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विमर्श

एसिड हमले की शिकार औरतें : गुमनाम होती जिंदगियाँ
सुप्रिया पाठक


लैंगिक भेदभाव को दूर करने के वादे वास्तविकता से अभी कोसों दूर हैं। अभी भी भारत में, महिलाओं को संविधान के तहत प्रदान की गई स्वतंत्रता के सभी अधिकारों का लाभ नहीं मिल पाता। भारत के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक, महिलाओं के खिलाफ अपराध प्रत्येक 1.6 मिनट में घटित होता है। प्रत्येक 4.8 मिनट में एक लड़की को इस देश में घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ता है और प्रत्येक 13.5 मिनट में एक बलात्कार को अंजाम दिया जाता है। 2016 के एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक, महिलाओं के प्रति अपराधों में 2015 की तुलना में 2016 में 2.9% की वृद्धि दर्ज की गई। मापदंडों के अनुसार, शीर्ष पाँच सबसे असुरक्षित क्षेत्रों में असम (कुल अपराधों में प्रतिशत की दृष्टि से छठवें स्थान पर और अपराधों की दर की दृष्टि से दूसरे स्थान पर), राजस्थान (कुल अपराधों में प्रतिशत की दृष्टि से चौथे स्थान पर और अपराधों की दर की दृष्टि से पाँचवें स्थान पर), पश्चिम बंगाल (कुल अपराधों में प्रतिशत की दृष्टि से दूसरे स्थान पर और अपराधों की दर की दृष्टि से सातवें स्थान पर), उड़ीसा (कुल अपराधों में प्रतिशत की दृष्टि से सातवें स्थान पर और अपराधों की दर की दृष्टि से तीसरे स्थान पर) और दिल्ली (कुल अपराधों में प्रतिशत की दृष्टि से दसवें स्थान पर और अपराधों की दर की दृष्टि से पहले स्थान पर) शामिल हैं।

एसिड हमलों को ऑस्ट्रेलिया, बांग्लादेश, कंबोडिया, चीन, एल सल्वाडोर, इथियोपिया, इटली, लाओस, मलेशिया, नेपाल, पाकिस्तान, श्रीलंका, थाईलैंड, युगांडा, यूके, संयुक्त राज्य अमेरिका और वियतनाम सहित दुनिया के विभिन्न भागों में दर्ज किया गया है। परंतु बांग्लादेश, भारत, पाकिस्तान, कंबोडिया और युगांडा में होने वाली इन घटनाओं की संख्या बहुत अधिक है और इसमें निरंतर वृद्धि हो रही है। इसके कुछ सामाजिक और सांस्कृतिक कारणों में, रिश्ते या विवाह से इनकार करना, विवाह के साथ लड़की की दहेज लाने की विफलता, वैवाहिक कलह, पारिवारिक विवाद, राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता, भूमि विवाद और घटना स्थल पर, दुर्भाग्य से पीड़ितों की आकस्मिक मौजूदगी शामिल हैं। इनमें से अधिकांश कारण विशेष रूप से लिंग से संबंधित हैं जो यौन हिंसा जैसे प्रकट रूप में सामने आते हैं। एसिड हमले जिसे विट्रियलज भी कहा जाता है, की शिकार विशेष रूप से महिलाएँ ही होती हैं। प्रत्येक साल करीब 1500 लोगों पर इस तरह से दुनिया भर में हमला किया जाता है। रिपोर्ट बताते हैं कि उनमें से 80% महिलाएँ होती हैं, इनमें भी 40% से 70% की उम्र 18 वर्ष से कम की हैं। वर्ष 2016 में एसिड हमलों के शिकार पीड़ितों की संख्या 2015 की तुलना में 23.3% बढ़कर 307 हो गई। पश्चिम बंगाल के लिए यह संख्या 102.4% बढ़ कर 41 से 86 है, जो की सबसे ज्यादा है। उत्तर प्रदेश में घटनाओं की संख्या 61 पर स्थिर रही, जबकि दिल्ली में 21 (2015 में) से मामूली वृद्धि के साथ यह संख्या 23 पर पहुँच गई। पंजाब में पीड़ितों की चौथी सबसे ज्यादा संख्या 18 (2015 में 7 की तुलना में 157.1% वृद्धि) दर्ज की गई और हरियाणा में पाँचवीं सबसे बड़ी संख्या दर्ज की गई जो पिछले साल की तुलना में 41.7% अधिक है (2015 में 12 पीड़ित)।

2013 से पूर्व भारत में एसिड हिंसा के मामलों का अलग से कोई आँकड़ा नहीं है क्योंकि इससे पहले भारतीय आपराधिक कानून ने इसे एक अलग अपराध के रूप में स्वीकार नहीं किया था। फरवरी 2013 में भारतीय दंड संहिता में संशोधन के साथ, एसिड हमले की घटनाओं को अब धारा 326-ए और 326-बी के तहत एक अलग अपराध के रूप में दर्ज किया जा रहा है। संशोधन के बाद पहला आँकड़ा 2014 का उपलब्ध हैं, जब पूरे भारत में 225 दर्ज किए गए थे। यह पिछले वर्षों की तुलना में बहुत अधिक वृद्धि दर्शाता है - 2012 में 106 और 2013 में 116। यह पूर्व के प्रत्येक वर्ष 1000-500 मामलों के अनुमान को पुष्ट करता है।

महिलाओं पर एसिड हमले यौन हिंसा का ही एक व्यवस्थित रूप है। पुरुषों पर किए जाने वाले एसिड हमलों के विपरीत, इन हमलों को स्त्रियों की पहचान को मिटाकर उन्हें शांत कराने और नियंत्रित करने के हथियार के रूप में प्रयोग किया जाता है। एसिड हमले के खिलाफ चलाए जाने वाले किसी भी अभियान के लिए यह आवश्यक है कि इन हमलों को लैंगिक यौन हिंसा के रूप में पहचानने और इनमें निहित पितृसत्तात्मक विचारों को समझाने के लिए आम सहमति का निर्माण किया जाए।

भारत में एसिड हमले के शिकार महिलाएँ

राज्य

2010

2011

2012

2013

2014

2015

2016

कुल

आंध्र प्रदेश

6

8

6

4

6

14

11

55

अरुणाचल प्रदेश

0

0

0

0

0

0

0

0

असम

0

0

1

13

0

3

9

26

बिहार

3

3

10

1

4

19

7

47

छतीसगढ़

0

0

0

0

1

0

1

2

गोवा

0

0

1

0

0

0

2

3

गुजरात

4

2

4

5

6

4

14

39

हरयाणा

4

8

6

6

13

12

17

66

हिमाचल प्रदेश

0

0

0

1

1

1

0

3

जम्मू कश्मीर

0

2

3

2

2

2

0

11

झारखंड

0

0

1

0

3

0

1

5

कर्नाटक

6

3

2

4

3

2

7

27

केरल

3

1

2

0

4

10

13

33

मध्य प्रदेश

1

5

6

11

20

19

7

69

महाराष्ट्र

3

6

3

9

5

8

8

9

मणिपुर

0

0

0

0

0

1

0

1

मेघालय

0

0

1

0

0

0

0

1

मिजोरम

0

0

0

0

0

0

0

0

नागालैंड

0

0

0

1

0

0

0

1

उड़ीसा

2

1

2

3

10

8

13

39

पंजाब

8

9

4

5

17

7

18

69

राजस्थान

0

0

6

0

6

1

3

16

सिक्किम

0

0

0

0

2

0

0

2

तमिलनाडु

0

0

1

6

13

10

1

31

तेलंगाना

0

0

0

0

1

1

0

2

त्रिपुरा

0

0

1

0

4

4

4

13

उत्तर प्रदेश

5

14

11

18

43

61

61

213

उत्तराखंड

0

2

3

0

0

0

2

7

पश्चिम बंगाल

12

13

22

8

41

41

83

220

अंडमान निकोबार

0

0

0

0

0

0

0

0

चंडीगढ़

1

1

0

1

0

0

2

5

दादरा नगर हवेली

0

0

0

0

0

0

0

0

दमन और दीव

0

0

0

0

0

0

0

0

दिल्ली

22

28

9

18

20

21

23

141

लक्षद्वीप

0

0

0

0

0

0

0

0

पुडुचेरी

0

0

1

0

0

0

0

1

कुल

80

106

106

116

225

249

307

1189

 

 

भारत में एसिड हिंसा की समस्या की त्रासदी, आकार और जटिलता को शताब्दी से देश में होने वाली सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक-आर्थिक परिवर्तन के संदर्भ में समझने की आवश्यकता है। कोफी अन्नान ने ठीक ही कहा है कि - "महिलाओं के खिलाफ हिंसा शायद सबसे शर्मनाक मानव अधिकारों का उल्लंघन है, और शायद सबसे अधिक व्यापक है।" जनवरी 2011 में प्रकाशित कार्नेल लॉ स्कूल के रिपोर्ट कहा गया है कि - "एसिड हमले सामाजिक घटनाएँ हैं जिसमें लैंगिक विभाजन निहित हैं, ये ऐतिहासिक रूप से पितृसत्तात्मक नियंत्रण और हिंसा के इस्तेमाल को उचित ठहराते आता रहा हैं।" यह अन्य उपायों के अलावा दृष्टिकोण में परिवर्तन की माँग करता है। दुर्भाग्य से, भारत में महिलाओं के खिलाफ हिंसा से निपटने के प्रयास वर्तमान सामाजिक ढाँचों और चुनौतियों के अनुरूप तालमेल बैठाने में असमर्थ रहा है।

भारत भौगोलिक रूप से सातवाँ सबसे बड़ा और 1.3 बिलियन जनसंख्या के साथ विश्व का दूसरा सबसे बड़ा देश है। यह दुनिया में सबसे पुरानी सभ्यता होने के अलावा एक बहुभाषी, बहुधार्मिक, बहुजातीय और बहुसांस्कृतिक राष्ट्र है। भारत संघीय, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक सिद्धांतों, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के साथ 29 राज्यों और 7 संघ शासित प्रदेशों का संघ है। सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में स्वतंत्र निर्वाचित विधानसभा और सरकारें हैं। वर्तमान समय में भारत वैश्वीकरण और स्थिर जीडीपी विकास का लाभ उठा रहा है। हालाँकि, दूसरी तरफ अकल्पनीय गरीबी, त्रासदी और अन्याय का दुष्चक्र भी व्याप्त है। 2010 में संयुक्त राष्ट्र विकास बैंक के अध्ययन में भारत की लगभग 37.2% आबादी को गरीब पाया गया। 8 राज्यों में 26 गरीब अफ्रीकी देशों से अधिक आबादी गरीबी में गुजर-बसर कर रही है। अनुमान के मुताबिक भारत की लगभग 21% जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे रहती है। अधिकांश जनता अशिक्षित और मानव अधिकारों के बारे में जागरूक न होने के कारण स्थिति अत्यधिक विकराल हो जाती है। जाति और वर्ग के संघर्ष, पुरानी रीति-रिवाजों और उच्च-नीच के भाव वाले समाज में सामाजिक तनाव और संघर्ष अवश्यंभावी है। यह अपराध और हिंसा के लिए एक उपजाऊ मैदान तैयार करता है। एसिड हमला ऐसे समाज में कोई आश्चर्य की बात नहीं है। इन हमलों में सबसे अधिक इस्तेमाल सल्फरिक, नाइट्रिक या हाइड्रोक्लोरिक एसिड होते हैं। यदि शीघ्र चिकित्सकीय ध्यान न दिया जाए तो इन हमलों के दीर्घकालिक परिणाम हो सकते हैं। इनमें अंधापन, साथ ही साथ चेहरे और शरीर पर स्थायी जख्म, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और आर्थिक क्षति शामिल हैं। एसिड हमला एक वैश्विक परिघटना है, परंतु मुख्य रूप से यह निम्न आय वाले समूहों में अधिक घटित होता है।

भारत में एसिड हमले का इतिहास प्राचीन है। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार एसिड हमले का पहला मामला ब्रिटिश भारत के बॉम्बे प्रेसीडेंसी में घटित हुआ। 6 सितंबर, 1920 को अली मोहम्मद फराबी ने अब्दुल्ला मोहम्मद जबली के चेहरे पर सल्फ्यूरिक एसिड फेंक कर हमला किया था। तब से आज तक इस घटना की दर बढ़ती ही गई। एएसडबल्यूडबल्यूएफ के द्वारा मीडिया रिपोर्टों के आधार पर और आरटीआई से प्राप्त जानकारी के अनुसार 2010 से 2015 के बीच 882 मामले घटित हो चुके हैं। इनमें ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाली घटनाएँ शामिल नहीं हैं। एसिड हमलों के इतिहास में दो मामले अत्यधिक चर्चा में रहे हैं। मीडिया की सकारात्मक भूमिका और न्यायलिक सक्रियता के कारण इसने पूरे देश की चेतना को झकझोर कर रख दिया। प्रथम, एसिड हमले की शिकार सोनाली मुखर्जी का दोषी को सजा दिलाने की माँग के विपरीत स्वयं की इच्छा-मृत्यु के लिए की जाने वाली गुहार और द्वितीय, निर्भया (बदला हुआ नाम) के साथ चलती बस में सामूहिक बलात्कार। द्वितीय घटना ने सरकार को न्यायमूर्ति जे एस वर्मा की अध्यक्षता में समिति गठित कर महिलाओं से जुड़े आपराधिक कानूनों में संशोधन सुझाने के लिए बाध्य कर दिया। समिति ने अपनी रिपोर्ट 23 जनवरी 2013 को पेश की। इसके तुरंत बाद राष्ट्रपति का अध्यादेश और फिर बाद में आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013 लागू कर दिया गया। संशोधन के बाद, कानून में एसिड हमलों के लिए अलग से अनुच्छेद (अनुच्छेद 326अ और अनुच्छेद ब) जोड़ दिया गया। साथ ही, इसके लिए गैर जमानती सजा का प्रावधान 10 वर्ष अथवा आजीवन कारावास, पीड़िता के देखभाल के लिए क्षतिपूर्ति संबंधित अनुच्छेद जोड़ा गया।

एसिड हमले की शिकार पीड़िता लक्ष्मी की याचिका (2006 का 129) पर सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने एसिड हमले बिक्री, पीड़िता के चिकित्सा के उपाय, देखभाल और क्षतिपूर्ति के संबंध में विस्तृत निर्देश जारी किया। दंड प्रक्रिया संहिता में पीड़िता के क्षतिपूर्ति योजना का प्रावधान है। सभी राज्यों के इन योजनाओं में एक रूपता नहीं हैं। उच्चतम न्यायालय सभी राज्यों को एकरूप योजना के अंतर्गत न्यूनतम 300000 रुपये देने का निर्देश दिया जिसमें 10000 एसिड हमले के 15 दिन में और शेष 2 महीने में मुहैया करना अनिवार्य है। तथापि एसिड हमले की संख्या कम नहीं हो रही है। पिछले मामले बदले और पीड़ा पहुँचाने की भावना को उजागर करते हैं।

एसिड हमले के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं -

• पारिवारिक विवाद, घरेलू हिंसा,

• किसी प्रस्ताव से इनकार

• भूमि अथवा वित्त विवाद

• बेवफाई

• चोरी अथवा डकैती

• आकस्मिक दुर्घटना

• यौन हिंसा, बलात्कार

भारत में एसिड हमलों से संबंधित मामले -

1. 1998 मे महाराष्ट्र में एसिड हमले से संबंधित एक घटना घटित हुई जिसमें एक महिला अपने ढाई वर्ष के बच्चे को गोद में ली हुई थी, तभी उसके देवर ने उस पर एसिड से हमला कर दिया। इस हमले में महिला का चेहरा, बायाँ हाथ, बाईं छाती पूरी तरह से जल गई। साथ ही, महिला एवं उसके बच्चे की आँखों की रोशनी चली गई। कुछ दिनों बाद महिला की मृत्यु भी हो गई। इस मामले में देवर को भारतीय दंड संहिता की धारा-302 के तहत आजीवन कारावास के साथ-साथ 2000 रुपये का जुर्माना लगाया गया।

2. एक दूसरा मामला जो 2002 में घटित हुआ जिसमें पति द्वारा पत्नी के चरित्र पर संदेह के उपरांत उसके गुप्तांग में मरक्युरि क्लोराइड डाला गया। इसके उपरांत, पत्नी की मौत हो गई। इस मामले में पति को भारतीय दंड संहिता के धारा-302 और 307 के तहत सजा दी गई।

3. एक अन्य मामले में पति ने पत्नी पर एसिड हमला इसलिए किया कि उसका दूसरी स्त्री से नाजायज संबंध था और वह पत्नी को तलाक देना चाहता था। पत्नी के इनकार करने के बाद उसने इस घटना को अंजाम दिया जिसमें पत्नी कि मौत हो गई और दोषी को भारतीय दंड संहिता के धारा 302 के तहत सजा दी गई।

4. मद्रास उच्च न्यायालय में एक मामला आया था जिसमें पति को अपने पत्नी के चरित्र पर संदेह था। धीरे-धीरे वह तनाव में आने लगा और एक दिन पत्नी पर उसने एसिड से हमला कर दिया, जिसमें पत्नी की तत्काल मृत्यु हो गई और पति को भारतीय दंड संहिता के धारा-302 के तहत सजा सुनाई गई।

5. मद्रास उच्च न्यायालय में एक अन्य मामला आया जिसमे नर्स एवं महिला कंपाउंडर ने षड्यंत्र से एसिड फेंक कर डॉक्टर को मार डाला। यह मामला पूरी तरह से बदला लेने के उद्देश्य से किया गया था जिसमें डॉक्टर ने नर्स एवं महिला कंपाउंडर का यौन शोषण किया था। फिर भी, दोनों को भारतीय दंड संहिता के 302 और 109 के अंतर्गत दोषी ठहराया गया। लेकिन, साक्ष्य के अभाव में दोनों को अंत में छोड़ दिया गया।

उपर्युक्त घटनाओं से पता चलता है कि एसिड हमले का प्रयोग प्रायः गुस्से के कारण बदला लेने और व्यक्ति की हत्या करने के लिए किया जाता है।

उत्तरजीविता की यात्रा

सबसे बड़ी आवश्यकता इस बात की है कि एसिड हमले से पीड़ित महिलाओं को निःशुल्क एवं पर्याप्त इलाज करने की व्यवस्था की जाए। परंतु सब कुछ मौखिक रूप से ही सही माना जाता है जो बेहद गलत है। हकीकत में कुछ शहरों को अपवाद के रूप में छोड़कर देखा जाए तो स्थिति बड़ी खराब प्रतीत होती है। एसिड हमले से ग्रसित मामलों में, भारी संख्या में पीड़िता इलाज के अभाव में दम तोड़ देती हैं, जबकि कुछ निजी अस्पतालों में भारी खर्च पर इलाज कराती हैं।

जटिल चिकित्सकीय अवस्था (प्राथमिक अवस्था)

1. प्राथमिक जाँच चिकित्सक के द्वारा संपन्न हो।

2. प्राथमिक इलाज के लिए 'इंटेंसिव केयर यूनिट' में मरीज को भर्ती कराया जाए।

3. इलाज के अंतर्गत त्वचा, आघात नियंत्रण, एवं प्रोटीन युक्त भोजन पर ध्यान दिया जाए।

4. स्वास्थ्य देखभाल अच्छे वातावरण में संचालित हो जिसमें शारीरिक चिकित्सा, अच्छा बिस्तर, आघात नियंत्रण एवं प्रोटीन-युक्त भोजन शामिल है।

द्वितीय चिकित्सकीय अवस्था

1. अधिक से अधिक शारीरिक स्वास्थ्य पर ध्यान दिया जाए।

2. शल्य चिकित्सा शारीरिक रूप से पुनर्जीवन प्रदान करने वाली होनी चाहिए।

गैर-चिकित्सकीय स्वास्थ्य पहलू

1. मनोवैज्ञानिक परामर्श एवं संबल प्रदान किया जाए।

2. सामाजिक पुनर्जीवन एवं स्वीकार्यता प्रदान किया जाए।

3. समय-समय पर प्रशिक्षण एवं चिकित्सा प्रदान की जाए।

4. कानूनी सहायता प्रदान की जाए।

जले हुए मरीजों की विशेष आवश्यकताएँ

तेजाब से जलना सचमुच गंभीर मामला होता है जो मांस एवं हड्डी दोनों को जलाने के साथ-साथ असहनीय पीड़ा प्रदान करता है। तेजाब से जले व्यक्ति को महीनों अस्पताल में इलाज के साथ-साथ दर्द झेलना पड़ता है, जबकि पूरी तरह से ठीक होने में महीनों लग जाते हैं। इसके अतिरिक्त आँखों से पानी गिरना एवं रोशनी की कमी सदा के लिए नियति बन जाती है। तेजाब शरीर के हिस्से को इस कदर क्षतिग्रस्त करता है कि वहाँ की कोशिकाएँ पुनर्जीवन के लायक नहीं रह जाती। इसलिए शारीरिक चिकित्सा (फिजियोथेरेपी) भी इलाज के लिए अति आवश्यक है क्योंकि इसके अभाव में हाथ का पंजा मुट्ठी के आकार का बन जाता है। त्वचा, मांसपेशीय एवं लीगमेंट आपस में संकुचित होकर लोथड़ा बना लेते हैं। तीसरी आवश्यकता कैलोरीयुक्त एवं विटामिन से भरपूर भोजन की होती है जो नए कोशिकाओं के निर्माण के लिए अति आवश्यक है। जब तेजाब से जले शरीर को पूरा पोषण प्राप्त नहीं हो पाता तो उसका विकास रुक जाता है। जख्म संक्रमित होने के कारण सुचारु रूप से कार्य करना बंद कर देते हैं।

राष्ट्रिय वैधानिक सेवा प्राधिकरण (एनएएलएसए)

तेजाब से जले मामलों के लिए सभी राज्यों में निःशुल्क वैधानिक सेवा प्रदान करने का उपबंध किया गया है जो सभी राज्यों में लागू है। प्रत्येक राज्य में यह सेवा 'राज्य वैधानिक सेवा प्राधिकरण के नाम से जाना जाता है। वहीं प्रत्येक राज्यों के जिलों में 'जिला वैधानिक सेवा प्राधिकरण' के नाम से प्रकोष्ठ का गठन किया गया है जिसकी अध्यक्षता जिला न्यायधीश करते है। वैधानिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम-1987 की धारा-12 में निम्नवत उपबंध किए गए हैं।

1. उस व्यक्ति को जिसने केस फाइल किया है या बचाव कर रहा है, इस अधिनियम के 12वीं धारा के अंतर्गत सम्मिलित किया जाएगा।

2. व्यक्ति अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जनजाति का हो।

3. व्यक्ति सामान्य व्यक्ति हो अथवा भिखारी उसके साथ भारतीय संविधान के अनुच्छेद-23 के तहत ही व्यवहार किया जाएगा।

4. वह बालक भी हो सकता है।

5. वह मानसिक अथवा शारीरिक रूप से कमजोर हो सकता है।

6. ऐसी परिस्थितियों से जुड़ा व्यक्ति हो सकता है जो नृजातीय हिंसा, जातिगत शोषण, बढ़, सूखा, भूकंप अथवा औद्योगिक आपदा का शिकार हो।

7. एक औद्योगिक कामगार हो सकता है।

8. हिरासत में न्यायिक प्रक्रिया के अंतर्गत रखे व्यक्ति पर इमोरल ट्रेफिक प्रेवेंशन एक्ट- 1956; जुवेनाईल जस्टिस एक्ट-1986 एवं मेंटल हेल्थ एक्ट-1987 के तहत सुनवाई हो सकती है या कराएगी।

एसिड हमले से संबंधित कानून पर विचार

आपराधिक अधिनियम-2013 के पारित होने के साथ 2 अप्रैल, 2013 को भारतीय दंड संहिता में संशोधन किया गया। इसमे धारा-326 (अ) और 326 (ब) को विशेष रूप से एसिड हमले के संबंध में जोड़ा गया। ये धराए हैं -

धारा-326 (अ) कोई भी व्यक्ति जो एसिड अथवा किसी दूसरे साधन से किसी दूसरे व्यक्ति के शरीर के पूरे अथवा आंशिक भाग को जलाने, चोट पहुँचाने के इरादे से यह कृत्य करे उसको कानून के अनुसार कम से कम 10 वर्ष की कारावास सजा और अधिक से अधिक आजीवन कारावास दी जा सकती है। इसके अलावा मुआवजा भी देने का प्रावधान है। मुआवजे का सीधा संबंध पीड़िता के चिकित्सकीय इलाज के लिए धन प्राप्त करना होगा जो तर्कपूर्ण होगा।

धारा-326 (ब) अगर कोई व्यक्ति एसिड अथवा दूसरे साधन का प्रयोग करते हुए किसी व्यक्ति को पूरी तरह अथवा आंशिक रूप से घायल करने अथवा कुरूप बनाने के इरादे से प्रयास करता है तो उसे कम से कम पाँच वर्ष और अधिक से अधिक सात वर्ष की सजा दी जा सकती है। इसके साथ ही, मुआवजे का भी उपबंध किया जा सकता है।

एसिड हमले के संदर्भ में क्षतिपूर्ति

धारा-357 (ब) को भारतीय दंड संहिता में जोड़ा गया है।

निःशुल्क चिकित्सा मुहैया

धारा-357 (सी) नए रूप में जोड़ी गई है जिसके तहत यह उपबंध किया गया है कि एसिड हमले से प्रभावित व्यक्ति को सरकारी, गैर-सरकारी अथवा कोई भी स्थानीय स्तर के अस्पताल में निःशुल्क चिकित्सकीय सेवा उपलब्ध होगी तथा स्थानीय पुलिस को घटना की जानकारी देनी होगी। यह भारतीय दंड संहित की धारा 326, 376, 376 अ, 376 ब, 376 स, 376 द अथवा 376 ई के अंतर्गत दर्ज होगी।

निष्कर्ष एवं सुझाव

प्रारंभिक अध्ययनों से यह पता चलता है कि भारत में एसिड हमलें की घटनाएँ बढ़ रही हैं। इस समस्या से निजात पाने हेतु भारतीय दंड संहिता के तहत कोई स्वतंत्र धारा न विकसित करके इसे धारा-326 मे जोड़ा गया है, जो एसिड हमले की समस्या के निदान हेतु अपर्याप्त है। पहला, यह कि दुखड़ाई चोट की परिभाषा काफी संकीर्ण रूप में दी गई है। दूसरा, भारतीय दंड संहिता की धाराओं में एसिड के प्रबंधन का कोई सटीक उपबंध नहीं किया गया है। तीसरा, सजा का सटीक वर्णन न होने के कारण बहुत से दोषी बच निकलते हैं। चौथा, भारतीय दंड संहिता में कोई ऐसी धारा नहीं है जो एसिड हमले का इरादा रखने वाले के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई कर सके। हम यह भी महसूस करते हैं कि जो व्यक्ति आत्मरक्षा के नाम पर एसिड हमला करते हैं अथवा एसिड का प्रबंधन करते हैं, यह कैसे पता चलेगा कि व्यक्ति द्वारा एसिड का प्रयोग आत्मरक्षा के लिए किया गया है अथवा नहीं। इन सबके साथ-साथ हम यह भी महसूस करते हैं कि एसिड की बिक्री सिर्फ व्यावसायिक कार्यों के लिए की जानी चाहिए। साथ ही, एसिड खरीदने वाले लोगों का नाम रिकॉर्ड किया जाना चाहिए। हमें दुनिया के और मुल्कों में विद्यमान कानूनों की समीक्षा करनी चाहिए जो एसिड हमले से संबंध रखती है। भारत में, महिला आयोग ने यह सुझाव दिया है की एसिड हमले के मामले की सुनवाई उसके तत्वाधान में होनी चाहिए जो एक कारगर कदम होगा। हम यह भी महसूस करते हैं कि केवल एसिड हमले के मामले में क्षतिपूर्ति का उपबंध न करके और मामलों में भी क्षतिपूर्ति का उपबंध किया जाना चाहिए, जिनमें महिलाओं के कल्याण एवं पुनर्जीविता शामिल हो। क्षतिपूर्ति या हर्जाने के रूप में 10 लाख रुपये प्राप्त किए जाएँ। साथ ही, दोषी को 10 वर्ष की सजा के स्थान पर आजीवन कारावास की सजा दी जाए। यदि कोई व्यक्ति एसिड का प्रयोग शारीरिक रूप से नुकसान पहुँछाने, कष्ट पहुँचाने अथवा कुरूप बनाने हेतु करता है और वह अपने प्रयास में असफल होता है तो ऐसी स्थिति में उस व्यक्ति को 10 वर्ष की सजा एवं 5 लाख रुपये का जुर्माना अदा करना चाहिए। हम यह भी प्रस्ताव रखना चाहते हैं कि आपराधिक घाव क्षतिपूर्ति अधिनियम (The criminal injuries compensation act) लाया जाना चाहिए जो सरकार के कानून के सामानांतर कार्य करे जिसमें बलात्कार, एसिड हमला, यौन दुराचार के मामले शामिल हो। क्षतिपूर्ति की राशि सीधे पीड़ित के खाते में ली जानी चाहिए।


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