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बाल साहित्य

लू लू की सनक
दिविक रमेश


लू लू अपना हर काम खुशी-खुशी करता। सब उसकी प्रशंसा करते। माँ खुश होती। आँखें छलछला उठतीं। भगवान को धन्यवाद देती। लू लू को सब प्यार करते। लू लू को अब जेबखर्ची भी अच्छी-खासी मिलती। टोका-टोकी भी कम होती। लू लू भी खुश हो जाता।

सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। पता नहीं कैसे लू लू को हर वक्त चिप्स खाने की लत लग गई। जब देखो तब चिप्स ही खाता। चिप्स की टोह में ही लगा रहाता। जेब खर्ची भी चिप्स पर ही खर्च करने लगा। माँ अच्छा-अच्छा पौष्टिक खाना बनाती। पर लू लू को तो उसे देखने तक का मन न होता। उसे तो बस चिप्स की ही रट लगी रहती। वह भी मसालेदार चिप्स की। माँ समझाती पर हार कर उसे चिप्स ही देने पड़ते। कुछ तो खाए। शायद ठीक हो जाए। कुछ दिन तो ऐसा चलता रहा लेकिन अब माँ की चिंता बढ़ने लगी। एक दिन फिर माँ को लू लू को अच्छे से समझाने की कोशिश की - "देख लू लू मैं तुझे चिप्स खाने से रोकती नहीं। पर हर वक्त चिप्स खाना सेहत के लिए ठीक नहीं। सबकुछ खाना चाहिए। हर चीज के कुछ न कुछ गुण होते हैं।" लू लू सुनता लेकिन माँ की बात को कोरा उपदेश मानकर अनसुनी कर देता। माँ को कुछ समझ नहीं अता। बस परेशान रहती। और सोच में पड़ी रहती।

स्कूल जाता तो भी लू लू लड़ झगड़ कर चिप्स ही ले जाता। लंच के लिए। माँ ने कई बार कुछ और देने की कोशिश की पर वह उसे वैसा का वैसा वापिस ले आता। मुँह तक नहीं लगाता। माँ समझाती - "लू लू तेरे लिए कितने प्यार से बनाया है। तू खाकर तो देख। न अच्छा लगे तो मत खाना।" पर लू लू के कान पर तो जूँ तक नहीं रेंगती। माँ की बात को अनसुनी कर देता। माँ ज्यादा कहती तो रोने लगता। रूठ जाता। उसे तो बस चिप्स ही चाहिए थे। ऊबता भी नहीं था। अब तो उसकी सेहत पर भी बुरा असर पड़ने लगा था। माँ परेशान हो गई। चिप्स तो और बच्चे भी खाते थे और स्कूल भी ले जाते थे पर कभी-कभार।

एक दिन तो स्कूल से भी शिकायत आ गई। लिखा था कि लू लू अपने चिप्स खाकर और बच्चों के भी चिप्स चट कर जाता है। कभी चुराकर तो कभी छीनकर। "हे राम!" - माँ के मुँह से निकला। इस शिकायत ने तो माँ को हिला ही दिया। वह सोचती कि लू लू को किसी की बुरी नजर लग गई है। पुराने विचारों की जो ठहरी। उसे कहाँ मालूम था कि बुरी नजर-वजर कुछ नहीं होती।

इस बार वह खुद टी लू की माँ के पास गई। अपनी सारी परेशानी बताई। टी लू की माँ भी चिंता में पड़ गई। पर थोड़ी देर को ही। वह मुस्कराई और उसकी आँखों में चमक भी आ गई। लू लू की माँ समझ गई। जरूर टी लू की माँ को कोई तरकीब सूझ गई है। बात सही भी निकली। टी लू की माँ ने लू लू की माँ को उसके कान में एक तरकीब बताई। लू लू की माँ खुश हो गई।

अगले दिन लू लू की माँ भी लू लू के साथ उसके स्कूल गई। अकेले में टीचर जी से मिली। और उन्हें टी लू की माँ की बताई तरकीब बताई। टीचर जी भी खुश हो गईं। माँ घर लौट गई।

लंच का समय हुमा। लू लू ने अपना टिफिन बॉक्स खोला। यह क्या! वह तो खाली था। उसमें तो एक भी चिप्स नहीं था। लू लू का माथा चकराया। उसे अच्छी तरह याद था कि उसकी माँ ने तो ढेर सारे चिप्स दिए थे। उसने खाए भी नहीं। फिर कहाँ गायब हो गए।

बच्चे अपना-अपना लंच खा रहे थे। खूब मजे से। लू लू बस ताक रहा था। बेचारा लू लू! क्या करे वह? वह उठा और टीचर जी के पास गया। वह भी लंच खा रही थीं। लू लू ने कहा - "टीचर जी मेरा टिफिन खाली है। पता नहीं मेरे चिप्स कहाँ गायब गए।" टीचर ने रूखे स्वर में कहा - "तो मैं क्या करूँ?" "मुझे बहुत भूख लगी है।" - लू लू ने रुआँसा होकर कहा। "ठीक है, मैं बच्चों से पूछती हूँ।" - टीचर ने कहा और बच्चों से पूछा - "क्या तुमने लू लू के चिप्स लिए हैं?" "नहीं मैम। लू लू तो खुद चोर है। कभी कभी हमारे चिप्स छीन भी लेता है। देख लीजिए हमारे टिफिन। हमने तो चिप्स लाने ही छोड़ दिए।" - बच्चों ने कहा। "सुन लिया लू लू।" - मैडम ने कहा।

लू लू को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। भूख थी कि उसे तड़पा रही थी। बहुत ही बेचैन कर रही थी। उसने टीचर से फिर कहा - "मुझे बहुत भूख लगी है टीचर जी! मैं क्या करूँ?" "देखो लू लू, मैं भी क्या करूँ? तुम तो बस चिप्स ही खाते हो और यहाँ किसी के पास चिप्स नहीं हैं। अब तुम ही बताओ मैं क्या करूँ? हाँ मेरे पास यह गोभी का पराँठा है। चाहो तो यह खा सकते हो।" - लाचारी के स्वर में टीचर ने गोभी का पराँठा उस की ओर बढ़ाते हुए कहा कहा। सब बच्चे चुपचाप देख रहे थे। लू लू की एक बार तो नाक-भौंह सिकुड़ गई। लेकिन भूख के आगे उसका वश नहीं चल रहा था। सो पराँठा ले लिया और खाने लगा। यह क्या? पराँठा खाकर तो उसे मजा आ गया। उसने सोचा तक न था कि पराँठा इतना स्वादिष्ट हो सकता है। कितनी ही बार तो उसकी माँ ने गोभी का पराँठा खिलाने की कोशिश की थी पर वह तो मुँह तक नहीं लगाता था। उसे कहाँ पता था कि आज वाला गोभी का पराँठा भी उसकी माँ ही ने बनाया था जिसे माँ ने ही टीचर को दिया था। टीचर ने देखा लू लू ने पूरा पराँठा खा लिया था। लू लू खुश भी नजर आ रहा था। टीचर अपनी तरकीब पर खुश थी। लेकिन थोड़ा उदास होकर बोली - "लू लू आज तो तुम्हें गोभी के पराँठे से ही काम चलाना पड़ा न?" "हाँ मैडम। लेकिन मुझे बहुत मजा आया। अब तो मैं रोज बस गोभी का पराँठा ही खाया करूँगा।" - लू लू ने कहा। बच्चे हैरान थे।

घर जाकर लू लू ने बस्ता रखते ही माँ से कहा - "माँ कल से मैं चिप्स नहीं ले जाऊँगा। मुझे गोभी का पराँठा ही देना। अब मैं रोज गोभी का पराँठा ही खाऊँगा। वह बहुत अच्छा होता है।" माँ ने खुश होकर कहा - "ठीक है, ठीक है, पर तुझे गोभी का पराँठा कहाँ से याद आ गया। तब लू लू ने स्कूल की पूरी बात बता दी - चिप्स गायब हो जाने से गोभी के पराँठे तक की। माँ का तो खुशी का ठिकाना न रहा। टी लू की माँ की बताई तरकीब काम जो आ गई थी।

अगले दिन माँ ने गोभी का पराँठा बना कर दिया। बच्चों ने देखा लू लू बहुत खुश था। एक-दो बच्चे जो चिप्स लाए थे उनके चिप्स न तो चोरी हुए और न ही लू लू ने उन्हें छीना।

माँ को फिर परेशानी हुई। लू लू अब गोभी के पराँठे के सिवा और कुछ नहीं खाता था। स्कूल में भी वह गोभी का पराँठा ही ले जाता। माँ को फिर स्कूल जाना पड़ा। टीचर को बताया। सुनकर टीचर मुस्कुराई। बोली - आप चिंता मत कीजिए। अब तो हमारे पास तरकीब है ही।" माँ घर चली आई।

अगले दिन लू लू ने जब अपना टिफिन बॉक्स खोला तो वह खाली था। लू लू को पक्का याद था कि माँ ने गोभी का पराँठा उसके सामने रखा था। बाकी सब बच्चे मजे-मजे से खा रहे थे। किसी के पास भी गोभी का पराँठा नहीं था। मतलब किसी ने उसका पराँठा चुराया भी नहीं था। फिर कहाँ गया। उसका तो सिर ही चकरा गया। क्या करे वह? भूख तो जोर से लगनी ही थी सो लगी। पेट में चूहे भी कूदने लगे। गोभी के पराँठे की महक उसके सिर में चक्कर लगा रही थी। बेचैनी बढ़ती जा रही थी। नही रहा गया तो जा पहुँचा टीचर के पास। रोना निकल रहा था। बोला - "मैम, मेरा टिफिन बॉक्स खाली है। माँ ने गोभी का पराँठा दिया था। किसी बच्चे के पास भी नहीं है। मैं क्या करूँ?" उदास सा मुँह बनाकर टीचर ने कहा - "हाँ लू लू,गोभी का पराँठा तो आज मेरे पास भी नहीं है। मैं अब क्या करूँ?" लू लू क्या बताता। चुप हो गया। पानी पीया। पर पेट के चूहे मानते तब न! उसका फिर रोना निकल आया।

लू लू को परेशान देखकर टीचर ने कहा - "लू लू तुम चाहो तो यह खा सकते हो।" लू लू ने देखा टीचर के हाथ में रोटी और दाल थी। एक बार तो लू लू के मन में आया कि मना कर दे। पर क्या करता। भूख जो सता रही थी। लाचार होकर रोटी और दाल ले ली। खाने लगा तो वह चौंक गया। बहुत ही स्वादिष्ट थी दाल और रोटी तो। वह तो मजे-मजे से पूरी खा गया। उसने सोचा अब वह रोज दाल-रोटी ही खाएगा। और कुछ नहीं। टीचर ने देखा वह बहुत खुश था। टीचर भी खुश हो गई।

घर आते ही लू लू ने माँ को दाल-रोटी खाने वाली स्कूल की सारी बात बताई। माँ खुश हो गई। लू लू ने कहा - "माँ! माँ! अब से मैं बस दाल-रोटी ही खाऊँगा। मुझे बस दाल-रोटी ही देना। "अच्छा" कह कर माँ चुप हो गई। सोचा कैसा खब्ती बेटा है मेरा। पूरा सनकी है। पर बोली कुछ नहीं। दो-चार दिन तक लू लू दाल-रोटी पर ही पिला रहा। स्कूल भी दाल-रोटी ही ले जाता और मजे-मजे से खाता।

आज टीचर पहले ही से तैयार थी। जो घटना था वही घटा। लू लू का टिफिन बॉक्स फिर खाली था। और दाल-रोटी किसी के पास नहीं थी। टीचर के पास भी नहीं। लू लू को भूख भी लगनी ही थी सो लगी। उसे टीचर से पूछना ही था सो पूछा - "अब मैं क्या करूँ?" तरकीब के अनुसार टीचर को लाचारी दिखानी ही थी सो दिखाई। बोली - "आज तो लू लू मेरे पास बस यह है - सैंडविच। खाना चाहो तो इसे खा लो।" लू लू ने सैंडविच खाया तो दंग रह गया। "इतना स्वादिष्ट होता है सैंडविच!" - उसने सोचा और पूरा का पूरा खा गया। टीचर ने उसे एक और सैंडविच दिया तो उसे भी खा गया। बहुत ही खुश था वह। टीचर भी उसे खुश देखकर खुश हो गई। उसने अचानक कहा - "मैम मुझे तो पता ही नहीं था कि सैंडविच भी इतना मजेदार होता है। अब से मैं बस सैंडविच ही खा...।" पर कहते कहते बीच में ही रुक गया। वह थोड़ा शर्मा भी रहा था और होंठों से हँसी भी फूट रही थी।

टीचर को भी हँसी आ गई। बच्चों भी खिलखिला उठे। लू लू भी खुल कर हँस पड़ा। हँसी थमी तो टीचर बोली - "लू लू लगता है बात तुम्हारी समझ में आ गई है। दुनिया में एक से एक अच्छी चीज है खाने की। सबका अपना-अपना स्वाद है। सबके अपने-अपने गुण हैं। तुम एक ही चीज के पीछे पड़े रहोगे और दूसरी चीजे खाने की कोशिश भी नहीं करोगे तो कैसे पता चलेगा दूसरी चीजें कैसी हैं! सबकुछ खाने से ही अच्छी सेहत भी बनती है। देखो अब तुम पहले से ज्यादा ताकतवर भी हो गए हो।"

पता नहीं लू लू को टीचर की बात कितनी समझ में आई। पर उसे यह जरूर पता चल गया था कि उसे रोज-रोज एक ही चीज खाने की जिद नही करनी चाहिए। चोरी करके या छीन कर भी नहीं। सब चीजें खानी चाहिए। जो भी माँ दे। माँ हमेशा अच्छी चीजें ही देती है। सब चीजें बहुत मजेदार होती हैं। ये बातें लू लू ने अपने एक दोस्त को भी बताई थी। चुपके से। पर मैंने भी तो चुपके से सुन ली थी।


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