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कविता

नजरें पहचानना
मंजूषा मन


पीठ पर,
बस्ता टाँगे
स्कूल जातीं छोटी लड़कियाँ
अब समझने लगीं हैं
उन
अंकलनुमा आदमियों की नजरें
जो उन्हें घूरा करते हैं
आते-जाते...
वही
शाम को
अपने घर में
बेटी को सिखाता है
नजरें पहचानना...।


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