एक औजार की तरह इस्‍तेमाल करते हैं, और आप लोगों तक संदेश पहुँचाते हैं। तो किसी कला को बहुरूपी होना चाहिए। हर तरह की चीजों को आप भरपूर करें, ऐसा मेरा मानना है। नाच कर खुश हो जाना ही उद्देश्‍य नहीं होना चाहिए। मेरे पास डिसएबल बच्‍चे भी हैं। मेरे पति भी डिसएबल बच्‍चों के लिए बहुत काम करते हैं। मेरे यहाँ, धीमें सीखने वाले बच्‍चे, सुनने की परेशानी से ग्रसित बच्‍चे भी हैं। वो सब नृत्‍य सीखते हैं, और इससे उन्‍हें बहुत फायदा होता है। हमारा थिएटर पहला ऐसा थिएटर है, जो डिसएबल बच्‍चों के लिए समर्पित है। इस कला को हम एक उपचार के रूप में प्रयोग करते हैं। उनको ऊपर उठाने का काम करते हैं। सामान्‍यतः हम कहते हैं कि हमारे परिवार में कोई अच्‍छा गायक है या नर्तक है, उसे अवसर नहीं मिल पाया। पर हम डिसएबिलिटी के बारे में नहीं सोचते हैं। उनमें भी कला का हुनर होता है। बहुत से लोग कलाकार होते है। पर वे चाय पान की दुकान पर बैठते हैं, अखबार बेचते हैं, और कहते हैं कि हम कुछ नहीं कर सकते। उन कलाकारों को वहाँ से निकाल कर एक मंच प्रदान करना, उनकी आय से इसको जोड़ना। हमारे आयाम काफी अलग हैं। हम केवल एक जिंदगी से ही इसे नहीं देखते बल्कि विभिन्‍न रूपों में इसे देखते हैं। फिलहाल मैं नेत्रविहीन बच्‍चों के साथ नृत्‍य के माध्‍यम से काम करने जा रही हूँ।

अवंतिका शुक्ल : यह बहुत बेहतर है, और अलग भी। अमूमन घरानों में एक खास किस्‍म से ही नृत्‍य किया जाता है। परिवर्तन का प्रयोग सीमित संदर्भों में ही किया जाता है। सामाजिक मुद्दों को नृत्‍य में जोड़ना कथक में एक बड़ा परिवर्तन है, जो खासतौर पर कत्थक नृत्यांगनाओं द्वारा किए जा रहे हैं।

रानी खानम : हाँ। वैसे घराने तो लोगों से बने हैं, न आपने बनाया न हमने बनाया। कोई व्‍यक्ति विशेष ने अपनी कला की खूबसूरती, अपनी नवीनता को एक नाम दे दिया और वह घरानों के रूप में आ गया। यह घराना 200 साल पहले तो था ही नहीं। 100 साल पहले भी नहीं था। यह अभी की कहानी है। कथक इन सबसे ऊपर है।

अवंतिका शुक्ल : स्‍वंतत्रता प्राप्ति के बाद, या उससे पहले।

रानी खानम : उससे थोड़ा पहले लोग कह सकते हैं, मेरा खयाल से वर्गीकरण स्‍वतंत्रता प्राप्ति के बाद आस-पास ही होगा।

अवंतिका शुक्ल : वाजिद अली शाह के समय के आस-पास।

रानी खानम : हाँ। पर उस समय घराने हुआ नहीं करते थे। लखनऊ के नर्तक लखनऊ के कहलाते थे। अब रायगढ़ की बात करें, तो वहाँ राजा चक्रधर सिंह, लखनऊ जयपुर दोनों जगह से कलाकारों को अपने दरबार में बुलाते थे। वे वहाँ लंबे समय रहते थे और नृत्‍य की शिक्षा भी देते थे। वहीं रहते हुए इन लोगों ने कई बंदिशें लिखीं, नई तरह के नृत्‍य बनाए और उसे नाम दे दिया रायगढ़ घराना। बनारस घराने के लोगों ने कहा हम नृत्‍य के बोलों पर नाचेंगे, इस पर नहीं नाचेंगे। तो घराने तो हैं और उनकी खूबसूरत बात यह है कि इसमें विशेषताएँ दिखती हैं पर आज का कथक इन सब से ऊपर चला गया है। आज का कथक घरानों से ऊपर है, और बेहतर होता जा रहा है। यह और बात है कि आप घरानों की जो खास बात है, जैसे लास्‍यता है, भाव है उसको आप बरकरार रखने के साथ-साथ आगे बढ़ सकते हैं। मैं एक खास बात कहना चाहती हूँ कि आज जो नाच है, वो 10 साल पहले नहीं था। 10 साल पहले का नाच उससे पहले नहीं था, तो वक्‍त के साथ नृत्‍य बदलता रहता है। यह आगे भी बदलेगा और बेहतर बदलेगा। गाना-कपड़ा सब ट्रेंड की तरह है। जैसे विचारधाराएँ बदलती हैं, वैसे ही चीजें बदलती जाती है। जो परंपराएँ होती हैं, जैसे घराने या प्रदर्शनकारी कला कहा जाता है, 2000 साल से था, मंदिरों से चला आ रहा है, तो हो सकता है उस समय मंदिरों में हो। उसके बाद कहाँ-कहाँ कैसे फैली। पर आज जिंदा तो है, क्‍योंकि पंरपरा यानी के प्रवाह। वही परंपरा जीवित रहती है, जो नदी की तरह आगे बहती है। जो नदी रुक जाती है, वह नाला बन जाती है, सड़ जाती है, गल जाती है, सूख जाती है, पर जो समय के साथ आधुनिकता और विचारों को लिए हुए चलती रहती है, वही परंपराएँ, वही जिंदगी जीवित रहती है। नृत्‍य संगीत या जो भी परंपराएँ हो, जैसे नृत्‍य या खाना हो, पीना हो, कपड़ा, मसाले आदि, वे समय और विचारों को लेकर आगे बढ़ी हैं। अगर आज मैं कुछ नया कर रही हूँ, तो उसमें आज के समय को शामिल किया है और लेकर चल रही हूँ। आगे कोई और कुछ करेगा, तो यही परंपरा है।

अवंतिका शुक्ल : आपका काम कई मायने में खास है। जैसे पूरे कथक डांस की परंपरा को भक्ति और मंदिर से जोड़कर देखा जाता है पर सारे भारतीय नृत्‍यों में से वह एक ऐसा नृत्‍य है, जिसमें दो धर्मों का एक सामंजस्य देखने को मिलता है। दोनों ने ही इसमें बढ़ चढ़कर योगदान दिया है। पर क्‍या कारण है कि सारे गुरु ब्राह्मण ही दिखते हैं? मुस्लिम क्‍यों नहीं? नियंत्रण खास जाति या वर्ग या धर्म के हाथ में कैसे आ गया? क्‍या इसका कोई धर्मनिरपेक्ष रूप रहा है?

रानी खानम : इस नृत्‍य के धर्मनिरपेक्ष रूप में विकसित होने को दुनिया मानती है। अगर वाजिद अली शाह न होते, तो यह कथक खतम हो गया होता। आखिरी की बात कह रही हूँ मैं। यह भारतीय शास्‍त्रीय नृत्‍य है, इसमें से आप आध्‍यात्मिकता को अलग नहीं कर सकते। शास्‍त्रीय नृत्‍य के जितने आयाम है, वो मुद्राओं के ऊपर आधारित हैं। यह मानना सही है कि बहुत सारे मुस्लिम लोग भी रहे हैं। आशित हुसैन खाँ साहब है, यह लोग पार्टीशन के बाद पाकिस्‍तान चले गए। इसलिए यह जड़ से टूट गया। अगर वो रहे होते तो शायद आपके पास कहने के लिए भी कुछ रहता। वहाँ पर कला का दमन किस प्रकार किया जाता है आप जानती ही हैं। मेरा एक शागिर्द है। उसका नाम फारूख है, वो भी नृत्‍य सीखते हैं। तीन-चार साल वहाँ उन्‍होंने आशिक हुसैन खाँ साहब से सीखा है, कई और बड़े-बड़े कलाकारों से सीखा है। ऐसा नहीं है कि दरकिनार किया गया है। मैं आपको बताती हूँ कि बाबरनामा में कई पर्शियन डांसरों का जि़क्र है जिन्‍हें बाबर हिंदुस्‍तान लेकर आए थे। मैंने अपना एक पेपर न्‍यूयॉंर्क परफॉर्मिग आर्ट लाइब्रेरी में पढ़ा था। Contribution of Islamic Culture in Indian Dance... उसमें मैंने कथक को प्रस्‍तुत किया था। उसमें कथक में कौन-कौन सी बातें, खजाने इस्‍लामिक योगदान के कारण बने। जो रंग मंडल 50-60% कथक में नाचा जाता है, वह पुराना इस्‍लामिक योगदान ही है। जैसे 'गतनिकास' या 'गत भाव' इसमें जितनी चीजें हैं। अंदाज में जितनी चीजें हैं, यह हमारी नहीं है, पर्शियन की है। आप उस समय की पेंटिंग देखेंगे तो पता चलेगा कि आज के नृत्‍य की तमाम मु्द्राएँ उस समय जैसी ही हैं। इस पर किसी ने काम नहीं किया। ऐसा नहीं है कि लोग इसे मानते नहीं है पर इस पर और काम करने की आवश्‍यकता है।

अवंतिका शुक्ल : जब आपने नृत्‍य सीखना प्रारंभ किया था, तब आपके माता-पिता का क्‍या नजरिया था। वे इसे सिर्फ शौकिया तौर पर देख रहे थे, या वे इस क्षेत्र में आपके स्‍टेज पर नृत्‍य प्रदर्शन या कैरियर के लिए भी उत्‍सुक थे।

रानी खानम : पहले तो मैं ऐसे ही सीख रही थी। पर 14-15 साल के बाद उन्‍हें दिक्‍कतें आने लगी कि मुस्लिम परिवार की लड़की है, शादी कैसे होगी? कहीं मँगनी वगैरह भी कर दी और कहा कि देखो अब यह नाच-वाच किसी स्‍कूल में सिखाना। ऐसा नहीं था कि उन्‍होंने मना किया था। फिर उन्‍होंने कहा कि शादी वगैरह कर लो। तब तक मैं काफी जागरूक हो चुकी थी। मैंने कहा, मैं तो इसी कला की साधना करूँगी। नाचना ही मेरा मुख्‍य ध्‍येय है। शादी वगैरह तो बाद में आती है। जब मैं नहीं मानी तो उन्‍होंने कहा कि अब यह तुम पर है कि इसका जो भी सकारात्‍मक नकारात्‍मक परिणाम हो, उसकी जिम्‍मेदारी तुम पर है। आगे जाने पर बहुत सारी परेशानियाँ आयेंगी, तुम अपने आपको इन सबके लिए तैयार रखना। मैंने कहा कि ठीक है, कोई चिंता नहीं है, और इस तरह से मैं अपने काम को आगे बढ़ाती चली गई।

अवंतिका शुक्ल : क्‍या स्‍टेज पर प्रस्‍तुतीकरण के समय कभी किसी दिक्‍कत का सामना करना पड़ा। एक मुस्लिम लड़की होने के नाते कभी कट्टरपंथियों के गुस्‍से का शिकार हुई हों?

रानी खानम : बहुत अच्‍छा सवाल है। मैं कहना चाहूँगी कि ऐसी दिक्‍कत मुझे कभी नहीं हुई। एक कलाकार और इनसान होने के नाते मैंने कभी ऐसे मुद्दों को करने या उघाड़ने की कोशिश नहीं की। फालतू बकवासें या अपनी प्रसिद्धि के लिए विवादित बयान आदि देने की कोशिश नहीं की। लोगों में होता है कि बदनाम हुए तो क्‍या हुआ नाम तो होगा। बहुत सारे लेखक है जो खासतौर पर उन मुद्दों को उघाड़ते हैं, जो लोग विशेष के विश्‍वास को ठेस पहुँचाते हैं। उन्‍हें दूसरों के साथ ऐसा करने का कोई अधिकार नहीं है। मैंने इन बातों का खास ख्‍याल रखा।

अवंतिका शुक्ल : इस पूरी नृत्‍य यात्रा के दौरान कभी आपको लगा कि आपके साथ नृत्‍य कला को सिखाने में या स्‍टेज पर प्रस्‍तुतीकरण के समय कोई जेंडरगत भेदभाव किया गया है। जैसे कि कोई खास नृत्‍य की शैली आपको इसलिए न सिखाई गई हो, क्‍योंकि आप महिला हैं या कभी स्‍पेस की कमी लगी हो।

रानी खानम : नहीं ऐसा कभी नहीं हुआ।

अवंतिका शुक्ल : क्या आपको लगता है कि नृत्‍य की दुनिया का समाज ज्‍यादा प्रजातांत्रिक है और स्‍त्री-पुरुष के जेंडर गत भेदभावों से मुक्‍त है।

रानी खानम : मेरे निर्णय इतने मजबूत होते हैं कि मुझे यह सारी बातें दिखती ही नहीं है। मुझे जो करना है, सो करना है। अतः मैं कभी यह महसूस नहीं करती कि मैं यह नहीं कर सकती, वो नहीं कर सकती। देखिए अवंतिका जी सबसे पहले तो आप को अपनी योग्यता को पहचानना चाहिए, औरत; औरत ही खूबसूरत लगती है। औरत मर्द की तरह नहीं नाच सकती या उसकी तरह नहीं सोच सकती। जब मैं नाचती हूँ तो औरत के भीतर जो कोमलता होती है, जो शोभा होती है, एक लावण्यता होती है, एक शृंगारिक रूप होता है, मैं उसे ज्यादा सामने लाती हूँ। मैं मर्दों की तरह नहीं नाच सकती और नाचना भी नहीं चाहती। उनके नृत्य में तांडव होता है, शक्ति प्रधान नृत्य होते हैं। उनका नाच में अलग हिसाब है, मेरे में अलग। मैं उस खूबसूरती का ख्याल रखती हूँ।

अवंतिका शुक्ल : दर्शक के बारे में क्या कहना चाहेंगी? जब वह किसी महिला को मंच पर नृत्य करते हुए देखता है, तो उनका दृष्टिकोण क्या होता है? हर जगह अलग-अलग दर्शक होते हैं तो आप उसको कैसे नियंत्रित करती हैं?

रानी खानम : बहुत अच्छा सवाल है। मैं स्पिक मैके के साथ जुड़ी हूँ, और उनके साथ लगातार कार्यक्रम करती हूँ। 12-15 साल हो गए हैं, स्पिक मैके का जो ध्येय है, वह शिक्षा से जुड़ा है। वे शिक्षा के साथ कला को जोड़ते हैं, और उन दर्शकों के साथ जुड़ते हैं जिनके पास यह कला नहीं पहुँच पाती। छोटे-छोटे स्कूल से यह शुरू हुआ था, फिर पूरे भारत में बड़े पैमाने पर कार्यक्रम हुए। स्कूलों में बच्चे 2-3 कक्षा से लेकर दसवीं तक के भी होते हैं। विश्वविद्यालयों में, आई.आई.टी., कॉलेजों में होने लगे। बिजनेस मैंनेजमेंट, आदि तमाम जगह कार्यक्रम हुए हैं। मेरे बारे में मशहूर है कि मैं दर्शकों के साथ जल्दी जुड़ जाती हूँ। मुझे सिर्फ पाँच मिनट चाहिए, मंच पर दर्शकों से जुड़ने के लिए। कभी भी सोच कर नहीं जाती हूँ कि यह गाना नाचना है या इस रचना पर नाचना है। बाकी चीजें धुँधली होती है। मंच पर जाकर मैं कई चीजें प्रस्तुत करती हूँ, उससे मुझे पता चलता है कि वो क्या पकड़ पा रहे हैं। बच्चे हैं तो उनके हिसाब से, आई.आई.टी. कॉलेजों में वहाँ के लोगों को हिसाब से, कभी अगर डांस के किसी भी विभाग में गई, विजिटिंग डांसर के रूप में तो वहाँ के प्रोफेसर की डांस को लेकर क्या समझ है, क्या परतें उन पर खुलती हैं, यह सब देखकर नाचती हूँ। मैं कथक नहीं बल्कि कथक के बहुआयामी रूप को लेकर नाचती हूँ। एक बार मैं रावतपुरा सरकार के लिए शो करने गई, वहाँ लगभग 1 लाख दर्शक बैठे थे। जहाँ नजर उठाओ वहीं सिर। वहाँ इतने लोग थे कि मैं दर्शकों को पकड़ नहीं पा रही थी। मेरा दिल उचट रहा था। 10-15 साल पुरानी बात है। फिर मैंने भक्ति से शुरू किया। अभी दिल्ली विश्वविद्यालय में एक कार्यक्रम था। मुझसे पहले उन्होने फिल्मी गाने पर कोई नृत्य रखा था। यह बात मुझे पता ही नहीं थी। मैं तभी नाराज हुई कि जब आपको फिल्मी ही रखना था तो शास्त्रीय क्यों रखा? खैर वहाँ सब जींस टॉप वाली लड़कियाँ थी और एक घेरे में फिल्मी गानों पर नाच रही थी। अब उनके तुरंत बाद मुझे नाचना है मैं कोई लड़की तो हूँ नहीं दूसरा हमारा शास्त्रीय आधार है। तो फिर इन दर्शकों को भी पकड़ा और हाल यह था कि लोग जाने नहीं दे रहे थे।

अवंतिका शुक्ल : आप ने ऐसा क्या किया?

रानी खानम : मैंने उन्हें नाच नहीं नाच की ताकत को दिखाया। नाच की हर जुनूनियत से उन्हें बांधा। तो देख सकते हैं कि शास्त्रीय में ऐसी क्या पकड़ है, ऐसी क्या चुंबक है जिसे लोग भौंचक होकर देखते रह जाते हैं। मैं बहुत जल्दी दर्शकों से जुड़ती हूँ। कलाकार की अपनी सोच है कि वह अपने दर्शकों को किस तरह पकड़े। अभी मैं केंद्रीय विद्यालय में कार्यक्रम करने गई थी। आपको तो उनका हाल पता ही है। कई बहुत अच्छे हैं, तो कई का हाल बहुत खराब है। बच्चों को पेड़ के नीचे जमीन पर बैठा दिया जाता है। स्पिक मैके के इस कार्यक्रम में मैं गई। हमें बहुत दुख लग रहा था कि बच्चों को ऐसे बैठा दिया यह इनसानियत नहीं है। बच्चे धूप में बेचैन हो रहे थे। मैंने उन बच्चों को भी जोड़ा और उन्हें ज्यादा दिक्कत न हो इसलिए कार्यक्रम 30-40 मिनट में ही खतम कर दिया। मगर बच्चे जाने को तैयार नहीं थे। उनके साथ सवाल जवाब करना, उन्हें मुद्राएँ सीखना। उसे एक कहानी के माध्यम से बताना जैसे कि मुद्राएँ कर के उन से पूछना क्या समझ आया? इस तरह से कला को रोचक बनाना। मेरा मानना है कि कला को शिक्षाप्रद और रुचिकर बनाना आवश्यक है। उनको और प्रेरित करना। अगर आपने कला के माध्यम से शिक्षा, मनोरंजन व प्रेरणा दे दी तो इसका मतलब आपने सबकुछ कर दिया। कला का यह रूप जरूर होना चाहिए। एक कलाकार के भीतर यह गुण होना चाहिए। मैं कहती हूँ कि आप जिस भी क्षेत्र में काम करिए ईमानदारी से करिए। कोई भी काम छोटा नहीं होता। मैं सच कहती हूँ कि कपड़ा सिलना भी एक कला है, खाना बनाना भी एक कला है। आप अगर एक छोटा ढाबा भी खोलें और अपना खाना अच्छा दे रहे हों तो मर्सिडीज की लाइन लग जाएगी। वो उसकी जगह नहीं बल्कि खाने का स्वाद देखेंगे। बस उस खाने का स्वाद बाकी अलग व बेहतर होना चाहिए। आप के काम में खास खुशबू आनी चाहिए चाहे वह शोध हो या पढ़ाई-लिखाई। इसके लिए आप को बहुत मंथन करना पड़ता है। विचार और संघर्ष करना पड़ता है। बाकी ऊपर वाले कृपा हो और सही लोग मिलते रहें, तो रास्ता बनता चला जाता है।

अवंतिका शुक्ल : बहुत बेहतर सोच है आप की, अपने क्षेत्र में आप को कौन ऐसी महिला कलाकार है, जो आप को इन मुद्दों के करीब लगती है, या आप को लगता है इनके विचारों में भी एक ताजगी है?

रानी खानम : मेरे क्षेत्र में लोग काफी नया काम कर रहे हैं पर मेरा क्षेत्र अलग है।

अवंतिका शुक्ल : नृत्य में सूफी संस्कृति को शामिल करने का फैसला कैसे लिया?

रानी खानम : इस पर काफी काम हुआ है। आजकल तो सूफियाना फैशन बन गया है। रॉक बन गया है। जिसको देखे वही छाप तिलक नाच लिया तो सूफियाना हो गया। यह एक ब्रांड बन गया है। मेरे गुरु की कृपा है कि मुझे नृत्य की पराकाष्ठा में जाने की मौका मिला। एक बार एक स्टेज परफोर्मेंस में मेरे दूसरे गुरु महाराज जी (बिरजू महाराज) आए हुए थे। नृत्य प्रस्तुति के बाद उन्होंने कहा कि मुझे फक्र है कि यह मेरी शागिर्द है और मैं इसका गुरु हूँ। उसने जो सीखा, उसे उसी खूबसूरती से सहेजा और प्रस्तुत किया। कोई जल्दबाजी नहीं की यह कर दूँ, वो कर दूँ। तो इस तरह मैंने नृत्य की शुद्धता को भी बरकरार रखने का पूरा प्रयास किया।

अवंतिका शुक्ल : आप के जीवन में परफोर्मेंस को लेकर सबसे खूबसूरत और सबसे खराब पल क्या रहे?

रानी खानम : (हँसते हुए...) अरे अभी तो मेरी जिंदगी खत्म नहीं हुई है तो मैं कैसे बता पाऊँगी। फिर भी अभी तक मैं यह नहीं मानती कि कोई एक पल सबसे बेहतर है, मेरा मानना है कि इस समाज को जी रही हूँ, कल वो जिंदगी इतनी शिद्दत से महसूस नहीं कर पाऊँगी। पल भी ज्यादा टुकड़े-टुकड़े... कई बार ऐसा हुआ मैं नाचती हूँ तो बहुत खूबसूरत गया है। कार्यक्रम तो बहुत शानदार रहे हैं। लोग छोड़ते नहीं है। मुश्किल से निकलना होता है।

अवंतिका शुक्ल : कोई यादगार कार्यक्रम?

रानी खानम : एक घटना बताती हूँ। दो साल पहले की बात है बॉम्बे में, उसमें मेरी गुरु श्रीमती रेवा विद्यार्थी जी थी। जब तक वो यहाँ थी हमने गुरु शिष्य परंपरा में सीखा। मतलब जो सच कहता है, वो गुरु होता है। गुरु वो नहीं जिससे आपने नृत्य सीखा बल्कि गुरु वो है, जो जीवन के हर पल, हर पड़ाव पर मार्गदर्शन दे, गुरु का मतलब आप लफ्जों में बयान नहीं कर सकते। गुरु का मतलब होता है, जब आप बहुत क्षीण महसूस करते हैं, तो उसको याद करते ही, स्मरण करते ही आप में ताकत आ जाती है। गुरु का आशीर्वाद हमेशा आप के सिर पर रहता है। जब से मैं दिल्ली में थी मैंने उन से नृत्य सीखा। बाद में महाराज जी के पास भी गई पर मेरा घर रेवा जी के पास था। अतः अक्सर उनके पास आना जाना लगा रहता था। जब बहुत बेचैन हो जाती थी, तो उनके पास चली जाती थी, उनके लिए कभी कभी खाना भी बना देती थी और उस बीच में एक दो टुकड़ा भी ठीक करती रहती थी। हर वक्त जब भी सही हुआ, गलत हुआ, उन्होंने बहुत सँभाला। फिर उनके बेटे आशीष विद्यार्थी जो निर्देशक भी हैं, तबियत खराब होने कारण दिल्ली से मुंबई ले गए। उन से मुलाकात कम हो गई थी। पर जब भी मुंबई जाना होता उन से जरूर मिलती थी। हर महीने उन से दो चार बार फोन से भी बात होती थी। एक बार मैं मुंबई कार्यक्रम करने गई, तो रेवा जी को देखे दो साल हो चुके थे। जब मैंने उन्हें उस कार्यक्रम में देखा तो वो बीमार थीं, क्षीण थी, तो उन्हें देखकर मैं रोने लगी। और मुझे ऐसे लगा कि हाथ पाँव काम नहीं कर रहे हैं, और मैं बिखर कर रोने लगी पर मैं उन्हें अपने आँसू नहीं दिखाना चाहती थी। मैंने उन्हें प्रणाम किया। दीदी बैठ गईं। स्टेज पर पैर रखते ही मेरा रोना फिर शुरू हो गया। मैं बोलने लगी मेरी गुरु हैं, मेरे सामने बैठी हैं। बस मैं बोल ही नहीं पा रही थी। मुझे लग रहा था कि पता नहीं क्या हो गया है। सालों की अंदर जो तकलीफ थी, उन्हें देख नहीं पा रही हूँ, खुदा ने मुझे इतना ऊपर पहुँचा दिया कि वो मुझे देख नहीं पा रहीं थी। आज लगभग 10-15 साल बाद वो मेरा नाच देख रहीं हैं। मैं बस रोए जा रही हूँ। दीदी उधर रो रहीं हैं। मेरे हाल यह था कि मैं मंच से हट गई। और खूब रोई। फिर तबले वाले को इशारा किया कि तुम बजाओ और उसके बाद मैं नाची। मुझे पता ही नहीं कि मैंने क्या नाचा।

अवंतिका शुक्ल : वह नृत्य गुरु के लिए था।

रानी खानम : हाँ उस दिन मैं यह नहीं दिखा रही थी कि मैं क्या नाच सकती हूँ, बल्कि जो सीखा वही सामने था। मैंने कहा कि इसमें जो भी अच्छा है वो गुरु का है, और जो खराब है, वो मेरा है। इसके लिए आप लोग मुझे माफ करें। कार्यक्रम के बाद आप यकीन करो हर व्यक्ति रो रहा था। दर्शक, साजिंदे सब रो रहे थे। फिर मैं नीचे उतरी घुँघरू पहने थी। दीदी के पास गई और उसके पैरों से लिपट गई। दीदी ने कहा कि मुझे तो लगा ही नहीं कि मैं दर्शकों के बीच में बैठी हूँ। मुझे लगा कि तुम मेरे लिए नाच रही हो। तो वो जो भावना थी हमारे बीच। मेरे लिए भी उस कार्यक्रम में मेरी गुरु ही मुख्य थीं और उनके लिए मैं। वो लम्हा है, जिसे आज भी याद करके रोना आता है। (आँसू पोंछते हुए...) वो पल मेरे लिए अविस्मरणीय था। एक साल के बाद उनका निधन हो गया। आज भी वो कार्यक्रम मैं भूल नहीं पाती हूँ। वो पल एकदम अलौकिक है।

अवंतिका शुक्ल : कथक के भविष्य के बारे में आपका क्या कहना है? आज वह किन संभावनाओं की और बढ़ जा रहा है?

रानी खानम : बहुत उज्जवल हैं भविष्य। आज एक लाख से ज्यादा एन.जी.ओ. काम कर रहे हैं, कथक के लिए। इतनी सारी छात्रवृत्ति, इतने सारे मौके सरकारी गैर सरकारी निजी संस्थानों से बच्चों को मिल रहे हैं। हजारों संस्थान खुल गए हैं, जिसमें बच्चे निकलकर आ रहे हैं। विश्वविद्यालय खुल गए हैं। पहले कहाँ था यह सब? पहले मुझे शर्म आती थी कि मैं नाच सीख रही हूँ। मुसलमान हूँ। मुझे डर लगता था कि मुस्लिम लोग क्या कहेंगे। लोग बड़ी हिकारत की नजर से देखते थे। जब बाद में मेरा नाम हो गया, तो वही लोग अपने बच्चे भेज रहे हैं। तो कथक बहुत आगे बढ़ गया है। बस इसमें नई विचारधारा के साथ कलाकार की जरूरत है। साथ-ही-साथ विषय पर पकड़ भी होनी चाहिए। आज बच्चे आठ साल सीखने के बाद सोचते हैं कि अब नर्तक बन गए। नाच वो नहीं होता जो आप नाच रहे हैं, नाच वो होता है जो आप को नचाता है। अपने आपको जब आप छोड़ देते हैं, तो नाच आप पर आने लगता है। यह मैंने बहुत साल बाद महसूस किया। जब आप यह कहते हैं कि यह तिहाई सुनिए, यह टुकड़ा सुनिए, तो उस समय आप अहम हैं, वहाँ आप एक बंधन में बँध जाते हैं पर जब आप अपने आपको छोड़ देते हैं, तो आप उसमें मजा लेने लगते हैं। ताली की गिनती नहीं रहती कि अरे कुछ छूट गया। ना धिन धिना ना धिन धिना में आप धीरे-धीरे ऐसे डूब जाते हैं जैसे कोई बारिश की बूँद या पानी के झरने से खेल रहा है, या जैसे कोई बच्चा गुल्ली डण्डा खेल रहा हो। जैसे कोई तितली पकड़ रहा है। तो जो यह खुशी होती है, जो बहना होता है। मैंने अभी फैज़ अहमद फैज़ साहब की बरसी के सौ साल पर पाकिस्तान में हुए एक कार्यक्रम में नाचा था, जिसे आई.सी.सी.आर. ने कराया था। इसकी तैयारी के लिए मैंने अपने बाकी काम बंद करा दिए थे, और धीरे-धीरे फैज़ की रचनाओं के भीतर चली गई। जो फैज़ ने उसमें देखा है, उसके अलावा मैं उसमें 'पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न माँग', पर मैं इसे कैसे करूँगी? मेरा सोच क्या है? और मैं ऐसी स्विच ऑफ हुई कि मुझे किसी बात का होश नहीं था। मैं अंतिम कंपोजीशन कर रही थी। (गुनगुनाते हुए...) मेरा दर्द-ए-नगमा-ए बेसदा/ मेरी जात जर्रा ए-बे-निशाँ/ मेरे दर्द को जो ज़ुबाँ मिले/ मुझे अपना नामों निशाँ मिले। इसे मंच पर करते हुए मेरे आँखों से आँसू निकल रहे थे। लोगों को लग रहा था कि मैं अभिनय कर रही हूँ। पर वास्तव में उस समय मैं भीतर से रो रही थी। और जब मैं नैरेट कर रही थी कि वह लड़की कह रही है मेरा दर्द बेजुबाँ हो गया है, मैं इतना रोई, इतना चिल्लाई हूँ कि अब अपने दर्द को बोल नहीं सकती। मेरे औकात जर्रा से भी गिरी है। अगर तुम मुझसे मुहब्बत कर लेते हो तो मुझे जुबाँ मिल जाएगी, मुझे एक शक्ल मिल जाएगी। उसमें मैंने कई एब्स्ट्रैक्ट किए। मैं बहुत भावुक हो गई थी। लोगों ने कहा कि वाह आप कितनी अच्छी अभिनेत्री हैं। कितना अच्छा बोलती हैं पर मैंने उनसे कुछ नहीं कहा क्या बोलूँ। उनको लगा कि मैंने पढ़कर बोला होगा। पर यह मेरे दिल की आवाज थी, जो मैं महसूस कर रही थी। जब मैं किसी नृत्य में डूबती हूँ, तो मुझे खाना-पीना कुछ अच्छा नहीं लगता था। कार्यक्रम का आनंद मैंने तीन-चार दिन बाद तक लिया। जब मैं किसी नृत्य या कोरियोग्राफ की तैयारी करती हूँ, तो खाना-पीना भूल जाती हूँ। मैं उसे जीने लगती हूँ।

अवंतिका शुक्ल : अपने डांस स्कूल उसके संचालन के बारे में कुछ बताइए?

रानी खानम : हाँ पटपड़गंज में हैं। मेरे स्कूल का नाम है, आमद कथक डांस स्कूल। 200-250 बच्चे सीख रहे हैं। राष्ट्रीय कथक विद्यालय की पूर्वी शाखा भी मेरे पास है। उनके बच्चे भी मुझसे ही तालीम लेते हैं। मैं बच्चों को यह नहीं समझती कि मैं नाच सिखा रही हूँ, बस तमीज सिखा रही हूँ। एक साल सिर्फ तमीज और तहजीब सिखाती हूँ। नाच गाना दूर की बात है। कैसे झुकावट होनी चाहिए? क्या अदब होना चाहिए? कक्षा में बड़ों के सामने कैसा व्यवहार हो? चीजों को लेकर कितनी खोज हो, दैवीयता हो। बच्चों की एकाग्रता बहुत बढ़ जाती है। मेरे पास से बच्चे जाते नहीं हैं। सिर्फ बीमारी या तबादले की स्थिति में ही वो छोड़ते हैं। लोग कहते हैं कि बच्चे सीखना नहीं चाहते पर मैं उनकी रूह तक पहुँचने की कोशिश करती हूँ और उन्हें इतनी ताकत दे देती हूँ कि वो उसके बगैर रह ही नहीं पाते।

अवंतिका शुक्ल : तो एक घराना हम आपका भी मान कर चलें?

रानी खानम : बिल्कुल नहीं।

अवंतिका शुक्ल : आप घरानों पर विश्वास नहीं करतीं?

रानी खानम : बिल्कुल करती हूँ। मैं घरानों की खूबसूरती पर विश्वास करती हूँ पर मुझे ब्रांडिंग या दुकान पसंद नहीं है।

अवंतिका शुक्ल : लेकिन आपके नृत्य की जो पहचान है, उसे कैसे रखेंगी?

रानी खानम : पहचान अच्छी है। नृत्य में मैं लखनऊ घराने का प्रतिनिधित्व करती हूँ। कई बार तो मैं कथक को नहीं, बल्कि तहजीब को प्रस्तुत करती हूँ, जिसके भीतर सांस्कृतिक धर्म निरपेक्षता हैं। हिंदू-मुस्लिम दोनों से ऊपर उठा हुआ है। बड़ा खूबसूरत काम हैं। यह ऐसा काम है, जिसमें आप रम जाएँ तो आपको कुछ दिखाई नहीं देगा। यह प्रेम की बात है, जितना प्रेम करोगे, उतना ही डूबोगे। जब मैं डांस सीखती थी तो मैं इतनी बेसुध रहती थी कि सलवार कुर्ती, दुपट्टा किसी भी रंग का पहन लेती थी। वो बेमेल हैं इसका भी मुझे ख्याल नहीं रहता था। इतनी बावरी थी मैं। मेरे महाराज जी कहते थे कि यह तो मस्त राम है। इसे किसी बात का होश नहीं। बस नाच सीखना। कौन आया, कौन गया, कुछ होश नहीं। बहुत सालों तक तो मुझे यह ही पता नहीं चला की बंगाली मार्केट कौन सा है? मैं आज भी काम में रमी रहती हूँ। आदमी जो भी काम करे ईमानदारी से और रम के करे। खुदा आपको आपके काम में ही दिखाता है। अगर मुहब्बत भी करो तो इतने अच्छे से करो की उसमें भी खुदा दिखाई दे। मैं अपने काम को सबसे ऊपर रखती हूँ। एक पल को शौहर छूट जाता है, एक पल को माँ बाप छूट जाते हैं, नाम छूट जाता है। काम जीवन भर आखिरी साँस तक रहता है। मैं इसे सबसे ऊपर रखती हूँ। यह मेरे मरने के बाद ही जाएगा। काम से इतना प्यार करो कि आपको अपनी शक्ल देखनी हो तो काम में दिखे, पहचान देखनी हो तो काम में दिखे। एक साधे सब आए, सब साधे सब जाए। एक ही काम से इतनी मुहब्बत करो कि तुम अपना ही नहीं दुनिया का भला करो।

अवंतिका शुक्ल : आप अपने बच्चों को इस क्षेत्र में लाना चाहेंगी?

रानी खानम : मेरी बेटी है। सारा नाम है उसका। मैंने आठ साल की उम्र से उसे सिखाना शुरू किया है। अब मुझे नहीं पता कि कितनी शिद्दत के साथ वो इसे कर पाएगी।

अवंतिका शुक्ल : आप तो उसकी गुरु हैं, आपने यह महसूस किया कि उसे नृत्य सीखने का शौक है या नहीं?

रानी खानम : नहीं शौक उसे काफी है। दिक्कत यह है कि जब चीजें आपको तशतरी में मिलती है, तो उसकी अहमियत नहीं रह जाती। यह चीजें मैं उसे तश्तरी में नहीं देना चाहती। बाकी वो जो बनेगी इसका निर्णय वही करेगी। मैं तो उसे कलाकार बना दूँगी पर कला के लिए एक पागलपन, एक आग, अपनी पहचान बनाने की जद्दोजहद मैं नहीं कर सकती। अगर उसे एक बेहतर कलाकार बनना है तो यह जद्दोजहद उसे खुद करनी पड़ेगी। मैं उसे सिर्फ एक सीमा तक ले जा सकती हूँ। नाम तो अपना वो खुद करेगी, मैं थोड़े न करूँगी। आग तो उसे खुद पैदा करनी है, पर हाँ मैं इतना मानती हूँ कि कम से कम 6-7 साल वो नाच सीखे। संगीत की शिक्षा ले ताकि तमीजदार बने, तहजीबदार बने। संस्कृति उसे समझ में आए। कल से वो उसके लिए अछूत व अनदेखा न रह जाए। इस कला की इज्जत करे और कथक के साथ उसकी एक लय बने। कला इनसान को संवेदनशील बनाती है। कलाकार दो तरह का होता है। एक कहते हैं कि मैंने यह सीखा दूसरे वो होते हैं, जो जन्म से ही होते हैं। वो काफी संवेदनशील होते हैं। छोटी-छोटी चीजों को जल्दी महसूस करते हैं। बहुत अंतर्मुखी होते हैं, कई बार बहिर्मुखी भी। कला व्यक्ति को इतना संवेदनशील बना देती है कि वह सही और गलत की पहचान करने लगता है। उसके बाद फिर आपका काम है।

अवंतिका शुक्ल : आप अपने आपको एक सामान्य महिला से किस तरह अलग पाती हैं?

रानी खानम : कई मामलों में। कई बार बहुत दुख भी होता है। जैसे बचपन मेरा काफी रियाज में बीता, तो गुड्डे गुड़िया नहीं खेल पाए। काम शुरू करने के बाद मेरी दिनचर्या भी बदली। मैं सुबह चार बजे उठती थी। मुँह हाथ धोकर मैं पौने छह तक रियाज करती थी। गर्मी हो, बारिश हो, सर्दी हो, यह एक नियम बँधा रहता था। फिर तैयार होकर स्कूल जाती थी। फिर लौटकर भागते हुए डांस क्लास जाना। काफी भूख भी लगती थी, फिर 8-9 बजे वापस आकर अपने बाकी बचे घर और स्कूल के काम करना। मेरे जीवन में मस्ती खेल कूद नहीं रहा। मैंने वैसे यह महसूस नहीं किया और कभी किया भी हो तो भी काम का बोझ इतना ज्यादा था कि उस पर ज्यादा सोचा नहीं। आम महिलाएँ किटी पार्टीज में जाती हैं या बच्चों को ज्यादा समय देती हैं। मैं कई बार अपनी बेटी को लेकर अपराधबोध से ग्रसित हो जाती हूँ। जब ज्यादा कार्यक्रम हो जाते हैं, तो उन्हें रोकना पड़ जाता है। विदेश नहीं जा पाती हूँ। 6-7 बार ही गई होगीं। पहले मैं 6-6 महीने बाहर रहती थी। पर बच्चे के बाद नहीं। कई बार जैसे सब्जी खरीदने नहीं जा पाती हूँ, इस तरह की छोटी-छोटी खुशियाँ, मैं उनसे महरूम हूँ। इसमें बात अहम की नहीं है। आज भी मैं अच्छा खाना बनाती हूँ। घर का पूरा काम करती हूँ। जब काम (डांस) नहीं रहता तो पूरे दिन घर में रहती हूँ। कहीं नहीं जाती। कई बार बहुत आम चीजें मैं नहीं कर पाती हूँ तो दुख सा होता है। पर दूसरा पक्ष देखती हूँ, तो लगता है कि मैंने बहुत कुछ ऐसा पाया है, जिसे दूसरे नहीं पा पाए। पर अपनी बेटी के लिए मैं काफी अपराधबोध से ग्रसित हो जाती हूँ। अब जाकर मैंने कुछ कार्यक्रम शुरू किए, नहीं तो उसके पैदा होने के बाद चार साल तक तो मैं घर से नहीं निकली।

अवंतिका शुक्ल : आपने कार्यक्रम बंद कर दिए थे।

रानी खानम : हाँ वो छोटी थी, गोद में थी। दूध पीती थी। तो उसे छोड़कर कहाँ जाऊँ? एक बार उसकी आया और दो रिश्तेदारों के पास उसे छोड़कर मैं बस आगरा तक गई थी कि फोन आ गया कि 'सारा' का बदन बहुत गरम है। सारा उस समय एक साल की थी। मेरा तो वहीं रोना शुरू हो गया। मैंने खुद को बहुत कोसा कि मैं अपनी बच्ची को छोड़कर यहाँ कार्यक्रम करने क्यों आई? फिर मेरे पति जो कि मेरे साथ थे, ने घर फोन किया। मैंने अपने एक दोस्त को घर भेजा, तब पता चला कि कंबल में लपेटकर सुलाने के कारण उसका शरीर गरम हो गया था। उसके बाद हमने अपने को संतुलित करने का प्रयास किया। ज्यादातर मैंने ही किया, एक औरत होने के नाते। क्योंकि औरत किसी भी स्तर तक पहुँचे, उसे अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करना ही पड़ता है। संतुलन ऐसे बनाते हैं कि जब वो (पति) घर पर होते थे, तभी मैं अपने कार्यक्रम की तारीखें निर्धारित करती थी, ताकि सारा के पास कोई न कोई रहे। एक दो दिन के लिए ही आना जाना करती हूँ। उस बीच मेरे रिश्तेदार, मित्र वगैरह भी उसको देखते रहते हैं। उनका भी सहयोग मिलता है। मैं संतुलन स्थापित करने की कोशिश करती हूँ पर माँ के नाते एक अपराधबोध है।

अवंतिका शुक्ल : क्या इस तरह का कोई अपराधबोध आपके शौहर ने भी कभी महसूस किया? आपने कभी उनसे पूछा या उनसे चर्चा की?

रानी खानम : सवालों के जबाब तो उनके पास काफी खूबसूरत होते हैं या बुरा उन्हें भी लगता ही होगा पर मुझे ज्यादा लगता है। क्योंकि हमारी सोच मर्दों जैसी नहीं हैं। आदमी और औंरत दुनिया को दो छोर है। यह खुदा की मर्जी है कि उसने दोनों को मिलवाया है, वरना दोनों की सोच बहुत अलग है। हम ग्रहण करते है, वो छोड़ते हैं। हर चीज को वो अपने हिसाब से तय करते हैं। अगर यह संतुलन न होता, तो यह कायनात कायम नहीं रह सकती थी। मैं यह मानती हूँ कि हर एक का कर्तव्य है और खूबसूरती से है। त्याग और सामंजस्य तो सभी को करना चाहिए। आप भले ही बडी शख्सियत हों, या कलाकार हो। लेकिन परिवार को लेकर जो ज़िम्मेदारियाँ हैं, वो आपको पूरी करनी ही पडेगी। कहीं ना कहीं तो पहले आपका परिवार आता है। एक कलाकार के रूप में मेरा परिवार मेरी बच्ची सबसे पहले है। उसके बाद मेरा काम है। पहले मैं अपने परिवार में संतुलन बनाती हूँ, फिर काम में, तो मुझे कोई चिंता नहीं होती, क्योंकि मैं अपना दायरा समझती हूँ।

अवंतिका शुक्ल : क्या कथक की इस दुनिया में महिला कलाकारों के साथ किसी तरह का शोषण या उत्पीड़न भी होता है?

रानी खानम : कथक की दुनिया हमारी दुनिया से कोई अलग तो है नहीं। इसी का एक हिस्सा है। बाकी दुनिया में जब शोषण उत्पीड़न है, तो यहाँ कोई नहीं होगा? ऐसा भी होता है कि एक एक शो के लिए लोग महिला कलाकारों को अपनी अंकशायनी बनाने को आतुर रहते हैं। कई कलाकार इन प्रलोभनों के आगे झुक जाती हैं। बहुत सी नहीं। वो अपनी पहचान खुद बनाती हैं।

अवंतिका शुक्ल : यह प्रलोभन कौन लोग देते हैं?

उत्तर : कार्यक्रमों के प्रायोजकों से लेकर आला अफसर तक शामिल रहते हैं।

अवंतिका शुक्ल : क्या आपको कभी इस तरह के किसी प्रलोभन का सामना करना पड़ा?

रानी खानम : हाँ कई बार। लेकिन मैंने उन्हें सिरे से नकार दिया। मुझे ऊँचाई पर जाने की कोई जल्दी नहीं थी। मेरा मानना था कि ठीक है ना मिले मुझे कोई कार्यक्रम, पर मैं अपने काम और काबिलियत से इतनी खुशबू भर दूँगी कि मुझे और मेरे काम को नकारना किसी के लिए संभव न होगा। मेरे काम और मेहनत ने ही मुझे ताकत दी कि मैंने यहाँ अपनी शर्तों पर काम किया, दूसरों की नहीं।


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