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कविता

आ अब गाँव चलें
रमेश पोखरियाल निशंक


बाट तुम्हारी राह जोहती, नदियाँ हैं अकुलाई,
पवन के झोंके तो ठहरे हैं, कलियाँ भी मुरझाई।
ईर्ष्या की लपटों से बचकर तरु की छाँव चलें,
छोड़ सभी आडंबर जग के आ अब गाँव चले।

तुझे कलुषता ने झुलसाया, दूषितता ने अकुलाया,
देख ले फिर से अपना अंतस, क्या खोया क्या पाया।
सोच ले अब भी समय बचा है, व्यर्थ न हाथ मलें,
छोड़ सभी आडंबर जग के आ अब गाँव चलें।

नहीं कहीं ममता है दिखती, सहज भाव का नाम नहीं,
हत्या बर्बरता से अब तो, छूटी कोई शाम नहीं।
जाने इस प्रतिशोध अग्नि में, कितनों के अरमान जले,
छोड़ सभी आडंबर जग के आ अब गाँव चलें।

आज तो रिश्ते नाते टूटे, स्वार्थों में क्यों व्यक्ति खड़ा,
लक्ष्य शिखर पा जाने वाला, क्यों धूल-धूसरित आज पड़ा।
छला बहुत तुझको स्वार्थों ने, सोच ले तेरा कल न छले,
छोड़ सभी आडंबर जग के आ अब गाँव चलें।


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