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बाल साहित्य

लू लू की माँ
दिविक रमेश


लू लू भी अपने ही तरह का बच्चा था। बड़ा हो गया था पर अनोखा था। उसे तो बस खेलने में ही मजा आता था। या दिन भर टी.वी. के आगे बैठने में। कोई भी काम करने में उसे आलस ही आता। माँ समझाती - "अपने थोड़े काम भी करना सीख।" पर लू लू समझे तब न। उसे तो कोई न कोई बहाना मिल ही जाता। लू लू को प्यास लगती तो माँ को पुकारता और कहता-एक गिलास पानी तो दो न माँ! माँ कहती - "लू लू मैं रसोई में काम कर रही हूँ। तुम उठ कर ले लो न बेटे! लू लू उठता ही नहीं। बल्कि नाराज हो जाता। हार कर माँ ही मनाती। लू लू कहता - "माँ मैं तो अभी छोटा हूँ न। मेरे काम आप ही किया करो। जब मेरा काम कोई दूसरा करता है तो मुझे बड़ा मजा आता है।" माँ परेशान हो जाती। सोचती-कैसे राह पर लाऊँ लू लू को। जो भी करने को कहो लू लू का ऐसा ही जवाब होता। एक दिन तो हद ही हो गई।

रात को थोड़ी ठंड हो गई थी। लू लू ने माँ को पुकारा - "माँ रजाई तो उढ़ा जाओ!" माँ ने कहा - "लू लू रजाई तुम्हार पास ही रखी है। खुली हुई। थोड़ा खींच ले बेटे!" लू लू चिल्ला कर बोला - "माँ मैं ने कहा था न। मेरे काम जब दूसरे करते हैं तो मुझे बड़ा मजा आता है।" माँ क्या करती। जानती थी, लू लू ढंड में पड़ा रहेगा पर रजाई नहीं ओढ़ेगा। ठंड लग गई तो बीमार पड़ जाएगा। सारे काम छोड़ कर आई और लू लू पर रजाई कर दी। लू लू खुश हो गया। और बड़े मजे से सो गया।

माँ की एक सहेली थी। बड़ी ही अच्छी। उसका भी एक बेटा था। लू लू जितना ही। नाम था टी लू। माँ ने टी लू की माँ को लू लू की बात बताई। दुखी जो थी। टी लू की माँ ने कहा - "मेरा टी लू भी पहले ऐसा ही था। मैं कहती रह जाती पर कोई काम नहीं करता था। अब तो वह अपने सारे काम आपी आपी करता है। वह भी खुश होकर।" "वह कैसे?" - लू लू की माँ ने आश्चर्य से पूछा। "एक सीक्रेट है।" - टी लू की माँ ने कहा। "जल्दी से बता न" - लू लू की माँ बोली। "तो सुनो! पर पास आ जाओ। कान में बताऊँगी। कोई सुन ले तो?" - टी लू की माँ ने कहा। टी लू की माँ ने लू लू की माँ को सीक्रेट बता दी।

लू लू की माँ बहुत खुश हुई। उसने सीक्रेट के अनुसार ही किया। यह क्या? चमत्कार ही हो गया। लू लू तो एकदम बदल गया। वह भी टी लू जैसा अच्छा बन गया। माँ कहती - "लू लू खाना बन गया है। डाल दूँ क्या?" लू लू भाग कर आता और कहता, "नहीं नहीं माँ! मैं ले लूँगा न। तुम कितना काम करती हो। थक जाती होगी न!" लू लू की ऐसी बात सुन कर माँ खुश हो जाती। आँखें भर आतीं। कितना अच्छा बच्चा बन गया था लू लू। आलसी तो जरा भी नहीं रहा। आब न वह सारा सारा दिन खेलता था और न ही टी.वी. के सामने पड़ा रहता था। अब सब उसकी तारीफ भी तो करते थे। तारीफ सुन कर लू लू बहुत खुश हो जाता। बस लू लू की कहानी खत्म।

अरे हाँ। टी लू की माँ की सीक्रेट क्या थी, वह तो बताई ही नहीं। टी लू की माँ ने लू लू की माँ से कहा था कि आज से वह लू लू को कुछ न कहे। वह जो करता है करने दे। उसके सारे काम भी वही कर दिया करे। लू लू कहता - "माँ गेंद दे दो।" माँ चुपचाप गेंद दे देती। माँ ने लू लू को कह दिया था कि अब से उसके सारे काम वही करेगी। लू लू कुछ नहीं करेगा। लू लू तो बहुत खुश हो गया। उसे और क्या चाहिए था। लू लू कहता - "माँ प्लीज मेरा होमवर्क कर दो।" लू लू की माँ कर देती। अब तो लू लू कुछ काम नहीं करता। माँ पर ही निर्भर हो गया। वह सबसे कहता, "माँ मेरे सारे काम करती है।" एक दिन माँ ने कहा, "लू लू अब भी कुछ काम हैं जो तुम करते हो। अब से वे काम भी मैं ही करूँगी। तुम नहीं। लू लू झट से बोला - "हाँ माँ सब काम आप ही किया करो। मैंने कहा था न कि जब कोई दूसरा मेरा काम करता है तो मुझे बड़ा मजा आता है।" सुन कर लू लू की माँ मुस्कुराई। "ठीक है लू लू, आज से मैं तुम्हें एक भी काम नहीं करने दूँगी। तुम्हारी जगह मैं ही करूँगी।" - माँ ने कहा। लू लू ने उछल कर कहा - "वाव! एकदम ठीक।" "तुम कुछ कहोगे तो नहीं न? मुझे करने दोगे न अपने सारे काम?" - माँ बोली। "नहीं माँ, कुछ नहीं कहूँगा, प्रोमिज।" - लू लू ने कहा। "तो फिर सुनो! आज से तुम खेलने नहीं जाओगे। तुम्हारी जगह मैं ही खेलने जाऊँगी। टी.वी. भी मैं ही देख लूँगी। तुम बस आराम करना।" - माँ ने प्यार से कहा।

लू लू तो जैसे चौंक ही गया। पर धीरे-धीरे बात उसकी समझ में आ गई। उसने माँ से कहा - "माँ अब से अपने सारे काम मैं अपने आप करूँगा।"

माँ ने लू लू को गले से लगा लिया।


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