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बाल साहित्य

मैं क्यों सोचूँ
दिविक रमेश


लू लू कुछ न कुछ सोचता जरूर है। जब देखो तब। ऐसा उसके बापू कहते हैं। दोस्त भी। पर लू लू क्या सोचता है, यह कोई नहीं जानता। पूछने पर वह कुछ बताता भी तो नहीं। बताए भी तो क्या। खुद उसे यकीन नहीं आता कि वह कुछ न कुछ सोचता जरूर है। वह तो सब की तरह स्कूल जाता है। होमवर्क करता है। खेलता है। खाता है। पीता है। सोता है। जागता है। बापू और दोस्तों की बात जब ज्यादा ही हो जाती है तो लू लू सोचता है कि वे सब उसके बारे में वैसा क्यों सोचते हैं।

लू लू अधिकतर अपने घर में ही रहता है। कुछ साल पहले ही तो बनवाया था घर बापू ने। बहुत सुंदर। गेट के पास, बड़े प्यार से, एक नीम का पेड़ भी लगाया था। लू लू तब से नीम के पेड़ को बढ़ते हुए देख रहा है। उसे पानी भी देता है। वैसे वह पानी देने को हमेशा पानी पिलाना कहता है। इसलिए कि उसे अच्छा लगता है। बापू भी उसी के लहजे में कभी न कभी पूछ लेते हैं - "अरे लू लू नीम को पानी पिलाया कि नहीं?" जब बापू उसी की तरह पूछते उसे बड़ा मजा आता। पर वह सोचने लगता कि उसे मजा क्यों आता है। पर उत्तर की परवाह किए बिना वह जल्दी ही अपनी मस्ती में खो जाता।

उस दिन पता नहीं वैसा क्यों हुआ? लू लू को लगा कि नीम का पेड़ उससे कुछ कहना चाहता है। पर वह वैसा क्यों लग रहा है, उसने सोचा। भला पेड़ कोई आदमी है कि उससे बात करेगा। पर थोड़ी ही देर में उसे फिर लगा कि पेड़ की टहनियाँ उसे पास बुलाकर कुछ कहना चाहती हैं। नहीं तो वे हिल हिलकर उसकी ओर क्यों झुकतीं। कहीं ये टहनियाँ बापू की शिकायत तो नहीं करना चाहतीं। अरे हाँ, बापू, हर सुबह इन पर लगी नन्हीं-नन्हीं कोमल पत्तियों को तोड़ कर मजे मजे से खा जाते हैं। कहीं इसी बात का तो दुख नहीं है इनको! उसने टहनियों की ओर ऐसे देखा जैसे जानना चाहता हो कि वह जो सोच रहा है क्या सही है। पर यह क्या! उसे लगा जैसे टहनियाँ जोर-जोर से हँस रही हों। जैसे कह रही हों - "अरे भोले सरकार, पत्तियाँ तोड़ने पर भी कोई नाराज होता है भला? और वह भी तब जब पत्तियों का बहुत अच्छा उपयोग होता हो। देखते नहीं कि कि हम पर फिर पत्तियाँ आ जाती हैं। लू लू को लगा कि वह तो निरा बुद्धू ही निकला। उसके बापू भला ऐसा काम क्यों करेंगे जिससे पेड़ या उसकी टहनियाँ नाराज हों। वह फिर सोच में पड़ गया। आखिर वह वैसा-वैसा सोच भी क्यों रहा है? उसने अपराधी की तरह टहनियों की ओर देखा। सॉरी भी बोला। उसे लगा कि टहनियाँ खिलखिलाकर खुश हो गईं। उसे बड़ा मजा आया। पर वह फिर सोच में पड़ गया। सोचने लगा कि जब हम अपनी गलती मानकर सॉरी कहते हैं तो दूसरे खुश क्यों हो जाते हैं? और दूसरों को खुश देखकर हमें मजा क्यों आता है? लेकिन पहले की तरह उसने इस बार भी उत्तर की परवाह नहीं की। और अपने में मस्त हो गया। पर एक सवाल जाने कहाँ से उसके दिमाग में आ टपका। और लगा उछलने। उसे उकसाने। टहनियों से कुछ पूछने के लिए। उसने सोचना तो जरूर चाहा कि ये सवाल क्यों कहीं से उछल-उछल कर हमारे दिमाग में आ टपकते हैं लेकिन चुप रहा। सोचा कि पहले टहनियों से पूछ ही लेता हूँ। सो पूछा - "अच्छा, जब कोई आपकी टहनियाँ तोड़ता है तो आपको दर्द नहीं होता?" उसे लगा टहनियाँ थोड़ी चुप हो गई थीं और उसे अचरज से देखने लगी थीं। उसे लगा कि वे सोच रहीं थीं कि लू लू कुछ न कुछ सोचता ही रहता है। लू लू ने सोचा कि वह इस बात को यहीं छोड़ दे। कुछ भी न सोचे। पर वह करे भी तो क्या करे? टहनियाँ, उसे लगा, कुछ कहना चाहती हैं। और कहने भी लगीं - "लू लू! क्या तुमने किसी की मदद की है? जरूर की होगी, क्योंकि तुम अच्छे बच्चे लग रहे हो। माँ के काम में हाथ बँटाया होगा। दादी की ऐनक ढूँढ़ी होगी। किसी को सड़क पार कराई होगी। नहीं?" लू लू को झट से याद आया कि एक बार उसने अपने दोस्त की मदद की थी। वह और दोस्त मैदान में भागते-भगते गिर गए थे। लू लू को चोट आई थी लेकिन दोस्त से बहुत कम। दोस्त तो उठ ही नहीं पा रहा था। तब लू लू ने दोस्त को उठाया था। अपनी चोट और दर्द की परवाह किए बिना। यूँ कितना दर्द हुआ था उसे। पर दोस्त को सहारा देकर वह स्कूल की डॉक्टर के कमरे में ले आया था। कितना-कितना अच्छा लगा था उसे! लू लू ने चाहा कि वह यह पूरा किस्सा टहनियों को बता दे। वह बताने को हुआ ही था कि देखा कि टहनियाँ न तो झुकी हुई थीं और न ही हिल रही थीं। बस स्थिर खड़ी थीं। जैसे किसी सोच में मग्न हों। लू लू मुस्कुराया और सोचा की टहनियाँ भी तो सोचती हैं। पर जल्दी ही फिर सोचा - "मैं क्यों सोचूँ। कुछ भी। जब देखो तब। नहीं तो सब यही कहेंगे न कि लू लू कुछ न कुछ सोचता जरूर है।"


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