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विमर्श

दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास
प्रथम खंड

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुक्रम 17. पहली फूट पीछे     आगे

1907 की पहली जुलाई आई। परवाने देनेवाले सरकारी दफ्तर खुले। कौम का आदेश था कि हर एक दफ्तर के सामने खुले आम पिकेटिंग किया जाए - अर्थात दफ्तर जाने के मार्गों पर स्‍वयंसेवक रखे जाएँ और वे दफ्तर में जानेवाले हिंदुस्‍तानियों को वहाँ बिछाए गए जाल से सावधान करें। सब स्‍वयंसेवकों को एक निशानी रखनी होती थी। और सबको यह खास सूचना दी गई थी कि परवाना लेनेवाले किसी भी हिंदुस्‍तानी के साथ वे असभ्‍यता से पेश न आएँ। वे उसका नाम पूछें; और अगर वह अपना नाम न बताए तो उसके साथ जबरदस्‍ती या अशिष्‍टता का व्‍यवहार न करें। वे एशियाटिक ऑफिस में जानेवाले प्रत्‍येक हिंदुस्‍तानी को खूनी कानून के सामने सिर झुकाने से होनेवाले नुकसान का छपा हुआ परिपत्र दें, उसमें क्‍या-कुछ लिखा है यह समझाएँ और पुलिस के साथ भी सभ्‍यता से पेश आएँ। पुलिस गाली दे या मार मारे, तो स्‍वयंसेवक शांति से सहन कर लें; और मार सहन न हो सके तो वहाँ से हट जाएँ। पुलिस उन्‍हें गिरफ्तार करे तो खुशी से गिरफ्तार हो जाएँ। जोहानिसबर्ग में ऐसा कुछ हो तो उसकी सूचना वे मुझे ही करें। अन्‍य स्‍थानों में वे उस उस स्‍थान में नियुक्‍त किए हुए मंत्री को सूचना करें और उसकी सूचनाओं के अनुसार काम करें। पहरेदारों की हर टुकड़ी का एक नेता या नायक होता था। उस नेता के आदेशानुसार अन्‍य पहरेदारों (पिकेटों) को चलना होता था।

ऐसा अनुभव कौम को पहली ही बार हुआ था। 12 वर्ष से ऊपर के सब लोगों को पहरेदार (पिकेट) के रूप में पसंद किया जाता था, इसलिए 12 से 18 वर्ष तक के अनेक किशोर और नवयुवक भी स्‍वयंसेवकों के रूप में भरती हो गए थे। लेकिन ऐसे किसी व्‍यक्ति को किसी भी हालत में नहीं लिया जाता था, जो स्‍थानीय कार्यकर्ताओं से अपरिचित हो। इतनी सावधानी के सिवा प्रत्‍येक सभा में घोषणा करके और अन्‍य प्रकार से लोगों को यह बताया जाता था कि जिन्‍हें नुकसान के डर से या दूसरे किसी कारण से नया परवाना लेने की इच्‍छा हो, लेकिन पिकेट (पहरेदार) का डर लगता हो, उन्‍हें नेताओं की ओर से एक स्‍वयंसेवक दिया जाएगा; वह स्‍वयंसेवक उनके साथ जाकर उन्‍हें एशियाटिक ऑफिस में छोड़ आएगा और वहाँ का काम पूरा हो जाने पर उन्‍हें फिर से स्‍वयंसेवकों के क्षेत्र से बाहर रख आएगा। कुछ लोगों ने, इस सुरक्षितता का लाभ उठाया भी था।

स्‍वयंसेवकों ने हर जगह अपना काम अपार उत्‍साह और लगन से किया था। वे अपने कर्तव्‍य-पालन में सदा जाग्रत और सावधान रहते थे। सामान्‍यतः ऐसा कहा जा सकता है कि पुलिस ने स्‍वयंसेवकों को बहुत नहीं सताया। और कभी कभी पुलिस परेशान करती या सताती भी थी, तो स्‍वयंसेवक उसे चुपचाप सह लेते थे। इस कार्य में स्‍वयंसेवकों ने हास्‍यरस भी उँड़ेल दिया था। कभी कभी उसमें पुलिस भी शरीक हो जाती थी। अपना समय आनंद में व्‍यतीत करने के लिए स्‍वयंसेवक अनेक तरह के चुटकुले खोज निकालते थे। एक बार रास्‍ता रोकने का आरोप लगाकर यातायात के कानून के अनुसार उन्‍हें गिरफ्तार कर लिया गया था। वहाँ के सत्‍याग्रह में असहयोग का समावेश नहीं किया गया था, इसलिए अदालतों में बचाव न करने का नियम नहीं रखा गया था। परंतु यह सामान्‍य नियम अवश्‍य रखा गया था कि कौम के पैसे से वकील रखकर बचाव नहीं किया जा सकता। गिरफ्तार किए गए स्‍वयंसेवकों को निर्दोष ठहरा कर अदालत ने छोड़ दिया था। इससे उनका उत्‍साह और बढ़ गया था।

इस प्रकार सार्वजनिक रूप में तो स्‍वयंसेवकों की ओर से परवाना लेने की इच्‍छा रखनेवाले हिंदुस्‍तानियों के साथ किसी तरह की अशिष्‍टता या जबरदस्‍ती नहीं की जाती थी। परंतु मुझे स्‍वीकार करना चाहिए कि सत्‍याग्रह की लड़ाई के सिलसिले में हिंदुस्‍तानियों की ऐसी एक टोली खड़ी हो गई थी, जिसका काम स्‍वयंसेवक बने बगैर गुप्‍त रूप में परवाना लेनेवालों को मार-पीट की धमकी देना या दूसरी तरह से उन्‍हें नुकसान पहुँचाना था। यह अत्यंत दुखद बात थी। इसका पता चलते ही इसे रोकने के लिए बहुत ही सख्‍त कदम उठाए गए। इसके फलस्‍वरूप धमकी देने की बात लगभग बंद हो गई, यद्यपि जड़मूल से उसका नाश नहीं हुआ। धमकी का असर वातावरण में रह गया और मैंने देखा कि उस हद तक हमारी सत्‍याग्रह की लड़ाई को नुकसान पहुँचा। जिन हिंदुस्‍तानियों को डर लगता था उन्‍होंने तुरंत सरकार का संरक्षण माँगा और वह उन्‍हें मिला। इस तरह कौम में जहर पैठ गया और जो लोग कमजोर थे वे अधिक कमजोर बन गए। इससे जहर को पोषण मिला, क्‍योंकि कमजोरों की वृत्ति सदा बदला लेने की होती ही है।

कौम के लोगों पर इस धमकी का बहुत ही कम असर हुआ। परंतु लोकमत के दबाव का और इस डर का कि स्‍वयंसेवकों की उपस्थिति के कारण परवाना लेनेवाले लोगों के नाम कौम को मालूम हो जाएँगे, बड़ा गहरा असर पड़ा। मैं ऐसे एक भी हिंदुस्‍तानी को नहीं जानता, जिसने यह मत प्रकट किया हो कि खूनी कानून के सामने झुकना अच्‍छा है। जो लोग नए परवाने निकलवाने गए वे केवल दुख या नुकसान सहन करने की अपनी असमर्थता के कारण ही गए थे। इस कारण से वे बड़े लज्जित हुए थे।

एक ओर लज्‍जा और दूसरी ओर बड़े व्‍यापारवाले हिंदुस्‍तानियों को अपने व्‍यापार में नुकसान पहुँचने का भय - इन दो कठिनाइयों से बाहर निकलने का रास्‍ता कुछ प्रमुख हिंदुस्‍तानियों ने खोज लिया। उन्‍होंने एशियाटिक विभाग के साथ मिलकर ऐसी व्‍यवस्‍था की कि एक निजी मकान में रात के नौ-दस बजे बाद एशियाटिक विभाग का अधिकारी जाकर उन्‍हें परवाने दे दे। उन्‍होंने सोचा कि इस व्‍यवस्‍था से कुछ समय तक तो उनके खूनी कानून के सामने झुकने का किसी को पता ही नहीं चलेगा और वे स्‍वयं कौम के नेता हैं इसलिए उनकी देखादेखी दूसरे लोग भी कानून के सामने सिर झुका देंगे। इससे कुछ नहीं तो उनकी लज्‍जा का बोझ तो कम होगा ही। बाद में अगर उनकी पोल खुल जाए तो उसकी चिंता नहीं।

परंतु स्‍वयंसेवक इतने जाग्रत और सावधान थे कि कौम को एक एक क्षण की घटनाओं का पता चल जाता था। एशियाटिक ऑफिस में भी कोई न कोई तो ऐसा रहता ही था, जो सत्‍याग्रहियों को ये बातें बता देता था। दूसरे कुछ लोग ऐसे थे जो स्‍वयं कमजोर होते हुए भी नेताओं का खूनी कानून के सामने झुकना बरदाश्‍त नहीं कर पाते थे। वे इस सद्भावना से सत्‍याग्रहियों को अपने नेताओं के पतन की सूचना दे देते थे कि अगर नेता दृढ़ रहेंगे तो वे स्‍वयं भी दृढ़ रह सकेंगे। इस तरह एक बार ऐसी सावधानी के कारण कौम को यह सूचना मिली कि अमुक रात को अमुक दुकान में अमुक लोग परवाने लेनेवाले हैं। कौम ने पहले तो इस तरह का इरादा रखनेवाले हिंदुस्‍तानियों को समझाने का प्रयत्‍न किया। उस दुकान पर पिकेटिंग भी किया। लेकिन मनुष्‍य अपनी कमजोरी को कब तक दबा सकता है? रात के दस-ग्‍यारह बजे ऊपर बताए मुताबिक कुछ हिंदुस्‍तानी नेताओं ने परवाने लिए और इस घटना से एक स्‍वर से बजनेवाली बाँसुरी में दरार पड़ गई। दूसरे ही दिन कौम ने उन लोगों के नाम भी प्रकाशित कर दिए। लेकिन मनुष्‍य की लज्‍जा की भी एक मर्यादा होती है। स्‍वार्थ जब उसके सामने आकर खड़ा हो जाता है तब लज्‍जा नहीं टिकती और मनुष्‍य सही रास्‍ते से भटक जाता है। इस पहली फूट का लाभ उठाकर धीरे धीरे लगभग पाँच सौ हिंदुस्‍तानियों ने परवाने ले लिए। कुछ दिन तक परवाने देने का काम निजी मकानों में चला। लेकिन जैसे जैसे लज्‍जा का भाव मंद पड़ता गया वैसे वैसे इन पाँच सौ में से कुछ लोग खुले आम भी अपने नाम लिखवाने और परवाने लेने के लिए एशियाटिक ऑफिस में गए।


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