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कविता

कोई मुश्किल नहीं
रमेश पोखरियाल निशंक


तूफान आने पर भी बुझे न
तुम्हें तो दिया आज ऐसा जलाना,
संकल्प लेकर बढ़ो तो सही
कोई मुश्किल नहीं स्वर्ग धरती पर पाना।

दुखों का जहर भी पीकर स्वयं ही
खुशियों की रिमझिम वर्षा बहाना,
पूरी दुनिया को दिल में बसा तो सही
कोई मुश्किल नहीं है, क्षितिज को भी पाना।

किसी द्वार तक भी रहे न उदासी
उजाला बसा गीत खुशियों के गाना
अमर बन के हर दिल में गूँजे सदा ही
कोई मुश्किल नहीं गीत ऐसा बनाना।

जलधि कहीं भी मिले छोर न तो
किश्ती स्वयं ले तटों को मिलाना,
जग में स्वयं जो महक ही बिखेरे
कोई मुश्किल नहीं पुष्प ऐसा खिलाना।

आशा की पलकें प्रगति पथ बिछाकर
कठिन राह में पग न पीछे हटाना,
हर बुराई कुचल कर बढ़ो तो सही
कोई मुश्किल नहीं आसमाँ को झुकाना।


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