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लेख

विशेष योग्यता वाले समूहों के मानवाधिकार का सवाल
डॉ. मिथिलेश कुमार


मानव अधिकार का विचार हमारे राजनीतिक यथार्थ की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। मानव अधिकार मुख्यतः राज्य के व्यवहार से व्यक्ति की सुरक्षा से संबंधित हैं लेकिन इसके साथ ही, ये राज्य के द्वारा ऐसी सामाजिक स्थितियों के निर्माण का भी निर्देश देते हैं, जिसमें व्यक्ति अपना पूर्ण विकास कर पाए। मानवाधिकार वे अधिकार है जो प्रत्येक व्यक्ति (Individual) को मानव होने के नाते प्राप्त है। दार्शनिक स्तर पर मानवाधिकार की बुनियादी प्रेरणा यह है कि कोई व्यवस्था किस सीमा तक मनुष्य के बहुआयामी विकास को बढ़ाने के लिए वातावरण व सुविधाएँ देती है। चूँकि 'राज्य' (State) भी एक व्यवस्था है या दूसरे शब्दों में कहें तो सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्यवस्था है इसलिए मानवाधिकार के लिहाज से एक अच्छे राज्य की कसौटी यह है कि वह मानवीय विकास के लिए आवश्यक परिस्थितियों का निर्माण किस सीमा तक कर रहा है।

विशेष योग्यता वाले पुरुष, महिलाएँ एवं बच्चे हमेशा से समाज के हाशिये पर रहे हैं तथा अपने दैनंदिन अधिकारों के लिए अनेक कठिनाइयों को झेलने हेतु मजबूर भी रहे हैं। मानवाधिकार का जन्म मानव को गरिमापूर्ण एवं स्वतंत्र जीवन जीने हेतु अधिकार प्रदान करने के लिए हुआ। लेकिन, लंबे समय से विशेष योग्यता वाले समूहों के मानवाधिकार के लिए राष्ट्र-राज्यों का रवैया ठीक नहीं रहा है। अतः समाज में विशेष योग्यता के लोग शारीरिक, मानसिक एवं विभेदगत पीड़ाओं को झेलने के लिए मजबूर रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार दुनिया भर में करीब 65 करोड़ लोग किसी ना किसी तरह के विकलांगता के शिकार हैं जो दुनिया के कुल आबादी का 10 फीसदी हिस्सा धारण करते हैं। इनमें से भी इनकी 80 प्रतिशत आबादी विकासशील देशों में है। सही अर्थों में देखा जाए तो प्रतिभा एवं बुद्धि के मामलों में ये समूह किसी से कम नहीं हैं और न ही रहे हैं। ऐसी कई मिसालें दुनिया भर में मिल जाएँगी जिनमें विशेष योग्यता रखने वाले लोगो ने विविध स्तरों पर अपनी प्रतिभा को साबित किया है। स्टीफन हाकिंस पेशीशोषी पार्श्व काठिन्य (एमियोट्रॉफ़िक लैटरल स्कलिरॉसिस) नामक रोग के शिकार होते हुए भी भौतिक विज्ञान की दुनिया में कई सिद्धांतों की खोज की तथा ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम, द यूनिवर्स इन अ नटशेल जैसी कालजयी पुस्तकों की रचना की। विल्मा रूडोल्फ चार वर्ष की अवस्था में ही पोलियोमेलाइटिस नामक रोग की शिकार हो गई थीं। शारीरिक रूप से विकलांग होने के बावजूद भी ओलिंपिक के महिला वर्ग की दौड़ प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त कर के स्वर्ण पदक हासिल किया। अल्बर्ट आइन्स्टीन जिन्हें जूते का फीता (नॉट) किशोरावस्था तक नहीं बाँधना आता था क्योंकि वह इसे याद नहीं रख पाते थे, कहा तो यह भी जाता था कि वह अपने ऑफिस से घर आते समय घर का रास्ता तक भूल जाते थे। फिर भी, उन्होने विज्ञान जगत में सापेक्षता का सिद्धांत (Theory of relativity) देकर एक नई क्रांति का सूत्रपात किया। लेकिन अधिकतर मामलों में इनको कई तरह के विभेदों, एकाकीपन एवं शोषण का सामना करना पड़ता है। ज्यादातर मामलों में ये लोग गरीबी में ही जीवन-यापन करते है तथा शिक्षा एवं रोजगार के अवसरों से कोसों दूर रहते हैं। कई देशों में तो इन्हें खुद की संपत्ति अर्जित करने के अधिकार से भी वंचित रहना पड़ता है।

विशेष योग्यता वाले समूह के लोगों का मानवाधिकार की लड़ाई अस्सी के दशक में प्रारंभ हुई जब पहली बार 1981 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस वर्ष को अंतरराष्ट्रीय विकलांगता वर्ष घोषित किया। 1993 में संयुक्त राष्ट्र की आम सभा द्वारा 'स्टैंडर्ड रूल्स ऑन द इक्वलाईजेशन ऑफ ऑपोर्चुनिटिज फॉर पर्सन डिसेबिलिटिज' को पारित किया गया। इसी कड़ी में एक महत्वपूर्ण पहल 1991 में की गई जब 'कमेटी ऑन एलिमिनेशन ऑफ डिस्क्रिमिनेशन ऑन वुमेन' द्वारा विशेष योग्यता वाले महिलाओं के मनवाधिकारों की बात की गई। इनके मानवाधिकार को लेकर एक बड़ी बहस मई 2008 में शुरू हुई जिसके परिणामस्वरूप 'कन्वेंशन ऑन द राइट्स ऑफ पर्सन्स विथ डिसेबिलिटी एंड इट्स ऑप्शनल प्रोटोकॉल' को वैश्विक स्तर पर लागू करने की मुहिम शुरू हुई। इसके अनुच्छेद-1 के अनुसार इसका मूल उद्देश्य विकलांग व्यक्तियों के सभी मानवाधिकारों और मौलिक स्वतंत्रता को बढ़ावा देना, उनकी रक्षा सुनिश्चित करने के साथ ही उनके प्रति गरिमा और सम्मान को बढ़ावा देना शामिल है।

इन विशेष योग्यता वाले समूहों के मानवाधिकरों के रक्षा के लिए की गई यह पहल अपने आप में इस मायने में भी अलग है कि, पूर्व में, विकलांगता एक व्यक्तिगत श्रेणी/सारणी के रूप में देखी जाती थी जिसमें कोई व्यक्ति प्राकृतिक रूप से, प्रकृति अथवा बाह्य कारणों से शारीरिक रूप से इतने सबल नहीं हो पाते थे कि वे शिक्षा एवं आजीविका के अवसरों का समान लाभ उठा सकें। इन समूहों के मानवाधिकारों की रक्षा हेतु इस नई पहल ने पूरे मुद्दे को देखने के लिए एक नई दृष्टि देने के साथ-साथ विकलांगता को वैयक्तिक श्रेणी से स्थानांतरित कर सामाजिक श्रेणी मे स्थापित करने का प्रयास किया है। अब समाज की जवाबदेही बनती है कि इन समूहों को शिक्षा और अन्य अधिकारों का समान अवसर प्रदान करे।

पिछले कुछ दशकों में विकलांगता को देखे जाने के नजरिए में बदलाव आया है। विकलांगता का पूरा विमर्श, अब इस बात पर बल देता है कि विकलांगता में व्यक्ति का कोई दोष न होकर व्यक्ति एवं समाज के मध्य सामंजस्य न स्थापित होने के कारण विशेष योग्यता प्राप्त समूह के समक्ष समस्याएँ पैदा होती है। विकलांगों को देखे जाने का यह नजरिया सामाजिक उत्तरदायित्व की अवधारणा के तरफ इशारा करता है। इस नजरिए के अनुसार, विशेष योग्यता वाले व्यक्तियों को अपने मानवाधिकारों के प्रयोग में सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक एवं पर्यावरणीय बाधाओं के कारण रुकावटें पैदा होती है। उदाहरण के लिए, शिक्षा व्यवस्था में विशेष योग्यता वाले व्यक्तियों की गैर मौजूदगी/ कम मौजूदगी इस कारण से नहीं है कि वे असमर्थ हैं अथवा हमारे पास विद्यालयों, कॉलेजों एवं शिक्षकों की कमी है बल्कि इसका मूल कारण विद्यालयों एवं कॉलेजों की संरचनात्मक संरचना है।

विशेष योग्यता वाले समूहों के मानवाधिकारों का पूरा विमर्श अधिकार केंद्रित उपागम पर जोर देता है जिसमे ये लोग समाज के किसी भी तरह के उपकार अथवा दया के अधिकारी नहीं हैं बल्कि उनकी माँग है कि उन्हें भी सभी के समान मानवाधिकारों का लाभ उठाने तथा गरिमामय जीवन जीने का अधिकार है। इनके अधिकारों के माँग की कवायद सिर्फ सुविधा प्राप्त करना नहीं है बल्कि समाज के सोच एवं नजरिए में व्यापक बदलाव की कोशिश भी है - ताकि समूहिक स्तर पर यह प्रयास किया जाए कि सभी व्यक्ति समान रूप से अधिकारों के उपयोग करने में अवसर प्राप्त करें।

विशेष योग्यता वाले समूहों का परिभाषीकरण

विशेष योग्यता के लोगों के जीवन के परिप्रेक्ष्य में कई दृष्टिकोण प्रतिस्थापित किए गए है। इन दृष्टियों को उपागम के रूप में देखा जाता है। ये निम्नलिखित हैं -

1. धर्मार्थ अथवा कल्याणकारी उपागम - यह उपागम मानता है कि विशेष योग्यता के समूह या व्यक्ति अपने समस्या अथवा असमर्थता के लिए खुद जिम्मेदार होते हैं। वह समाज के शुभेच्छा पर अपने हित अथवा कल्याण हेतु निर्भर रहते हैं। यह उपागम विशेष योग्यता के समूहों को समाज पर भार मानता है। इसी कारण गिरिजाघर गैर-सरकारी संगठन एवं अनेक मानव कल्याणकारी संस्थान इनकी मदद करते हैं। इस तरह से यह उपागम व्यक्ति के विशेष योग्यता एवं समाज के मध्य अंतर स्थापित करता है।

2. चिकित्सकीय उपागम - यह उपागम मानता है कि व्यक्ति की समस्या अथवा असमर्थता सामाजिक संरचना एवं प्रकार्य का प्रतिफल न होकर व्यक्ति की अपनी निजी समस्या है अतः व्यक्ति की समस्या एवं उपचार के लिए चिकित्सकीय सहायता प्रदान करना चाहिए। इस तरह यह उपागम विशेष योग्यता के लोगों के कल्याण हेतु समाज के प्रयास से ज्यादा चिकित्सकीय तंत्र पर बल देता है।

3. सामाजिक उपागम - इस उपागम के अनुसार विशेष योग्यता के समूहों का जन्म व्यक्ति एवं पर्यावरण के मध्य अंतरक्रिया के कमी के कारण होता है। इस प्रकार यह उपागम विशेष योग्यता के लोगों को समाज में केंद्रीय स्थान देता है तथा समाज के उत्तरदायित्व की भी बात विशेष योग्यता रखने वाले लोगों के प्रति करता है।

4. मानवाधिकार उपागम - यह उपागम विशेष योग्यता रखने वाले समूहों के अधिकारों की बात करता है। इस तरह से इस उपागम के अंतर्गत राज्य के उत्तरदायित्व को विशेष योग्यता वाले समूह के प्रति तय किया जाता है ताकि राज्य इनको मत देने, शिक्षा प्राप्त करने, नौकरियों में स्थान देने और चिकित्सा प्रदान करने की पहल करे। इस प्रकार यह उपागम विशेष योग्यता के समूहों को राज्यों के उत्तरदायित्व के साथ-साथ वैश्विक मानवाधिकार से भी संबंध स्थापित करता है।

विशेष योग्यता वाले लोगों के प्रति सामाजिक दृष्टि

व्यक्ति एवं समाज में गहरा संबंध होता है। दोनों में अंतःक्रिया होने के साथ-साथ आपस में अंतर प्रभाव भी पड़ता है। विशेष योग्यता के लोगों के प्रति समाज में कई प्रकार के नजरिए मौजूदा समय में पाई जाती हैं -

1. विशेष योग्यता के लोग समाज में विशेष स्थान रखते हैं। इनके लिए समाज एवं राज्य दोनों को अधिक प्रयास करते हुए इनके स्वास्थ्य, सुरक्षा, खुशी एवं जीवन की गरिमा का ध्यान रखना चाहिए।

2. विशेष योग्यता के लोग समाज पर हानिकारक प्रभाव डालते हैं। जैसे - मानसिक रोगी, लँगड़े, गूँगे, बहरे, अंधे लोगों को कुष्ठ रोगी और क्षय रोगी जैसे संक्रामक बीमारियों के समान दर्जा दिया जाता है और माना जाता है कि ये समाज के लिए अभिशाप है।

3. विशेष योग्यता के लोग दिव्यांग अथवा दिव्य मानव होते हैं खासकर यह दृष्टिकोण समाज में विशेष योग्यता के लोगों के लिए छवि स्थापित करने के लिए होती है मगर कभी-कभी यह धारणा विशेष योग्यता के लोगों के लिए उपहास कि वजह बन जाती है।

4. विशेष योग्यता के लोग समाज पर भार होते हैं क्योकि यह अनुत्पादक श्रेणी में आते हैं। इनके देख-रेख एवं पोषण में समाज का बड़ा श्रम एवं उत्पादन खर्च होता है। इसलिए यह वर्ग समाज पर भारस्वरूप होते है। कुछ लोग इस दृष्टि से प्रेरित होकर तो यह भी विचार देते हैं कि इन विशेष योग्यता वाले लोगों को विवाह करने, बच्चा पैदा करने तथा संपत्ति अर्जित करने का हक नहीं होना चाहिए क्योंकि ये लोग मूलतः अनुत्पादक होते हैं।

विशेष योग्यता वाले समूह के मानवाधिकारों की मूल विशेषताएँ

विशेष योग्यता वाले समूह के मनवाधिकारों की मूल विशेषताएँ निम्नलिखित है -

1. व्यक्तियों के अंतर्निहित गरिमा, व्यक्तिगत स्वायत्ता एवं स्वतंत्रता का सम्मान करना।

2. किसी भी प्रकार के विभेदीकरण को खत्म करना।

3. सामाजिक स्तर पर पूर्ण एवं सार्थक भागीदारी सुनिश्चित करना।

4. विभिन्नता का आदर करना तथा विशेष योग्यता वाले समूहों को मानवी विविधता के रूप में स्वीकार करना।

5. अवसर की समानता को बढ़ावा देना।

6. सुगम्यता का अधिकार प्रदान करना।

7. बच्चों की उभरती क्षमता का सम्मान करना एवं उनकी पहचान को बढ़ावा देना।

8. स्त्री एवं पुरुष के बीच समानता स्थापित करना।

विशेष योग्यता वाले व्यक्तियों के क्षमता संवर्धन के लिए किए जाने वाले कुछ जरूरी उपाय

विशेष योग्यता वाले समूहों के मानवाधिकार का क्रियान्वयन हेतु जरूरी है कि उनकी क्षमता का निरंतर संवर्धन किया जाए तथा समाज के मुख्यधारा में उन्हें जोड़ा जाए। इसके लिए निम्न प्रक्रियाओं का पालन किया जाना चाहिए -

1. सभी प्रारूपों एवं भाषाओं में मुद्रित सामाग्री का निर्माण - प्रशिक्षण मैनुअल, निगरानी प्रक्रिया, सहमति फॉर्म एवं संबंधित प्रश्नावली शामिल की जा सकती है। इसके लिए आवश्यक है कि इन सारी सामग्रियों का विकास ब्रेल लिपि एवं साइन भाषा में किया जाए ताकि तथ्य को आसानी से पढ़ा एवं समझा जा सके।

2. दृश्य-श्रव्य माध्यमों का विकास - इसके अंतर्गत स्लाइड, फोटो, विडियो, टेप आदि के माध्यम से जानकारी को अधिकतम स्तर तक उपलब्ध कराया जा सकता है।

3. सुगम्यता प्रदान करना - इसके अंतर्गत विशेष योग्यता वाले लोगों को गतिशील उपकरणों के उपयोग हेतु प्रशिक्षण प्रदान करना एवं उनको सुविधा मुहैया करना शामिल है। उदाहरण के तौर पर भवनों का निर्माण करते समय सुगम्य सीढ़ियों का ढाँचा तैयार करना चाहिए।

विशेष योग्यता समूह एवं भारत

सामान्य रूप में जिस प्रकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष योग्यता समूह के अधिकारों एवं मनवाधिकारों की पहल संयुक्त राष्ट्र संघ एवं अन्य गैर-सरकारी संगठनों ने सत्तर और अस्सी के दशक में प्रारंभ किया। ठीक वैसे ही 1970 के आसपास भारत में भी इनके अधिकारों की माँग प्रारंभ हुई। कई गैर-सरकारी संगठनों के नेतृत्व में विशेष योग्यता समूह के लिए समान अवसर की प्राप्ति, अधिकारों का संरक्षण एवं व्यवस्था में पूर्ण भागीदारी की माँग की गई। इनकी सक्रियता को देखते हुए सरकार ने 1955 में एक अधिनियम पारित किया जिसमे विशेष योग्यता समूह के लिए सरकारी नौकरियों में 3% स्थान आरक्षित कर दिया गया। यह इस समूह के लिए प्रेरणा एवं अग्रिम संघर्ष का आधार बना। इनके अधिकारों की रक्षा एवं कल्याण के लिए केंद्र सरकार ने 2012 एवं 2016 में अधिनियम पारित किया जिसके तहत इनकी सुरक्षा, स्वास्थ्य आश्रय सुविधा सरकारी नौकरियों में आरक्षण, सम्यक वातावरण, सामाजिक भागीदारी एवं संपत्ति अर्जन से संबंधित कई संदर्भों में उपबंध किए गए। विशेष योग्यता समूह के लिए 2016 में जो अधिनियम पारित किया गया उसमे विशेष योग्यता समूह के व्यक्तियों के संबोधन हेतु दिव्यांग नाम से संबोधित किया। फिर भी, आज भारतीय समाज में विशेष योग्यता प्राप्त लोगों की स्थिति दोयम दर्जे एवं तिरष्कृत भावना का शिकार रही है। समाज में इनको बुरे कर्मों का प्रतिफल के रूप में देखा जाता है। पारिवारिक स्तर से लेकर के सामाजिक स्तर तक इनकी गरिमा तार-तार होती रहती है। अतः इनके मानवाधिकार, कल्याण सुरक्षा एवं जीवन-गरिमा के संदर्भ में सिर्फ सरकारी स्तर पर प्रयास करने से बहुत सुधार नहीं होने वाला। जब तक कि इनके लिए भारतीय समाज के परंपरागत रूढ़िवादी मानसिकता में बदलाव नहीं लाया जाता है। समाज में विशेष योग्यता समूह के प्रति सम्यक, साकारात्मक एवं गुणात्मक बदलाव आए इसके लिए जागरूकता कार्यक्रम, निषेध कार्यक्रम एवं सामाजिक संरचना में बदलाव लाने की आवश्यकता है।

सारांश

विशेष योग्यता समूह के मानवाधिकार की लड़ाई सामाजिक आंदोलन के रूप में रही है एवं जारी भी है। यह अंतरराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर निरंतर अपनी मौजूदगी कायम की है। विशेष योग्यता समूह के लोगों ने वैश्विक एवं राष्ट्रीय स्तर पर जो सामाजिक आंदोलन शुरू किया उसके दो आयाम थे। प्रथम, यह कि इन लोगों ने अपनी प्रतिभा एवं क्षमता का प्रदर्शन विकास के हर क्षेत्रों में साबित किया कि वे किसी भी स्तर पर समाज में अनुत्पादक एवं आश्रित स्थिति में नही हैं। दूसरी बात यह कि, इन लोगों ने खुद को संगठित कर के हर स्तर पर समाज, राष्ट्र एवं सरकार पर दबाव समूह के रूप में दबाव बना कर अपने अधिकारों की माँग की।


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