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विमर्श

दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास
प्रथम खंड

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुक्रम 11. सज्जनता का बदला : खूनी कानून पीछे     आगे

11 . सज्‍जनता का बदला : खूनी कानून

पुराने और नए परवानों की अदला-बदली हुई तब तक हम 1906 के साल में पहुँच गए थे। 1903 में मैंने ट्रान्‍सवाल में दूसरी बार प्रवेश किया था। उस वर्ष के लगभग मध्‍य में मैंने जोहानिसबर्ग में ऑफिस खोला था। इस प्रकार मेरे दो वर्ष एशियाटिक विभाग के आक्रमणों का विरोध करने में ही बीत गए। हम सबने यह मान लिया था कि परवानों का मामला निबट जाने से सरकार को संपूर्ण संतोष होगा और कौम को थोड़ी शांति मिलेगी। लेकिन कौम के नसीब में तो शांति लिखी ही नहीं थी। पिछले प्रकरण में मैं श्री लायनल कर्टिस का परिचय दे चुका हूँ। उन्‍हें ऐसा लगा कि हिंदुस्‍तानियों के केवल नए परिवाने ले लेने से ही गोरों का उद्देश्‍य सिद्ध नहीं होता। महान कार्य परस्‍पर समझौते से पूरे हों; यह उनकी दृष्टि से काफी नहीं था। वे मानते थे कि ऐसे कार्यों के पीछे कानून का बल भी होना चाहिए; तभी वे उचित ठहरते हैं और तभी उनके भीतर रहे सिद्धांतों की रक्षा हो सकती है। श्री कर्टिस चाहते थे कि हिंदुस्‍तानियों पर अंकुश लगाने के लिए कोई ऐसा कार्य किया जाए, जिसका प्रभाव समूचे दक्षिण अफ्रीका पर पड़े और अंत में दूसरे उपनिवेश उसका अनुकरण भी करें। उनका खयाल था कि जब तक दक्षिण अफ्रीका का एक भी दरवाजा हिंदुस्‍तानियों के लिए खुला रहेगा तब तक ट्रान्‍सवाल सुरक्षित नहीं कहा जाएगा। इसके सिवा, वे ट्रान्‍सवाल सरकार और हिंदुस्‍तानियों के बीच हुए समझौते को हिंदुस्‍तानी कौम की प्रतिष्‍ठा बढ़ानेवाला मानते थे। लेकिन उनका इरादा कौम की प्रतिष्‍ठा बढ़ाने का नहीं बल्कि घटाने का था। उन्‍हें हिंदुस्‍तानियों की सम्‍मति की कोई परवाह नहीं थी। वे तो हिंदुस्‍तानियों पर बाहरी अंकुश लगा कर कानून के आतंक से कौम को थरथरा देना चाहते थे। इसलिए उन्‍होंने एशियाटिक एक्‍ट का मसौदा तैयार किया और सरकार को यह सलाह दी कि जब तक इस मसौदे के अनुसार कानून पास नहीं होगा, तब तक हिंदुस्‍तानी लोग छिपे तौर पर ट्रान्‍सवाल में जरूर ही दाखिल होते रहेंगे और जो लोग इस तरह दाखिल होंगे उन्‍हें ट्रान्‍सवाल से बाहर निकालने के लिए वर्तमान कानूनों में कोई भी व्‍यवस्‍था नहीं है। श्री कर्टिस की ये दलीलें और उनका एशियाटिक एक्‍ट का मसौदा ट्रान्‍सवाल सरकार को पसंद आया। और उनके मसौदे के अनुसार ट्रान्‍सवाल की धारासभा में पेश किया जानेवाला बिल सरकारी गजट में प्रकाशित हुआ।

इस बिल की मैं विस्‍तार से चर्चा करूँ इसके पहले एक महत्वपूर्ण घटना का वर्णन कुछ शब्दों में यहाँ कर देना आवश्‍यक है। मैं सत्‍याग्रह आंदोलन का प्रेरक था, इसलिए यह आवश्‍यक है कि पाठक मेरे जीवन की घटनाओं को पूरी तरह समझ लें। ट्रान्‍सवाल में इस तरह हिंदुस्‍तानियों पर अधिक अंकुश लगाने के प्रयत्‍न जिन दिनों हो रहे थे उसी अरसे में नेटाल में वहाँ के हबशियों का - जूलुओं का - विद्रोह जाग उठा। उस विस्‍फोट को विद्रोह कहा जा सकता है या नहीं, इस विषय में मुझे शंका थी; आज भी मुझे शंका है। फिर भी यह घटना विद्रोह के नाम से ही सदा नेटाल में पुकारी गई है। बोअर-युद्ध के समान उस विद्रोह के समय भी नेटाल में रहनेवाले कई गोरे उसे शांत करने के लिए स्‍वयं सेवक के रूप में सेना में भरती हुए थे। मैं भी नेटाल का ही निवासी माना जाता था; इसलिए मुझे लगा कि इस युद्ध में मुझे भी यथाशक्ति सहायता करनी चाहिए। हिंदुस्‍तानी कौम की इजाजत लेकर मैंने नेटाल सरकार को लिखा कि मुझे घायलों की सेवा-शुश्रूषा करनेवाला दल (स्‍ट्रेचर-बेयरर कोर्प्‍स) खड़ा करने दिया जाए। मेरा प्रस्‍ताव सरकार ने मान लिया। इसलिए मैंने जोहानिसबर्ग का घर तोड़ दिया और अपने बाल-बच्‍चों को नेटाल के फिनिक्‍स आश्रम में भेज दिया, जहाँ 'इंडियन ओपीनियन' नामक साप्‍ताहिक चलाया जाता था और जहाँ मेरे सहयोगी मित्र रहते थे। ऑफिस मैंने बंद नहीं किया, क्‍योंकि मैं जानता था कि यह सेवाकार्य लंबे समय तक मुझे नहीं करना पड़ेगा।

20-25 आदमियों का छोटा सा दल खड़ा करके मैं नेटाल की सेना के साथ जुड़ गया। इस छोटे से दल में भी लगभग सभी जातियों और सभी प्रांतों के हिंदुस्‍तानी थे। इस दल ने एक माह तक घायलों की सेवा-शुश्रूषा का कार्य किया। हमें करने के लिए जो काम सौंपा गया था, उसके लिए मैंने सदा ही ईश्‍वर का उपकार माना। अनुभव से मैंने देखा कि जो हबशी विद्रोह में घायल होते थे उन्‍हें केवल हम लोग ही उठाते थे, वर्ना वे जहाँ के तहाँ पड़े दुख भोगा करते थे। इन घायलों के घावों की सार-सँभाल और मरहम-पट्टी करने में एक भी गोरा हमारी मदद नहीं करता था। जिस सर्जन के मातहत हमें यह काम करना था, उसका नाम डॉ. सावेज था। वह अत्यंत दयालु था। घायलों को उठाकर अस्‍पताल में ले आने के बाद उनकी सार-सँभाल करना हमारे क्षेत्र में नहीं आता था। परंतु हम तो यह समझ कर ही युद्ध में शरीक हुए थे कि जो भी काम हमें सौंपा जाए, वह हमारे क्षेत्र के भीतर ही है। उस भले और दयालु डॉक्‍टर ने हम से कहा कि मुझे एक भी गोरा इन घायलों की सार-सँभाल करनेवाला नहीं मिलता। मैं किसी गोरे को यह काम करने के लिए मजबूर करने की शक्ति नहीं रखता। इसलिए आप लोग यदि दया का यह काम करेंगे, तो मैं आप का उपकार मानूँगा। हमने खुश हो कर जूलुओं की सेवा-शुश्रूषा का काम हाथ में ले लिया। कुछ हबशियों के घावों की पाँच-पाँच, छह-छह दिन तक मरहम-पट्टी नहीं की गई, इसलिए वे बदबू करने लगे थे। उनके घावों को साफ करके मरहम-पट्टी करने का काम हमारे सिर आया और हमने उसे बहुत ही पसंद किया। हबशी बेचारे हमारे साथ कुछ बोल तो नहीं सकते थे। परंतु उनके हाव-भाव और उनकी आँखों से प्रकट होनेवाली कृतज्ञता से हम समझ सकते थे कि वे हमें ईश्‍वर द्वारा उनकी मदद के लिए भेजे हुए दूत ही मानते थे। यह काम बड़ा कठिन था। कभी कभी तो हमें दिन में चालीस चालीस मील की मंजिल तय करनी पड़ती थी।

एक महीने में हमारा यह काम पूरा हो गया। अधिकारियों को हमारे काम से संतोष हुआ। गवर्नर ने हमें धन्‍यवाद और आभार का पत्र भी लिखा। हमारे दल के प्रत्‍येक सदस्‍य को एक विशेष पदक दिया गया था, जो इसी अवसर के उपलक्ष में तैयार किया गया था। इस दल के तीन सार्जन्‍ट गुजराती थे। उनके नाम ये हैं : श्री उमियाशंकर शेलत, श्री सुरेंद्रराय मेढ़ और श्री हरिशंकर जोशी। ये तीनों बड़े हृष्‍ट-पुष्‍ट थे और तीनों ने बहुत कड़ी मेहनत की थी। दूसरे हिंदुस्‍तानियों के नाम इस समय मुझे याद नहीं आते, लेकिन इतना अच्‍छी तरह याद है कि उन लोगों में एक पठान भी था। मुझे यह भी याद है कि हम लोग उस पठान के जितना ही बोझ उठा सकते थे और उसके साथ रह कर कूच भी कर सकते थे, यह बात उसे आश्‍चर्यकारक लगती थी।

इस दल का काम करते करते मेरे दो विचार परिपक्‍व हो गए, जो धीरे धीरे मेरे मन में पक रहे थे। एक विचार तो यह कि सेवाधर्म को जीवन में प्रमुख स्‍थान देनेवाले मनुष्‍य को ब्रह्मचर्य का पालन अवश्‍य ही करना चाहिए। दूसरा यह कि सेवाधर्म का पालन करने वाले मनुष्‍य को गरीबी का सदा के लिए वरण करना चाहिए। वह कोई ऐसा धंधा न करे, जिसकी वजह सेवाधर्म का पालन करने में उसे कोई हिचकिचाहट होने का मौका आए अथवा सेवाधर्म के पालन में थोड़ी भी रुकावट हो।

इस दल में मैं काम करता था तभी जैसे बने वैसे जल्‍दी ही ट्रान्‍सवाल आने के बारे में मुझे पत्र और तार मिलते रहे थे। इसलिए उसका काम पूरा होते ही फिनिक्‍स के सब मित्रों से मिल कर मैं तुरंत जोहानिसबर्ग पहुँच गया। वहाँ ऑफिस में मैंने ऊपर बताए एशियाटिक बिल का मसौदा पढ़ा। 22 अगस्‍त, 1906 को प्रकाशित हुआ ट्रान्‍सवाल सरकार का वह असाधारण गजट ऑफिस से मैं घर ले गया, जिसमें बिल का मसौदा छपा था। मेरे मकान के पास एक छोटी सी पहाड़ी थी। अपने एक मित्र के साथ उस टेकरी पर जाकर मैं 'इंडियन ओपीनियन' के लिए उस बिल का गुजराती अनुवाद करने लगा। जैसे जैसे मैं उस बिल की धाराएँ पढ़ता गया, वैसे वैसे मैं काँपता गया। उसमें मैं हिंदुस्‍तानियों के प्रति द्वेष और घृणा के सिवा दूसरा कुछ नहीं देख सका। मुझे लगा कि अगर यह बिल पास हो गया और हिंदुस्‍तानियों ने कायर बनकर उसे स्‍वीकार कर लिया, तो दक्षिण अफ्रीका में हिंदुस्‍तानी कौम के पैर जड़ से उखड़ जाएँगे। मैंने स्‍पष्‍ट रूप से समझ लिया कि हिंदुस्‍तानी कौम के लिए यह जीवन-मरण का प्रश्‍न है। मैंने यह भी समझ लिया कि कौम अरजियाँ पेश करने से अपने ध्‍येय में यदि सफल न हो, तो उसे हाथ पर हाथ धरे चुपचाप बैठे नहीं रहना चाहिए। इस खूनी कानून की शरण में जाने की अपेक्षा उसका मर जाना बेहतर होगा। लेकिन मरा कैसे जाए? हिंदुस्‍तानी कौम ऐसे कौन से खतरे में पड़े या कि पड़ने की हिम्‍मत करे, जिससे उसके सामने जीत या मौत के सिवा तीसरा कोई रास्‍ता ही न रह जाए? मेरे सामने तो मानो ऐसी भयंकर दीवाल खड़ी हो गई, जिसके पार कोई रास्‍ता सूझता ही नहीं था। जिस बिल के मसौदे ने मुझे जड़ से हिला दिया, उसकी तफसील पाठकों को जाननी ही चाहिए। उसका सार नीचे दिया जाता है :

'ट्रान्‍सवाल में रहने का अधिकार रखनेवाले प्रत्‍येक हिंदुस्‍तानी पुरुष, स्‍त्री और आठ वर्ष के अथवा आठ वर्ष से ऊपर के बालक-बालिकाओं को एशियाटिक विभाग के दफ्तर में नाम लिखा कर परवाना ले लेना चाहिए। ये परवाने लेते समय अपने पुराने परवाने वहाँ के अधिकारियों को सौंप देने चाहिए। अरजी में हर हिंदुस्‍तानी को अपना नाम, पता, जाति, उमर वगैरा लिखना चाहिए। नाम दर्ज करनेवाले अधिकारी (रजिस्‍ट्रार) को अर्जदार के शरीर पर कोई खास निशानियाँ हों तो उन्‍हें लिख लेना चाहिए और अर्जदार की सब अँगुलियों और अँगूठे की छाप लेनी चाहिए। निश्चित की हुई अवधि के भीतर जो हिंदुस्‍तानी स्‍त्री-पुरुष इस तरह अरजी न करें, उनके ट्रान्‍सवाल में रहने के अधिकार रद हो जाएँगे। अरजी न करना कानून के अनुसार अपराध माना जाएगा। इस अपराध के लिए जुर्माना किया जा सकता है, जेल की सजा हो सकती है और कोई कोर्ट उचित समझे तो अपराधी को देश निकाले की सजा भी दे सकती है। बच्‍चों की अरजी माता-पिता को देनी चाहिए; और निशानियाँ लिखाने और अँगुलियों वगैरा की छाप देने के लिए बच्‍चों को अधिकारियों के सामने ले जाने की जिम्‍मेदारी भी माता-पिता की होगी। अगर माता-पिता ने अपनी यह जिम्‍मेदारी अदा न की हो, तो सोलह वर्ष की उमर हो जाने पर बच्‍चों को यह जिम्‍मेदारी खुद अदा करनी चाहिए। और अगर वे यह जिम्‍मेदारी अदा न करें, तो जिस जिस सजा के पात्र माता-पिता हो सकते हैं, उसी सजा के पात्र सोलह वर्ष की उमर को पहुँचे हुए नौजवान भी माने जाएँगे। जो परवाना अर्जदार को दिया जाए उसे कोई पुलिस अधिकारी जब और जहाँ माँगे तब और वहाँ बताना अनिवार्य होगा। यह परवाना पेश न करना अपराध माना जाएगा और उस अपराध के लिए कोर्ट जुर्माने की या कैद की सजा कर सकती है। इस परवाने की माँग रास्‍ते चलते यात्री से भी की जा सकती है। परवानों की जाँच करने के लिए पुलिस अधिकारी लोगों के घरों में भी प्रवेश कर सकते हैं। किसी बाहर के स्‍थान से आकर ट्रान्‍सवाल में प्रवेश करते समय हिंदुस्‍तानी स्‍त्री या पुरुष को जाँच करनेवाले अधिकारी के सामने अपना परवाना पेश करना ही चाहिए। कोई हिंदुस्‍तानी अदालत में किसी काम से जाए या माल-ऑफिस में व्‍यापार का अथवा सायकल रखने का अनुमति-पत्र लेने जाए, तो वहाँ भी अधिकारी उससे परवाना माँग सकता है। कहने का अर्थ यह कि कोई हिंदुस्‍तानी किसी भी सरकारी दफ्तर में उस दफ्तर से संबंधित किसी काम के सिलसिले में जाए, तो वहाँ का अधिकारी हिंदुस्‍तानी की प्रार्थना सुनने से पहले उससे परवाना माँग सकता है। यह परवाना अधिकारी के सामने पेश करने से इनकार करना या परवाना रखनेवाले आदमी से माँगी जानेवाली परवाना-संबंधी कोई भी जानकारी अधिकारी को देने से इनकार भी अपराध माना जाएगा और उसके लिए भी कोर्ट अपराधी को जुर्माने की या कैद की सजा कर सकती है।'

जहाँ तक मैं जानता हूँ, इस प्रकार का कानून दुनिया के किसी भी हिस्‍से में स्‍वतंत्र मानवों के लिए नहीं बनाया गया होगा। मैं जानता हूँ कि नेटाल के गिरमिटिया हिंदुस्‍तानियों के लिए बनाए हुए परवाने के कानून बहुत कड़े हैं, लेकिन वे बेचारे तो स्‍वतंत्र मानव माने ही नहीं जाते। फिर भी यह कहा जा सकता है कि उपर्युक्‍त बिल की तुलना में उन लोगों के लिए बने हुए परवानों के कानून नरम हैं और उन कानूनों को तोड़ने की सजा इस बिल में बताई गई सजा के सामने कुछ भी नहीं है। इस बिल के अनुसार कोई लाखों का व्‍यापार करनेवाला हिंदुस्‍तानी व्‍यापारी भी देश निकाले की सजा पा सकता है। अर्थात इस बिल की धाराओं को भंग करने से उसकी आर्थिक स्थिति जड़ मूल से नष्‍ट हो सकती है। और धैर्य रखनेवाले पाठक आगे चल कर देखेंगे कि इस बिल की कुछ धाराओं को भंग करने से हिंदुस्‍तानियों को देश निकाले की सजा भी हुई थी। हिंदुस्‍तान में जरायम-पेशा जातियों के लिए कुछ कड़े कानून हैं। इस बिल की तुलना उन कानूनों के साथ आसानी से हो सकती है; और तुलना करने पर सब मिलाकर यह बिल सख्‍ती में उन कानूनों से किसी भी प्रकार घटिया नहीं कहा जा सकता। इस बिल में हाथों की दसों अँगुलियों की छाप लेने की जो धारा थी, वह तो दक्षिण अफ्रीका में बिलकुल नई ही चीज थी। मुझे इस संबंध में कुछ साहित्‍य पढ़ना चाहिए, ऐसा सोचकर मैं एक पुलिस अधिकारी श्री हेनरी की लिखी 'फिंगर इंप्रेशन्‍स' (अँगुलियों की निशानियाँ) नामक पुस्‍तक पढ़ गया। उसमें मैंने देखा कि इस प्रकार अँगुलियों की छाप कानूनन तो केवल अपराधियों की ही ली जाती है। इसलिए जबरदस्‍ती हिंदुस्‍तानियों की दस अँगुलियों की छाप लेने की बात मुझे अत्यंत भयंकर लगी। स्त्रियों और सोलह वर्ष के भीतर के बालकों के परवानों की प्रथा भी इस बिल के द्वरा पहले-पहल दाखिल की गई थी।

दूसरे दिन अग्रगण्‍य हिंदुस्‍तानियों को एकत्र करके मैंने उन्‍हें यह बिल अक्षरशः समझाया। इसके फलस्‍वरूप उन लोगों पर बिल का वही असर हुआ, जो मुझ पर हुआ था। उनमें से एक मित्र तो जोश में आकर बोल उठे : ''मेरी पत्‍नी से जो आदमी परवाना माँगने आएगा, उसे मैं तो वहीं का वहीं गोली से उड़ा दूँगा। भले बाद में मेरा जो भी होना हो होता रहे।'' मैंने उन्‍हें शांत किया। फिर सबसे कहा : ''यह संकट बड़ा गंभीर है। यह बिल अगर पास हो गया और हमने उसे स्‍वीकार कर लिया, तो उसका अनुकरण समूचे दक्षिण अफ्रीका में होगा। मुझे तो दक्षिण अफ्रीका में हमारी हस्‍ती को मिटाना ही उसका एकमात्र उद्देश्‍य मालूम होता है। यह बिल इस दिशा में उठाया जानेवाला कोई अंतिम कदम नहीं है, परंतु हमें सता सता कर दक्षिण अफ्रीका से भगा देने का पहला कदम है। इसलिए हमारी जिम्‍मेदारी केवल ट्रान्‍सवाल में बसनेवाले दस-पंद्रह हजार हिंदुस्‍तानियों की सुरक्षा तक ही सीमित नहीं है; उसमें दक्षिण अफ्रीका में बसी हुई समस्‍त हिंदुस्‍तानी कौम की सुरक्षा का समावेश होता है। और, यदि हम इस बिल का गूढ़ अर्थ पूरी तरह समझ लें, तब तो सारे हिंदुस्‍तान की प्रतिष्‍ठा को बचाने की जिम्‍मेदारी भी हम पर आ जाती है। क्‍योंकि इस बिल से केवल हमारा ही अपमान नहीं होता, परंतु सारे हिंदुस्‍तान का अपमान होता है। अपमान का अर्थ ही है निर्दोष मनुष्‍य के स्‍वाभिमान का भंग होना। हम ऐसे कानून के पात्र हैं, यह कोई भी नहीं कह सकता। हम निर्दोष हैं; और हिंदुस्‍तानी प्रजा के एक भी निर्दोष सदस्‍य का अपमान समस्‍त प्रजा का अपमान है। इसलिए ऐसे कठिन अवसर पर हम यदि उतावली करेंगे, अधीर बन जाएँगे और गुस्‍सा करेंगे, तो केवल इतना करने से हम इस आक्रमण से बच नहीं सकेंगे। परंतु यदि हम शांति से अपनी रक्षा के उपाय खोजकर समय पर उन्‍हें काम में लेंगे, एक होकर रहेंगे और अपमान का विरोध करने पर आ पड़नेवाले दुख भी सहन करेंगे, तो मेरा विश्‍वास है कि ईश्‍वर स्‍वयं हमारी सहायता करेगा।'' सब कोई बिल की गंभीरता को समझ गए। य‍ह निर्णय किया गया कि एक सार्वजनिक सभा की जाए, जिसमें कुछ प्रस्‍ताव रखे जाएँ और उन्‍हें पास किया जाए। इसके लिए यहूदियों की एक नाटक-शाला किराये पर ली गई और वहाँ सभा की गई।

अब पाठक समझ सकेंगे कि इस प्रकरण के शीर्षक में उपर्युक्‍त बिल को 'खूनी कानून' क्‍यों कहा गया हैं। इस प्रकरण के लिए 'खूनी' विशेषण की योजना मैंने नहीं की है। परंतु यह विशेषण दक्षिण अफ्रीका में ही इस कानून का परिचय कराने के लिए प्रचलित हो गया था।


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