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आलोचना

त्रिलोचन : संसार को ‘जनपद’ बनाती कविता
सुबोध शुक्ल


कभी काफ्का से किसी ने पूछा था कि रचनाधर्मिता क्या है? काफ्का ने कहा कि क्षितिज पर उगते हुए सूरज की किरणों का एक नींद लेते बच्चे पर पड़ना और उस बच्चे का करवट बदल लेना रचनाधर्मिता है। बात यहीं रुक गई और अच्छा ही रहा कि यहीं समाप्त हो गई। कभी-कभी उजाले की व्याख्या के लिए अँधेरे को अधिक संभावित और सहानुभूतिपरक बनाना पड़ता है। काफ्का का दिया गया जवाब किसी चालू मुहावरे का घिसा-पिटा दुहराव नहीं है, वह रचनाधर्मिता के पीढ़ियों से चले आ रहे बीजकों और घुटते जा रहे शब्दकोशों पर, सभ्यता के सपनों की मीमांसा है। साहित्य एवं कला के लिए इस प्रकार की अंतःसापेक्षता इसलिए भी अधिक महत्वपूर्ण है कि यह एक ऐसा भावबोध है जिसमें अंतर्दृष्टियाँ और मनोदशाएँ स्पष्ट रूप से द्वंद्वात्मक नहीं रहतीं। अतएव इन्हें अपनी जगह से हिलाने और आमने-सामने लाने के लिए ऐसी समृद्ध लोकधर्मिता की भूमि तैयार करनी होती है जहाँ विभक्त और उपेक्षित अभिव्यक्तियाँ, आत्मपरक जीवनानुभवों को सार्वजनिक रागबोध से जोड़ने का काम करती हैं। कविता का सिर्फ इतना ही काम है। यह रचनाकार ही है जो अपने निर्दोष अक्खड़पन में विराट और सामान्यतः चुनौती न दी जा सकने वाली शक्तियों को भी धता बताता है, नजरंदाज करता है और तमाम हिंसक, विवादास्पद और विनाशकारी बनते जाते वृत्तांतों के मध्य अपनी असंतुष्टि को एक शस्त्र की तरह पेश करता है।

एक तल्ख और निराशाजनक समय में त्रिलोचन का प्रवेश, भाषा के अभिजात्य के बीच लोक के अलंकरण की तरह है। लोकोक्ति की आक्रामकता और इतिहास का जीर्णोद्धार होते हम उनके कवि-कर्म में देख सकते है। शोर और प्रायोजित पहचान से दूर उनकी कविता, अनुभूतियों के संघर्ष और जीवन की आकांक्षाओं को आवश्यकता तथा अभाव के बीच पिरो देने की क्षमता से लैस है।

त्रिलोचन की रचना-भूमि का कोई ध्रुवीय-संघर्ष नहीं है। सामान्य जीवन के साधारण से लगते प्रसंग और उनके असाधारण बेधते प्रभाव, यह उनके रचना-संसार का दो-टूक सच है। यह सत्य, प्रतीति और प्रबोध की अंदरूनी बनावट से पैदा होता है; जिसके लिए यथार्थ न तो सिर्फ एक कालावधि का प्रसंग है और न ही कल्पना कोई ऐतिहासिक काव्यभाषिक मजबूरी। यह भी नहीं कहा जा सकता कि वे समानांतर अनुभूतियों के ग्राही हैं। क्योंकि समानांतरता किसी वैचारिक या चिंतनपरक संवाद की आधारशिला तो हो सकती है पर उसकी आतंरिक बनावट नहीं। तो यह कह सकते हैं कि त्रिलोचन में एक किस्म का घालमेल है और यह घालमेल प्रभावों के मामले में आसान नहीं है। यहाँ घालमेल से अर्थ मिलावट का न लिया जाय। त्रिलोचन के सिलसिले में घालमेल एक दर्शन है, एक मूल्य है। यह जैसे ही कविता के बीच, एक समीकरण की तरह प्रयुक्त होता है वैसे ही भाषा की अंदरूनी सरलता कविता को संगठित कर देती है। यह एक दिलचस्प घटना है। यही कारण है कि अपनी समूची परंपरा के कवियों के बीच त्रिलोचन में संतुलन की भाषा बनाने की जिद नहीं है। इसलिए उनकी कविता अपने ढंग से देखी गई चीजों को बड़े पैमाने पर मानवीय-जीवन-विवेक का हिस्सा बना देने का काम कर जाती है

प्रेम दबे पाँव चला करता है / जाड़े का सूरज / जैसे कुहरे में छिपकर / आता है साँसों को साधकर / नयन पथ पर / लाते हैं / आना ही पड़ता है। (नीला आकाश कह सकता है)

ताप के ताए हुए दिन ये / क्षण के लघु मान से / मौन नापा किए ( ताप के ताए हुए दिन )

शब्दों से काम नहीं चलता / जीवन को देखा है / यहाँ कुछ और / वहाँ कुछ और / इसी तरह यहाँ वहाँ / हरदम कुछ और / कोई एक ढंग सा काम नहीं करता (शब्दों से काम नहीं चलता)

यह मात्र आनुभविक स्तर पर बोधपरक होना भर नहीं है, वह जीवन की यथार्थकामी बारीकियों की एक मनोदशा भी है। यही वजह है कि त्रिलोचन का रचना-मानस समयधर्मी इकहरे विचारों का संसार भर नहीं है; जबकि उनकी कविता पर लगाए गए मजबूत आरोपों में यह वजह भी एक दलील की तरह प्रस्तुत की जाती रही है।

समकालीन हिंदी कविता में अनुभव और यथार्थ का द्वंद्व कोई नया नहीं है। यथार्थ को उसके अपने लिए बनाए गए निश्चित आग्रहों और तयशुदा पूर्वधारणाओं ने बड़ा आघात पहुँचाया है। वह छूट के निकल भागे अपराधी की तरह खोजा जाता है और उसी क्रम में अनुभव एक उपेक्षित बुज़ुर्ग की तरह अपने को अधिक पालतू बनाए जाने में लगा रहता है। त्रिलोचन में अनुभव और यथार्थ के मुहावरे अधिक मूर्त और पार्थिव हैं जिनको वे कविता की भीतरी अनुगूँजों में अविष्कृत और परिभाषित करते हैं। जैसा कि मलयज ने उनकी कविता के लिए कभी कहा था कि इस कविता को भागते हुए तीव्र अहसासों के क्षण में पकड़ पाना मुश्किल ही नहीं, बल्कि दुस्साध्य है। इसे पकड़ने के लिए थोड़ा इत्मीनानवाला भाव लाना होगा, जिसमें आप इसके अंतरंग सौष्ठव का आनंद ले सकें... इस कविता की भाषा के पीछे जो रक्त बजता है, उसे सुनने के लिए आपको उसकी धमनी पर कुछ देर तक हाथ रखना होगा। निश्चय ही उनके रचना-संसार में प्रवेश के लिए चुस्त और चालाक नहीं वरन सशक्त और शालीन मानस की आवश्यकता है। शास्त्रीयता ऐसी कविता से तू-तू, मैं-मैं नहीं कर सकती, बौद्धिकता प्रलाप नहीं कर सकती। हो सकता है तो बस यह कि इतिहास, समय, स्मृति और मिथक को एक कथा की भाषा में, चौपाल पर बैठ कर सुना जाय।

धनुष बाण लेकर / क्या करूँगा / रक्खो / रक्खो इनको / नाटक में / वेशधारियों के काम आएँगे / जीवन इन खेलों से आगे बढ़ आया है। (खेलों से आगे बढ़ आया)

और थोड़ा और, आओ पास / मत कहो अपना कठिन इतिहास / मत सुनो अनुरोध, बस चुप रहो / कहेंगे सब कुछ तुम्हारे श्वास (पास)

त्रिलोचन ने सीधे कथन के स्तर पर, बुनियादी लोक-धर्म और अवसन्न जनादर्शों को प्रभावित किया है। रचनात्मकता और आत्मीयता के निर्द्वंद्व मैकेनिज्म के बीच यह संदर्भ, उनकी कविता की अधिक सार्वजनीन और समकालिक प्रस्तुतियाँ देता है। उनकी कविताओं का सहधर्म और उनकी सहजात परिपक्वता या शिल्प की वह बुनावट जो आदमी के बिलकुल पास जाकर उससे बात करने की कोशिश करती है, वह इसलिए नहीं है कि त्रिलोचन अपनी सहानुभूति को हथियार बना कर पेश कर रहे हैं वरन इसलिए है कि वे समय और उससे जुड़ी हुई नाटकीयता के सहारे थमते-दौड़ते आदमी को पहचानते हैं, उसकी निराशा और टूक-टूक होते उसके हृदय को समझ रहे होते हैं।

लगभग एकस्तरीय होते जाते अवसाद की रोमांटिक नियति और उदग्र होती जा रहीं सृजनात्मक जीवनानुभूतियों के बीच, त्रिलोचन एक संसार के जीवित बचे रहने की उम्मीद के रूप में मिलते हैं। उनकी कविताओं का एक हिस्सा वह है जिसमें उनकी आशावादी आस्था, वस्तुनिष्ठ भागीदारी के लिए पहल करती है और दूसरा वह है जिसमें वह पहल एक संवेदनात्मक संत्रास में तब्दील हो जाती है। एक अंतरंग मुठभेड़, जोकि शब्दों, व्याकरणों और व्यवस्थाओं की ठोस आत्म-संतुष्टि वाली दुनिया को ठेंगा दिखाती चलती है। उनकी अधिकांश कविताएँ एक निम्नमध्यमवर्गीय औसत संघर्ष को, उनके विरोधों और स्वभावों के बीच खंगालती हैं और जीवन के सामान्य से दिखने वाले अनुभवों से संवाद स्थापित करती हैं। उनकी लगभग हर कविता एक प्रबंध की रूपरेखा है जो धारावाहिक रूप में लिखी लगती है। प्रत्येक कविता का स्वर संतुलित, शांत एवं संयत होते हुए भी अपने ऐंद्रिक राग से लड़ाई लड़ता सा लगता है। चीजों को सुरक्षित बचाए रखने की आसक्ति भी कविता को जड़ नहीं करती बल्कि उन्हें बनाए चले जाने की जिजीविषा, उसे अपनी ऊष्मा और ताप से बांधे रखती है। ऐसी कविताएँ तकनीकी ढंग से देखी गई जिंदगी के प्रति न केवल समाज की संवेदनशीलता को चुनौती देती हैं बल्कि उसे उत्तेजित भी करती हैं - ठीक उसी भाषा-योजना के जरिये जिसके माध्यम से आत्मवंचक विश्वास और परावलंबी दार्शनिकता हमें अभियुक्त का जीवन जीने को विवश करती आई हैं। यह बड़ा साधारण सा भाव स्तर है कुंठा का सीधे सामना करने का। अपने सारे ब्यौरों, वार्तालाप तथा सूचनात्मक यथार्थ में विन्यस्त होने के बावजूद, त्रिलोचन में यही भाषा लोक-संबद्ध और लोक-धर्मी बनती है। इसी कारण एक निर्बाध अपनेपन के निजी संस्कार के बावजूद, त्रिलोचन अपने कवि-व्यक्तित्व के प्रति किसी खास मुहावरे से आसक्त नहीं दीखते हैं।

दीन, हीन, छवि-क्षीण और व्याकुल ईश्वर को / आज सड़क पर हाथ पसारे मैंने पाया / यह कैसी है बात - प्रश्न जी से कढ आया... / पुन परम कर देह, कहा ईश्वर से, ईश्वर / बना लिया क्या हाल इधर तुमने बी अपना / मुझको रच कर भूल गए हाथों का करतब (दीन, हीन, छवि-क्षीण)

करता हूँ आक्रमण धर्म के दृढ़ दुर्गों पर / कवि हूँ, नया मनुष्य यदि अपनाएगा / उन गानों में अपने विजय गान पाएगा / जिनको मैंने गाया है। (पश्यंती)

इस प्रकृति और परिप्रेक्ष्य तक त्रिलोचन की कविताओं का रास्ता आसान नहीं रहा है। यदि वे निपट सरल और सुरुचिबद्ध होतीं तो उनके चरित्र की पहचान मुश्किल होती। यही त्रिलोचन की कविताओं की व्याप्ति भी है। एक व्यापक और प्रभावशाली युग-बोध को संजोये हुए उनका कवि-मानस जिस तरह हिंदी कविता के आशयों और अभिप्रायों को, उनके मूल सरोकारों तक पहुँचाने का यत्न करता है वह सृजन की लौकिकता से बद्धनाल चेतना की भूमिका में ही संभव है। अपने ही बनाए गए तौर-तरीकों से बौखलाए हुए मनुष्य की आपाधापी, त्रिलोचन के परवर्ती संग्रहों की वस्तु है। त्रिलोचन तनाव और तिरस्कार को बोध मानते हैं। तमाम नकारात्मकताओं के झमेले से जीवन की सुरुचि और सहजता को हथिया लेने का उनका अपना तरीका है। वे भाषा को अपनी संगिनी की तरह जीते हैं - पूरी लगन और निष्ठा के साथ। जिस लोकव्यापी भाषा की अक्षमता, कविता को सुविधा और लालसा की रोमानियत से भरती है, वह त्रिलोचन के संस्कार में पगी भाषा नहीं है। असल में यह दृष्टि एक कथावाचक की दृष्टि है जो छोटी-छोटी घटनाओं को व्यापक एवं क्षैतिज नाटकीयता की श्रृंखला में पिरोती चलती हैं। सतही या कहें नगण्य लगने वाली क्रियाएँ, उपेक्षित संवेदन, नेपथ्यगामी सौंदर्यबोध, और कविता के लिए हमेशा से खतरा बताए जाने वाले इतिवृत्त, उनके कवि-व्यक्तित्व का समाजवैज्ञानिक आधिभौतिक स्थूल हिस्सा हैं और इन हिस्सों के महीन मनोवैज्ञानिक सूत्र उस सजग समझदारी की जीवंत संगीतमयता से पनपते हैं जिसमें बाहरी अनुभूति के साथ-साथ भीतरी यथार्थ भी चालक शक्ति के रूप में मौजूद रहता है। उल्लेखनीय बात यह है कि त्रिलोचन में यह भीतर-बाहर का संश्लेषण, किसी एरिस्टोक्रेट आत्ममंथन या सूचनात्मक अंतर्द्वंद्व की देन नहीं है, यह संतुलन या कहें अनुशासन, प्रदत्त परंपरा और किसी भी तरह की आरोपित प्रगतिशीलता के अतिक्रमण से पैदा हुआ है। यह एक बड़ी वजह है कि वर्तमान त्रिलोचन के यहाँ ठहर सा गया है। उनके यहाँ क्षण, अपने अन्योन्याश्रित नैरेटिव में एक ऊबड़-खाबड भूत और धूल-धूसरित भविष्य को भाषा के सहारे जीवित करता है। वे स्वतंत्रता के दौर के उन चुनिंदा कवियों में से एक हैं जिन्होंने इतिवृत को कैनन की तरह पेश किया और उसे समकालीन कविता-चिंतन में मुख्य धारा में खड़ा किया।

झेला नंगी पीठ जमाने का वह कोड़ा / सर्र सर्र जो पड़ता रहा न रुकना सीखा / जिसने, मैंने भी कब संचित धीरज छोड़ा / पल भर को भी, ताजा है मुझको वह तीखा / मांसपेशियों का मंथन.../ अगर न पीड़ा होती तो भी क्या मैं गाता / यदि गाता तो क्या उसमें ऐसा स्वर आता (झेला नंगी पीठ)

शब्दों से वर्ण गंध का काम लिया है / मैंने शब्दों को असहाय नहीं पाया है / कभी किसी क्षण / पदचिह्नों को देखा ताका / मुझे देखकर सबने मेरा नाम लिया है। (शब्दों के द्वारा जीवित)

कविता के लिए तैयार किए गए उनके अपने सरोकार और पैमाने, एक वृहद युग-बोध के तात्कालिक सौंदर्य और सीमाओं को संवेदित करते हैं। ये युग-बोध उनके चिंतन-संसार की प्रतिछवियाँ हैं जो कविता को कई जगह भीरु, संकीर्ण और उदासीन बनाती है - एक निर्मित माल की तरह। किंतु तमाम जोखिमों और भटकावों के बावजूद ये प्रति-छवियाँ पैदा तो अंतःप्रक्रियाओं के संघर्ष से ही होती हैं इसलिए कविता में भाव-बोध का लैंडस्केप भुरभुरा होने के बावजूद, अनुभूति और अंतर्मुखता की नैसर्गिकता के कारण ढहता नहीं है और स्पष्टतया कहें तो वह उस भीरु, सकीर्ण और उदासीन युगबोध को, विकास के निश्चित मंतव्यों का रूप देकर प्रासंगिक बनाने लगता है।

इसी क्रम में त्रिलोचन की प्रतिनिधि कविताओं के संवैधानिक संस्कारों की एक पड़ताल भी जरूरी है। प्रथमतः चर्चित कविता है - चंपा काले अक्षर नहीं चीन्हती। यह कविता 1940 के आसपास लिखी गई। एक रैखिक वार्तालाप से फूटती यह कविता अपनी भाषा से ज्यादा अपने बुनियादी शिल्प में अधिक क्रांतिकारी है। कहासुनी की हास्यास्पद आत्मसुरक्षा के बीच यह कविता एक निरीह, कातर और लहूलुहान कर देने वाली विडंबना की आख्या है, जिसमें अंतर्पीड़ा, व्यंग्य, और तथाकथित नगरीय पिपासा के समानांतर उन प्रश्न-चिह्नों को खड़ा किया गया है जिनमें आधुनिक संस्कृति और परंपरागत संस्कार के अंतर्मन गुँथे-धँसे हुए हैं। चंपा उस जमीन की प्रवक्ता है जो दुनिया के हाशिए पर है पर उसका सुख और बेलौस खीझ दुनिया को हाशिए पर रख देने के लिए काफी है। साथ ही चंपा उस अन्याय और अपराध की मासूम या कहें अबोध सी प्रतिक्रिया भी है जो तथाकथित प्रगति, विकास के सौदे में अपनी सांस्कृतिक जीवंतता और सृजनधर्मी स्वप्नशीलता को हास्यास्पद पिछड़ेपन में ढकेल देती है।

चंपा अच्छी है / चंचल है / न् ट ख ट भी है / कभी-कभी ऊधम करती है / कभी-कभी वह कलम चुरा देती है / जैसे-तैसे उसे ढूँढ़कर जब लाता हूँ / पाता हूँ - अब कागज गायब / परेशान फिर हो जाता हूँ

चंपा कहती है / तुम कागद ही गोदा करते हो दिन भर / क्या यह काम बहुत अच्छा है /

चंपा बोली! तुम कितने झूठे हो, देखा / हाय राम, तुम पढ़ लिखकर इतने झूठे हो / मैं तो ब्याह कभी ना करूँगी / और कहीं जो ब्याह हो गया / तो मैं अपने बालम को संग साथ रखूँगी / कलकता मैं कभी ना जाने दूँगी / कलकत्ता पर बाजार गिरे

कविता चंपा की पीड़ा नहीं, फटकार है उस सामंतवादी औपनिवेशिक मैकेनिज्म को जो शरीर को उसके प्राण, इंद्रिय को उसके आस्वाद से, व्यक्ति को उसके व्यक्तित्व और लोक को उसके संसार से तोड़ने का षड्यंत्र रच रहा है। सत्ता किस तरह व्यक्तिगत संगति और समूहगत वस्तुपरकता का अंतर्विरोध रच रही होती है यह इस कविता का प्रेय है। यह कविता अमानवीय और सर्वसंहारी से दिखते आक्रांत नगरीय मूल्यों और अपने अंतर्संयोजन में टूटते ग्रामीण-बोध की क्रमिक शिनाख्त है।

'नगई महरा' उनकी सशक्ततम और प्रौढ़ कृति है। त्रिलोचन का संघर्ष इस कविता में यही रहा है कि किस तरह एक सृजन-चेतना अपने में आत्मलीन, स्वायत्त इकाई होने पर भी कोई ठहरी हुई या जड़ सत्ता नहीं है - समय के घेराव में बंद नहीं है। वह हर पीढ़ी की आँख में यहाँ तक कि एक ही युगीन-संदर्भ में अलग-अलग चेतनाओं के लिए बदलती रहती है। नहीं बदलती है तो तो सिर्फ परंपरा के जातीय प्रसंगों की सार्वभौमिकता। नगई महरा एक उपन्यास है। पवित्र-अपवित्र, नैतिक-अनैतिक के बीच ऐतिहासिक वर्गीय अकेलेपन और परंपरागत सांस्कृतिक गुटबंदी की खींची गई विभाजन रेखा। नगई महरा इन संदर्भों में अभिजात्य के तथाकथित नैतिक स्पेस में लिया गया एक प्रोटेस्ट है जहाँ संसार के दिये गए उपेक्षित अकेलेपन के सामने 'नगई' और उसकी 'घरनी' का हस्तक्षेप है। कविता अपनी अंतर्वस्तु में एक साहसपूर्ण उपलब्धि है। कविता की मुखर भाषा में गद्य की बोली का सामंजस्य इस कविता को अपनी स्वायत्तता में एक जोखिम से भरी प्रसवपीड़ा बनाता है। तड़पता हुआ, संतप्त, विक्षुब्ध किंतु अपने अंतर्विरोधों के प्रति हर क्षण सजग। सामंती मध्यवर्गीय पूँजीतंत्र और विकल्पहीनता के शिकार समझौतापरस्त प्रतिबद्धताओं के बीच यह कविता एक युद्ध है जो प्रदर्शनप्रिय मर्यादा-चेतना और अपनी पहचान के तनाव से गुजर रहे इतिहास-बोध का हिस्सा है।

पूरा परिवार मैंने देखा है / पैरों पैरों है / हाथों ने काम कोई लिया, किया / हो जाने को ही काम हाथों में आता था

बातों से बात चली / अलगाव दूर था लगाव पास-पास था / और हर लगाव को कोई नाम देने से / काम बहुत नहीं बनता / नाम एक निश्चित निश्चय उगाता है / अर्थ संबंधों के सहारे चला करते है / यानी अर्थ का उद्गम छिपा रह जाता है।

यह कहना भी गलत नहीं होगा कि त्रिलोचन का रचना-संसार व्यापक तो है किंतु बहुआयामी नहीं है। हाँ, एक क्षैतिज विस्तार में विपर्ययों को जुटाने का कौशल, उनकी कवि प्रतिभा के सामर्थ्य का बोधक है। विरोधाभासों के आपसी संवादों से नए अर्थ-बिंबों को पैदा करना कविता की एक प्रचलित परंपरा रही है पर त्रिलोचन की विलक्षणता यह है कि वे नैमित्तिक या कहें नैसर्गिक घटनाओं में एक विचारगत दूरी और फिर तटस्थता पैदा करते हैं और फिर उन्हें एक ईमानदार भावुकता के द्वंद्व में फँसाकर इतना पास ले आते हैं कि हमारे समय का टकराव अपनी औपचारिकता और भद्रता का उल्लंघन करता, आत्मसंघर्ष की तरह उपलब्ध होने लगता है। त्रिलोचन के तमाम नैतिक सामाजिक आग्रह इन उपलब्धियों में गंभीर रूप से शामिल होते हुए भी एक पाठ की तरह अप्रत्याशित और आकस्मिक ही रहते हैं। यही उनके कवि-कर्म का आश्चर्यलोक भी है साथ ही यही कारण है कि उनका रास्ता सीधा स्वीकार या अस्वीकार का नहीं है। चेतना से लेकर चिड़िया तक और कठफोड़वे से लेकर भोपाल के कोहरे तक जहाँ तक विचार और दृष्टि की शक्ति तथा भूमिका हो सकती है वे सब त्रिलोचन की कविता के उपजीव्य हैं।

एक बड़े सामाजिक बोध के प्रति सचेष्ट कवि की व्यापक सार्थकता एवं समग्र सृजनधर्मी गहराई इस बात से मापी जा सकती है कि उसमें प्रतिरोध और प्रतिबद्धता का आनुपातिक द्वंद्व कितना है। अनुकूल-प्रतिकूल, जीवन-मृत्यु तथा जैविक-तात्विक आग्रहों के समालोचकीय निर्णय-बिंदु कैसे हैं। परिवेशगत जनाभिरुचियों के प्रति वह जितना ऐंद्रिक रूप से आसक्त होगा; एक संगठित तथा सफल यथार्थ के वैज्ञानिक सरोकारों के प्रति जितना सजग रहेगा वह उतनी ही क्षैतिज और प्रवाहमान संस्कृति का निर्माण कर सकता है। एक ऊर्जस्वित कालबोध की औपचारिक प्रक्रिया के समानांतर, त्रिलोचन की कविता सांसारिकता के इसी आत्मसंयमित मानवशास्त्र की खोज है।

एक बेलौस संतुलन की धरती पर जमा-फैला बूढ़ा पीपल, जिसकी छाँह सिर्फ सुरक्षा नहीं ममता को भी आकार देती है। त्रिलोचन ऐसे ही हैं। एक चीखती-चिल्लाती सदी के आवारापन के बीच वे एक नितांत मासूम से दीखते घरेलू अनुराग के कवि है। तमाम वादों और प्रतिवादों के रचना-विश्व के बीच उनकी उपस्थिति गोधूली की तरह है एक ऐसा संक्रमणशील तत्काल, जो धूसर होते सृजनधर्मी साहचर्य के बीच प्रतिबद्ध आश्वासन की तरह अपनी नियति को रेखांकित कर सकता है। अंधी होती कलाधर्मी जिम्मेदारियों के मध्य रिश्तों और संबंधों के जीवंत साक्ष्य समोए हुए।


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हिंदी समय में सुबोध शुक्ल की रचनाएँ



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