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कविता

दर्द का सिलसिला
रमेश पोखरियाल निशंक


जिंदगी की श्वास में
मंजिलों की आस में
कारवाँ बन बढ़ रहा, दर्द का यह सिलसिला है।

प्यार की एक बूँद को
हर पल तरसते
किंतु बदले में मिले
पत्थर बरसते
कुछ ना पूछो जिंदगी से, गम सहित क्या-क्या मिला है
कारवाँ बन बढ़ रहा, दर्द का यह सिलसिला है।

इस छोर से उस छोर तक
सभी को परखते रहे,
किंतु पग-पग में मिला छल
जिसके सभी गम भी सहे
कौन जाने कब ढहेगा, घोर दुख का ये किला है,
कारवाँ बन बढ़ रहा, दर्द का यह सिलसिला है।

आस की नन्ही किरण
झेलती तम को रही,
कभी तो तूफान कभी
बयार विष की भी बही
सफल कैसे हो सफर यह, जिंदगी का जो मिला है,
कारवाँ बन बढ़ रहा, दर्द का यह सिलसिला है।


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