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कविता

यशोदा
मंजूषा मन


मेरे घर
मासिक वेतन पर आई
एक आया
धीरे-धीरे यशोदा बन जाती है...
मैं बनी रह गई
देवकी...
कभी परिवार की जरूरत
कभी सपनों की उड़ान
तो कभी मजबूरी की
मोटी-मोटी साँकलों में
जकड़ी रही...
मैं
किसी सूरत तोड़ न पाई
अपना कारागार
समय का कंस
जकड़े रहा मुझे...


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