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कविता

एक जोड़ी पैर
मंजूषा मन


जीवन भर
देखे उसने
सिर्फ एक जोड़ी पैर
और सुनी
एक रोबदार आवाज
"चलो"
और वो चलती रही
एक जोड़ी पैर के पीछे
करती भी क्या
बचपन से यही सीखा
सिर नीचे रखो
नजर नीचे रखो
देख भी क्या पाती
नीची गर्दन से
नीची नजर से
उसे तो दिखे
सिर्फ एक जोड़ी पैर
जो दिशा दिखाते रहे
और धीरे-धीरे
वो औरत से
भेड़ में बदल गई
जब भी सुनती
"चलो"
तो बस चल देती
उन दो पैरों के पीछे
बस यही जानती है वो
ये एक जोड़ी पैर
और ये आवाज है
उस पुरुष के
जो मालिक है
जीवन का।


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