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बाल साहित्य

मनाएँगे हर त्यौहार
मनोहर चमोली ‘मनु’


दीपावली अवकाश के बाद स्कूल खुला तो प्रातःकालीन सभा में सबकी नजर नई प्रिंसिपल पर जा टिकी। सभा समाप्त हुई तो जनरल मॉनीटर नील जेवियर खुद को रोक नहीं पाई। उसने प्रिंसिपल की ओर देखकर कहा - "बड़ी मैम। दीवाली-होली-ईद-बैसाखी स्कूल में मनाई जाती है। क्रिसमस भी मनाया जाना चाहिए।"

"चुप रहो। तो तुम मुझे सिखाओगी कि स्कूल में क्या होना चाहिए और क्या नहीं।" प्रिंसिपल ने जोर देकर कहा। नई प्रिसिंपल इस तरह पेश आएँगी। किसी को भी उम्मीद नहीं थी। नील तो सहम ही गई।

"मैम। नील इस स्कूल की जनरल मॉनीटर है। बहुत ही होशियार है। पढ़ाई के साथ-साथ हर गतिविधि में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेती है।" स्कूल की वरिष्ठतम मैडम ने शालीनता से बताना चाहा।

"तो? स्कूल अनुशासन भंग करने का किसी को भी अधिकार नहीं है। हर कोई अपने काम से काम रखे। बच्चे पढ़ें और टीचर पढ़ाएँ। बस। पढ़ाई ही काम आती है। कोई त्यौहार नहीं, कोई उत्सव नहीं। सुना सबने। अब सब अपनी-अपनी क्लास में जाओ। छमाही इम्तिहान की तैयारी करो।" यह कह कर प्रिंसिपल चली गई।

आज किसी का मन पढ़ाई में नहीं लगा। सब प्रिंसिपल के व्यवहार से सकते में थे। नील तो सन्न-सी रह गई थी। चुलबुली, चंचल, यहाँ-वहाँ डोलती-फिरती नील की जबान पर जैसे ताला जड़ दिया गया हो। प्रातःकालीन सभा से लेकर छुट्टी का घंटा बजने तक अब नील बुत सी बनी रहती। वही नील जो सारे स्कूल के बच्चों की प्रिय थी। उसकी एक आवाज पर किसी भी क्लास के बच्चे सावधान और मौन होकर उसकी ओर देखने लगते थे। आखिर वो शिक्षकों की बात बच्चों तक पहुँचाने का माध्यम जो थी। वह बड़े प्यार से और आत्मविश्वास से बच्चों को निर्देश देती। आए दिन होने वाली घोषणाओं का नेतृत्व नील ही करती थी।

एक दिन की बात। क्लास चल रही थी। एक मैडम ने नील से पूछा - "नील क्या हो गया है तुम्हें? छमाही परीक्षा में भी तुम अच्छे नंबर नहीं ला पाई। तुम पहले जैसी नहीं रही। क्या बात है? बोलो।" यह सुनते ही नील फफक-फफक कर रो पड़ी। रोते-रोते बोली - "मैम। मुझे बड़ी मैम अच्छी नहीं लगती। क्या समझती हैं वो अपने आप को। क्या हम बच्चों का कोई सम्मान नहीं है? मैंने उस दिन ऐसा क्या गलत कह दिया था, जो भरी सभा में मैडम ने इतना कुछ कह दिया। मुझे तो लगने लगा है कि अब इस स्कूल में हम बच्चों का कोई नहीं है। अब मैं इस स्कूल में नहीं पढ़ सकती। मैं ऐसे स्कूल में पढ़ना चाहती हूँ, जहाँ सभी त्यौहार और उत्सव मनाए जाते हैं।"

क्लास में हल्ला मच गया। सारे बच्चे नील की बात से सहमत थे। मैडम ने बड़ी मुश्किल से कक्षा को शांत किया। तभी मैडम की नजर कैलेंडर पर पढ़ी। कैलेंडर को देखते हुए बोली - "कोई बात नहीं। स्कूल में नहीं तो क्या हुआ, क्रिसमस घर में भी तो मनाया जा सकता है। वैसे भी अभी अक्तूबर है। फिर नवंबर आएगा। फिर क्रिसमस तो दिसंबर में आता है। अभी से क्यों परेशान होती हो।"

नील सुबकते हुए बोली - "मैम। इस बार क्रिसमस के दिन रविवार है। मेरे मम्मी-पापा मुझे चर्च लेकर जाएँगे। मैंने अपना क्रिसमस प्लान कर लिया है।"

"श्ऽऽऽ! शायद बड़ी मैम इसी ओर आ रही हैं। चलो किताब निकालो।" मैडम ने बात बदल दी और जोर-जोर से पढ़ाने लगी।

दिसंबर का महीना भी आ गया। चौबीस तारीख को स्कूल की छुट्टी का घंटा बजा। बच्चे गेट के बाहर आकर नील को क्रिसमस की अग्रिम बधाई देने लगे। नील की सहेली सलमा ने कहा - "नील। एडवांस में हैप्पी क्रिसमस। वैसे मैं कल तुम्हारे घर जरूर आऊँगी।"

"थैंक्स सलमा। मैं इंतजार करूँगी।" नील ने हँसते हुए कहा।

नील घर पहुँची। मम्मी-पापा घर को सजाने में लगे हुए थे। नील ने मम्मी से लिपटते हुए कहा - "कल क्रिसमस है। संडे भी। बड़ा मजा आएगा।" शाम से लेकर रात भर नील मम्मी-पापा के साथ घर के एक-एक कोने को सजाने में जुटी रही। अचानक उसे कुछ ध्यान आया। वह बोली - "पापा। क्रिसमस ट्री नहीं लाए?" नील के पापा ने मुस्कराते हुए जवाब दिया - "क्रिसमस कल है न। कल ले आएँगे। अब चलो। खाना खाकर सो जाओ। सुबह जल्दी उठना।"

नील सुबह उठी तो उसके सिरहाने के पास विशालकाय सजा-धजा क्रिसमस का पेड़ मुस्करा रहा था। नील खुशी से झूम उठी। वह बुदबुदाई - "मेरे मम्मी-पापा कितने अच्छे हैं। एक हमारी बड़ी मैम है, उफ! कितनी खराब हैं वो।"

नील ने सलमा और अपने मम्मी-पापा के साथ क्रिसमस डे के दिन खूब मस्ती की। रात कब आई। उसे पता ही नहीं चला। सुबह उठी तो वह खुश थी। वह खुशी-खुशी स्कूल के गेट के निकट पहुँची। स्कूल का गेट देखकर वो हैरान हो गई। उसने चारों ओर नजर दौड़ाई। उसका स्कूल दुल्हन की तरह सजा था। उसने गेटकीपर से पूछा - "अंकल। आज हमारे स्कूल में क्या है?"

"मैं बताती हूँ।" अचानक गेटकीपर के पीछे से प्रिंसिपल ने आगे आते हुए कहा। इससे पहले नील कुछ समझ पाती प्रिंसिपल बोली - "हैप्पी क्रिसमस नील। देखो सारा स्कूल तुम्हें बधाई देने के लिए तैयार है।"

गेटकीपर बोला - "नील बेटा। कल संडे था। बड़ी मैडम ने अपने हाथ से तुम्हारी क्लास को सजाया है। जल्दी जाओ। सब वहीं तुम्हारा इंतजार कर रहे है।" नील दौड़कर अपनी कक्षा में जा पहुँची। हर कोई उसे बधाई दे रहा था। नील की खुशी का ठिकाना न रहा। तभी उसकी नजर अपने मम्मी-पापा पर पड़ी। वह दौड़कर उनके पास जा पहुँची। उसने हँसते हुए पूछा - "मम्मी! पापा! आप यहाँ!"

नील की मम्मी ने मुस्कराते हुए कहा - "हम तो तुम्हारी बड़ी मैडम को थैंक्स कहने आये थे। कल उन्होंने तुम्हारे लिए क्रिसमस ट्री जो भेजा था।"

अब उसके पापा ने कहा - "वैसे भी तुम अब इस स्कूल में नहीं पढ़ना चाहती हो। तुम्हारे डॉक्यूमेंट लेने भी तो हमें आना ही था।"

प्रिंसिपल नील से बोली - "दरअसल। मैंने इस स्कूल के बारे में गलत सुना। मुझे बताया गया था कि इस स्कूल की पढ़ाई-लिखाई बेहद लचर है। मैंने पहले ही दिन सख्ती दिखानी चाही। धीरे-धीरे मुझे लगा कि यहाँ तो सब ठीक-ठाक है। फिर तुम्हारे पापा ने मुझे बताया कि तुम तनाव में रहने लगी हो। तुम स्कूल छोड़ कर जाने वाली हो। इस बात ने मुझे परेशानी में डाल दिया। फिर मैंने तय किया कि मुझे तुम्हारा, समूचे स्टॉफ का और बच्चों का विश्वास हासिल करना होगा। बस। मैं भी क्रिसमस का इंतजार करने लगी। क्या अब भी तुम इस स्कूल को छोड़कर जाओगी?"

नील ने नजरें झुका ली थीं। वह धीरे से बोली - "नहीं। बड़ी मैम। मैं इस स्कूल को छोड़कर कैसे जा सकती हूँ।"

प्रिंसिपल ने मुस्कराते हुए कहा - "हम सबने मिलकर निर्णय लिया है कि अब इस स्कूल में हर त्यौहार और उत्सव मनाएँ जाएँगे।" यह सुनते ही नील दौड़कर प्रिंसिपल से लिपट गई। सब एक बार फिर से एक-दूसरे को क्रिसमस की बधाई दे रहे थे।


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