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बाल साहित्य

जरूरी हैं सब
मनोहर चमोली ‘मनु’


सब तालाब के चारों ओर इकट्ठा हो गए थे। शेर दहाड़ा - "अब बताओ। क्या हुआ था?" गिलहरी ने सुबकते हुए बताया - "मैंने जैसे ही पानी में मुँह डाला था, किसी ने मेरी नाक काट खाई।" हिरन बोला - "मेरी जीभ में चोट लगी है।" बंदर ने कहा - "मेरी आँख फूटते-फूटते बची है। प्यास तो हर किसी को लगती है। अब क्या होगा?" इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता। मछलियाँ तालाब में हरकतें करने लगी। कुछ पल भर के लिए हवा में उछलती फिर तालाब में डुबकी लगा लेती। एक बूढ़े कछुए ने तालाब से मुँह बाहर निकाला। वह बोला - "तालाब में हमारे अलावा मगर, मेढक और मछलियाँ भी रहती हैं। मछलियाँ कह रही हैं कि यह तालाब उनका है।"

गधा बीच में ही बोल पड़ा - "तालाब हम सबका है। मैं देखता हूँ। मुझे पानी पीने से कौन रोकता है।" गधा यह कहकर तालाब की ओर बढ़ा। चपड़-चपड़ की आवाज आने लगी। गधे ने दो घूँट पानी ही पीया था कि वह लड़खड़ा कर तालाब में ही जा गिरा। एक विशालकाय मछली ने उसकी नाक पर हमला बोल दिया था। शेर बोला - "ओह! तो ये सब मछलियों का किया-धरा है। इस तालाब में तो सैकड़ों मछलियाँ हैं। हमें कहीं ओर जाना होगा।" कछुए ने कहा - "सैकड़ों नहीं, हजारों हैं। एक से बढ़कर एक हैं। रोहू, महाशीर, कतला, नैन, स्टॉर फिश, गोल्डन फिश, डॉल्फिन और शार्क भी हैं। ऐसी कई मछलियाँ हैं, जो बड़ी मछलियों को भी खा जाती हैं।" कछुए ने डुबकी लगाते हुए कहा।

नन्हीं गौरेया पेड़ की डाल पर बैठी थी। वह बोली - "मैं कुछ मदद करूँ?" घोड़ा हँस पड़ा। गौरैया से कहने लगा - "ये लो। कर लो बात! अपना साइज तो देख। तू और मदद! तेरे शरीर में जरा-सा पानी क्या पड़ेगा, तो तू उड़ भी नहीं पाएगी।" गिलहरी बोली - "अरे! उसकी बात सुन तो ली जाए।" गौरेया ने कहा - "रुको। मैं अभी आती हूँ।" यह कहकर गौरैया उड़ गई। कुछ क्षण बीते। सब बेचैन हो गए। घोड़ा बोला - "अब कुछ नहीं हो सकता। पिद्दी सी गौरेया हमारी क्या मदद करेगी। कुछ और सोचो या फिर इस जंगल को छोड़ दो।"

अचानक आसमान में अँधेरा छा गया। अनगिनत पक्षी मँडरा रहे थे। पक्षियों के झुंड तालाब के किनारे आ पहुँचे। घोड़ा बोला - "अरे! यहाँ तो पक्षियों का जमघट लग गया है। क्या ये तालाब को सुखाने जा रहे हैं?" घोंघा बोला - "अरे नहीं! ध्यान से देखो। इन पक्षियों में अधिकतर किंगफिशर हैं। बगुले, बाज, पेंग्विन, पेलिकन और सारस भी हैं।" शेर ने कहा - "तो?" बंदर हँसते हुए बोला - "मैं समझ गया। अब तालाब में खलबली मचने वाली है।"

यही हुआ। पक्षियों ने मछलियों पर एक साथ हमला बोल दिया। भालुओं का दल भी आ पहुँचा। भालुओं ने तालाब में डुबकी लगा दी। तालाब में उथल-पुथल मच गई। मगर, कछुए और मेढक बदहवास तालाब से बाहर आने लगे। बूढ़ा कछुआ भी बाहर आ गया। वह मुस्कराते हुए बोला - "हमला रोक दो। अब मछलियाँ मान चुकी हैं कि यह तालाब हम सबका है।" भालुओं का दल भी तालाब से बाहर आ गया। पक्षी जिस दिशा से आए थे, उसी ओर लौट गए।

घोड़ा गौरैया से बोला - "माफ करना। मुझे नहीं पता था कि...।" गौरैया हँसते हुए बोली - "कोई बात नहीं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हम एक-दूसरे का भोजन हैं। लेकिन हम एक-दूसरे के लिए जरूरी भी हैं।" शेर दहाड़ा - "अब कोई डर नहीं। सब तालाब से पानी पी सकते हैं।"

अब जंगल में सब कुछ सामान्य हो गया था।


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