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निबंध

सावन का सत्कार
श्रीधर दुबे


ग्रीष्म का ताप सहती आई धरती के ताप के उपशमन का महीना होता है सावन का महीना। लू और घाम सह सह कर रूखी-सूखी देह वाली हुई धरती आषाढ़ से भीगना शुरू होती है और सावन में भीग भीग कर तर-बतर हो जाती है। इस समय दृष्टि के अंतिम छोर तक हरियाली ही हरियाली पसरी हुई दिखती है जोकि सावन के महीने में धरती की असीम कामना का ही प्रतिफल होती है। हर ओर धान के पौधे लहराते हुए नजर आते हैं, जिन पर हवा तिरती है तो कोसों तक तिरती ही चली जाती है। नदी-नाले, गड़ही-तालाब सब के सब इस महीने में अपनी उमंग के उफान पर होते हैं। प्रकृति के अलावा प्रकृति के चिर सहचर मनुष्य व पशु-पक्षी भी इस उफान से अछूते नहीं रह जाते।

इस ऋतु में देह व मन दोनों की आकांक्षा बलवती हो कर अधीर कर देती है। संयम का बाँध टूटने-टूटने को हो आता है, और प्रिया के द्वारा प्रियतम की प्रतीक्षा चिर प्रतीक्षा में तब्दील हो जाती है। इसी अधीरता में जब यौवन की गागर बेसँभार होकर छ्लकने को हो आती है तो अपने विरही चित्त को सँभालते हुए गँवई विरहन गा उठती है -

छ्लकल गगरिया मोर निरमोहिया
छलकल गगरिया मोर
बिरही मोरनियाँ मोरवा निहारे
पियवा गईल कवनी ओर
छलकल गगरिया मोर...
कि छ्लकल गगरिया मोर।

ग्रीष्म के ताप से तपी, और तप कर अतृप्त हुई धरती के तृप्ति की आकांक्षा है सावन। इस अतृप्ति में तृप्ति के लिए जो भोग है वह दरअसल भोग नहीं उपभोग है। उस तृप्ति की आकांक्षा में जिस सुख की चाह है वही सुख सृजन का मूल है। धरती आतुर होती है मेघ के लिए और मेघ की उन समस्त कलाओं के लिए भी जिसको गँवई स्त्रियों द्वारा अपने प्रवासी पतियों की प्रतीक्षा में आदरपूर्वक निहारा जाता है, और जिनका आकाश में पंक्तिबद्ध हो उड़ती बगुलियाँ गर्भाधान के उत्सव का क्षण मान कर अपने नेत्रों में आश्रय कर लेती हैं।

गर्भाधानक्षणपरिचयान्नूनमाबद्धमालाः सेविष्यंते नयन सुभगं खे भवंतम बलाकाः॥

सावन के महीने में धरती अपनी धानी चुनर ओढ़ती है और बरसते बादल से भीग कर सराबोर होने को अतुर हो उठती है। जब तक बादल जी खोल कर बरसते नहीं तब तक धरतीरूपी दुल्हन की चुनर को कोरी यानी बिना भीगा हुआ माना जाता है।

धरती की अपनी चुनर भीगने की प्रतीक्षा और बादल के जी खोल कर बरसने की लालसा दरअसल स्त्री-पुरुष संबंधों का ही द्योतक है। इसीलिए सावन विरह और प्रेम दोनों का महीना माना गया है। लोकगीतों में इस प्रेम के बहुविध रंग मिलते हैं।

धरती बिहौती के सईयाँ सवनवा।
कि अबही चुनरिया बा कोर॥

सावन के महीने में ही 'कोरी धरा' धानी रंग से रंग कर 'धरा' से 'धन्य धरा' हो जाती है। यहाँ तक कि गाँव की धाना (प्रिया) भी जब अपने प्रिय से चुनरी की माँग करती है तो धानी चुनरी की ही माँग करती है, और साथ-साथ चेतावनी भी देती है कि अगर चुनरी नही मिली तो सेज पर अँगुली दिखा देगी। मोहम्म्द खलील ने धाना के चुनरी स्पृहित भाव को बखूबी अपने शब्दों में मूर्त किया है।

ले ले अईहss बालम, बजरिया से चुनरी।
ना त तरसा देब, हमहूँ देखा देब, सेजरिया प अँगुरी।।

सावन पुरुषों से अधिक स्त्रियों की ऋतु है। उनके उल्लास की, उनके उत्सव मनाने, गाने बजाने और साथ ही साथ अपने चित्त में पलते दुखों को गाने और गा गा कर चित्त को हल्का करने की भी ऋतु है सावन। सावन में हर ब्याहता स्त्री अपने पीहर के लिए तड़पती है और अपने माता-पिता या भाई बहन का निहोरा इस उम्मीद में करती है कि कोई न कोई आएगा और उन्हें अपने साथ ले जाएगा। उनकी इसी प्रतीक्षा को अमीर खुसरों ने भी अपने शब्दों में स्वर दिया है।

अम्मा मेरे बाबा को भेजो री - कि सावन आया
बेटी तेरा बाबा तो बूढ़ा री -
अम्मा मेरे भाई को भेजो री -
बेटी तेरा भाई तो बाला री -
अम्मा मेरे मामू को भेजो री -
बेटी तेरा मामू तो बाँका री -

अमीर खुसरो का यह गीत मेरे भीतर के भी एक ऐसे मर्म स्थल को छूता है कि मैं दर्द से सिर्फ सिहरता ही नहीं बल्कि कराह उठता हूँ।

बात राप्ती नदी के पार ब्याही सबसे बड़ी मौसी की है। वह किसी घोर संकट में थी और नाना तक कोई संदेश पहुँचाना चाहती थी। वह संदेश नाना तक एक साँझ किसी राहगीर ने चिट्ठी सौंपते हुए पहुँचाया। चिट्ठी में ज्यादा कुछ नहीं लिखा था। बस इतना भर लिखा था कि बाबूजी जल्दी आ जाओ मैं बहुत संकट में हूँ।

नाना बिना देर किए उसी क्षण मौसी से मिलने चल दिए। गाँव से पैदल राप्ती के घाट तक पहुँचते-पहुँचते रात हो गई। उस निर्जन कछार की नदी हहराते हुए बह रही थी। नाना कूद गए और तैर कर नदी पार की। सुबह होते-होते मौसी के गाँव के समीप पहुँचे और किसी से मौसी के ससुर का नाम ले कर उसके घर का रस्ता पूछे। बताने वाले ने रास्ता बताते हुए यह भी बताया की आज तो उनके घर उनकी बड़ी बहू का श्राद्ध है। मौसी ही उस घर की बड़ी बहू थीं। यह बात सुनते ही नाना को मुर्छा सी आ गई। वो समझ गए कि खबर पहुँचाने वाले ने खबर पहुँचाने में देर कर दी थी। मौसी के मौत की खबर सुनते ही लठैत नाना की लाठी जहाँ थी वहीं की वहीं कई खंडों में टूट गई। उसके बाद उनके कदम आगे नही बढ़ सके। वे वहीं से वापस लौट आए। उस घटना के बाद से ही नाना साधू हो गए थे। माँ बताती है कि मृत्यु के अंतिम कुछ दिनों से वो लगातार बड़ी मौसी का ही नाम बड़बड़ाने लगे थे। यहाँ तक कि जब कभी भी माँ या उसकी किसी और बहन को बुलाना होता तो मौसी का नाम ले कर ही बुलाते थे।

खैर कहाँ तो बात चल रही थी रसिक सावन की, अमीर खुसरो की और गाँव की गँवई उस धाना कि जो अपने प्रवासी प्रिय से धानी चुनर की माँग कर रही है, उसी बीच में बिना बात के ही व्यक्तिगत बातों का फेरा पड़ गया। क्या करें, जीवन है ही बहती हवा की तरह जो कभी भी एक सीध में न चल कर आड़ी-तिरछी चलती है। वरना सावन के मनभावन मौसम में बेमौसम के बात का कोई तुक ही नहीं है। खैर बात चल रही थी सावन की तो उसी पर फिर से आते हैं।

सावन के इस महीने में आज गाँव का बिसरा हुआ एक दृश्य बहुत याद आ रहा है। पड़ोसी रामासरे सिह के दरवाजे पर नीम का बड़ा सा पेड़ था। गाँव का सबसे जब्बर झूला वहीं पड़ता था। नागपंचमी (जिसे हम लोग पचईयाँ कहते थे) के रोज सुबह से देर रात तक वहाँ भीड़ लगी रहती थी। उस झूले पर झूले बिना पचईयाँ का असल झूला झूलना माना ही नहीं जाता। पड़ोसी टोले की औरतें भी रामासरे सिह के झूले पर झूला झूलने आतीं। देर रात तक गाँव सावन के सतरंगी गीतों से गूँजता रहता।

झूला झूलना ज्यादातर औरतों और बच्चों का खेल था। इसके इतर पुरुषों के अलग खेल थे। गाँव के पूरब तरफ आम के बड़े से बाग में बने अखाड़े पर दंगल होता। सारे गाँव के लोग वहाँ इकट्ठा हो कर दंगल देखते और मिल-जुल कर चिक्का, कबड्डी आदि गँवई खेल खेलते थे।

नागपंचमी के रोज उत्तर टोले के नारायण काका की पत्नी का अलग ही श्रृँगार होता था। अपने ब्याह के समय की पारंपरिक हँसुली और बाजुबंद पहनती थीं और खुले कंठ से गाँव में घूम-घूम कर कजरी गाती थी। वो जिस गली से गुजरतीं लोग बाग जान जाते कि नारायण बहू गुजर रहीं हैं।

नारायण काका की पत्नी मिठबोलिया नहीं थीं। किसी को कुछ भी बोल देती थीं लेकिन लोग उनकी बातों का बुरा नहीं मानते थे। लोग जानते थे कि दिल की एकदम साफ हैं और किसी का बुरा नही चाहतीं। उनका श्राप भी लोगों के लिए आशीर्वाद जैसा ही था।

बारिश के महीने में जब सूखे का आसार दिखता तो इंद्र देव को खुश करने के कुछ गँवई उपाय थे। उन्हीं उपायों में एक उपाय यह भी था कि किसी ऐसे के ऊपर कीचड़ फेंका जाय जो लोगों को जी भर कर श्रापे, कोसे या गालियाँ दे। इस काम के लिए भी हर साल नारायण काका की पत्नी जिन्हें गाँव में नारायण बहू कह कर बुलाया जाता था, का ही चुनाव किया जाता। राह चलते चुपके से काकी के ऊपर कीचड़ फेंक दिया जाता। उसके बाद काकी एक तरफ तो अपने ऊपर फेंका हुआ कीचड़ साफ करती तो साथ ही साथ अपने श्रीवचनों से गाँव के लोगों के कुल को भी तारती रहतीं। इतने के बाद भी लोग उनकी बात का बुरा नहीं मानते।

गाँव में किसी के घर भी जब शादी-ब्याह पड़ता तो काकी का उत्साह देखते ही बनता था। ऐसा लगता था कि उन्ही के घर के किसी सदस्य की शादी है। अपने पारंपरिक परिधान में उपस्थित हों जाती और उचित रीति के अनुरूप मुक्त कंठ से मंगल गीत गाने लगतीं। उन दिनों काकी के गाए गीतों के बिना किसी का उत्सव असल उत्सव नहीं लगता था।

नारायण काका की पत्नी के चिर दुश्मन थे - मेरे खेत में बटईया बोने वाले पियारे काका। काकी ने कभी उनको उनके नाम से नहीं पुकारा। हमेशा उनको बुलाते वक्त उनके परदादा का नाम ले कर कहतीं या पूछतीं कि फलनवा का दामाद कहाँ है? पियारे काका ने कभी उनकी बात का बुरा नहीं माना और न ही इस पर उनसे कोई वाद-विवाद ही किया। हाँ पियारे काका की पत्नी और नारायण काका की पत्नी में इस संबोधन को ले कर अनगितन बार रड़हो-पुतहो (झगड़ा) हुई लेकिन काकी ने संबोधन का वह अधिकार कभी त्यागा ही नहीं। पियारे काका के असमय निधन पर भी काकी यही कहते हुए फफक रहीं थीं कि फलनवा का दामाद जीते जी तो हमसे धोखाधड़ी करता ही रहा मरने पर भी बाज नहीं आया। उमर में छोटा हो कर भी मुझसे पहले ही इस दुनिया से निकल लिया।

उन दिनों गाँव बस कहने भर के लिए अलग-अलग कई टोलों में बँटा हुआ था। लेकिन लोगों के दिल नहीं बँटे हुए थे। मुझे अब भी याद है कि रामासरे सिंह का ही मँझला बेटा, जो बचपन में मेरा लँगोटिया यार था और जिसे हम लोग भल्लम पंडित कहते थे के बिजली के तार गिरने से हुई मौत पर सारा गाँव रोया था। उस रोज गाँव में ऐसी उदासी छाई थी कि किसी के घर न चूल्हा जला न रसोई पकी।

लेकिन अब गाँव और गाँव के लोगों कि नीयत बदल गई है। किसी का किसी के घर आना जाना तो दूर दरवाजे पर से हो कर भी नहीं गुजरना होता। अब एक दूसरे का दुख ही लोगों के सुख का सबब बन गया है। गाँव में बरसात के बहते पानी को ले कर उपजा विवाद अब खूनी रंग ले लेता है। बरसात के बहते पानी के विवाद की ही वजह से रामासरे सिंह को भी अपनी जगह-जमीन बेच कर गाँव के बाहर बसना पड़ा। दो भाइयों के बँटवारे मे उपजे विवाद को ले कर उनके दरवाजे पर विशाल नीम का पेड़ भी काट दिया गया। अब उस पेड़ की जगह एक विशाल शून्य भर है जहाँ से हो कर गुजरता हूँ तो मुझे एक बड़ा सा नीम का पेड़ अब भी दिखता है, जिस पर गाँव का सबसे जब्बर झूला दिखता है, और दिखती हैं वो गँवई स्त्रियाँ जिनके द्वारा गाई कजरी के समवेत स्वरों से गाँव की आत्मा आत्मीयता की मिठास से भीग उठती थी।

गाँव अब अधुनिक गाँव हो गया है। अब वहाँ न कजरी नहीं गाई जाती है और न झूला झूला जाता है। गाँव के बाहर आम के जिस बड़े से बाग में पचईयाँ के रोज मेला लगा रहता था वहाँ अब सन्नाटा झाँय-झाँय करता है।

सात साल की भानजी हंसिका जब मुझसे कहती है कि मामा मुझे आम का बाग दिखाओ तो मैं निरुत्तर हो चुपचाप मौन गह लेता हूँ, और उस गहे हुए मौन में गाँव के पूरब वाले उस बड़े से आम के बाग को सोचने लगता हूँ जिसे निर्मम तरीके से काट दिया गया और उस जगह नई तकनीकी की छाड़न धुआँ उगलती चिमनी उगा दी गई।

इन सारी बातों के और सारे बदलावों के बावजूद भी मेरा मन आज भी सावन के उल्लास के लिए ललकता है। और उस ललक में अपने खोए हुए उस गाँव को पाने की भी ललक उमगती है जो चौतरफा विकास के नाम पर आए बदलावों की भेंट चढ़ चुका है।

सावन का महीना फिर आया है और हम आकाश का निहोरा करते हुए सावन के सत्कार की तैयारी में भी जुटे हैं। लेकिन असल में तो हम सावन का सत्कार तभी कर पाएँगे जब हमारा मन नारायण काका की बहू, पियारे काका या अपने प्रिय से धानी चुनर की माँग करती धाना जैसा ही गँवई और विशुद्ध लोक मन होगा। क्योंकि सावन के उत्सव को मनाने के लिए हरियाली की कामना करने वाला ठीक वैसा ही उत्सवी मन चाहिए। जो लोग वीकेंड में डिस्को बार में मदिरा में आकंठ डूबे उल्टियाँ करने को ही असल सुख मानते हैं, उनके लिए सावन की हरियरी से हरिअराया मन अछूत ही नहीं अबूझ भी है। क्योंकि वह गँवई मन उधारी पर लिया हुआ पाश्चात्य मन नहीं बल्कि विशुद्ध भारतीय मन है। जिस भारतीय मन में केवल अपना ही नहीं बल्कि पेड़ पौधे और पशु पक्षी सबके सुख की चिंता समाई हुई है।

तभी तो ब्याह के बाद अपने घर से विदा होती बेटी अपने पिता से दरवाजे का नीम न काटने का आग्रह करती है। क्योंकि उनके कटते ही उस पर बसी चिड़ियों का बसेरा उजड़ जाएगा।

बाबा निबिया के पेड़ जनि काटहुँ।
निबिया चिरईया बसेर।।


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