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कविता

इनसान ढूँढ़ो कहाँ हैं?
रमेश पोखरियाल निशंक


लक्ष्य उसका क्या निहित, गंतव्य उसका कहाँ है,
आज ढूँढ़ो व्यक्ति को ये भटकता भी जहाँ हैं।

सोच कोरी रह गई
हर श्वास दूषित हो गई,
आज तो बस हर कदम पर
मनुजता भी रो रही।
आज तो सब छोड़ कर, इनसान ढूँढ़ो कहाँ है?
आज ढूँढ़ो व्यक्ति को ये भटकता भी जहाँ है।

आदर्श का चोला लिए
अब बात लंबी हो गई,
मतलब नहीं इस बात का, कि
क्या गलत है क्या सही।
खो गया क्यों सत्य ढूँढ़ो, सत्यवादी कहाँ है?
आज ढूँढ़ो व्यक्ति को ये भटकता भी जहाँ है।

बंधु-बांधव को समझना
अब दिखावा रह गया,
प्रेम था वह है कहाँ
स्वार्थ में सब बह गया।
कहाँ है आत्मीयता, बंधुत्व खोया कहाँ हैं?
आज ढूँढ़ो व्यक्ति को ये भटकता भी जहाँ है।


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